Sunday, 17 April 2016

वाराणसी के बीएचयू कैंपस में स्थापित नए काशी विश्वनाथ मंदिर की आखों देखी दास्ता

काशी एक शहर नही बल्कि आस्था विश्वास और मान्यताओं का संगम है।इस प्राचीन नगरी के कोने-कोने में समर्पण भरी आस्था देखने को मिलती है। इसका एक नाम काशी है तो दूसरा नाम बनारस । ऐसा माना जाता है कि जब पृथ्वी का निर्माण हुआ था तब सूर्य़ का पहली किरण काशी की धरती पर ही पड़ी थी और तभी से काशी ज्ञान और अध्यात्म का केन्द्र बन गई। काशी के नाम के साथ-साथ यहा स्थित काशी हिन्दू विश्वविद्यालय का नाम भी दुनिया भर में प्रसिध्द है। देश विदेश से छात्र यहां पर पढ़ाई करने आते है। इसी विश्वविद्यालय के परिसर में निर्मित है नया काशीविश्वनाथ मंदिर। इस मंदिर कि संकलपना पं. मदन मोहन मालवीय ने कि थी। उनके इस संकलपना को साकार किया बिड़ला ग्रुप ने। और इस भव्य मंदिर का निर्माण करवाया।। मंदिर के बाहर पूजा समाग्री की कई दूकाने है। जहां से भक्तगण प्रसाद और माला खरीदते है। और प्रवेश द्वार की ओर बढ़ते है। इस मंदिर का द्वार बेहद भव्य है। द्वार के ऊपर दोनों तरफ छतरीया बनी हुई है।

यहा से अंदर जाते ही विश्वनाथ मंदिर का विशाल परिषद दिखाई देता है। विशाल परिषद के बीच स्थित इस अद्भूद मंदिर का निर्माण सगमरमर और लाल पत्थर से किया गया है। मंदिर की कारगरी,नकासी देखने लायक है। मंदिर के शिखर पर घंटी नूमा आकृति बनाई गई है। जो इसकी सुन्दरता में चार चॉद लगाती है। मंदिर के अंदर मुख्य गर्भ गृह में भगवान शंकर का अतिसुंदर शिवलिंग स्थापित है। रोजाना सैकड़ों भक्त इस मंदिर में दर्शन करने आते है। भक्त गंगाजल से भगवान भोलेनाथ का अभिषेक करते है। और भोलेनाथ का आशीर्वाद प्राप्त करते है। बाबा भोलेनाथ का द्वार हर वर्ग हर जाति और हर संप्रदाय के लिए खुला है। दो मंजिला यह मंदिर अंदर से भी बेहद आकर्षक है। इसकी दिवारों पर सुंदर चित्रकारी कि गई है। मंदिर के बाहरी परिस में देवाधि देव महादेव का सवारी नंदी की प्रतिमा भी स्थापित है। महाशिवरात्रि और सावन के मौके पर यहां भक्तों की खासी भीड़ होती है। इस मौके पर विशेष कार्यक्रर्मों का आयोजन किया जाता है। जिसमें लाखों की संख्या में भक्त हिस्सा लेते है। विदेश से आने वाले भक्तों को भी यह मंदिर बेहद आकर्षक लगता है।  यहां पहुंचा हर वर्ग  बाबा भोलेनाथ के दर्शन कर धन्य हो जाता है। और यही कामना करता है भगवान अपने भक्तों पर अपनी कृपा बनाए रखेगें। 
 

