Tuesday, 12 April 2016

देश में बढ़ रहे जल संकट पर सरकार को सोचने की जरूत है


सरकार ने नेशनल हाइड्रोलॉजी पॉलिसी यानी राष्ट्रीय जल विज्ञान नीति बनाई है। देश में नदियों, तालाबों और भूमिगत जलाशयों में पानी उपलब्ध होता है। दरअसल ये तीनों स्नोत आपस में जुड़े हुए हैं, जैसे कि यदि यमुना के पानी को हथनीकुंड बैराज से सिंचाई के लिए निकाल लिया जाता है तो हथनीकुंड के नीचे यमुना सूख जाती है। परिणामस्वरूप यमुनानगर और पानीपत में भूमिगत जल का पुनर्भरण नहीं होता है। वैसे भी इस क्षेत्र में बोरवेल सूख रहे हैं और सिंचाई में कमी आ रही है। इसी प्रकार तालाबों में वर्षा का पानी जमा हो जाता है। इस पानी से भी भूमिगत जल का पुनर्भरण होता है। इस प्रकार नदी, तालाब और भूमिगत जलाशय एक दूसरे से जुड़े रहते हैं। अब तक की व्यवस्था में नदियों के पानी के आंकड़े सेंट्रल वॉटर कमीशन द्वारा एकत्रित किए जाते थे। भूमिगत जल के आंकड़े सेंट्रल ग्राउंड वॉटर बोर्ड द्वारा एकत्रित किए जाते थे। तालाबों के आंकड़े एकत्रित नहीं किए जाते थे, लेकिन केंद्र सरकार द्वारा नेशनल हाइड्रोलॉजी पॉलिसी बनाने के बाद अब पानी के ये सभी आंकड़े एक स्थान पर उपलब्ध होंगे। इस प्रकार अब हम आकलन कर सकेंगे कि हथनीकुंड से पानी निकालने से सिंचाई में कितनी वृद्धि हुई और यमुना के सूखने से सिंचाई में कितनी कमी आई। 1आंकड़े जुटाना जरूरी है, परंतु उपलब्ध आंकड़ों से ही साफ है कि लगभग पूरे देश में भूमिगत जल का स्तर तेजी से गिर रहा है। दस वर्ष पूर्व 200 फुट पर पानी उपलब्ध था तो आज 500 फुट पर मिल रहा है। सभी किसानों को अपने बोरवेल गहरे कराने पड़ रहे हैं। इस समस्या का सामना करने के लिए केंद्र सरकार ने राज्य सरकारों को सुझाव दिया है कि नए बोरवेल लगाने के लिए लाइसेंस लेना अनिवार्य कर दिया जाए। यह पॉलिसी सफल नहीं होगी, क्योंकि वर्तमान में लगे हुए बोरवेलों से ही भूमिगत जल का गिराव जारी रहेगा। इसके लिए उपाय यह है कि हर क्षेत्र में बोरवेल की अधिकतम गहराई को निर्धारित कर दिया जाए। जैसे किसी क्षेत्र में अधिकतम गहराई 200 फुट निर्धारित कर दी गई तब हर किसान 200 फुट तक उपलब्ध पानी को ही निकाल सकेगा। वर्षा के मौसम में पानी का जितना भरण 200 फुट की गहराई तक होगा उतना ही निकाला जा सकेगा। आज वही पानी का स्तर गिरकर 500 फुट नीचे तक जा रहा है और हर किसान उसे 500 फुट की गहराई से निकालने को मजबूर है। जाहिर है, इससे सभी किसानों का गहराई से पानी निकालने का खर्च बच जाएगा। 1भूमिगत जल का स्तर गिरने का दूसरा कारण बिजली पर दी जा रही सब्सिडी है। लगभग सभी राज्यों में किसानों को सस्ती दर पर बिजली दी जा रही है। कई राज्यों में मुफ्त बिजली भी दी जा रही है। इससे किसानों की प्रवृत्ति अधिक पानी को निकालने की बनती है। मान लीजिए किसी खेत की एक बार सिंचाई करने पर बिजली का खर्च 500 रुपया आता है, जबकि इससे उपज में 200 रुपये की वृद्धि होती है। जाहिर है, ऐसी सिंचाई करना उचित नहीं है जिसमें लागत ज्यादा और आय कम हो। फिर भी किसानों के लिए ऐसी सिंचाई करना लाभप्रद हो जाता है, क्योंकि उसे बिजली का मूल्य अदा नहीं करना होता है। इस प्रकार भी देश में पानी की भारी