Thursday, 30 July 2015

अकेलापन हम सभी को परेशान करता है

अकेलापन हम सभी को परेशान करता है। थोड़ा-सा अकेले होते नहीं है कि तुरंत फेसबुक खोल लिया, फ़ोन मिला लिया। इतना ही नहीं, अगर आप किसी और को अकेला देख लेते हो, तो बोलते हो, ‘क्या हुआ? इतना उदास क्यों हो?’ जैसे की अकेला होना उदास होने का सुबूत है। अगर हॉस्टल में रहते हो और सारे दोस्त घर चले जाते हैं तो पागल हो जाते हो, भागते हो। अकेलेपन से हमें डर इसलिए लगता है क्योंकि हमें जो कुछ भी मिला हुआ है, वो दूसरों से ही मिला हुआ है। और दूसरों से जो मिला है, उसके अलावा हमने आपने आप को कभी जाना नहीं है। तो यह दूसरे जब कुछ देर के लिए जीवन से हटते हैं, तो हमें ऐसा लगता है कि जीवन ही बंद हो गया है क्योंकि जो पूरी तरह से अपना है, उसको हमने कभी जाना ही नहीं है। हमने सिर्फ वही जाना है जो हमें किसी और से मिला है। और हमें सब कुछ दूसरों से ही मिला है। नाम दूसरों से मिला है, मान्यताएं दूसरों से मिली हैं, धर्म दूसरों से मिला है, ज़िन्दगी की परिभाषा दूसरों से मिली है। मुक्ति, सत्य, पैसा, करियर, प्रेम, समाज इन सबकी परिभाषा दूसरों से मिली है। इसलिए थोड़ी देर के लिए जब यह ‘दूसरे’ ज़िन्दगी से दूर हो जाते हैं, तब बड़ी ज़ोर से डर लगता है। लगना तो स्वाभाविक है क्योंकि अगर यह ज़िन्दगी दूसरों का ही नाम है, तो जब दूसरे हटते हैं तो ऐसा लगता है कि ज़िन्दगी ही दूर हट गयी है।

अकेलेपन से बस उसको ही डर नहीं लगेगा जिसने खुद को जाना है। जो कहता है, ‘दूसरों के अलावा भी मेरा कुछ है, जो किसी ने मुझे दिया नहीं, और कोई मुझसे छीन नहीं सकता’, वही नहीं डरेगा अकेलेपन से। फिर उसके लिए ‘अकेलापन’ बन जायेगा ‘कैवल्य’, और इन दोनों शब्दों में बहुत अंतर है, ज़मीन आसमान का। अब उसके लिए अकेलापन एक डरावना सपना नहीं रह जाता है। वही एकांत अब एक उत्सव बन जाएगा। पर हममें से बहुत लोगों को अपने साथ समय बिताना ही पसंद नहीं होता। हमें अकेला छोड़ दिया जाये तो बहुत असहज हो जाते हैं। जिसको अपना साथ पसंद नहीं है, किसी और को उसका साथ कैसे पसंद आएगा? आप आपने साथ रहना पसंद नहीं करते, दूसरे आप के साथ रहना कैसे पसंद कर सकते हैं? आपकी हालत इतनी ख़राब है कि आप अपने साथ रहना गवारा नहीं कर सकते। आप अपना साथ रहना बर्दाश्त नहीं कर सकते, दूसरे आपको कैसे बर्दाश्त कर लेंगे?

पहले तो आप कैवल्य को पाइए, आपने साथ खुश रहना सीखिये, दूसरों पर निर्भरता हटा दीजिये। इस अकेलेपन को कैवल्य में बदलिये। और बहुत मज़े की बात है कि जो अपने में खुश होना जान जाता है, फिर जब वह दूसरों के साथ होता है तो पूरी तरह से उनके साथ हो जाता है। जो अकेला है, जब वह दूसरों के साथ होता है तो क्या होता है? साथ के लिये बेचैन, ‘बस कोई मिल जाये’। तो अब जो भी मिलेगा, मैं क्या करुंगा उसके साथ? ‘मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकता’। और दूसरा कह रहा है, ‘मुझसे क्या गलत हो गयी? छोड़ दे मुझे’।

अकेलेपन के कारण जो भी संबंध बनेगा, वो दुःख ही देगा। अकेलेपन से जो भी संबंध निकलेगा, वो यही होगा। ‘दोनों हाथों से पकड़ लो, जाने मत देना’। अब वो आपको मुक्त नहीं छोड़ सकता। और अगर वो देख लेगा कि आप किसी और के साथ हैं, तो ज़बरदस्त ईर्ष्या भी होगी। यह सब अकेलेपन की बीमारियाँ हैं। माल्कियत, ईर्ष्या, डर, यही सब होगा। ‘मेरे साथ जितने दोस्त थे, सबकी शादी हो गयी। माँ मेरी भी करा दो। बहुत अकेलापन लगता है’।

संबंध तो आपकी पूर्णता से बने। कैवल्य ही पूर्णता है। उससे जो संबंध बनेगा वो बहुत ख़ूबसूरत होगा। तब आप एक दूसरे के साथ इसलिए हैं क्योंकि आप आनंद में हैं, इसलिए नहीं कि आप ज़रुरतमंद हैं। मानसिक या शारीरिक ज़रुरत, इन दोनों में से कोई ना कोई ज़रुरत ज़रुर है। इसमें जो भी संबंध निकलेगा, यह वही होगा; शोषण का। अब सामने वाला मिल गया।

एक सुन्दर संबंध होता है जिसमें अकेलेपन में भी हम खुश थे, अकेलेपन में तुम भी खुश थे, और जब साथ हैं तो यही ख़ुशी बांट रहे हैं। साथ इसलिए नहीं है कि अकेले होने में दुख है, साथ इसलिए हैं क्योंकि खुश हैं। साथ होकर खुश नहीं हैं, साथ इसलिए हैं क्योंकि पहले से ही खुश हैं।
हम क्या कहते हैं? साथ होंगे तभी खुश होंगे। यह अकेलेपन की निशानी है। असली साथ वो है जिसमें हम खुश हैं इसलिए साथ हैं। बात समझ आ रही है?

Thursday, 23 July 2015

खामोश सफ़र!!!!!!: संकट में भारत की संसदीय व्यवस्था

खामोश सफ़र!!!!!!: संकट में भारत की संसदीय व्यवस्था: संसद जनतंत्र का मंदिर है, दलतंत्र का युद्ध क्षेत्र नहीं। संसद भारत की अभिलाषा, स्वप्न और समृद्धि पर संवाद का शीर्ष जनप्रतिनिधि मंच है...

