Wednesday, 22 April 2015

जंतर-मंतर पर हुई किसान के मौत पर आखिर कब तक होगी राजनीति,...गजेंद्र... ये देश शर्मिंदा है...किसानों के मौत पर भी होती हैं राजनीति

आम आदमी पार्टी की रैली के दौरान एक किसान गजेंद्र सिंह ने हजारों लोगों के सामने आत्महत्या कर ली। गजेंद्र ने दिल्ली के सीएम, डिप्टी सीएम, कैबिनेट मंत्रियों समेत हजारों लोगों के सामने अपनी जान दे दी, और मीडिया समेत (उसमें मैं खुद भी शामिल था) सभी लोग तमाशा देखते रहे।
गजेंद्र के लटकने के समय और बाद भी भाषणबाजी चलती रही, भीड़ के चलते कोई हिल भी नहीं पा रहा था, लेकिन गजेंद्र संभवत: उसी समय अपनी आखिरी यात्रा पर निकल चुके थे। जब एक किसान की, घर के मुखिया की मौत होती है, तो सिर्फ वही नहीं मरता। गजेंद्र के साथ ही मर गई, वो उम्मीद। जिसके सहारे उसका परिवार जी रहा था। गजेंद्र के साथ ही मर गए वो सपने, जो उसके परिवार ने पाल रखे थे।


गजेंद्र के साथ ही मर गया वो संघर्ष, जो गजेंद्र जीते जी अपने परिवार को पालने के लिए करता। इसके साथ ही गजेंद्र के साथ मर गई, उन सभी की इंसानियत, तो उसकी मौत का तमाशा देखते रहे। किसान के साथ जो हुआ वो दुखद है लेकिन उसकी मौत के बाद जंतर मंतर पर जो होता रहा वो भी हैरानी और गुस्से से भर देने वाला रहा। इस दौरान आम आदमी पार्टी की रैली होती रही। कुमार विश्वास बोलते रहे, मनीष सिसोदिया बोलते रहे, यहां तक कि अरविंद केजरीवाल भी बोले। भाषणों में मौत पर दुख से ज्यादा केंद्र सरकार पर हमलावर रुख दिखाई दिया।
राजनीतिक बयानबाजी हुई और प्वाइंट स्कोर करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी गई। दिल्ली पुलिस को ललकारते रहे, शिक्षकों को ललकारते रहे, केंद्र सरकार को ललकारते रहे। रैली के बाद उसकी मौत पर रोने से भला क्या फायदा होता सरकार का? अब तमाम नेता आंसू बहा रहे हैं। छाती पीट रहे हैं। हाय हाय कर रहे हैं। किसान की लाश को देखने वीआईपी, वीवीआईपी नेताओं का तांता लगा है। राहुल गांधी से लेकर अजय माकन तक, केंद्रीय मंत्रियों से लेकर दिल्ली सरकार के मंत्री तक।
आम आदमी पार्टी सवाल उठा रही है कि किसान खुदकुशी के लिए कैसे मजबूर हुआ? बीजेपी का सवाल है कि किसान की खुदकुशी के बावजूद आप की रैली कैसे चलती रही? और कांग्रेस एक साथ इन दोनों सवालों को उछाल रही है। कुल मिलाकर तीनों ही बड़ी पार्टियों को किसान की इस खुदकुशी में राजनीतिक रोटियां सेंकने का पूरा स्कोप दिख रहा है। आगे क्या होगा ये देश का बच्चा-बच्चा जानता है। अब मुआवजे का ऐलान होगा। परिवार के सदस्य को नौकरी की बात होगी।
किसान के घर में रियल लाइफ की पीपली लाइवफिल्माई जाएगी। लेकिन ये सवाल बाकी रह जाएगा कि क्या किसान की जिंदगी की यही कीमत है? कमी राजस्थान के स्थानीय प्रशासन की रही हो या केंद्र सरकार की हो। लेकिन जो संवेदनहीनता आज जंतर मंतर पर हम सबने बरती, वो कभी फिर न बरती जाए। बस यही उम्मीद है। जिस तरह घंटे भर से पेड़ पर चढ़े किसान की धमकी को लोगों ने हल्के में ले लिया था, वैसे ही किसी परेशान की आवाज को हल्के में न लिया जाए। वर्ना लोग मरते रहेंगे और मुआवजे की नौटंकी होती रहेगी। इन मौतों के साथ ही मरता रहेगा, एक परिवार का सपना और दागदार होती रहेगी जिंदगी।


