Tuesday, 26 January 2016

दक्षिण बेंगलुरू का शिव मंदिर में शिवलिंग का तिलक सूर्य की रौशनी से होता है

दक्षिण बेंगलुरू में स्थित शिव का यह मंदिर है जहां साल में एक बार शिवलिंग का तिलक सूर्य की रौशनी से खुद होता है। वह भी तब जब सूर्य उत्तरायण दिशा की ओर हो। वह दिन होता है मकरसंक्रांति का दिन। यह मंदिर शहर का एक प्रमुख आकर्षण है। इसे गवीपुरम गुफा मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। यह अपने वास्तुशिल्पीय बनावट के लिए विख्यात है।
 इसे कुछ इस तरह बनाया गया है कि हर साल एक खास खास समय पर सूर्य की रौशनी मंदिर के गर्व गृह में रखी प्रतिमा पर पड़ती है।

भगवान शिव और गवी गंगाधरेश्वरा को समर्पित यह मंदिर इंडियन रॉक-कट आर्किटेक्चर का बेहतरीन नमूना है। इस मंदिर को 9वीं शताब्दी में एक मोनोलिथिक रॉक से बनाया गया था।
मकर संक्रांति के दिन गवी गंगाधरेश्वरा मंदिर में हजारों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं। यही वह दिन है जब सूर्य की रोशनी मंदिर में रखे शिवलिंग पर करीब एक घंटे तक पड़ती है। सूर्य की रोशनी मंदिर के सामने रखी नंदी के सिंघ के बीच से होकर गुजरती है। इससे यह पता चलता है कि हमारे प्रचीन मूर्तिकार खगोल विद्या और वास्तुशिल्प के कितने अच्छे जानकार थे।



भगवान शिव का तीर्थस्थल होने के अलावा मंदिर में अग्नि के भगवान की एक दुर्लभ प्रतिमा रखी गई है। आज गवी गंगाधरेश्वरा गुफा मंदिर एक स्मारक है, जो पुरातात्विक स्थल और अवशेष अधिनियम 1961 और कर्नाटक प्रचीन व ऐतिहासिक स्मारक के अंतर्गत संरक्षित है।

यह मंदिर काफी हद तक शहर के अंतर्गत ही आता है और बसवनगुड़ी के पास है। पर्यटकों को यहां पहुंचने में किसी तरह की परेशानी नहीं होती है।


यहां हर साल मकर संक्रांति के दिन इस विशेष नजारे को देखने के लिए देश-विदेश के अनेक शिवभक्त यहां आते हैं।  कहा जाता है कि यहां सूर्यदेव की किरणें भगवान शिव को तिलक करती हैं।
वास्तव में जब सूर्यदेव मकर संक्रांति के दिन उत्तरायण में आते हैं तो अपनी पवित्र और तेजयुक्त किरणों से भगवान शिव का अभिनंदन करते हैं।  यह नजारा प्रतिवर्ष दिखाई देता है और जब मकर संक्रांति के दिन शाम को सूर्य रश्मियां इस तरह गिरती हैं मानो वे शिवलिंग का तिलक कर रही हों।

इस अनूठे दृश्य में उल्लेखनीय यह है कि सूर्य रश्मियां मंडप और गुफा की दो खिड़कियों से आती हैं और नंदी के सींगों के मध्य से गुजरते हुए शिवलिंग का तिलक करती हैं।  यह दुर्लभ नजारा वर्ष में एक बार यानी मकर संक्रांति के दिन ही दिखाई देता है। इस अनूठे नजारे के दर्शन के लिए मकर संक्रांति के दिन शिवभक्तों की अपार भीड़ जुटती है।
 

Monday, 25 January 2016

गणतंत्र दिवस के अवसर पर राजपथ पर दुनिया ने देखा हिंदुस्तान का शौर्य



आज पूरे देश में 67वां गणतंत्र दिवस धूमधाम से मनाया जा रहा है। इस मौके पर राजपथ पर भारत की ताकत दिखाई गई । भारत की सैन्य शक्ति और विभिन्न क्षेत्रों में उसकी उपलब्धियां, अत्याधुनिक रक्षा प्रणाली, सांस्कृतिक विविधता, सामाजिक परंपराएं, आत्म-निर्भरता और स्वदेशीकरण पर सरकार का जोर, इन सभी की झलक 67वें गणतंत्र दिवस समारोह में परेड के दौरान आज राजपथ पर नजर आई । इस मौके पर फ्रांस के राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद मुख्य अतिथि हैं।





गणतंत्र दिवस समारोह के इतिहास में पहली बार फ्रांस की सेना का 76 सदस्यीय दल भी राजपथ पर भारत के राष्ट्रपति को सलामी दिया। इस दल में 48 संगीतकारों का दस्ता भी शामिल हुआ। परेड में 26 साल के बाद सेना के श्वान (कुत्ता) दस्ते के सदस्य भी अपने हैंडलर्स के साथ भाग लिया। परंपराओं के अनुसार, राजपथ पर बीएसएफ के उंट दस्ते के सजे-धजे रंग-बिरंगे 56 उंटों का दस्ता डिप्टी कमांडेंट कुलदीप जे. चौधरी के नेतृत्व में मार्च किया।

राजपथ पर संस्कृति और देश के उज्ज्वल भविष्य की झलक भी दिखाई गई। इस बार की झांकी में पंचायती राज की झांकी को शामिल किया गया। वही स्वच्छ भारत अभियान की झांकी दिखाई गयी। गोवा की झांकी में यहां की जागोर जनजाति और गुजरात की झांकी में गौरव की पहचान गीर के जंगल दिखाए गए। सिक्किम की झांकी में सागा दाबा यानी बुद्ध जयंती उत्सव को पेश किया गया। जम्मू-कश्मीर की झांकी में मेरा गांव मेरा जहां यानी स्वच्छ एवं हरित अभियान का प्रचार किया गया। राजस्थान की झांकी में जयपुर के गौरव हवा महल को दिखाया गया। हवा महल को 1799 में सवाई प्रताप सिंह ने बनवाया था। चंडीगढ़ की झांकी में सपनों के शहर में खुला स्वागत करते दिखाया गया। ओडिशा की झांकी में बंदाण महोत्सव दिखाया गया। बिहार की झांकी में चंपारण सत्याग्रह को दिखाया गया।





कर्नाटक की झांकी में कॉफ़ी की धरती कोडगु को दिखाया गया। छत्तीसगढ़ की झांकी में खैरागढ़ कला एवं संगीत विश्वविद्यालय को दिखाया गया। तमिलनाडु की झांकी में थोडा जनजाति की झलक दिखाई गई। उत्तराखंड की झांकी में रम्माण उत्सव की झलक दिखी। उत्तर प्रदेश की झांकी में जरदोई कला प्रदर्शित की गई। असम की झांकी में रोंगाली बीहू की झलक पेश की गई।