Tuesday, 6 October 2015

बिहार में महागठबंधन कौन पास कौन फेल?

वैसे तो बिहार का देश की राजनीति में हमेशा एक महत्वपूर्ण योगदान रहा है !कहते है कि दिल्ली कि सत्ता का रास्ता बिहार से होकर ही गुजरता है ! लेकिन इस बार का चुनाव थोड़ा भिन्न है,बिहार के इतिहास में शायद ऐसा पहली बार हुआ है ! जब एक साथ कई सारी पार्टियाँ दाव आजमाने को तैयार है !
एक ओर विकास का चेहरा बने नीतीश कुमार जहां लालू और काँग्रेस के साथ मिलकर बिहार की गद्दी एक बार फिर सँभालने को तैयार है वही भारतीय जनता पार्टी भी कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती ‘ रा.ज.द से निष्कासित साँसद बाहुबली पप्पू यादव ने जहां मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी के साथ मिलकर तीसरा मोर्चा खोल अपनी चुनौती को बरकरार रखा है ! वहीं ओबैसी की पार्टी AIMIM ने मुस्लिमि बाहुल सीमांचल में अपने उम्मीदवार उतारकर लालू के वोट बैंक पर प्रहार किया है !
कुछ पार्टी जिसके पास शायद खोने को ज्यादा नहीं है ! वो भी किसी और बड़ी पार्टी के पतवार के सहारे अपनी नैया पार लगाना चाहते है !जिसका ताजा उदाहरण मॉँझी की पार्टी हिन्दुस्तान आवाम मोर्चा है ! महागठबंधन के इस महाखेल में लालू की पार्टी राजद ,जे डी यू और कांग्रेस सहित तीन पार्टियां है!

वहीं भारतीय जनता दल की सहयोगी पार्टियों में पासवान की लोजपा ,उपेन्द्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक समता पार्टी और मॉँझी की हिन्दुस्तान आवाम मोर्चा सहित चार पार्टियाँ है !
तीसरा मोर्चा में समाजवादी पार्टी और पप्पू यादव की जान अधिकार पार्टी सहित कुल दो पार्टियाँ है ! और ओवैसी की AIMIM अकेली चुनाव लड़ रही है ! इतनी सारी पार्टियों की इस चुनावी खिचड़ी में देखना है कि कौन अपनी दाल गलाने में कामयाब हो पाता है!
अगर बात हम सम्भावनायो की करे तो मामला काफी दिलचस्प सा लगता है !
विकास का चेहरा लिए नीतीश कुमार को लालू की पार्टी रा ज द से गठबंधन महँगा पड़ सकता है !
वहीं काफी समय से सत्ता से बाहर चल रहे लालू यादव के लिए सत्ता से और बाहर रहना संभव नहीं होगा !
इन्होने तो इस चुनाव को पहले ही पिछडो और अगड़ो की लड़ाई घोषित कर चुके है ! वहीं बाहुबली पप्पू यादव ने जहां यादवो का नया नेता बनकर लालू की परेशानी बढा दी है तो ओवैसी ने मुस्लिम वोटो के दम पर अपनी पार्टी की राष्ट्रीय राजनीति चमकाने की कोशिश की है ! याद रहे कि ओवैसी को महाराष्ट्र में भी आंशिक सफलता मिली थी !

लालू के यादव और मुस्लिम वोटो पर पप्पू यादव और ओवैसी का प्रहार देखकर तो लगता है कि इस बार भी लालू की राह आसान नही होगी !
अब रही बात भारतीय जनता पार्टी और उसके सहयोगी दल की, तो उनके सामने कोई ख़ास चुनौती नहीं जान पड़ती ,क्योकि जहां मोदी का भ्रष्टाचार मुक्त चेहरा और उनकी एक कद्दावर नेता की छवि है !वही उनकी देश-विदेश में लोकप्रियता का परचम चरम पर है!
साथ ही ओवैसी मुस्लिम वोट काटकर अप्रत्यक्ष रूप से भारतीय जनता पार्टी को ही मदद पहुँचा रहे है !
बहरहाल ,नतीजा जो भी हो ,कुल दस पार्टियो के इस चुनावी महासंग्राम में ऊँट किस करवट बैठता है ,ये तो बक्त ही बताएगा !