संकट में भारत की संसदीय व्यवस्था





संसद जनतंत्र का मंदिर है, दलतंत्र का युद्ध क्षेत्र नहीं। संसद भारत की अभिलाषा, स्वप्न और समृद्धि पर संवाद का शीर्ष जनप्रतिनिधि मंच है। संसद राष्ट्रजीवन की जिजीविषा है। राष्ट्र प्रतिबद्ध वाद विवाद ही इस संस्था की जीवन ऊर्जा हैं, लेकिन संसदीय प्रणाली संकट में है। कांग्रेस सहित अधिकांश विपक्षी दल संसद को राजनीतिक झगड़ों का मंच बना रहे हैं। संसदीय गतिरोध बढ़ा है। संसदीय कलह की अंतरराष्ट्रीय चर्चा है। अमेरिका सहित अन्य कई देशों के समाचार माध्यमों में भी इस गतिरोध पर व्यापक टिप्पणियां हैं। यों संसद और विधानमंडलों में हल्ला-गुल्ला कोई नई बात नहीं। विधायी सदनों का कामकाज काफी लंबे समय से घटा है। हल्ला और शोर-शराबा बढ़ा है। बहस की गुणवत्ता लगातार घटी है, पर मानसून सत्र में एक नई परंपरा भी जुड़ी है। सामान्यतया विपक्ष चर्चा की मांग पर बल देता है। सत्तापक्ष कतराता है, लेकिन चालू सत्र में सरकार बहस को तैयार है, पर विपक्ष मुद्दा आधारित चर्चा से भाग रहा है।


लोकसभाध्यक्ष ने पोस्टर और नारेबाजी को अनुचित बताया था। कांग्रेस ने तीसरे दिन भी नारेबाजी सहित काली पट्टी का प्रदर्शन किया। चुनावी हार की खुन्नस है। संसदीय गतिरोध से राष्ट्रजीवन में निराशा है।1भारत की संसदीय व्यवस्था ब्रिटिश संसदीय व्यवस्था की उधारी है। गांधीजी ने ‘हिन्दू स्वराज’ (1909) में ब्रिटिश संसद की कटु आलोचना की थी, ‘सांसद ऊंघते हैं, शोर मचाते हैं। इस संसद ने कोई अच्छा काम नहीं किया।’ ब्रिटिश संसद सभाकक्ष में सत्तापक्ष व विपक्ष के बीच बिछे कालीन में विभाजक लाल रेखा है। दो बेंचों के मध्य दो तलवारों की लंबाई की दूरी है। संसदीय परिपाटी के प्रारंभ में सांसदों को हथियार ले जाने की अनुमति थी। संसदीय परंपरा की कथित जननी ब्रिटिश संसद में भी झगड़े थे। प्राचीन रोम के शासक जूलियस सीजर की हत्या विधायी सदन में ही हुई थी। दक्षिण कोरिया, नाइजीरिया, पेरू, यूक्रेन आदि के विधायी सदनों में भी कलह होती है, लेकिन प्राचीन भारत की सभा समितियां प्रीतिपूर्ण संवाद का मंच थीं। ऋग्वेद में सूक्त है कि शासक सभा में वैसे ही जाता है जैसे कलश में सोमरस गिरता है। सभा में जाने वाले ही सभ्य/सभेय कहे गए। बौद्ध काल के गणतंत्रों में भी सभा सदनों की कार्यवाही उत्कृष्ट थी। शुरुआती दौर की भारतीय संसद भी विचार-विमर्श का केंद्र थी, लेकिन भारतीय राजनीति ने परंपरा और संस्कृति से प्रेरणा नहीं ली। सो संसद और विधानमंडल ‘दल कलह’ के मंच बनाए जा रहे हैं।1भारत विश्व का सबसे बड़ा जनतंत्र है। यहां हरेक स्तर पर निर्वाचित संस्थाएं हैं- ग्रामसभा, क्षेत्र पंचायत, जिला पंचायत, विधानमंडल और फिर सर्वोच्च संसद। सारी संस्थाएं संसदीय कार्यवाही की ओर टकटकी लगाती हैं। आमजन समाचार माध्यमों से चिपके रहते हैं-हमारे लिए क्या हुआ? आर्थिक सुधारों के लिए अगले कदम के इंतजार में। जीएसटी जैसे सर्वहितैषी कानून अथवा भूमि अधिग्रहण जैसे विधेयकों पर संभावित बहस की अधीर प्रतीक्षा में और श्रमिक वर्ग श्रम कानूनों की प्रतीक्षा में। लेकिन विपक्ष बहस से भाग रहा है। नीति आयोग की बैठक में नीतीश कुमार के अलावा विपक्षी दल का कोई मुख्यमंत्री नहीं आया। वे आते, बहस करते, अपना पक्ष रखते। उभयपक्षी तर्क और तथ्यों से जनता का ज्ञानवर्धन कर सकते थे। ललित मोदी मामले में सरकारी पक्ष ने बहस की तत्परता दिखाई। सुषमा स्वराज बयान देने को तैयार थीं। मध्य प्रदेश का घोटाला राज्य स्तरीय विषय है। अरुण जेटली ने नियमों के हवाले व्यवस्था का प्रश्न उठाया। केंद्र सरकार राज्यों के मामले में शासन का अधिकार नहीं रखती। केंद्र की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार संसद को आवंटित विधायी विषयों तक सीमित है। अनु. 246 की 7वीं अनुसूची में संसद व राज्य विधानमंडलों को आवंटित विषय हैं। जेटली के तर्क संवैधानिक थे, लेकिन विपक्ष तैयार नहीं हुआ। 1दलतंत्र जनता के समक्ष जवाबदेह है। परस्पर आरोप-प्रत्यारोप जवाबदेही नहीं होते। विधायी सदनों में शोर-शराबे के लिए दलतंत्र ही जिम्मेदार है। दलतंत्र को बताना चाहिए कि संसद सहित महाराष्ट्र, केरल, उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु आदि विधानसभाओं में अप्रिय संघर्ष क्यों हैं? सदन कलह मंच क्यों बन रहे हैं? विधायी सदनों में आमजनों की समस्याओं पर व्यापक चर्चा क्यों नहीं होती? उत्तर प्रदेश में लंबे समय से सत्ररंभ के दिन हुल्लड़ की ही गारंटी क्यों है? संसद और विधानमंडल स्वयं अपनी ही बनाई नियमावली से ही क्यों नहीं चलते? अंग्रेजीराज में गठित केंद्रीय विधानसभा के समय (1921) अध्यक्ष फ्रेडरिक व्हाइट की अध्यक्षता में पीठासीन अधिकारियों का पहला सम्मेलन शिमला में हुआ था। तबसे हर बरस पीठासीन अधिकारियों के अखिल भारतीय सम्मेलन होते हैं। लोकसभा के महत्वपूर्ण प्रकाशन ‘संसदीय पद्धति और प्रक्रिया’ के अनुसार सम्मेलन का उद्देश्य संसदीय प्रणाली का समुचित विकास और उसी दिशा में उचित परंपरा का विकास करना है। विधायी सदनों के अध्यक्षों/सभापतियों व अन्य महानुभावों के कई सम्मेलनों में संसदीय कामकाज को ठीक से चलाने के तमाम प्रस्ताव पारित हुए। उन प्रस्तावों को कार्य व आचरण में क्यों नहीं लाया गया?1संसद त्यागपत्र मांगने का उपयुक्त स्थल नहीं है। मुद्दा आधारित वाद-विवाद ही संसद की प्रतिष्ठा है। लेकिन संसदीय कार्यवाही में दलीय संघर्ष हैं। कांग्रेस राष्ट्रीय प्रश्नों पर बहस नहीं चाहती। उसने त्यागपत्रों और शोर शराबे को ही संसदीय कर्तव्य बनाया है। संकीर्ण राजनीतिक लड़ाई ने संसद का एजेंडा उलट दिया है। राबर्ट वाड्रा के विरुद्ध संसदीय विशेषाधिकार हनन के नोटिस पर कांग्रेस खफा है। विशेषाधिकार हनन का नोटिस संसदीय कार्यवाही का अतिमहत्वपूर्ण भाग है। उसे टाला नहीं जाता। संसद और विधानमंडलों ने हुल्लड़ व विषयांतर रोकने के अनेक संकल्प लिए। लोकसभा के स्वर्ण जयंती अधिवेशन (1997) में सर्वसम्मत प्रस्ताव हुआ था, ‘सभा के प्रक्रिया तथा कार्य संचालन संबंधी संपूर्ण नियमों तथा व्यवस्थित कार्य संचालन संबंधी पीठासीन अधिकारियों के निर्देशों के सचेतन तथा गरिमापूर्ण अनुपालन द्वारा संसद की प्रतिष्ठा का परिरक्षण और संवर्धन किया जाए।’ लेकिन संकल्प और व्यवहार में जमीन आसमान का अंतर है। संकल्प में विधिवत कार्य संचालन का आदर्श है, व्यवहार में विधिवत् गतिरोध पर ही सर्वसम्मति है। 1सत्तापक्ष सदनों के प्रति जवाबदेह है। सरकार को जवाबदेह बनाना विपक्ष का प्रमुख कर्तव्य है। विपक्ष को भी जवाबदेह होना चाहिए। जनादेश प्राप्त सरकार को काम करने से रोकना और सदन न चलने देना किसी भी सूरत में औचित्यपूर्ण नहीं है। भारत विश्व प्रतिष्ठ हो रहा है। संसदीय सदनों की कार्यवाही को भी उसी स्तर पर लाना होगा। अनुशासनहीन सदन अनुशासित शासन तंत्र नहीं दे सकते। संसदीय गरिमा और अनुशासन का प्रभाव राष्ट्रजीवन के सभी क्षेत्रों पर पड़ता है। दल अपनी कलह के लिए अन्य मंच खोजें। चुनाव सुधारों के माध्यम से दलतंत्र के भीतर जनतंत्र की प्रतिष्ठा करनी होगी। विधायी सदनों को दलीय राजनीति की झगड़ालू परिधि से बाहर करने का नियम बनाना होगा। संसदीय अनुशासन को सदस्य चुने जाने की अर्हता से जोड़ना चाहिए और संसदीय अनुशासनहीनता को सदस्यता की निर्हता से। विधायी कार्य राष्ट्रीय पुनर्निर्माण की साधना हैं, सामान्य राजनीतिक व्यवसाय या बयानबाजी नहीं। समूची संसदीय व्यवस्था के अस्तित्व पर संकट है। आत्मरूपांतरण के अलावा और कोई मार्ग नहीं।

