Monday, 4 April 2016

सवालों के घेरे में उत्तराखंड

अरुणाचल प्रदेश में सत्ता परिवर्तन के बाद उत्तराखंड में जिन हालात में राष्ट्रपति शासन लगाना पड़ा उसके बाद अनुच्छेद 356 के इस्तेमाल को लेकर नए सिरे से बहस आरंभ हो गई है। इस बहस में एक अहम सवाल यह है कि क्या इस अनुच्छेद का इस्तेमाल राजनीतिक कारणों से किया जाता है? कांग्रेस मोदी सरकार पर आरोप लगा रही है कि वह उसकी राज्य सरकारों को एक के बाद एक अस्थिर कर रही है। इस पर भाजपा का कहना है कि अनुच्छेद 356 का सबसे अधिक दुरुपयोग तो कांग्रेस ने ही किया है और जहां तक अरुणाचल और उत्तराखंड की बात है तो इन दोनों राज्यों में कांग्रेसी विधायकों ने ही अपने मुख्यमंत्री के खिलाफ बगावत का झंडा बुलंद किया और इसके चलते जब संवैधानिक संकट की स्थिति उत्पन्न हुई तो मजबूरी में राष्ट्रपति शासन का सहारा लेना पड़ा। संविधान के अनुच्छेद 356 के जरिये केंद्र सरकार को यह अधिकार दिया गया है कि वह किसी राज्य में संवैधानिक संकट पैदा होने पर वहां की सरकार को बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन लागू करे। यह अधिकार इसलिए दिया गया है ताकि किसी राज्य में अराजकता की स्थिति न पैदा होने पाए और विधि का शासन चलता रहे। अब राष्ट्रपति शासन लागू करने के छह माह के भीतर उससे संबंधित प्रस्ताव को लोकसभा और राज्यसभा से पारित कराना पड़ता है। इसका मकसद यही है कि केंद्र सरकार इस अनुच्छेद का मनमाना इस्तेमाल न कर सके। एक समय ऐसा ही होता था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट की ओर से संसद के दोनों सदनों की मंजूरी की शर्त रखने के बाद मनमानी पर एक हद तक रोक लगी है। यह रोक सुप्रीम कोर्ट के एसआर बोम्मई बनाम केंद्र सरकार के फैसले से लगी।11988 में जब कर्नाटक की एसआर बोम्मई के नेतृत्व वाली जनता दल सरकार को अल्पमत की बताकर राष्ट्रपति शासन लगाया गया तो केंद्र की तत्कालीन राजीव गांधी सरकार के इस फैसले को चुनौती दी गई। यह मामला कर्नाटक हाई कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ तक पहुंचा। सुप्रीम कोर्ट ने 1994 में अपने ऐतिहासिक फैसले में व्यवस्था दी कि जब तक संसद के दोनों सदन राष्ट्रपति शासन लागू करने संबंधी निर्णय को मंजूरी नहीं देते तब तक विधानसभा भंग नहीं हो सकती। शीर्ष अदालत ने राष्ट्रपति शासन लागू करने के मामले को न्यायिक समीक्षा के दायरे में भी ला दिया। हालांकि कोर्ट कैबिनेट की ओर से राष्ट्रपति को दी गई सलाह को चुनौती नहीं दे सकता, लेकिन सलाह के आधार की समीक्षा कर सकता है। एक नजीर कायम करने और केंद्र-राज्य संबंधों को नए सिरे से परिभाषित करने वाले इस फैसले के बाद कुछ अवसरों पर सुप्रीम कोर्ट की ओर से राष्ट्रपति शासन लगाने के फैसले खारिज भी हुए। 1चूंकि आम तौर पर राष्ट्रपति शासन लागू करने का आधार किसी राज्य में संवैधानिक व्यवस्था विफल होना बताया जाता है इसलिए उत्तराखंड के मामले में इसकी कानूनी समीक्षा हो सकती है कि क्या इस राज्य में वास्तव में ऐसी स्थिति बन गई थी और क्या केंद्र सरकार ने अपने अधिकार का इस्तेमाल वाजिब तरीके से किया? इसके पहले अरुणाचल प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगाने के मामले पर सुनवाई करते हुए उच्चतम न्यायालय यह टिप्पणी कर चुका है कि अगर कुछ गलत हुआ है तो हम उसे सही कर देंगे। उत्तराखंड मामले में नैनीताल उच्च न्यायालय ने राष्ट्रपति शासन लगाने के फैसले के बाद हरीश रावत को सदन के भीतर अपना बहुमत साबित करने का फैसला दिया था, जिसे इसी उच्च न्यायालय की दो सदस्यीय पीठ ने रोक दिया। अब उसके फैसले का इंतजार है और असमंजस का माहौल कायम है। अनुच्छेद 356 के