Tuesday, 12 April 2016

देश में बढ़ रहे जल संकट पर सरकार को सोचने की जरूत है


सरकार ने नेशनल हाइड्रोलॉजी पॉलिसी यानी राष्ट्रीय जल विज्ञान नीति बनाई है। देश में नदियों, तालाबों और भूमिगत जलाशयों में पानी उपलब्ध होता है। दरअसल ये तीनों स्नोत आपस में जुड़े हुए हैं, जैसे कि यदि यमुना के पानी को हथनीकुंड बैराज से सिंचाई के लिए निकाल लिया जाता है तो हथनीकुंड के नीचे यमुना सूख जाती है। परिणामस्वरूप यमुनानगर और पानीपत में भूमिगत जल का पुनर्भरण नहीं होता है। वैसे भी इस क्षेत्र में बोरवेल सूख रहे हैं और सिंचाई में कमी आ रही है। इसी प्रकार तालाबों में वर्षा का पानी जमा हो जाता है। इस पानी से भी भूमिगत जल का पुनर्भरण होता है। इस प्रकार नदी, तालाब और भूमिगत जलाशय एक दूसरे से जुड़े रहते हैं। अब तक की व्यवस्था में नदियों के पानी के आंकड़े सेंट्रल वॉटर कमीशन द्वारा एकत्रित किए जाते थे। भूमिगत जल के आंकड़े सेंट्रल ग्राउंड वॉटर बोर्ड द्वारा एकत्रित किए जाते थे। तालाबों के आंकड़े एकत्रित नहीं किए जाते थे, लेकिन केंद्र सरकार द्वारा नेशनल हाइड्रोलॉजी पॉलिसी बनाने के बाद अब पानी के ये सभी आंकड़े एक स्थान पर उपलब्ध होंगे। इस प्रकार अब हम आकलन कर सकेंगे कि हथनीकुंड से पानी निकालने से सिंचाई में कितनी वृद्धि हुई और यमुना के सूखने से सिंचाई में कितनी कमी आई। 1आंकड़े जुटाना जरूरी है, परंतु उपलब्ध आंकड़ों से ही साफ है कि लगभग पूरे देश में भूमिगत जल का स्तर तेजी से गिर रहा है। दस वर्ष पूर्व 200 फुट पर पानी उपलब्ध था तो आज 500 फुट पर मिल रहा है। सभी किसानों को अपने बोरवेल गहरे कराने पड़ रहे हैं। इस समस्या का सामना करने के लिए केंद्र सरकार ने राज्य सरकारों को सुझाव दिया है कि नए बोरवेल लगाने के लिए लाइसेंस लेना अनिवार्य कर दिया जाए। यह पॉलिसी सफल नहीं होगी, क्योंकि वर्तमान में लगे हुए बोरवेलों से ही भूमिगत जल का गिराव जारी रहेगा। इसके लिए उपाय यह है कि हर क्षेत्र में बोरवेल की अधिकतम गहराई को निर्धारित कर दिया जाए। जैसे किसी क्षेत्र में अधिकतम गहराई 200 फुट निर्धारित कर दी गई तब हर किसान 200 फुट तक उपलब्ध पानी को ही निकाल सकेगा। वर्षा के मौसम में पानी का जितना भरण 200 फुट की गहराई तक होगा उतना ही निकाला जा सकेगा। आज वही पानी का स्तर गिरकर 500 फुट नीचे तक जा रहा है और हर किसान उसे 500 फुट की गहराई से निकालने को मजबूर है। जाहिर है, इससे सभी किसानों का गहराई से पानी निकालने का खर्च बच जाएगा। 1भूमिगत जल का स्तर गिरने का दूसरा कारण बिजली पर दी जा रही सब्सिडी है। लगभग सभी राज्यों में किसानों को सस्ती दर पर बिजली दी जा रही है। कई राज्यों में मुफ्त बिजली भी दी जा रही है। इससे किसानों की प्रवृत्ति अधिक पानी को निकालने की बनती है। मान लीजिए किसी खेत की एक बार सिंचाई करने पर बिजली का खर्च 500 रुपया आता है, जबकि इससे उपज में 200 रुपये की वृद्धि होती है। जाहिर है, ऐसी सिंचाई करना उचित नहीं है जिसमें लागत ज्यादा और आय कम हो। फिर भी किसानों के लिए ऐसी सिंचाई करना लाभप्रद हो जाता है, क्योंकि उसे बिजली का मूल्य अदा नहीं करना होता है। इस प्रकार भी देश में पानी की भारी