Monday, 13 July 2015

मेरी हमेशा से कुछ आशाएं रही हैं


मेरी हमेशा से कुछ आशाएं रही हैं उन लोगों से जो मेरे साथ जुड़े होते हैं | मैं जितना भी लोगों के साथ करता हूँ मेरी तमन्ना होती है की बदले में मुझे उससे थोडा ज्यादा मिले , और शायद ये मेरी सोच ही नही बल्कि हर इंसान की सोच होती है या सही शब्दों में कहू तो ये इंसानी प्रवृत्ति है | हर इंसान के अपने कुछ शौक और सपने होते हैं कुछ अच्छे तो शायद कुछ ऐसे जो लोगों को रास न आयें पर कहीं न कही हर इंसान अपने करीबी लोगों से उन चीज़ों में कम-से-कम सराहना की उम्मीद तो करता ही है | क्या ये हो पाता है ??

अगर कोई लेखक है तो जरुरी नही की वो प्रेमचंद हो ,अगर कोई स्केच आर्टिस्ट है तो जरुरी नहीं वो ऍम ऍफ़ हुसैन हो , अगर कोई कीबोर्ड अच्छा बजता है तो जरुरी नहीं वो ऐ आर रहमान हो या अगर कोई पढने में अच्छा है तो जरुरी नही कि वो किसी आई आई ऍम या आई आई टी का ही छात्र हो | हर इंसान का अपना एक हुनर होता है जिसमे अगर वो निपुण न भी हो तो कम-से-कम बेहतर होता है | हिंदी जगत में एक कहावत है की “जितना है उतने में ही संतोष करो” ,पर क्या ये आजकल मुमकिन हो पाता है?

जब भी हम किसी को दोस्त बनाते हैं तो ऐसा नहीं की कोई टर्म्स एंड कंडीशंस के साथ बनाते है ये तो स्वाभाविक है की जब हम किसी व्यक्ति के विचारों में थोडा अपना-पन पातें हैं तो हम उसकी तरफ आकर्षित हो उठते हैं | हमारी अपने दोस्तों और उन ख़ास लोगों से बहुत सारी उम्मीदें होती हैं जिनसे हम प्यार करते हैं जब ये सारी उम्मीदें पूरी होती है या इनमें से अगर कुछ भी पूरी होती है तो हमारा रिश्ता और गहरा हो जाता है पर कई बार इन उम्मीदों के कारण ही रिश्तों में खटास आ जाती है |

अगर इस वक़्त में आपसे पूछने लगूं की आपको कैसा हमसफ़र या दोस्त चाहिए तो आपकी भी लम्बी लिस्ट तैयार हो जाएगी | लेकिन क्या वाकई में ये मुमकिन है की आपको कोई ऐसा इंसान मिले जो आपकी हर उम्मीद पर खरा उतरता हो ? …. नही ये मुमकिन नहीं है क्योंकि आपकी ये उम्मीदें भी समय के साथ घटती और बढती हैं आपकी ये उम्मीदें भी परिस्थिति के अनुरूप अपने-आप को ढालती हैं | हर अगली परिस्थिति में आपकी इच्छा कुछ अलग होती है लेकिन ये संभव नही की जैसा आप सोचते हैं वैसा ही हर इंसान सोचता हो |


