Tuesday, 22 March 2016

बनारस की होली होती है बेहद खास

भांग पान और ठंडाई की जुगलबंदी के साथ अल्हड़ मस्ती और हुल्लड़बाजी के रंगों में घुली बनारसी हीली की बात निराली है। फागुन का सुहानापन बनारस की होली में ऐसी जीवंता भरता है कि फिजा में रंगों का बखूबी अहसास होता है। बाबा काशी विश्वनाथ की नगरी में फाल्गुनी बयार भारतीय संस्कृति का दीदार कराती है, संकरी गलियों से होली की सुरीली धुन या चौराहों के होली मिलन समारोह बेजोड़ है। इतना ही नहीं गंगा घाटों पर आपसी सौहार्द के बीच रंगों की खुमारी का दीदार करने देश-विदेश के सैलानी जुटते हैं। यहां की खास मटका फोड़ होली और हुरियारों के ऊर्जामय लोकगीत हर किसी को अपने रंग में ढाल लेते हैं। फाग के रंग और सुबह-ए-बनारस का प्रगाढ़ रिश्ता यहां की विविधताओं का अहसास कराता है। गुझिया, मालपुए, जलेबी और विविध मिठाइयों, नमकीनों की खुशबू के बीच रसभरी अक्खड़ मिजाजी और किसी को रंगे बिना नहीं छोड़ने वाली बनारस की होली नायाब है।

मंदिरों, गलियों और गंगा घाटों से लबरेज इस उम्दा शहर का जिक्र जेहन में पुरातनता, पौराणिकता, धर्म एवं संस्कृति के साथ साड़ी, गलीचे, लंगड़ा आम आदि विशेषणों को ताजा कर देता है। अपने अनूठेपन के साथ काशी की होली अलग महत्व रखती है। काशी की होली बाबा विश्वनाथ के दरबार से शुरू होती है। रंगभरी एकादशी के दिन काशीवासी भोले बाबा संग अबीर-गुलाल खेलते हैं और फिर सभी होलियाना माहौल में रंग जाते हैं। होली का यह सिलसिला बुढ़वा मंगल तक चलता है। वही भांग और ठंडाई के बिना बनारसी होली की कल्पना भी नहीं कर सकते।यहां भांग को शिवजी का प्रसाद मानते हैं, जिस का रंग जमाने में अहम रोल होता है। होली पर यहां भांग का खास इंतजाम करते हैं। तमाम वरायटीज की ठंडाई घोटी जाती है, जिनमें केसर, पिस्ता, बादाम, मघईपान, गुलाब, चमेली,  भांग की ठंडई काफी प्रसिद्धहै। कई जगह ठंडई के साथ भांग के पकौडे़ बतौर स्नैक्स इस्तेमाल करते हैं,। भांग और ठंडई की मिठास और ढोल-नगाड़ों की थाप पर जब काशीवासी मस्त होकर गाते हैं, तो उनके आस पास का मौजूद कोई भी शख्स शामिल हुए बिना नहीं रह सकता।
 होली के समय बनारस के अस्सी घाट के बहुचर्चित कवि सम्मेलन के बिना बनारसी होली की चर्चा अधूरीहै। एक समय था, जब यहां मशहूर हास्य कवि चकाचक बनारसी, पं.धर्मशीलचतुर्वेदी, सांड बनारसी, बदरी विशाल, बेधड़क बनारसी, बेढब बनारसी आदि शरीक होतेथे।यहां हास्य के फुहारों के बीच संतरी हों या मंत्री, कलेक्टर हों या सरकार सबकी बखिया उधेड़ी जाती थीं और हंसी-मजाक के बीच संस्कृति, समाज और राष्ट्रकी मौजूदा गतिविधियों से रूबरू कराया जाता है।  'जोगीरासारा..रा..रा..रा..रा...' की हुंकार बनारस की होली का अलग अंदाज दरसाता है। जोगीरा की पुकार पर आसपास के हुरियारे वाह-वाही लगाए बिना नहीं रह सकते और यही विशेषता अल्हड़ मस्ती को दर्शाती है। इसके अलावा 'रंग बरसे भींगे चुनरवाली, रंगबरसे..' और 'होली खेले रघुबीरा अवध में होली खेले रघुबीरा' जैसे गीतों की धुनें भी भांग और ठंडाई से सराबोर पूरे बनारस को ही झूमा देती हैं।गंगा घाटों पर मस्ती का यह आलम रहता है कि विदेशी पर्यटक भी अपने को नहीं रोक पाते और रंगों में सराबोर हो ठुमके लगाते हैं। अगर बनारसी होली के सभी गाने मिला दें, तो सचमुच बनारस बना हुआ रस हो जाए।'