बर्बादी हो रही है। जरूरी है कि किसानों से बिजली और पानी का समुचित मूल्य वसूल किया जाए जिससे वह पानी का उचित उपयोग करे। इसके साथ ही फसलों के समर्थन मूल्य में पर्याप्त वृद्धि करनी चाहिए जिससे किसान पर अतिरिक्त बोझ न पड़े। यदि हमें पानी बचाना है तो फसलों पर भी नियंत्रण जरूरी है। राजस्थान के रेगिस्तान में मिर्च, दक्कन के पठार में अंगूर और गुजरात के सूखे क्षेत्रों में कपास की खेती की जा रही है। समृद्ध किसानों द्वारा भूमिगत जल का अति दोहन करके इन फसलों को उगाया जा रहा है। कानून बनाकर हर क्षेत्र में उन फसलों के उत्पादन पर प्रतिबंध लगाया जाए, जिनके उत्पादन के लिए पानी उपलब्ध नहीं है। उपरोक्त कदमों को लागू करने के लिए आंकड़े वर्तमान में उपलब्ध हैं। इन कदमों को लागू करने के लिए तत्काल कदम उठाने चाहिए।1हाइड्रोलॉजी पॉलिसी का विशेष लाभ नदियों के पानी का समुचित उपयोग का है। वर्तमान में सिंचाई विभाग के इंजीनियरों का प्रयास रहता है कि पानी के प्रत्यक्ष उपयोग को बढ़ाया जाए। नदियों पर तुंगभद्रा, सरदार सरोवर और भाखड़ा जैसी बड़ी झील बनाकर पानी का भंडारण किया जाता है। इस पानी को कमांड क्षेत्र में किसानों को उपलब्ध कराया जाता है। दूसरी ओर जलाशयों में पानी की हानि की अनदेखी की जाती है। झील से लगभग 15 प्रतिशत पानी का वाष्पीकरण हो जाता है। बांधों के नीचे नदी के सूख जाने से नीचे के क्षेत्र में भूमिगत जल का पुनर्भरण नहीं होता है। जैसे यमुनानगर से पानीपत तक यमुना के किनारे के बोरवेलों में पानी कम हो गया है। इस क्षेत्र में सिंचाई के क्षेत्र में गिरावट आ रही है। अत: जरूरी नहीं कि हथनीकुंड से सिंचाई में वृद्धि हो। केवल सिंचाई का स्थानांतरण हो सकता है। पूर्व में पानीपत में सिंचाई होती थी, अब हिसार में हो रही है। कुल सिंचाई कम हुई है तो भी हमें जानकारी नहीं है। अब तक बड़े बांधों के इन अप्रत्यक्ष प्रभावों का आकलन नहीं हो पाता था, क्योंकि नदी और भूमिगत जल के आंकड़े अलग-अलग संस्थाओं द्वारा एकत्रित किए जाते थे। नदी और भूमिगत जल के आपसी संबंध पर ध्यान नहीं जाता था। हाइड्रोलॉजी पॉलिसी के अंतर्गत व्यवस्था है कि पानी के सभी स्नोतों के आंकड़े एक ही स्थान पर उपलब्ध होंगे। इससे इनके परस्पर संबंध को सफाई से समझा जा सकेगा। मेरा मानना है कि इस संबंध के सामने आने के बाद हमारे समग्र जल प्रबंधन के आयाम इस प्रकार होंगे। हमें पूरे देश में भूमिगत जलाशयों का जाल बिछाना होगा। बरसात के पानी को भूमिगत जलाशयों में डालना होगा जिससे वह गर्मी के समय में उपयोग के लिए भूमि में सुरक्षित पड़ा रहे। भाखड़ा, टिहरी और सरदार सरोवर जैसे सभी बड़े जलाशयों को हटाना होगा। इनमें वाष्पीकरण से पानी का भारी नुकसान हो रहा है। इसके साथ ही नहरों के माध्यम से सिंचाई में पानी का भारी दुरुपयोग हो रहा है, क्योंकि किसान को पानी की मात्र के अनुसार मूल्य अदा नहीं करना पड़ता है। इन बांधों को हटाकर भूमिगत जलाशयों में पानी का भंडारण किया जाए तो वाष्पीकरण और पानी के दुरुपयोग दोनों से बचा जा सकता है। इस दिशा में नेशनल हाइड्रोलॉजी पॉलिसी के माध्यम से अच्छा कदम उठाया गया है। अब आगे के कदमों को लागू करने की जरूरत है।