अंग्रेजी में एक कहावत है कि ” नो वन इज परफेक्ट “, और में इससे सहमत हूँ क्योंकि अगर कोई परफेक्ट होता तो वो इंसान न कहलाता | हमें कई बार ऐसे लोगों का साथ कुछ ऐसी परिस्थितियों में मिलता है की जब हमें ऐसे लोगों की खासा जरुरत रहती है लेकिन हर बार ऐसा हो ये मुमकिन नहीं है | इंसान गलतियों का पुतला है कई बार गलतियाँ अनजाने में होती है तो कई बार जानबूझकर लेकिन अपनों से मु मोड़ लेना किसी भी समस्या का हल नहीं होता | मुझे नहीं पता कि कोई ऐसा होता है या नहीं जैसा हम चाहते हैं हाँ मगर हमें अपने लिए बेहतर चुनना चाहिए क्योंकि कभी कभी इन बेहतर लोगों में ही हमें कोई अपना मिल जाता है|

माता पिता का इंटरव्यू लेने पर 10 साल की सजा


नर्सरी कक्षाओं में दाखिले के लिए किसी बच्चे या उसके माता पिता के साक्षात्कार लेने पर स्कूल अधिकारियों को 10 साल तक की कैद की सजा का सामना करना होगा, बशर्ते कि दिल्ली सरकार इस पर कदम आगे बढ़ाती है। नर्सरी कक्षाओं में दाखिले के लिए किसी बच्चे या उसके माता पिता के साक्षात्कार लेने पर स्कूल अधिकारियों को 10 साल तक की कैद हो सकती है। दिल्ली स्कूल शिक्षा (संशोधन) विधेयक 2015 के मसौदे में यह बात शामिल है। यदि दिल्ली सरकार इस पर कदम आगे बढ़ाती है तो यह प्रावधान कानून बन सकता है। नर्सरी दाखिले में निजी स्कूलों की मनमानी को रोकने के लिए मौजूदा नियमों को सख्त करने के उददेश्य से आप सरकार दिल्ली स्कूल शिक्षा (संशोधन) विधेयक 2015 पेश करने की योजना बना रही है।


प्रस्तावित विधेयक का मसौदा कहता है कि प्री प्राइमरी और प्री स्कूल में प्रवेश स्तर पर जहां बच्चे छ: साल से कम उम्र के हों वहां बच्चे या उसके माता पिता का कभी साक्षात्कार नहीं होना चाहिए। विधेयक में कहा गया है कि दाखिले के नियम का उल्लंघन करने वाले किसी व्यक्ति या स्कूल को पांच साल से कम सजा नहीं मिलनी चाहिए और यह सजा 10 साल तक बढ़ाई जा सकती है। दिल्ली में 1,100 सरकारी और 1,500 निजी स्कूल हैं। इस विधेयक में राष्ट्रीय राजधानी में गैर सहायता प्राप्त निजी स्कूलों की फीस के संग्रह के नियमन के बारे में चर्चा हो रही है। प्रस्तावित मसौदे में कहा गया है कि गैर सरकारी सहायता प्राप्त निजी स्कूलों में किसी भी कक्षा या किसी भी कोर्स के अध्ययन के लिए फीस को निर्धारित करने के लिए सरकार एक समिति गठित करेगी।

यह प्रस्ताव किया गया है कि समिति में उच्च न्यायालय के एक सेवानिवृत न्यायाधीश इसके अध्यक्ष होंगे। वहीं शिक्षा निदेशक और एक चार्टर्ड अकाउंटेंट इसके सदस्य होंगे। मसौदे के मुताबिक समिति का आदेश गैर सहायता प्राप्त निजी स्कूलों पर तीन साल के लिए बाध्यकारी होगा। इसमें कहा गया है कि नियम का उल्लंघन करने वाले स्कूल को अभिभावकों से अधिक ली गई राशि को नौ फीसदी ब्याज के साथ एक महीने के अंदर लौटाने का निर्देश दिया जाएगा।

Sunday, 12 July 2015

जीवन में प्यार का महत्व

हर लड़की का सपनों का एक राजकुमार होता है, अपने प्रियतम में वो उस राजकुमार की छबि ढूँढने लगती हैं जिसके वो सपने देखा करती थी लेकिन उसके व्यक्तित्व के कई अनछुए और अनजाने पहलू ऐसे भी होते हैं जो उसके सपनों से ज्यादा महत्वपूर्ण होते हैं जिन्हें वह नहीं जान पाती।

लड़कों का व्यवहार और उनके सोचने का तरीका बिल्कुल अलग होता है। इसलिए आपको अपने दोस्त से इस बात की उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि वह बिल्कुल बदलकर आपकी तरह हो जाएगा। आपको उसे बदलने की कोशिश भी नहीं करनी चाहिए।



1. अपने रिश्ते को समझें
प्यार की पहली नजर को हर किसी ने अनुभव किया होगा, ये एक ऐसा अनुभव है जब आपके लिए आपका साथी पहली प्राथमिकता होता है, ऐसे में आपसे मिलने के लिए वक्त से पहले पहुँचना और घंटों इंतजार करना प्रेम रूपी तपस्या का ही एक हिस्सा होता है। वक्त बितने पर जब सामंजस्य बढ़ जाता है तब ये उम्मीद कम कर देना चाहिए कि एक प्रेम पत्र के साथ वो रोज सुबह फूलों का गुलदस्ता आपके दरवाजे पर रख कर जाएगा, या फिर पहले की तरह सुबह शाम फोन पर घंटों बातें किया करेगा। वह दो-तीन दिनों तक आपको फोन ना कर पाए, तो आपको अपनी नाराजगी दिखाते समय यह नहीं भूलना चाहिए कि जिस तरह उसके किसी व्यवहार से आपको दुख पहुँचता है, उसी तरह आपकी भी कुछ बातें उसकी भावनाओं को ठेस पहुँचा सकती हैं।

2. भावनाएँ शब्दों की मोहताज नहीं
तारीफ सुनना हर व्यक्ति को अच्छा लगता है, लेकिन नारी जैसी निर्मलता पुरुषों में कम होती है। हो सकता हैं वो आपकी उम्मीद पर पूरी तरह नहीं उतर पाए, या अपनी भावनाओं को शब्दों में ना ढाल पाए। आपके किसी तोहफे पर धन्यवाद जैसे औपचारिक शब्दो की उम्मीद रखने की बजाय उसकी आँखों में उतर आई प्रसन्नता को देखने की कोशिश करें।


3. अलग होती हैं लड़कों की अपेक्षाएँ
प्रेम को तो ऋषि मुनियों ने भी पवित्र माना है, दैहिक आकर्षण तो एक प्राकृतिक लक्षण हैं जिससे कोई भी परे नहीं रह पाया है, हमारे समाज में कुछ नियमों को संस्कार का रूप दिया है जिसे कई बार युवा वर्ग अपनाने से मना कर देते हैं इसका मतलब ये नहीं को वो सिर्फ आपसे शारीरिक आकर्षण से जुडा है यदि आप इन नियमों का पालन करना चाहती हैं तो आप पर निर्भर करता है कि नाराज होने या उसका तिरस्कार करने की बजाय प्रेम से समझा पाती हैं या नहीं, दैहिक संबंध से परे एक और चीज बहुत महत्वपूर्ण होती है वो है स्पर्श जो उसे प्रियतमा के दैहिक आकर्षण से परे अपनत्व का एहसास दिलाएगा।