इस्तेमाल पर सवाल तब से ही उठ रहे हैं जब पहली बार नेहरू सरकार ने इस संवैधानिक प्रावधान का प्रयोग किया था। तब से लेकर आज तक जनता के मन में यही धारणा रहती है कि केंद्र इस प्रावधान का इस्तेमाल राजनीतिक कारणों से करता है। यह एक हद तक सही भी है, क्योंकि केंद्र की सत्ता में रहने के दौरान कांग्रेस ने सौ से अधिक बार अनुच्छेद 356 का इस्तेमाल कर राज्य सरकारों को बर्खास्त किया और उनमें से अधिकांश विरोधी दलों की सरकारें थीं। अकेले इंदिरा गांधी ने अपने प्रधानमंत्रित्व काल में लगभग 50 बार इस प्रावधान का इस्तेमाल किया। बोम्मई से संबंधित फैसले के बाद केंद्र सरकारें इस अनुच्छेद के इस्तेमाल के मामले में सतर्क हुई हैं। उन्हें डर रहता है कि उनके कदम की न्यायिक समीक्षा हो सकती है। 1पहले अरुणाचल और फिर उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन लागू करने के लिए कांग्रेस मोदी सरकार पर चाहे जैसे आरोप लगाए, इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि इन राज्यों में अपनी सरकारों की अस्थिरता के लिए वह खुद भी जिम्मेदार है। क्या कांग्रेस इस तथ्य से इन्कार कर सकती है कि दोनों ही राज्यों में उसके अपने विधायकों ने बगावत की? उत्तराखंड में पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के नेतृत्व में नौ विधायकों ने विनियोग विधायक के खिलाफ मतदान किया, जिसके बाद हरीश रावत सरकार अल्पमत में आ गई और यह विधेयक अर्थात बजट खटाई में पड़ गया। क्या इस स्थिति में भी केंद्र सरकार अपने संवैधानिक अधिकार का इस्तेमाल नहीं करती और इस राज्य को आर्थिक संकट का शिकार होने देती?1जो भी सरकार सत्ता से बेदखल होती है उसकी ओर से यह आरोप लगाना जितना सरल है कि ऐसा राजनीतिक कारणों से किया गया उतना ही मुश्किल उसके लिए अपने आरोपों के समर्थन में सुबूत पेश करना है। भाजपा को इस मामले में कांग्रेस के साथ राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप में उलझने से बचना होगा। अगर भाजपा इस बहस में पड़ेगी तो कांग्रेस को इस मामले को राजनीतिक रंग देने में मदद मिलेगी। यदि भाजपा के नेता और केंद्रीय मंत्री कांग्रेस को अनुच्छेद 356 के इस्तेमाल के मामले में उसके अतीत की याद भर दिलाते रहेंगे तो इससे बात बनने वाली नहीं है। यह कोई तर्क नहीं हुआ कि कांग्रेस ने भी सत्ता में रहते समय ऐसा किया था और जमकर किया था। ऐसे तर्को से तो आम जनता के बीच यही संदेश जाएगा कि भाजपा भी वही कर रही है जो कांग्रेस ने किया था। भाजपा यह कह कर खुद को सही साबित नहीं कर सकती कि कांग्रेस ने भी ऐसा किया था। भाजपा के समक्ष यह साबित करने की चुनौती है कि अरुणाचल और उत्तराखंड में संवैधानिक संकट उत्पन्न होने के कारण ही राष्ट्रपति शासन लगाया गया, न कि राजनीतिक लाभ उठाने के इरादे से। 1अनुच्छेद 356 का इस्तेमाल रुके, इसके लिए राजनीतिक दलों को राजनीतिक सुधारों की दिशा में बढ़ना होगा। यदि किसी सरकार के खिलाफ उसके अपने ही विधायक विद्रोह का झंडा उठाते हैं तो उनकी कहीं कोई सुनवाई होनी चाहिए। इसके अतिरिक्त विधानसभा अध्यक्ष को मनमाने फैसले लेने से रोका जाना चाहिए। आज के दौर में विधानसभा अध्यक्ष मुश्किल से ही निष्पक्ष होते हैं। आम तौर पर वे येन-केन-प्रकारेण अपने दल और मुख्यमंत्री का ही हित देखते हैं। कई बार मुख्यमंत्री से नाराज विधायक नेतृत्व परिवर्तन के लिए आवाज उठाते हैं, लेकिन जब उनकी सुनवाई नहीं होती तो वे विपक्षी दलों से मिलकर अपनी ही सरकार को गिराने की कोशिश करते हैं। अरुणाचल प्रदेश और उत्तराखंड में यही हुआ। अगर राजनीतिक सुधार नहीं किए जाते तो ऐसा आगे भी हो सकता है और खासकर कम सीटों वाली विधानसभाओं में