Monday, 14 March 2016

उलझन में पड़ी मीडिया


बीते शुक्रवार को जब दोपहर ढल रही थी तक मैंने अपना टेलीविजन ऑन किया और एक राष्ट्रीय समाचार चैनल लगाया। उम्मीद कर रहा था कि रात का खाना खाने से पहले कम से कम देश के हालात से जुड़ी कुछ खबरें देखने-सुनने को मिल जाएंगी। मुझे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा जब मैंने पाया कि करीब-करीब सभी अंग्रेजी समाचार चैनल दिल्ली में टैफिक जाम से जुड़ी खबरें दिखा रहे थे। कुछ चैनलों के न्यूज एंकर पूरी तन्मयता से दर्शकों को बता रहे थे कि 25 हजार शादियों और श्रीश्री रविशंकर की संस्था आर्ट ऑफ लिविंग द्वारा आयोजित सांस्कृतिक समारोह के कारण आज दिल्ली में ट्रैफिक जाम की भीषण समस्या पैदा हो गई है। उनका लहजा भय पैदा करने वाला था। जैसे कि वे सलाह दे रहे हों कि दिल्ली की जनता को यदि समस्या से पार पाना है तो अपने घरों में बंद रहना चाहिए। इसके बाद उनका ध्यान आर्ट ऑफ लिविंग के कार्यक्रम पर केंद्रित हो गया जहां प्रधानमंत्री अपना भाषण दे रहे थे। खबरों से यहां ऐसे संकेत मिल रहे थे कि पहले से ही नाजुक हो चुके दिल्ली के वातावरण को जीवनशैली से जुड़े एक गुरु का सांस्कृतिक जमावड़ा तहस-नहस कर देगा। इन लाइनों में छिपा संदेश साफ-साफ नजर आ रहा था कि हिंदूओं की भीड़ ने अपने पर्यावरण विरोधी कृत्यों और महंगी शादियों के कारण राजधानी को बंधक बना लिया है। 1सबसे अधिक विचित्र मुङो यह लगा कि समाचार चैनलों ने अपनी खबरों में दिल्ली में ट्रैफिक जाम को सबसे ज्यादा प्राथमिकता दी। दरअसल देश में हर कोई यह अच्छी तरह जानता है कि उसे अपनी नदियों को प्रदूषण मुक्त रखने के लिए क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए? मैं यह विश्वास नहीं कर सकता कि आर्ट ऑफ लिविंग संस्था भारत को प्रकृति से विरासत से मिली नदियों के विनाश की मंशा रखती है। इससे भी बढ़कर मेरे लिए यह भी कौतुहल की बात थी कि हमारे समाचार चैनलों में बैठे प्रोड्यूसर विश्वास करते हैं कि दिल्ली की किसी छोटी घटना में भारत के दूसरे शहरों में बैठे अंग्रेजी भाषी दर्शकों की गहरी दिलचस्पी होगी। जैसी कि आदत है या यह कहें कि मेरे लिए नियम बन गया है, मैं किसी भी शहर में होता हूं तो वहां की स्थानीय हलचल से रूबरू होने के लिए सुबह-सुबह अखबार देखना पसंद करता हूं। जब मैं हाल ही में कोलकाता के दौरे पर था तो मैं यह देखकर चकित रह गया कि शहर के प्रमुख अंग्रेजी समाचार पत्र ने अपने पूरे प्रथम पृष्ठ पर (विज्ञापनों के कारण अब उसे पहला पन्ना कहना भी मुश्किल है) दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में घटी थोड़ी विवादास्पद घटनाओं को स्थान दिया था। यह सच है कि कोलकाता में जेएनयू के पूर्व छात्रों का पूरा एक निकाय रहता है जो अपनी मातृ संस्था में क्या चल रहा है, यह जानने में दिलचस्पी रखता है, लेकिन क्या उस दिन धरती को झकझोर देने वाला ऐसा कुछ घटित हो गया था कि पूरा पहला पन्ना जेएनयू को समर्पित कर दिया जाता? 