4. माँ, पत्नी, बहन या प्रेयसी, हर रूप में नारी हैं एक सी
ऐसे ही कुछ विचार होते हैं पुरुषों के, चाहे वो पत्नी हो या प्रेमिका वो उसमें हर रूप को खोजने की कोशिश करता है। आप अपने हर रूप को उसके सामने कितना साकार कर पाते हो ये आप पर निर्भर करता है। उसकी छोटी- छोटी जरूरतों को पूरा कर, निराशा के समय में हिम्मत दिलाकर, खुशी के पलों की सहभागिता बन आप नारी के हर रूप को साकार कर सकती हैं।

5. नाराजगी जल्दी जाहिर ना करें
लड़कियाँ अपनी सारी भावनाएँ दूसरों के सामने बड़ी सहजता से जाहिर कर देती हैं। अगर उन्हें किसी बात से नाराजगी भी होती है तो वे उसे सबके सामने जाहिर कर देती हैं। लड़के इस मामले में काफी धैर्यवान और गंभीर होते हैं। लड़कों में छोटी-छोटी बातों को लेकर बेवजह बहस या रोक-टोक करने की प्रवृत्ति नहीं पाई जाती है। कई बार ऐसा भी होता है कि किसी छोटी-सी बात पर या बेवजह भी लड़कों को बहुत तेज गुस्सा आता है और ऐसी स्थिति में आपसी संबंधों में दरार पड़ने तक की नौबत आ जाती है।

अगर आप दोनों के संबंधों में कभी ऐसी स्थिति आए तो उसे सुधारने के मामले में आपकी जिम्मेदारी बढ़ जाती है। इसलिए जिस समय आपके साथी को गुस्सा आ रहा हो तो उस वक्त आप उसे कुछ न कहें। बाद में जब उसका गुस्सा शांत हो जाए तब आप उसे प्यार से समझाएँ कि उसे ऐसा नहीं करना चाहिए था। लड़के अपने बारे में खुद कुछ भी बताने के बजाय अपनी साथी से यही उम्मीद रखते हैं कि वह खुद ही लड़के की मनःस्थिति और उसकी पसंद या नापसंद के बारे में स्वयं समझकर हमेशा उसी के अनुकूल व्यवहार करे। इसलिए बेहतर यही होगा कि आप अपने साथी को नाराज होने का मौका नहीं न दें।

इस तरह अगर आप अपने साथी को समझने की कोशिश करेंगी तो निश्चित रूप से आपके संबंध मधुर बने रहेंगे। 

Saturday, 11 July 2015

एक वक़्त था

कभी - कभी अचानक एक हलकी-सी खरोच
सारे ज़ख्मों को ताजा कर जाती है ,
फिर उस वक़्त तलाश होती है उस व्यक्ति की -
जो जीवन की आपाधापी से अलग उस मर्म को समझ सके !
...नहीं ,नहीं किसी अपने की तलाश नहीं ,
वे तो क्षणिक होते हैं ,
सब जानकर भी बेतुके प्रश्न करते हैं !

एक वक़्त था - जब असामयिक आँधी मे ,
सुनामी लहरों के बीच ,
मैंने उन्हें आवाज़ दी थी ,...
सुनामी लहरों से बचने के लिए वे प्रायः दूर खड़े रहे .
एक - दो हथेलियाँ बढ़ी ,
पर ....मेरी हिचकियों से उन्हें परेशानी होती थी .
समझौता उन्हें नहीं ,
मुझे करना होता था ,न चाहते हुए भी खिलखिलाकर हँसना पड़ता था ...............

कोई निर्णय आसान नहीं था ,
कुएँ ,खाई ,समतल ज़मीन मे कोई फर्क नज़र नहीं आता था .
पर कुछ मकसद हो जीवन मे ,
तो वे उद्देश्य बन जाते हैं ...
मुझे भी जीवन का उद्देश्य मिला .

जिस दिन अंधी गहरी गुफा से बाहर ,
रोशनी की किरण झलकी -
विश्वास सुगबुगाया ,
'ज़िन्दगी मे बदलाव आता है ',
और उमीदों को नई ज़मीन मिली .
' कल ' दरवाज़े पर ' आज ' का दस्तक देने लगा .......
अतीत के दुह्स्वप्नो को भुला मैंने रंगोली सजाना शुरू किया .

पर उटपटांग प्रश्नों की खरोच से अतीत के ज़ख्म हरे हो जाते हैं
प्रश्नकर्ता अतीत का भयावह हिस्सा नज़र आता है ,
फिर बेचैन - सी मैं उस व्यक्ति को तलाशती हूँ ,
जो मेरे एहसासों को जी सके ............

डिजिटल इंडिया की तरफ बढ़ता भारत

 केन्द्र सरकार'स्मार्ट सिटी','मेक इन इंडिया' जैसी फ्लैगशिप योजनाओ के बाद अब आम आदमी के 'डिजिटल सशक्तिकरण' के  जरिये देश भर में 'सुशासन अभियान' को तीव्र गति देने के लिये  महत्वकांक्षी  'डिजिटल इंडिया सप्ताह' की शुरूआत करने जा रही है' , जिसके बारे में कहा जा रहा है कि इस योजना  से देश की तस्वीर बदल सकती है, आम आदमी की जिंदगी बेहतर और आसान हो सकती है. इस योजना को 'डिजिटल रूप से सशक्त भारत' की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है. एक जुलाई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राजधानी में आयोजित एक कार्यक्रम मे 'जन साधारण' के साथ साथ 'बड़े उद्योगपतियों' की मौजूदगी मे देश के 'डिजिटल इंडिया सप्ताह' योजना को लॉन्च करेंगे.



          डिजिटल इंडिया सप्ताह के तहत 36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में एक हफ्ते लंबा कार्यक्रम चलेगा। इसमें शामिल होने के लिए सरकार ने सभी बड़े उद्योगपतियों को न्यौता दिया है। ये उद्योगपति डिजिटल इंडिया पर अपनी निवेश योजनाओं की जानकारी देंगे। 'डिजिटल इंडिया वीक' में आम लोगों की सुविधा के लिए कई ऑनलाइन सेवाओं को लॉन्च किया जाएगा। इस दौरान ई-शिक्षा, ई-लॉकर, ई-हॉस्पिटल, ई-स्वास्थ्य आदि का लॉन्च होगा।