Monday, 4 April 2016

सवालों के घेरे में उत्तराखंड

अरुणाचल प्रदेश में सत्ता परिवर्तन के बाद उत्तराखंड में जिन हालात में राष्ट्रपति शासन लगाना पड़ा उसके बाद अनुच्छेद 356 के इस्तेमाल को लेकर नए सिरे से बहस आरंभ हो गई है। इस बहस में एक अहम सवाल यह है कि क्या इस अनुच्छेद का इस्तेमाल राजनीतिक कारणों से किया जाता है? कांग्रेस मोदी सरकार पर आरोप लगा रही है कि वह उसकी राज्य सरकारों को एक के बाद एक अस्थिर कर रही है। इस पर भाजपा का कहना है कि अनुच्छेद 356 का सबसे अधिक दुरुपयोग तो कांग्रेस ने ही किया है और जहां तक अरुणाचल और उत्तराखंड की बात है तो इन दोनों राज्यों में कांग्रेसी विधायकों ने ही अपने मुख्यमंत्री के खिलाफ बगावत का झंडा बुलंद किया और इसके चलते जब संवैधानिक संकट की स्थिति उत्पन्न हुई तो मजबूरी में राष्ट्रपति शासन का सहारा लेना पड़ा। संविधान के अनुच्छेद 356 के जरिये केंद्र सरकार को यह अधिकार दिया गया है कि वह किसी राज्य में संवैधानिक संकट पैदा होने पर वहां की सरकार को बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन लागू करे। यह अधिकार इसलिए दिया गया है ताकि किसी राज्य में अराजकता की स्थिति न पैदा होने पाए और विधि का शासन चलता रहे। अब राष्ट्रपति शासन लागू करने के छह माह के भीतर उससे संबंधित प्रस्ताव को लोकसभा और राज्यसभा से पारित कराना पड़ता है। इसका मकसद यही है कि केंद्र सरकार इस अनुच्छेद का मनमाना इस्तेमाल न कर सके। एक समय ऐसा ही होता था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट की ओर से संसद के दोनों सदनों की मंजूरी की शर्त रखने के बाद मनमानी पर एक हद तक रोक लगी है। यह रोक सुप्रीम कोर्ट के एसआर बोम्मई बनाम केंद्र सरकार के फैसले से लगी।11988 में जब कर्नाटक की एसआर बोम्मई के नेतृत्व वाली जनता दल सरकार को अल्पमत की बताकर राष्ट्रपति शासन लगाया गया तो केंद्र की तत्कालीन राजीव गांधी सरकार के इस फैसले को चुनौती दी गई। यह मामला कर्नाटक हाई कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ तक पहुंचा। सुप्रीम कोर्ट ने 1994 में अपने ऐतिहासिक फैसले में व्यवस्था दी कि जब तक संसद के दोनों सदन राष्ट्रपति शासन लागू करने संबंधी निर्णय को मंजूरी नहीं देते तब तक विधानसभा भंग नहीं हो सकती। शीर्ष अदालत ने राष्ट्रपति शासन लागू करने के मामले को न्यायिक समीक्षा के दायरे में भी ला दिया। हालांकि कोर्ट कैबिनेट की ओर से राष्ट्रपति को दी गई सलाह को चुनौती नहीं दे सकता, लेकिन सलाह के आधार की समीक्षा कर सकता है। एक नजीर कायम करने और केंद्र-राज्य संबंधों को नए सिरे से परिभाषित करने वाले इस फैसले के बाद कुछ अवसरों पर सुप्रीम कोर्ट की ओर से राष्ट्रपति शासन लगाने के फैसले खारिज भी हुए। 1चूंकि आम तौर पर राष्ट्रपति शासन लागू करने का आधार किसी राज्य में संवैधानिक व्यवस्था विफल होना बताया जाता है इसलिए उत्तराखंड के मामले में इसकी कानूनी समीक्षा हो सकती है कि क्या इस राज्य में वास्तव में ऐसी स्थिति बन गई थी और क्या केंद्र सरकार ने अपने अधिकार का इस्तेमाल वाजिब तरीके से किया? इसके पहले अरुणाचल प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगाने के मामले पर सुनवाई करते हुए उच्चतम न्यायालय यह टिप्पणी कर चुका है कि अगर कुछ गलत हुआ है तो हम उसे सही कर देंगे। उत्तराखंड मामले में नैनीताल उच्च न्यायालय ने राष्ट्रपति शासन लगाने के फैसले के बाद हरीश रावत को सदन के भीतर अपना बहुमत साबित करने का फैसला दिया था, जिसे इसी उच्च न्यायालय की दो सदस्यीय पीठ ने रोक दिया। अब उसके फैसले का इंतजार है और असमंजस का माहौल कायम है। अनुच्छेद 356 के