1समाचार चैनलों में उभरी इस विकृति के लिए आर्थिक कारण भी जिम्मेदार हैं। आर्थिक तंगी का सामना कर रहे समाचार चैनल अपना फोकस दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र पर इसलिए केंद्रित रखते हैं, क्योंकि इसमें कम लागत आती है। देश के दूरदराज क्षेत्रों में रोचक खबरें जुटाने के लिए आउटसाइड ब्रॉडकास्ट वैन यानी ओबी वैन और संवाददाताओं को भेजना उनके लिए खर्चीला होता है। उनके लिए यह कहीं बेहतर है कि अपने चौखट के सामने घटी घटनाओं को खबरों में प्रमुखता से जगह दें और उसे सच्चे अर्थो में राष्ट्रीय महत्व का बताएं। मीडिया प्रेमी आम आदमी पार्टी की दिल्ली में सरकार को भी इसी कारण लाभ मिल रहा है। मीडिया उसे राष्ट्रीय स्तर पर नरेंद्र मोदी की सरकार के विकल्प के रूप में देखता है और उससे तुलना करता है। इस प्रकार लागत में कटौती और राजनीतिक वजहों ने खबरों की कसौटी को बदल कर रख दिया है। पूर्व में यह माना जाता था कि राजनीति तो स्थानीय स्तर पर होती है। अब इस सिद्धांत को फिर से लिखा जा रहा है-इस संदेश के साथ कि दिल्ली तो हमेशा राष्ट्रीय है। दिल्ली ही देश नहीं है, लेकिन मीडिया का एक हिस्सा दिल्ली को ही समूचा देश मान बैठा है।1खबरों की कसौटी बदलने से विचित्र परिणाम सामने आए हैं। इस महीने के आरंभ में जेएनयू के छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार को अदालत द्वारा जमानत दी गई थी। उसके बाद एक हीरो की तरह जेएनयू में उसकी वापसी हुई। उसके भड़कीले भाषण को चैनलों पर लाइव दिखाया गया। करीब-करीब सभी चैनलों ने उसका साक्षात्कार दिखाया। पूरे मामले को एक तमाशे की तरह प्रस्तुत किया गया। इससे भी बढ़कर हास्यास्पद यह रहा कि मीडिया द्वारा उसके विद्रोही भाषण के आधार पर ही उसमें प्लेटो और यहां तक कि लेनिन के बराबर का एक राजनीतिक दार्शनिक देखा जाने लगा। मुङो नहीं लगता कि जेएनयू के एक युवा का यह महिमामंडन मोदी की चमक को फीका कर देगा और अंतत: संसद में भाजपा को विपक्ष में बैठने को मजबूर कर देगा। बहरहाल इससे दुनिया को इतना अवश्य पता चल गया है कि देश में कैंपस और टीवी स्टूडियो को भी राजनीति का अखाड़ा बनाया जा सकता है।1राजनीतिक विमर्श के केंद्र में दिल्ली को लाने से कुछ हास्यास्पद और कम महत्व के विषय मुख्यधारा में जगह पाने में सफल रहे हैं। इससे मीडिया में यह धारणा भी बैठ रही है कि वह बदलाव का अगुआ बन गया है। सोशल मीडिया के एक अवलोकन से पता चलता है कि एंकर और संवाददाता 140 शब्दों में अपने विचार प्रस्तुत करना ज्यादा पसंद करते हैं और खबरों को कवर करने में कम रुचि लेते हैं। 1श्रीश्री रविशंकर के आयोजन के मीडिया की नजरों में चढ़ने की एक वजह यह भी रही। आर्ट ऑफ लिविंग संस्था के प्रमुख को एक कपटी बाबा की तरह प्रस्तुत किया गया और यह दिखाने की कोशिश की गई कि संघर्ष प्रधानमंत्री के हिमदू समर्थकों के खिलाफ है। मुझे यह कहने में कोई हिचक नहीं है कि यदि यमुना के किनारे अल्पसंख्यक समुदाय से संबंधित किसी संगठन की ओर से इस तरह का सांस्कृतिक आयोजन किया गया होता तो मीडिया ने पर्यावरण की इतनी चिंता नहीं की होती। मीडिया ने उस समय कानून एवं व्यवस्था की भी चिंता नहीं की थी जब साल के आरंभ में मालदा जिले में धार्मिक ताकत का प्रदर्शन किया गया था। क्या मीडिया में मालदा की घटना को अपेक्षित जगह नहीं मिलने की वजह दिल्ली से उसकी दूरी थी? अथवा देश का वर्तमान राजनीतिक माहौल उसके लिए जिम्मेदार था जहां सभी विपक्षी पार्टियां चुनी हुई सरकार को नीचा दिखाने पर तुली हुई हैं? मुङो लगता है कि इस तरह के कठिन सवाल पूछने भर से काम नहीं चलेगा। कुछ ऐसा किया जाना चाहिए जिससे कुछ लोगों का भ्रम टूटे।