          केन्द्रीय सूचना प्रौद्योगिकी व दूरसंचार मंत्री रविशंकर प्रसाद के अनुसार डिजिटल इंडिया योजना इस तरह से डिज़ाइन की गई है कि इसके क्रियान्वन से देश की तस्वीर बदल सकती है यानि  यह योजना 'गेम चेंजर' होगी. इस के तहत पोस्ट ऑफिसों को कॉमन डिजिटल सर्विस सेंटर के रूप में विकसित किया जायेगा और छोटे शहरों में भी बीपीओ खोले जाएंगे। मोदी सरकार चाहती है कि देश के हर नागरिक के लिए डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर बने। शासन, सेवाओं को आसानी से उपलब्ध कराना सरकार का मकसद है। भारतीयों के डिजिटल सशक्तीकरण के प्रयासों स्वरूप इस योजना का लक्ष्य इस क्षेत्र के बारे में जागरूकता बढ़ाना और लोगों को इससे जोड़ना है। इसका एक लक्ष्य कागजी कार्रवाई को कम-से-कम करके सभी सरकारी सेवाओं को आम जनता तक डिजिटली यानी इलेक्ट्रॉनिकली  रूप् से सीधे व सुगम तरीके से पहुचाना है। डिजिटल विशेषज्ञों के अनुसार डिजिटल इंडिया कार्यक्रम के तहत भारत सरकार चाहती है कि तमाम सरकारी विभाग और देश की जनता एक-दूसरे से डिजिटल अथवा इलेक्ट्रॉनिक रूप से जुड़ जाएं ताकि वे सभी तरह की सरकारी सेवाओं से लाभ उठा सकें और देश भर में सुशासन सुनिश्चि‍त किया जा सके। चाहे किसी गांव में रहने वाला व्यक्ति हो शहर में रहने वाला, दोनों को ही सभी सरकारी सेवाएं समान रूप से डिजिटली अथवा ऑनलाइन हासिल हों, यही डिजिटल इंडिया कार्यक्रम का मुख्य लक्ष्य है। इस अहम सरकारी योजना को अमली जामा पहनाने के बाद आम जनता के लिए यह संभव हो जाएगा कि किस सरकारी सेवा को पाने के लिए उसे किस तरह एवं कहां ऑनलाइन आवेदन करना है और उससे किस तरह लाभान्वि‍त हुआ जा सकता है।  जानकारों के अनुसार दरअसल, किसी भी सरकारी सेवा के डिजिटली उपलब्ध होने पर  आम आदमी के लिये उससे लाभान्वि‍त हो्ने के लिये सीधा रास्ता खुल जायेगा। जाहिर है, ऐसे में सरकारी सेवाओं के मामले में होने वाली लेट लतीफी और भ्रष्टाचार पर कारगर ढंग से लगाम लग सकेगी।

          श्री प्रसाद के अनुसार 'इस सप्ताह के दौरान कई प्रतिष्ठित व्यक्ति इस क्षेत्र में अपनी निवेश योजनाओं के साथ शिरकत करेंगे। इससे अरबों रुपये के निवेश की उम्मीद है। इस निवेश से लाखों लोगों को रोजगार मिलेगा।'डिजिटल इंडिया वीक में बड़े उद्योगपति शामिल होंगे। इनमें स्टरलाइट टेक्नोलॉजी के अनिल अग्रवाल, विप्रो चेयरमैन के अजीम प्रेमजी, लावा इंटरनेशनल के एमडी हरि ओम राय, हीरो ग्रुप ऑफ कंपनीज के पवन मुंजाल, सुनील मित्तल, कुमार मंगलम बिड़ला, अनिल अंबानी, सायरस मिस्त्री, एयरबस समूह के पीटर गट्समेडल और निडेक कॉरपोरेशन के मिकियो कातायामा भी शामिल होने की उम्मीद है। खासतौर पर सरकार ने सभी  बड़े उद्योगपतियों को डिजिटल इंडिया में शामिल होने का न्यौता दिया है।
     
          केंद्र सरकार द्वारा डिजिटल इंडिया अभि‍यान का शुभारंभ  पिछले वर्ष 21 अगस्त को किया गया और इसका मुख्य उद्देश्य भारत को डिजिटली रूप से सशक्त समाज और ज्ञान अर्थव्यवस्था में तब्दील करना है। केंद्र सरकार की योजना यह है कि इस कार्यक्रम को अगले पांच सालों में पूरा कर लिया जाए। यह उम्मीद की जा रही है कि डिजिटल इंडिया कार्यक्रम वर्ष 2019 तक गांवों समेत देश भर में पूरी तरह से लागू हो जाएगा। दरअसल, इस कार्यक्रम के तहत सभी गांवों और ग्रामीण इलाकों को भी इंटरनेट नेटवर्क से जोड़ने की योजना है। डिजिटल इंडिया कार्यक्रम के तहत इंटरनेट को गांव-गांव पहुंचाया जाएगा। इस कार्यक्रम के तीन प्रमुख अवयव हैं- बुनियादी डिजिटल सुविधाएं, डिजिटल साक्षरता और सेवाओं की डिजिटल डिलीवरी। इस कार्यक्रम के तहत परियोजनाओं से देश को ड़िजिटल आधारित सशक्त  सूचना अर्थव्यवस्था के रूप मे बदजाने का लक्ष्य है.इसी के चलते डिजिटल इंडिया अभियान को सफल बनाने के लिए  एक जुलाई से डिजिटल इंडिया सप्ताह मनाया जा रहा है। सरकार इस दौरान डिजिटल लॉकर, डिजिटल साक्षरता, भारत नेटवर्क, डिजिटल सिग्नेचर जैसे कार्यक्रमों के विस्तारीकरण का ऐलान कर सकती है। ये फि‍लहाल पॉयलट अथवा प्रायोगिक आधार पर चलाए जा रहे हैं जिनका विस्तार देश भर में किया जा सकता है। इसका लक्ष्य इस क्षेत्र के बारे में जागरूकता बढ़ाना और लोगों को इससे जोड़ना है।

          ‘डिजिटल इंडिया वीक’ के तहत 600 जिलों में कार्यक्रम आयोजित किये जाएंगे। 314 जगहों पर उद्योग जगत के साथ मिलकर कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।  इस दौरान प्रधानमंत्री विभिन्न शहरों में वाई-फाई की सुविधा भी लांच करेंगे। इस मौके पर प्रधानमंत्री  नेशनल स्कॉलरशिप पोर्टल को भी लांच करेंगे। यही नहीं, छोटे शहरों में भी बीपीओ खोले जाएंगे। आम जनता को सरकारी सेवाएं आसानी से उपलब्ध कराना सरकार का मकसद है, ताकि लोगों को अत्याधुनिक सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी का लाभ मिल सके। इसके लिए आईटी, टेलीकॉम एवं डाक विभाग जोर-शोर से कार्यरत हैं। मोदी सरकार के महत्वाकांक्षी डिजिटल इंडिया अभियान के तहत सरकार अगले तीन वर्षों में 2.5 लाख ग्राम पंचायतों को राष्ट्रीय ऑप्टिकल फाइबर नेटवर्क से जोड़ेगी।  श्री रविशंकर प्रसाद ने यह जानकारी देते हुए कहा है कि केंद्र सरकार इस लक्ष्य को राज्य सरकारों की मदद से पूरा करेगी। इस साल 50,000 पंचायतों को और अगले दो वर्षों के दौरान 1-1 लाख पंचायतों को ब्रॉडबैंड से जोड़ा जाएगा। रविशंकर प्रसाद ने आईटी प्लस आईटी यानी 'इंडियन टैलेंट + इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी = इंडिया टुमॉरो' का मंत्र भी दिया है। उनका कहना है कि डिजिटल इंडिया सही अर्थों में ‘गेम चेंजर’ साबित होगा। सरकार का मानना है कि वर्ष 2020 तक तकरीबन 60 करोड़ लोग इंटरनेट का उपयोग करने लगेंगे।