Thursday, 1 October 2015

वो आखिर सफर और हमारी यादे

अजीब दिन थे । बाहों में बाहें डाले चहलकदमी करते रहने के दिन । उतरते हुए सूरज और ढलती हुई शामों के दिन । दूजे के हाथों प्रेम संदेशा पहुँचाने के दिन । गली के नुक्कड़ पर उसका इतंजार करते रहने के दिन । किताबों के आखिरी सफहों पर मन में पिघल रहे कुछ शब्दों को लिख देने के दिन ।

ऐसे ही उन दिनों में कस्बाई सपने, जो सुबह सूरज के साथ उगते थे और ढलती हुई शामों के साथ छतों से कपड़ों की तरह उतार लिये जाते थे । कई आँखें थी आस पास जो मिल जाने पर शरमा कर झुक जाया करती थीं। कई आँखों में दबे-छुपे से प्रणय निवेदन तो कई आँखें जो भुलायी नहीं जा सकती । शराफत के दिन, नजाकत के दिन, मोहब्बत के दिन, आरजुओं के दिन ।

वो उसे बस यूँ ही एक रोज़ अपनी छुट्टियों के होने पर वापसी में घर जाते हुए उसी स्टेशन पर मिल गयी । तब ना यूँ किसी को 'फ्लर्ट' करने के तरीके आते थे और ना ही कोई किसी को 'इम्प्रेस' करने की कोशिश किया करता था । बहुत सादगी हुआ करती थी । एक दूजे के आमने सामने बैठे हुए भी कई घंटे बिना बात किये हुए बीत जाते थे और जो नज़रें मिल जाएँ तो अन्दर ही अन्दर अजीब सी हलचल सी मच जाया करती थी ।

कनिका, हाँ यही तो नाम बताया था उसने जब वो विनय को दूसरी बार फिर यूँ ही उसी रास्ते घर को जाने के लिये स्टेशन पर मिली थी । फिर हर बार ही उनमें कुछ ऐसी अनकही बातें सी हो गयीं थीं कि छुट्टियां होने पर वो स्टेशन पर एक दूजे का इंतज़ार किया करते और जब तक दूसरा ना आ जाता तब तक पहला ना जाता । बड़े सुहाने दिन थे, तब शायद वो रेलगाड़ियाँ भी दोस्त हुआ करती थीं । जो दोनों के साथ हो जाने तक वहीँ खड़ी रहती थीं।


कनिका  को विनय  दो स्टेशन पहले ही उतरना होता था । तब आज की तरह उन कस्बाई रूहों में बाय बाय या टाटा-टाटा कहने का रिवाज नहीं हुआ करता था । बस विनय उसका सामान उसे उसके रेलगाड़ी से नीचे उतर जाने पर पकड़ा दिया करता था और कनिका "अच्छा" कहती हुई चली जाया करती थी ।

जब साथ हुआ करते तो उन्हें सब पता रहता था कि अब कौन सा स्टेशन आएगा या किस स्टेशन पर कौन सी खाने की चीज़ अच्छी मिलती है । दूसरे के बोलने से पहले ही कोई बोल पड़ता कि चलो ये खायें या फिर कभी कभी दोनों एक साथ ही बोल पड़ते, ये भी एक अजीब बात थी कि दोनों की जुबान से एक से ही लफ्ज़ निकलते थे
साथ वापस आते और फिर साथ ही दोबारा कॉलेज जाते हुए उस दूर बसे दूसरे शहर के लिये दिल में कुछ पैदा हो गया था । शायद ऐसा कुछ कि क्या ये नहीं हो सकता कि ये जिंदगी ऐसे ही सफ़र करते हुए कट जाए । कहने को तो ना ही कनिका ने कुछ कहा था और ना ही विनय ने कभी कुछ पूंछना चाहा ।

उन्हीं दिनों में जब "आई लव यू" कहने का रिवाज़ ना था । ना ही कोई अपने प्रेम का इजहार यूँ खुले रूप में करता था । मौन स्वीकृतियां ही प्रेम कहानी बन जाया करती थी । तब तो बस वही भोले भाले से प्रेम पत्र हुआ करते थे जो कि चाहने वालों के दिलों से निकली हुई आवाजें दूजे के दिल तक पहुँचाया करते थे ।

वो चेहरे के भाव, वो आँखें, वो ख़ामोशी और फिर रह रहकर कुछ बात कर लेने की आदत । सब कुछ तो याद हो गया था विनय को । एक दूजे की कई आदतें पता चल चुकी थीं, उन किये हुए सफर के दौरान । दोनों ओर से मौन रहते हुए भी, कुछ भी ऐसा नहीं था कि जो कहने को बाकी था ।

तब उस रोज़ वो अकेली नहीं थी । एक बुजुर्ग चेहरा भी उस चेहरे के साथ था । साफ़ था, कि वो जाहिरी तौर पर उसके पिताजी ही थे । उस रोज़ रेलगाड़ी भी वही थी और सफ़र करने वाले भी वही, मगर आँखों में ख़ुशी नहीं थी । सवाल तो कभी उन आँखों ने पूंछे ही न थे । तब उस रोज़ की ख़ामोशी ने सब कुछ पहले ही बयाँ कर दिया था । ऐसी गहरी ख़ामोशी तो कभी न रही थी उस चेहरे पर जो कि सीधे दिल में उतर जाए और छा जाए एक खामोश पल बनकर ।