Monday, 7 March 2016

नारी के हक की लड़ाई


मनुष्य की हर सही परिभाषा मनुष्य का वह सहज स्वरूप है जिसे पाने की कोशिश और पाकर उससे तदाकार होने की इच्छा सब महसूस करते रहते हैं। इस दृष्टि से नारीवाद की सही परिभाषा के केंद्र में भी नारी का वह सहज स्वरूप पाने की इच्छा है जो उसे एक पुरुष के बराबर मानवीय गरिमा या हक पाने का सहज अधिकारी बना दे। केवल श्रद्धा या केवल सहनशीला मां की बजाय सबसे ऊपर उसकी सहज मनुष्यता समाज में स्वीकार की जाए, यह नारीवादी आग्रह विकृत या खतरनाक मानसिकता नहीं। यह तो एक समझदार इंसान की सहज इच्छा की ईमानदार अभिव्यक्ति है। यह सही है कि यह परिभाषा कोई स्थिर या बंधी-बंधाई तस्वीर नहीं, बल्कि निरंतर आगे बढ़ने वाली यात्र की ही झलक है, पर भारत की करोड़ों औरतों द्वारा गुजरे छह दशकों में एक अपूर्ण कामना को लगातार अपने समय के आईने में सारे राज समाज के आगे प्रतिबिंबित करते जाना और चरण दर चरण अपनी मुक्ति के पड़ाव हासिल करना कैसा सजीव, ऊर्जादायक और मर्मस्पर्शी प्रयास है, यह वही समझ सकता है जो मेरी तरह उसका चश्मदीद गवाह और कभी कभार भागीदार, दोनों रहा हो।11950 में संयुक्त राष्ट्र संगठन ने विश्व स्तर पर मानवाधिकारों की व्याख्या करते हुए विश्व युद्धों से घायल दुनिया को 10 दिसंबर के दिन सालाना मानवाधिकार दिवस मनाने का संदेश दिया था। उस व्याख्या का मसौदा बाइबिल के बाद दुनिया का सबसे अधिक अनूदित दस्तावेज बताया जाता है, लेकिन मानवाधिकार दिवसों की छह दशक से लंबी श्रृंखला और उस पर तमाम गहन चिंतन-मनन के बाद भी दुनिया में मानवाधिकारों की, खासकर महिला, बच्चों तथा हाशिये के समूहों के मानवाधिकारों की चिंदियां उड़ाया जाना जारी है। भारत भी इसका खास अपवाद नहीं दिखता। संयुक्त राष्ट्र की व्याख्या का कुल मिलाकर सार यह है कि दुनिया का हर मनुष्य स्त्री हो या पुरुष, कुछ सहज मानवाधिकारों का बुनियादी हकदार है और उसे जन्मना किसी तरह की हिंसक दमनकारिता से रहित वातावरण में अपनी मानवीय गरिमा बनाए रखने, समुचित शिक्षा तथा स्वास्थ्य सेवाएं तथा कमाई की सुविधा पाने का अधिकार मिलने चाहिए। लेकिन सिर्फ मसौदा भारतीय भाषाओं में अनूदित कर देने से तो कारगर नीतियां नहीं बनतीं। हाशिये पर सिमटी महिलाओं, बच्चों और तमाम तरह के अल्पसंख्य समूहों के मानवाधिकारों को बहुसंख्य समाज के सवर्ण पुरुषों के हकों के समतुल्य मानते हुए उनकी बहाली पर गंभीर ईमानदार पहल, विज्ञापनी नारेबाजी से इतर बहुत कम हुई है। उलटे यह हमको कई बार दिखता है कि आज भी उपरोक्त समूहों की हक बहाली की संभावना से अब तक अपनी लाठी से हर भैंस को हांकते आए ताकतवर समूह तथा जातीय पंचायतें महिलाओं, बच्चों, दलितों, अल्पसंख्यकों को संसद से सड़क तक और घर से कार्यक्षेत्र तक में बराबरी के अधिकार देने की बातों पर भड़क पड़ते हैं। उपरोक्त बात का एक मजेदार उदाहरण मार्च महीने में एक लोकप्रिय मनोरंजन चैनल द्वारा जारी किया गया विज्ञापन है। यह बड़ी भव्य लच्छेदार अंग्रेजी शब्दावली में बताता है कि उनका चैनल आठ मार्च यानी अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर कुछ अन्य कंपनियों के साथ मिलकर एक नौ सदस्यीय जूरी की मदद से मीडिया, मार्केटिंग तथा विज्ञापन के क्षेत्र में देश की 500 शीर्ष महिलाओं की फेहरिस्त जारी करेगा तथा उनको सम्मानित करेगा। जूरी मेंबरान में एक भी महिला को शुमार नहीं किया गया है। जाहिर है, इस अहम क्षेत्र में अभी भी पुरुषों की एकछत्रता में हम जिसे आदर्श नारी कहें वहीं आदर्श नारी हैकी मानसिकता कैसे मजे से पैर फैलाए पसरी हुई है। 