बर्बादी हो रही है। जरूरी है कि किसानों से बिजली और पानी का समुचित मूल्य वसूल किया जाए जिससे वह पानी का उचित उपयोग करे। इसके साथ ही फसलों के समर्थन मूल्य में पर्याप्त वृद्धि करनी चाहिए जिससे किसान पर अतिरिक्त बोझ न पड़े। यदि हमें पानी बचाना है तो फसलों पर भी नियंत्रण जरूरी है। राजस्थान के रेगिस्तान में मिर्च, दक्कन के पठार में अंगूर और गुजरात के सूखे क्षेत्रों में कपास की खेती की जा रही है। समृद्ध किसानों द्वारा भूमिगत जल का अति दोहन करके इन फसलों को उगाया जा रहा है। कानून बनाकर हर क्षेत्र में उन फसलों के उत्पादन पर प्रतिबंध लगाया जाए, जिनके उत्पादन के लिए पानी उपलब्ध नहीं है। उपरोक्त कदमों को लागू करने के लिए आंकड़े वर्तमान में उपलब्ध हैं। इन कदमों को लागू करने के लिए तत्काल कदम उठाने चाहिए।1हाइड्रोलॉजी पॉलिसी का विशेष लाभ नदियों के पानी का समुचित उपयोग का है। वर्तमान में सिंचाई विभाग के इंजीनियरों का प्रयास रहता है कि पानी के प्रत्यक्ष उपयोग को बढ़ाया जाए। नदियों पर तुंगभद्रा, सरदार सरोवर और भाखड़ा जैसी बड़ी झील बनाकर पानी का भंडारण किया जाता है। इस पानी को कमांड क्षेत्र में किसानों को उपलब्ध कराया जाता है। दूसरी ओर जलाशयों में पानी की हानि की अनदेखी की जाती है। झील से लगभग 15 प्रतिशत पानी का वाष्पीकरण हो जाता है। बांधों के नीचे नदी के सूख जाने से नीचे के क्षेत्र में भूमिगत जल का पुनर्भरण नहीं होता है। जैसे यमुनानगर से पानीपत तक यमुना के किनारे के बोरवेलों में पानी कम हो गया है। इस क्षेत्र में सिंचाई के क्षेत्र में गिरावट आ रही है। अत: जरूरी नहीं कि हथनीकुंड से सिंचाई में वृद्धि हो। केवल सिंचाई का स्थानांतरण हो सकता है। पूर्व में पानीपत में सिंचाई होती थी, अब हिसार में हो रही है। कुल सिंचाई कम हुई है तो भी हमें जानकारी नहीं है। अब तक बड़े बांधों के इन अप्रत्यक्ष प्रभावों का आकलन नहीं हो पाता था, क्योंकि नदी और भूमिगत जल के आंकड़े अलग-अलग संस्थाओं द्वारा एकत्रित किए जाते थे। नदी और भूमिगत जल के आपसी संबंध पर ध्यान नहीं जाता था। हाइड्रोलॉजी पॉलिसी के अंतर्गत व्यवस्था है कि पानी के सभी स्नोतों के आंकड़े एक ही स्थान पर उपलब्ध होंगे। इससे इनके परस्पर संबंध को सफाई से समझा जा सकेगा। मेरा मानना है कि इस संबंध के सामने आने के बाद हमारे समग्र जल प्रबंधन के आयाम इस प्रकार होंगे। हमें पूरे देश में भूमिगत जलाशयों का जाल बिछाना होगा। बरसात के पानी को भूमिगत जलाशयों में डालना होगा जिससे वह गर्मी के समय में उपयोग के लिए भूमि में सुरक्षित पड़ा रहे। भाखड़ा, टिहरी और सरदार सरोवर जैसे सभी बड़े जलाशयों को हटाना होगा। इनमें वाष्पीकरण से पानी का भारी नुकसान हो रहा है। इसके साथ ही नहरों के माध्यम से सिंचाई में पानी का भारी दुरुपयोग हो रहा है, क्योंकि किसान को पानी की मात्र के अनुसार मूल्य अदा नहीं करना पड़ता है। इन बांधों को हटाकर भूमिगत जलाशयों में पानी का भंडारण किया जाए तो वाष्पीकरण और पानी के दुरुपयोग दोनों से बचा जा सकता है। इस दिशा में नेशनल हाइड्रोलॉजी पॉलिसी के माध्यम से अच्छा कदम उठाया गया है। अब आगे के कदमों को लागू करने की जरूरत है।