इस्तेमाल पर सवाल तब से ही उठ रहे हैं जब पहली बार नेहरू सरकार ने इस संवैधानिक प्रावधान का प्रयोग किया था। तब से लेकर आज तक जनता के मन में यही धारणा रहती है कि केंद्र इस प्रावधान का इस्तेमाल राजनीतिक कारणों से करता है। यह एक हद तक सही भी है, क्योंकि केंद्र की सत्ता में रहने के दौरान कांग्रेस ने सौ से अधिक बार अनुच्छेद 356 का इस्तेमाल कर राज्य सरकारों को बर्खास्त किया और उनमें से अधिकांश विरोधी दलों की सरकारें थीं। अकेले इंदिरा गांधी ने अपने प्रधानमंत्रित्व काल में लगभग 50 बार इस प्रावधान का इस्तेमाल किया। बोम्मई से संबंधित फैसले के बाद केंद्र सरकारें इस अनुच्छेद के इस्तेमाल के मामले में सतर्क हुई हैं। उन्हें डर रहता है कि उनके कदम की न्यायिक समीक्षा हो सकती है। 1पहले अरुणाचल और फिर उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन लागू करने के लिए कांग्रेस मोदी सरकार पर चाहे जैसे आरोप लगाए, इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि इन राज्यों में अपनी सरकारों की अस्थिरता के लिए वह खुद भी जिम्मेदार है। क्या कांग्रेस इस तथ्य से इन्कार कर सकती है कि दोनों ही राज्यों में उसके अपने विधायकों ने बगावत की? उत्तराखंड में पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के नेतृत्व में नौ विधायकों ने विनियोग विधायक के खिलाफ मतदान किया, जिसके बाद हरीश रावत सरकार अल्पमत में आ गई और यह विधेयक अर्थात बजट खटाई में पड़ गया। क्या इस स्थिति में भी केंद्र सरकार अपने संवैधानिक अधिकार का इस्तेमाल नहीं करती और इस राज्य को आर्थिक संकट का शिकार होने देती?1जो भी सरकार सत्ता से बेदखल होती है उसकी ओर से यह आरोप लगाना जितना सरल है कि ऐसा राजनीतिक कारणों से किया गया उतना ही मुश्किल उसके लिए अपने आरोपों के समर्थन में सुबूत पेश करना है। भाजपा को इस मामले में कांग्रेस के साथ राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप में उलझने से बचना होगा। अगर भाजपा इस बहस में पड़ेगी तो कांग्रेस को इस मामले को राजनीतिक रंग देने में मदद मिलेगी। यदि भाजपा के नेता और केंद्रीय मंत्री कांग्रेस को अनुच्छेद 356 के इस्तेमाल के मामले में उसके अतीत की याद भर दिलाते रहेंगे तो इससे बात बनने वाली नहीं है। यह कोई तर्क नहीं हुआ कि कांग्रेस ने भी सत्ता में रहते समय ऐसा किया था और जमकर किया था। ऐसे तर्को से तो आम जनता के बीच यही संदेश जाएगा कि भाजपा भी वही कर रही है जो कांग्रेस ने किया था। भाजपा यह कह कर खुद को सही साबित नहीं कर सकती कि कांग्रेस ने भी ऐसा किया था। भाजपा के समक्ष यह साबित करने की चुनौती है कि अरुणाचल और उत्तराखंड में संवैधानिक संकट उत्पन्न होने के कारण ही राष्ट्रपति शासन लगाया गया, न कि राजनीतिक लाभ उठाने के इरादे से। 1अनुच्छेद 356 का इस्तेमाल रुके, इसके लिए राजनीतिक दलों को राजनीतिक सुधारों की दिशा में बढ़ना होगा। यदि किसी सरकार के खिलाफ उसके अपने ही विधायक विद्रोह का झंडा उठाते हैं तो उनकी कहीं कोई सुनवाई होनी चाहिए। इसके अतिरिक्त विधानसभा अध्यक्ष को मनमाने फैसले लेने से रोका जाना चाहिए। आज के दौर में विधानसभा अध्यक्ष मुश्किल से ही निष्पक्ष होते हैं। आम तौर पर वे येन-केन-प्रकारेण अपने दल और मुख्यमंत्री का ही हित देखते हैं। कई बार मुख्यमंत्री से नाराज विधायक नेतृत्व परिवर्तन के लिए आवाज उठाते हैं, लेकिन जब उनकी सुनवाई नहीं होती तो वे विपक्षी दलों से मिलकर अपनी ही सरकार को गिराने की कोशिश करते हैं। अरुणाचल प्रदेश और उत्तराखंड में यही हुआ। अगर राजनीतिक सुधार नहीं किए जाते तो ऐसा आगे भी हो सकता है और खासकर कम सीटों वाली विधानसभाओं में