जब रेलगाड़ी से उतरते हुए उसने वो किताब उस बुजुर्ग चेहरे के सामने ही विनय को वापस की थी । तो बहुत कुछ तो बिना जाने ही उस दिल को आभास हो चला था ।

किताब का आखिरी सफ़हा जो कि अब कनिका की जुबाँ थी और जो कह रही थी । अब अगले बरस मैं नहीं आ सकूँगी, आगे की पढाई शायद अब मैं ना कर सकूँ । पिताजी अब यही चाहते हैं ।

उस आखिरी सफ़हे का साफ़ कहना था कि अब कनिका फिर इस सफ़र पर नहीं आएगी और आगे की पढाई ना करने का मतलब था कि उसके पिताजी ने उसका रिश्ता कहीं तय कर दिया है । उस रोज़ वो कनिका का आखिरी सफ़र था जिसमें कब कौन सा स्टेशन गुज़र गया, ना ही तो कनिका ने जानना चाहा था और ना ही विनय ने ।

ट्रेन से उतर जब वो उस पुल पर पहुँची थी तब उसने पलट कर एक बार देखा था और जाते हुए अपना रुमाल गिराया था । विनय तब चाहते हुए भी वहाँ पहुँच वो रुमाल नहीं उठा सका था । रेलगाड़ी में उसका सामान रखा हुआ था । किताबें, पेन, कपड़े और वो आखिरी किताब भी जिसके आखिरी सफ़हे पर कनिका के लिखे हुए आखिरी लफ्ज़ थे । रेलगाड़ी चल दी थी और तब विनय के पास इतना वक़्त ना था कि वो दौड़कर जाकर उस रुमाल को उठा ले । उसकी आखिरी निशानी भी तो ना ले सका था विनय।

इतने बरस बीत गये । पता नहीं कहाँ होगी कनिका । उस आखिरी रोज़ के आखिरी सफ़र में वो निशानी भी जाती रही ।



बिहार की सियायसत पर पार्टीयों का विजन डॉक्‍यूमेंट

बिहार विधानसभा चुनाव को लेकर भारतीय जनता पार्टी ने गुरुवार को अपना विजन डॉक्‍यूमेंट जारी किया. इसमें दक्षिण भारत के सियासी दलों के वादों की झलक दिखती है. खासकर गरीबों को साड़ी, टीवी जैसे लोकलुभावन वादे अन्‍नाद्रमुक और द्रमुक के चुनावी घोषणापत्र में होते थे, अब भाजपा के विजन डॉक्‍यूमेंट में शामिल है.
विजन डॉक्‍यूमेंट में छात्रों और युवाओं पर विशेष जोर दिया गया है. इसमें बिहार को कथित जंगलराज से मुक्त कराकर विकसित करने का वादा किया गया है. विजन डॉक्‍यूमेंट जारी करते हुए केंद्रीय वित्तमंत्री अरुण जेटली ने कहा कि भाजपा के विजन डॉक्‍यूमेंट में बिहार को आर्थिक दृष्टि से पिछड़ेपन से निकालने का संकल्प है. इसमें महिला सशक्तीकरण, पर्यावरण, प्रशासनिक सुधार और सुशासन पर बल दिया गया है.
विजन डॉक्‍यूमेंट में भाजपा ने युवा, महिलाओं और किसानों को मुख्य तौर पर ध्यान में रखा है. इसमें 'मेक इन बिहार' और 'डिजिटल बिहार' का नारा दिया गया है. साथ ही किसानों के लिए जहां अलग बजट बनाने की बात कही गई है, वहीं बिजली की स्थिति में सुधार का वादा करते हुए मतदाताओं को आकर्षित करने का प्रयास किया गया है.

भाजपा ने विजन डॉक्‍यूमेंट में प्रत्येक साल 10वीं और 12वीं कक्षा की 5,000 छात्राओं को मेधा के आधार पर स्कूटी तथा मेधावी छात्र-छात्राओं को लैपटॉप देने का वादा किया है. इसके अलावा दलित और महादलित परिवारों को रंगीन टीवी भी देने का वादा किया गया है.
विजन डॉक्‍यूमेंट में राज्य को पिछड़ेपन से मुक्ति दिलाकर आर्थिक रूप से संपन्न बनाने का वादा किया गया है तथा युवाओं को राज्य में ही रोजगार के अवसर मुहैया कराने, उच्च शिक्षा के साथ प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के साथ अधिक अवसर मुहैया कराने के संकल्प लिए गए हैं.
भाजपा ने किसानों को आकर्षित करने के लिए विजन डॉक्‍यूमेंट में उन्हें ब्याज दर मुक्त कृषि ऋण देने, पानी-बिजली की समस्या दूर करते हुए बीज और उर्वरकों की उपलब्धता सरल बनाने की बात कही है. साथ ही गरीबों को हर साल धोती और साड़ी देने का वादा किया गया है. राज्य में नए जिले, अनुमंडल और प्रखंड बनाने का वादा भी किया गया है.