1हर मनुष्य के पास एक जैसे मानवाधिकार हैं, यह दर्शन आज सामाजिक-राजनीतिक विषमता की आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक वजहों को भी टटोल रहा है। इसीलिए देश को कई ऐसे मानव निर्मित नियमानुशासन दिखने लगे हैं जो विषमता कायम रखे हैं। वे जानबूझकर एक विशिष्ट वर्ग को लिंग, जाति, आयु तथा आयवर्ग के आधार पर दूसरों से कहीं अधिक रेवड़ियां बांटते आए हैं और उनके भेदभाव को भेदभाव पर टिका राज समाज चतुर प्रतीकात्मक तौर से ओट दे देता है। कभी नारी को शक्ति कह पूजनीय बनाकर वास्तविकता पर पर्दा डाला जाता है तो कभी जरूरत के हिसाब से उसी शक्ति स्वरूपा को मनु के हवाले से पुरुषों की खाप पंचायतों की आधीनता में रहने को कहा जा रहा है। जरूरत पड़ी तो ढोल, गंवार..की कोटि में रखकर स्थिति के अनुसार उसे ताड़न का अधिकारी कह हिंसा को नारी जाति का सहज दुर्भाग्य बता दिया जाता है। लोकतांत्रिक सत्ता में बराबरी की भागीदारी की मांग पर महिलाओं, दलितों, पिछड़ों को पंचायतों में कोटा दिला दिया गया, पर शिक्षा या स्वास्थ्य सेवा तक सहज पहुंच अब तक नहीं सुनिश्चित की गई। नतीजतन उनका प्रदर्शन उम्मीदों से कमतर रहा है। अब उसको ही उनकी कुदरती अक्षमता का प्रमाण मानकर उनको संसद में आरक्षण न देने का तर्क पुष्ट किया जाता है। 1एक लोकतंत्र में राजनीति ही ताकत और अधिकारों के संतुलन का सबसे बड़ा जरिया है। इस दृष्टि से हमारी विधायिका में ताकतवर जड़ें बना चुकी महिलाओं का होना बहुत वजन रखता है। 2016 तक राजनीति में पुरुष आधिपत्य के बावजूद तीन नारियों ने केंद्र ही नहीं, बल्कि तीन बड़े राज्यों पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु में अपना निर्विवाद दबदबा मनवाया और मनवा रही हैं। उन पर कई तरह के लांछन लगे और वे लगातार अदालती विवादों में खींची गईं, लेकिन उनमें से कोई भी आरोप ऐसा नहीं जो राजनीति में सफल पुरुष नेताओं पर न लगता रहा हो। इसलिए वैचारिक मत भिन्नता के बावजूद हमको उनकी सहज जिजीविषा और क्षमता पर गर्व है। ममता बनर्जी, मायावती और जयललिता, इन तीनों ने बहुत कष्ट ङोलकर धारा के खिलाफ अकेले ही तैरा है। लंबे अर्से से राजनीति में उनको मिल रही सफलता और लोकप्रियता का रहस्य राजीव गांधी या कांशीराम या एमजीआर सरीखे पुरुष नेताओं के वरदहस्त से जोड़ने वालों को यह भी याद दिलाना जरूरी है कि इन तीनों की ताकत अपने राजनीतिक सरपरस्तों की मृत्यु के बाद भी घटी नहीं, बल्कि बढ़ी ही है और आज की तारीख में वे जिस मुकाम पर हैं वह उन्होंने अपनी हिम्मत, मेहनत और सूझबूझ से ही हासिल किया है उनका अटल वोट बैंक और चुनावी जीतों का निजी रिकॉर्ड बताता है कि अपनी मेहनत से अपने लिए कष्ट ङोलकर सहज अधिकार पाने वाली जुझारू महिला कितनी दूर जा सकती है।