Tuesday, 22 March 2016

बनारस की होली होती है बेहद खास

भांग पान और ठंडाई की जुगलबंदी के साथ अल्हड़ मस्ती और हुल्लड़बाजी के रंगों में घुली बनारसी हीली की बात निराली है। फागुन का सुहानापन बनारस की होली में ऐसी जीवंता भरता है कि फिजा में रंगों का बखूबी अहसास होता है। बाबा काशी विश्वनाथ की नगरी में फाल्गुनी बयार भारतीय संस्कृति का दीदार कराती है, संकरी गलियों से होली की सुरीली धुन या चौराहों के होली मिलन समारोह बेजोड़ है। इतना ही नहीं गंगा घाटों पर आपसी सौहार्द के बीच रंगों की खुमारी का दीदार करने देश-विदेश के सैलानी जुटते हैं। यहां की खास मटका फोड़ होली और हुरियारों के ऊर्जामय लोकगीत हर किसी को अपने रंग में ढाल लेते हैं। फाग के रंग और सुबह-ए-बनारस का प्रगाढ़ रिश्ता यहां की विविधताओं का अहसास कराता है। गुझिया, मालपुए, जलेबी और विविध मिठाइयों, नमकीनों की खुशबू के बीच रसभरी अक्खड़ मिजाजी और किसी को रंगे बिना नहीं छोड़ने वाली बनारस की होली नायाब है।

मंदिरों, गलियों और गंगा घाटों से लबरेज इस उम्दा शहर का जिक्र जेहन में पुरातनता, पौराणिकता, धर्म एवं संस्कृति के साथ साड़ी, गलीचे, लंगड़ा आम आदि विशेषणों को ताजा कर देता है। अपने अनूठेपन के साथ काशी की होली अलग महत्व रखती है। काशी की होली बाबा विश्वनाथ के दरबार से शुरू होती है। रंगभरी एकादशी के दिन काशीवासी भोले बाबा संग अबीर-गुलाल खेलते हैं और फिर सभी होलियाना माहौल में रंग जाते हैं। होली का यह सिलसिला बुढ़वा मंगल तक चलता है। वही भांग और ठंडाई के बिना बनारसी होली की कल्पना भी नहीं कर सकते।यहां भांग को शिवजी का प्रसाद मानते हैं, जिस का रंग जमाने में अहम रोल होता है। होली पर यहां भांग का खास इंतजाम करते हैं। तमाम वरायटीज की ठंडाई घोटी जाती है, जिनमें केसर, पिस्ता, बादाम, मघईपान, गुलाब, चमेली,  भांग की ठंडई काफी प्रसिद्धहै। कई जगह ठंडई के साथ भांग के पकौडे़ बतौर स्नैक्स इस्तेमाल करते हैं,। भांग और ठंडई की मिठास और ढोल-नगाड़ों की थाप पर जब काशीवासी मस्त होकर गाते हैं, तो उनके आस पास का मौजूद कोई भी शख्स शामिल हुए बिना नहीं रह सकता।
 होली के समय बनारस के अस्सी घाट के बहुचर्चित कवि सम्मेलन के बिना बनारसी होली की चर्चा अधूरीहै। एक समय था, जब यहां मशहूर हास्य कवि चकाचक बनारसी, पं.धर्मशीलचतुर्वेदी, सांड बनारसी, बदरी विशाल, बेधड़क बनारसी, बेढब बनारसी आदि शरीक होतेथे।यहां हास्य के फुहारों के बीच संतरी हों या मंत्री, कलेक्टर हों या सरकार सबकी बखिया उधेड़ी जाती थीं और हंसी-मजाक के बीच संस्कृति, समाज और राष्ट्रकी मौजूदा गतिविधियों से रूबरू कराया जाता है।  'जोगीरासारा..रा..रा..रा..रा...' की हुंकार बनारस की होली का अलग अंदाज दरसाता है। जोगीरा की पुकार पर आसपास के हुरियारे वाह-वाही लगाए बिना नहीं रह सकते और यही विशेषता अल्हड़ मस्ती को दर्शाती है। इसके अलावा 'रंग बरसे भींगे चुनरवाली, रंगबरसे..' और 'होली खेले रघुबीरा अवध में होली खेले रघुबीरा' जैसे गीतों की धुनें भी भांग और ठंडाई से सराबोर पूरे बनारस को ही झूमा देती हैं।गंगा घाटों पर मस्ती का यह आलम रहता है कि विदेशी पर्यटक भी अपने को नहीं रोक पाते और रंगों में सराबोर हो ठुमके लगाते हैं। अगर बनारसी होली के सभी गाने मिला दें, तो सचमुच बनारस बना हुआ रस हो जाए।'