          प्राप्त जानकारी के अनुसार डिजिटल इंडिया वीक के दौरान डिजिटल लॉकर सेवा का शुभारंभ किया जाएगा। इसके तहत लोग अपने प्रमाण पत्रों एवं अन्य दस्तावेजों को डिजिटल स्वरूप में सुरक्षित रख सकेंगे। इसमें आधार कार्ड नंबर व मोबाइल फोन के जरिये पंजीकरण कराना होगा। डिजिटल लॉकर में सुरक्षित रखे जाने वाले प्रपत्रों को सरकारी एजेंसियों के लिए भी हासिल करना आसान होगा। किसी व्यक्ति के विभि‍न्न दस्तावेज अगर डिजिटल लॉकर में हैं, तो उसे सरकारी योजनाओं के लिए इनकी फोटोकॉपी देने की जरूरत नहीं होगी। जाहिर है, ऐसे में लोगों को काफी सहूलियत होगी। इतना ही नहीं, इस दौरान ग्रामीण क्षेत्रों में बीपीओ खोलने की योजना का भी शुभारंभ हो सकता है। दरअसल, सरकार ग्रामीण क्षेत्रों में नौजवानों को रोजगार उपलब्ध कराने के लिए कॉल सेंटरों की स्थापना करना चाहती है। इन क्षेत्रों में बीपीओ खोलने वालों को सरकार सब्सिडी देगी। इसके साथ ही ऐसी उम्मीद है कि डिजिटल इंडिया वीक के दौरान सरकार डिजिटल इंडिया के ब्रांड ऐंबैसडरों की भी घोषणा करेगी। भारत सरकार अनेक एप्लीकेशंस एवं पोर्टल विकसित करने के लिए भी ठोस कदम उठा रही है जो नागरिकों के जीवन को बेहतर बनाने में अहम भूमिका निभाएंगे। डिजिटल इंडिया कार्यक्रम को मिलने वाली कामयाबी भारत को डिजिटल रूप से सशक्त बनाने और स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि, बैंकिंग आदि क्षेत्रों से संबंधित सेवाओं की डिलीवरी में आईटी के इस्तेमाल में अग्रणी बनाएगी।

डिजिटल इंडिया कार्यक्रम के नौ प्रमुख उद्देश्य हैं जिनका ब्योरा इस प्रकार है :

1. ब्रॉडबैंड हाईवेज :  इनके जरिए एक तय समय सीमा में बड़ी संख्या में सूचनाओं को प्रेषित किया जा सकता है।
2. सभी को मोबाइल कनेक्टिविटी सुलभ कराना :  शहरी इलाकों में भले ही मोबाइल फोन पूरी तरह से सुलभ हो गया हो, लेकिन देश के अनेक ग्रामीण इलाकों में अभी इस सुविधा का जाल वैसा नहीं हो पा्या है। इससे ग्रामीण उपभोक्ताओं को इंटरनेट और मोबाइल बैंकिंग के इस्तेमाल में आसानी होगी।
3. पब्लिक इंटरनेट एक्सेस प्रोग्राम :  इस कार्यक्रम के तहत पोस्ट ऑफिस को मल्टी-सर्विस सेंटर के रूप में विकसित किया जाएगा। नागरिकों को विभि‍न्न सरकारी सेवाएं मुहैया कराने के लिए वहां अनेक तरह की गतिविधियों को अंजाम दिया जायेगा।
4. ई-गवर्नेंस: प्रौद्योगिकी के जरिये शासन में सुधार : इसके तहत विभिन्न विभागों के बीच सहयोग और आवेदनों को ऑनलाइन ट्रैक किया जाएगा। इसके अलावा स्कूल प्रमाण पत्रों, वोटर आईडी कार्ड्स आदि की जहां भी जरूरत पड़े,  वहां उसका ऑनलाइन इस्तेमाल किया जा सकता है।
5. ई-क्रांति - सेवाओं की इलेक्ट्रॉनिक डिलीवरी : ई-एजुकेशन के तहत सभी स्कूलों को ब्रॉडबैंड से जोड़ने, सभी स्कूलों (ढाई लाख) में वाई-फाई की नि:शुल्क सुविधा मुहैया कराने और डिजिटल साक्षरता सुनि‍श्चि‍त करने की योजना है। किसानों को वास्तविक समय में मूल्य संबंधी सूचना, मोबाइल बैंकिंग आदि की ऑनलाइन सेवा प्रदान करना भी इनमें शामिल है। इसी तरह स्वास्थ्य क्षेत्र में ऑनलाइन मेडिकल परामर्श, रिकॉर्ड और संबंधित दवाओं की आपूर्ति समेत लोगों को ई-हेल्थकेयर की सुविधा देना भी इनमें शामिल है।
6. सभी के लिए सूचना : इस कार्यक्रम के तहत सूचनाओं और दस्तावेजों तक ऑनलाइन पहुंच कायम की जायेगी। इसके लिए ओपन डाटा प्लेटफॉर्म मुहैया कराया जाएगा।
7. इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माण में आत्मनिर्भरता : इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र से जुड़े तमाम उत्पादों का निर्माण देश में ही किया जाएगा। इसके तहत ‘नेट जीरो इंपोर्ट्स’ का लक्ष्य रखा गया है, ताकि वर्ष 2020 तक इलेक्ट्रॉनिक्स के मामले में देश आत्मनिर्भरता हासिल कर सके।
8. रोजगार के लिए सूचना प्रौद्योगिकी :  कौशल विकास के मौजूदा कार्यक्रम को इस प्रौद्योगिकी से जोड़ा जाएगा। गांवों व छोटे शहरों में लोगों को आईटी से जुड़ी नौकरियों के लिए प्रशिक्षित किया जाएगा।
9. अर्ली हार्वेस्ट प्रोग्राम्स : डिजिटल इंडिया कार्यक्रम को लागू करने के लिए पहले कुछ बुनियादी ढांचागत सुविधाएं स्थापित करनी होंगी।

यह साफ जाहिर है कि डिजिटल इंडिया कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य देश के नागरिकों को सुशासन  सुलभ कराना और उनकी जिंदगी बेहतर और आसान बनाना है .इस के जरिये ग्राम पंचायतों, स्कूलों विश्वविद्यालयों  में वाय-फाय सुविधाओं  से लेकर शहरो  यानि सभी जगह आम आदमी डिजिटल रूप् से सशक्त किये जाने का लक्ष्य है, जिससे उसकी जिंदगी आसान हो सकेगी साथ ही इससे आई टी, दूर संचार तथा इलेक्ट्रोनिक्स आदि अनेक क्षेत्रों में बड़ी तादाद में लोगों को रोजगार मिल सकेगा.'डिजिटल इंडिया सप्ताह' इसी कार्यक्रम को तीव्र  गति देने की दिशा में एक अहम कदम है।