Friday, 4 March 2016

लोक सभा में कांग्रेस को पीएम मोदी ने किया पानी-पानी



राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा के दौरान राहुल गांधी ने केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जमकर खिंचाई की थी। ऐसा करके उन्होंने सबका ध्यान अपनी ओर खींचा था, लेकिन जब प्रधानमंत्री के संबोधन की बारी आई तो उन्होंने कांग्रेस और राहुल गांधी को पानी-पानी कर दिया। उन्होंने इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के भाषणों का उल्लेख कर कांग्रेस की बोलती बंद कर दी। इस वार-पलटवार की अपनी-अपनी तरह से व्याख्या होगी-न केवल राजनीतिक दलों के स्तर पर, बल्कि मीडिया और सोशल मीडिया के स्तर पर भी। यह स्वाभाविक है, लेकिन अगर सत्तापक्ष-विपक्ष के बीच संसद चलाने को लेकर कोई सहमति नहीं बनती और पहले की तरह हंगामा-हल्ला होता रहता है तो फिर सब व्यर्थ है। चूंकि सभी प्रमुख राजनीतिक दल कभी न कभी सत्ता में रह चुके हैं इसलिए उनके पास एक दूसरे की गलतियां गिनाने के तमाम अवसर और उदाहरण होते हैं। अब तो ऐसे उदाहरण भी अनुकरणीय बताए जाने लगे हैं जिनमें संसदीय गरिमा का निरादर होता है। आखिर यह एक तथ्य है कि जब भाजपा विपक्ष में थी तब वह भी संसद की कार्यवाही सुचारू रूप से चलाने के लिए सत्तापक्ष का सहयोग नहीं करती थी। आज कांग्रेस जैसा व्यवहार कर रही है उसे देखते हुए आश्चर्य नहीं कि भविष्य में उसे अपने इस व्यवहार के लिए ताने सुनने पड़ें। इन स्थितियों में उचित यह होगा कि संसद को राजनीतिक दलों के आरोप-प्रत्यारोप से मुक्त करने के उपाय खोजे जाएं। 1यह इसलिए और भी आवश्यक है, क्योंकि विभिन्न मसलों पर सत्तापक्ष और विपक्ष तरह-तरह की दलीलों के साथ एक-दूसरे पर जो निशाना साधते हैं उससे इसका निर्णय बिल्कुल भी नहीं हो पाता कि आखिर किसकी बात सही है और कौन जीता और कौन हारा? आम जनता के पास इतना समय भी नहीं है कि वह दिन भर संसद की कार्यवाही देखती रहे। यदि वह ऐसा करे भी संसद में उसके मन मुताबिक कुछ होने वाला नहीं है। संसद में वही होगा जो राजनीतिक दल चाहेंगे और आज तो स्थिति यह है कि यदि किसी दल के चार सांसद ठान लें कि संसद नहीं चलने देनी है तो वे अपने मकसद में बहुत आसानी से सफल हो जाते हैं। इन स्थितियों में संसदीय कार्यवाही के नए तौर-तरीकों को अमल में लाए जाने की जरूरत है। सभी दल मिल-बैठकर विचार करें कि आरोप-प्रत्यारोप के दलदल से निकलकर संसद को सही तरह से कैसे चलाया जाए? ऐसा कोई उपाय अपनाया जा सकता है कि संसद के प्रत्येक सत्र के दो हिस्से हों। एक हिस्से में विभिन्न मसलों पर जमकर बहस हो और जिसको जो भी कहना हो उसकी पूरी छूट हो, लेकिन दूसरे हिस्से में केवल विधायी एजेंडे को पूरा करने पर ध्यान केंद्रित किया जाए। यदि ऐसा कोई उपाय नहीं सोचा जाता तो फिर संसद आम जनता की अपेक्षाओं पर खरी उतने वाली नहीं है और यह स्पष्ट ही है कि जोरदार-धारदार भाषणों से उसे कुछ न पहले हासिल हुआ है और आगे होने वाला है। संसद आम जनता की अपेक्षाओं को तभी पूरा कर सकती है जब वह अपनी वास्तविक भूमिका निभाती नजर आएगी।