Monday, 14 March 2016

उलझन में पड़ी मीडिया


बीते शुक्रवार को जब दोपहर ढल रही थी तक मैंने अपना टेलीविजन ऑन किया और एक राष्ट्रीय समाचार चैनल लगाया। उम्मीद कर रहा था कि रात का खाना खाने से पहले कम से कम देश के हालात से जुड़ी कुछ खबरें देखने-सुनने को मिल जाएंगी। मुझे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा जब मैंने पाया कि करीब-करीब सभी अंग्रेजी समाचार चैनल दिल्ली में टैफिक जाम से जुड़ी खबरें दिखा रहे थे। कुछ चैनलों के न्यूज एंकर पूरी तन्मयता से दर्शकों को बता रहे थे कि 25 हजार शादियों और श्रीश्री रविशंकर की संस्था आर्ट ऑफ लिविंग द्वारा आयोजित सांस्कृतिक समारोह के कारण आज दिल्ली में ट्रैफिक जाम की भीषण समस्या पैदा हो गई है। उनका लहजा भय पैदा करने वाला था। जैसे कि वे सलाह दे रहे हों कि दिल्ली की जनता को यदि समस्या से पार पाना है तो अपने घरों में बंद रहना चाहिए। इसके बाद उनका ध्यान आर्ट ऑफ लिविंग के कार्यक्रम पर केंद्रित हो गया जहां प्रधानमंत्री अपना भाषण दे रहे थे। खबरों से यहां ऐसे संकेत मिल रहे थे कि पहले से ही नाजुक हो चुके दिल्ली के वातावरण को जीवनशैली से जुड़े एक गुरु का सांस्कृतिक जमावड़ा तहस-नहस कर देगा। इन लाइनों में छिपा संदेश साफ-साफ नजर आ रहा था कि हिंदूओं की भीड़ ने अपने पर्यावरण विरोधी कृत्यों और महंगी शादियों के कारण राजधानी को बंधक बना लिया है। 1सबसे अधिक विचित्र मुङो यह लगा कि समाचार चैनलों ने अपनी खबरों में दिल्ली में ट्रैफिक जाम को सबसे ज्यादा प्राथमिकता दी। दरअसल देश में हर कोई यह अच्छी तरह जानता है कि उसे अपनी नदियों को प्रदूषण मुक्त रखने के लिए क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए? मैं यह विश्वास नहीं कर सकता कि आर्ट ऑफ लिविंग संस्था भारत को प्रकृति से विरासत से मिली नदियों के विनाश की मंशा रखती है। इससे भी बढ़कर मेरे लिए यह भी कौतुहल की बात थी कि हमारे समाचार चैनलों में बैठे प्रोड्यूसर विश्वास करते हैं कि दिल्ली की किसी छोटी घटना में भारत के दूसरे शहरों में बैठे अंग्रेजी भाषी दर्शकों की गहरी दिलचस्पी होगी। जैसी कि आदत है या यह कहें कि मेरे लिए नियम बन गया है, मैं किसी भी शहर में होता हूं तो वहां की स्थानीय हलचल से रूबरू होने के लिए सुबह-सुबह अखबार देखना पसंद करता हूं। जब मैं हाल ही में कोलकाता के दौरे पर था तो मैं यह देखकर चकित रह गया कि शहर के प्रमुख अंग्रेजी समाचार पत्र ने अपने पूरे प्रथम पृष्ठ पर (विज्ञापनों के कारण अब उसे पहला पन्ना कहना भी मुश्किल है) दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में घटी थोड़ी विवादास्पद घटनाओं को स्थान दिया था। यह सच है कि कोलकाता में जेएनयू के पूर्व छात्रों का पूरा एक निकाय रहता है जो अपनी मातृ संस्था में क्या चल रहा है, यह जानने में दिलचस्पी रखता है, लेकिन क्या उस दिन धरती को झकझोर देने वाला ऐसा कुछ घटित हो गया था कि पूरा पहला पन्ना जेएनयू को समर्पित कर दिया जाता? 