Wednesday, 8 July 2015

व्यापम घोटाले का सच,आखिर क्यू हो रही रहस्य मय मौते

दिल्ली के पत्रकार अक्षय सिंह और जबलपुर में मेडिकल कॉलेज के डीन अरुण शर्मा की हालिया 'संदिग्ध मौत' के बाद विपक्षी कांग्रेस मध्य प्रदेश की शिवराज सिंह सरकार पर लगातार सवालिया निशान लगा रही है।
मध्य प्रदेश के व्यावसायिक परीक्षा मंडल (व्यापमं) घोटाले से जुड़े हर वर्ग के लोगों की मौत हो रही है। लेकिन इन मौतों के रहस्य से पर्दा उठना अभी बाकी है, और जांच जारी है।


मौतों की सूची पर नजर डालें तो पता चलता है कि परीक्षा देने वाला मर रहा है, फर्जी परीक्षार्थी मर रहा है, परिजन मर रहे हैं और जांच में सहयोग करने वाले मौत के मुंह में समा रहे हैं। वे लोग भी अब अपने को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं, जो इस मामले की जांच से जुड़े हुए हैं।

राज्य का व्यापमं घोटाला आज देश में चर्चा का सबसे बड़ा विषय बना हुआ है। पिछले शनिवार से इस मामले में हर रोज लगातार मौतें हुई हैं।

दिल्ली के एक समाचार चैनल के पत्रकार मध्य प्रदेश के झाबुआ में इस घोटाले से संबंधित समाचार कवर करने गए थे और समाचार संकलन के दौरान ही शनिवार को उनकी मौत हो गई। वहीं पुलिस जांच में मदद कर रहे मध्य प्रदेश के एक मेडिकल कॉलेज के डीन अरुण शर्मा रविवार को दिल्ली के एक होटल में मृत पाए गए।

और सोमवार को व्यापमं परीक्षा के जरिए चयनित एक प्रशिक्षु महिला उप निरीक्षक (सब इंस्पेक्टर) ने राज्य के सागर जिले में तड़के तालाब में कूदकर खुदकुशी कर ली। प्रशिक्षु उप निरीक्षक की पहचान अनामिका कुशवाहा के रूप में हुई है। वह जिले के जवाहर लाल नेहरू पुलिस प्रशिक्षण केंद्र में प्रशिक्षणरत थीं।
जुलाई 2013 में मामला दर्ज होने के बाद लगातार मौतें हो रही हैं। कांग्रेस मौतों का आंकड़ा 48 बता रही है, तो उच्च न्यायालय के निर्देश पर जांच की निगरानी कर रही एसआईटी को 33 मौतों की जानकारी है। वहीं सरकार मौतों की संख्या 25 मानती है।


व्यापमं से जुड़े जिन लोगों की मौत हुई है, उनमें विद्यार्थी, दलाल, फर्जी विद्यार्थी के तौर पर परीक्षा देने वाले और आरोपियों से जुड़े उनके परिजन शामिल हैं। जेल में और जेल के बाहर मौतें हुई हैं।

इंदौर में नरेंद्र सिंह तोमर की तबीयत बिगड़ी और अस्पताल पहुंचने पर मौत हो गई। इसी तरह श्योपुर के अमित सगर भी व्यापमं का आरोपी था और घर से घूमने निकला था और उसका शव नहर में मिला था। एसटीएफ और पुलिस इसे आत्महत्या करार दे रही है। एक अन्य आरोपी राज्यपाल रामनरेश यादव के बेटे शैलेश यादव की भी संदिग्ध हालात में लखनऊ में मौत हुई थी।

एक ओर मौतों का सिलसिला जारी है तो दूसरी ओर इस मामले से जुड़े लोग और मामले को उजागर करने वाले अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं।

व्यापमं घोटाले का सबसे बड़ा पहलू चिकित्सा महाविद्यालयों में दाखिले से जुड़ा है। ग्वालियर के गजराजा चिकित्सा महाविद्यालय के डीन डॉ. जी. एस. पटेल ने भी लगभग छह माह पूर्व सुरक्षा की बात भोपाल में अफसरों के साथ हुई बैठक में उठाई थी।

पटेल ने सोमवार को आईएएनएस से कहा, “उनके कॉलेज से छात्रों का निष्कासन चल रहा था, और उस समय दफ्तर के बाहर भीड़ लगी रहती थी। इस पर सुरक्षा की बात कही थी। वर्तमान में सुरक्षा की कोई बात नहीं की है। लेकिन सतर्क व सजग जरूर हैं।”

उच्च न्यायालय के निर्देश पर पूर्व न्यायाधीश चंद्रेश भूषण की अध्यक्षता में एसआईटी की देखरेख में एसटीएफ जांच कर रहा है। एसटीएफ के दो अफसरों ने भी एसआईटी से अपनी जान को खतरा बताया है।

चंद्रेश भूषण ने सोमवार को संवाददाताओं से चर्चा के दौरान माना कि दो अफसरों ने अपनी जान को खतरा बताया है।
इसी तरह इंडियन मेडिकल एसोसिएशन की जबलपुर इकाई के अध्यक्ष डॉ. सुधीर तिवारी ने भी सुरक्षा की मांग की है। डॉ. तिवारी ने पिछले दिन तत्कालीन डीन डॉ. डी.के. साकल्ले की मौत को लेकर सवाल उठाए थे। डॉ. साकल्ले की चार जुलाई, 2014 को घर में जलकर मौत हो गई थी, उसे आत्महत्या बताया गया था।

कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष अरुण यादव ने मौतों पर सवाल उठाए हैं। साथ ही सुनियोजित साजिश की आशंका जताई है। उन्होंने व्यापमं घोटाले की सीबीआई से जांच की मांग की है। इस मामले से जुड़े लोग अपने को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। वहीं मुख्यमंत्री चौहान ने सुरक्षा का भरोसा दिलाया है।

ज्ञात हो कि राज्य में इंजीनियरिंग कॉलेज, मेडिकल कॉलेज में दाखिले से लेकर विभिन्न विभागों की भर्तियों की परीक्षा व्यापमं आयोजित करता है। इन दाखिलों और भर्तियों में हुई गड़बड़ी का खुलासा होने के बाद जुलाई 2013 में पुलिस में प्राथमिकी दर्ज कराई गई थी। इस मामले में पूर्व मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा से लेकर व्यापमं के पूर्व नियंत्रक पंकज त्रिवेदी सहित वरिष्ठ अधिकारी व राजनीतिक दलों से जुड़े लोग जेल में है। राज्यपाल रामनरेश यादव पर भी सिफारिश करने का प्रकरण दर्ज है।