1समाचार चैनलों में उभरी इस विकृति के लिए आर्थिक कारण भी जिम्मेदार हैं। आर्थिक तंगी का सामना कर रहे समाचार चैनल अपना फोकस दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र पर इसलिए केंद्रित रखते हैं, क्योंकि इसमें कम लागत आती है। देश के दूरदराज क्षेत्रों में रोचक खबरें जुटाने के लिए आउटसाइड ब्रॉडकास्ट वैन यानी ओबी वैन और संवाददाताओं को भेजना उनके लिए खर्चीला होता है। उनके लिए यह कहीं बेहतर है कि अपने चौखट के सामने घटी घटनाओं को खबरों में प्रमुखता से जगह दें और उसे सच्चे अर्थो में राष्ट्रीय महत्व का बताएं। मीडिया प्रेमी आम आदमी पार्टी की दिल्ली में सरकार को भी इसी कारण लाभ मिल रहा है। मीडिया उसे राष्ट्रीय स्तर पर नरेंद्र मोदी की सरकार के विकल्प के रूप में देखता है और उससे तुलना करता है। इस प्रकार लागत में कटौती और राजनीतिक वजहों ने खबरों की कसौटी को बदल कर रख दिया है। पूर्व में यह माना जाता था कि राजनीति तो स्थानीय स्तर पर होती है। अब इस सिद्धांत को फिर से लिखा जा रहा है-इस संदेश के साथ कि दिल्ली तो हमेशा राष्ट्रीय है। दिल्ली ही देश नहीं है, लेकिन मीडिया का एक हिस्सा दिल्ली को ही समूचा देश मान बैठा है।1खबरों की कसौटी बदलने से विचित्र परिणाम सामने आए हैं। इस महीने के आरंभ में जेएनयू के छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार को अदालत द्वारा जमानत दी गई थी। उसके बाद एक हीरो की तरह जेएनयू में उसकी वापसी हुई। उसके भड़कीले भाषण को चैनलों पर लाइव दिखाया गया। करीब-करीब सभी चैनलों ने उसका साक्षात्कार दिखाया। पूरे मामले को एक तमाशे की तरह प्रस्तुत किया गया। इससे भी बढ़कर हास्यास्पद यह रहा कि मीडिया द्वारा उसके विद्रोही भाषण के आधार पर ही उसमें प्लेटो और यहां तक कि लेनिन के बराबर का एक राजनीतिक दार्शनिक देखा जाने लगा। मुङो नहीं लगता कि जेएनयू के एक युवा का यह महिमामंडन मोदी की चमक को फीका कर देगा और अंतत: संसद में भाजपा को विपक्ष में बैठने को मजबूर कर देगा। बहरहाल इससे दुनिया को इतना अवश्य पता चल गया है कि देश में कैंपस और टीवी स्टूडियो को भी राजनीति का अखाड़ा बनाया जा सकता है।1राजनीतिक विमर्श के केंद्र में दिल्ली को लाने से कुछ हास्यास्पद और कम महत्व के विषय मुख्यधारा में जगह पाने में सफल रहे हैं। इससे मीडिया में यह धारणा भी बैठ रही है कि वह बदलाव का अगुआ बन गया है। सोशल मीडिया के एक अवलोकन से पता चलता है कि एंकर और संवाददाता 140 शब्दों में अपने विचार प्रस्तुत करना ज्यादा पसंद करते हैं और खबरों को कवर करने में कम रुचि लेते हैं। 1श्रीश्री रविशंकर के आयोजन के मीडिया की नजरों में चढ़ने की एक वजह यह भी रही। आर्ट ऑफ लिविंग संस्था के प्रमुख को एक कपटी बाबा की तरह प्रस्तुत किया गया और यह दिखाने की कोशिश की गई कि संघर्ष प्रधानमंत्री के हिमदू समर्थकों के खिलाफ है। मुझे यह कहने में कोई हिचक नहीं है कि यदि यमुना के किनारे अल्पसंख्यक समुदाय से संबंधित किसी संगठन की ओर से इस तरह का सांस्कृतिक आयोजन किया गया होता तो मीडिया ने पर्यावरण की इतनी चिंता नहीं की होती। मीडिया ने उस समय कानून एवं व्यवस्था की भी चिंता नहीं की थी जब साल के आरंभ में मालदा जिले में धार्मिक ताकत का प्रदर्शन किया गया था। क्या मीडिया में मालदा की घटना को अपेक्षित जगह नहीं मिलने की वजह दिल्ली से उसकी दूरी थी? अथवा देश का वर्तमान राजनीतिक माहौल उसके लिए जिम्मेदार था जहां सभी विपक्षी पार्टियां चुनी हुई सरकार को नीचा दिखाने पर तुली हुई हैं? मुङो लगता है कि इस तरह के कठिन सवाल पूछने भर से काम नहीं चलेगा। कुछ ऐसा किया जाना चाहिए जिससे कुछ लोगों का भ्रम टूटे।