Thursday, 16 April 2015

नेहरु गांधी परिवार का एकलौते राजनीतिक वारिश भारत लौटा

कांग्रेस महासचिव अपने अज्ञातवास से लौटे चुके हैं। 56 दिन बाद उनकी स्वदेश वापसी हुई है। राहुल का गायब होना भारतीय राजनीति के लिए यक्ष प्रश्न था। भारतीय मीडिया उनकी राजनीतिक कुशलता और नेतृत्व क्षमताओं पर तीखा प्रहार किया। राजनीतिक विश्लेषक और प्रतिपक्ष ने उन्हें रणछोड़ जैसे शाब्दिक सम्मानों से सम्मानित किया। उनकी वापसी को लेकर कांग्रेस में कोई खास हचलच नहीं दिखी। लेकिन मां सोनिया गांधी और बहन प्रियंका उनके वापसी के पहले उनके आवास पर पहुंची। राहुल गांधी के अज्ञातवास के बाद अब उनकी वापसी भी उतनी अहम हो गयी है। कांग्रेस और देश उनकी ओर देख रहा है। वापसी में राहुल गांधी क्या लाए हैं। वह कौन सी जड़ी-बूटी है जो दमतोड़ती कांग्रेस के लिए संजीवनी साबित होगी।
अभी तक यह सवाल उठते रहे कि आखिर राहुल गांधी कहां है। सोशलमीडिया में कुछ तस्वीरें उत्तराखंड की वायरल हुई थी। लेकिन बाद में इस पर यह कहकर विराम लगा दिया गया कि यह उनकी पुरानी तस्वीरें हैं। राहुल गांधी को कोई मामूली शख्सियत नहीं हैं। कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव होना भर भी उनकी उपलब्धि नही हैं। बल्कि वे देश की सबसे बड़ी सियासी पार्टी रही कांग्रेस के उत्तराधिकारी हैं। इसके साथ ही नेहरु गांधी परिवार के एकलौते राजनीतिक वारिश भी हैं। कांग्रेस के लिए राहुल गांधी की अहमियत क्या हैं। यह सवाल समय-समय पर उठता रहा है। लेकिन देश के विकास में कांग्रेस के साथ नेहरु और गांधी परिवार का बलिदान और योगदान नहीं भूलाया जा सकता है। राहुल युवा हैं उनकी सोच नयी है। देश की राजनीति में उनकी भूमिका को नकारा नहीं जा सकता है। राहुल कांग्रेस और उसके भविष्य की राजनीति के चेहरा हैं। राहुल के अज्ञातवास को लेकर भारतीय मीडिया में काफी बाते हुईं। उन पर पलायनवादी होने का भी आरोप लगा।
अब उनकी वापसी भी उतने ही सवाल उठा रही है। पूरा विमर्श ही इस पर टिका है कि आखिर 56 दिन वाद दिल्ली लौट रहे राहुल गांधी की चिंतन झोली में नया क्या हैं। वापसी से क्या फायदा होने वाला है। उनका नया शोध और चिंतन का नया सिद्धांत क्या है। उससे देश, कांग्रेस और स्वंय राहुल गांधी को क्या फायदा होने वाला है। राहुल गांधी और उनकी राजनीतिक कुशलता का यह अज्ञातवास अग्नि परीक्षा होगी। हलांकि इस पर बहुत अधिक बखेड़़ा भी नहीं उठना चाहिए। क्योंकि सभी का अपना व्यक्तिगत जीवन होता है। हो सकता है उनका अज्ञातवास स्वयं की शांति और चिंतन के लिए हो, जिस कांग्रेस और राजनीति से जोड़़ा जा रहा है। यह बात तभी सामने आएगी। जब वे खुद मंच पर आएंगे। इस चिंतन की पहली अग्नि परीक्षा 19 अप्रैल को होने वाली किसान रैली है। कहा जा रहा है राहुल गांधी इस रैली को संबोधित करेंगे। अज्ञातवासवास के दौरान उन्हें व्यक्तिगत हमले भी झेलने पड़े। उनके संसदीय क्षेत्र अमेठी में पोस्टर लापता होने का पोस्टर भी चस्पा हुआ। संसद सत्र के ऐन मौके पर गायब होने पर भी सवाल उठाए गए।
राजनीति विरोधियों से और खुद कांग्रेस के अंदर घिरे राहुल गांधी नयी विचारधारा कितनी धारधार होगी इसका लोगों को बेसब्री से इंतजार है। कांग्रेस में राहुल की नेतृत्व की क्षमता को लेकर सवाल खड़े होते रहे हैं। पार्टी का युवा धड़ा राहुल और प्रियंका को सामने लना चाहता था। जबकि चाटुकार राजनीति के रणनीतिकार और सोनिया गांधी की परिक्रमा में लगा खेमा राहुल को बर्दाश्त नहीं करना चाहता है। क्योंकि पार्टी की कमान राहुल के हाथ में जाने से बुजुर्ग पीढ़ी के नेताओं का पत्ता साफ हो सकता हैं। युवा सोच का होने से कांग्रेस से मठाधीशों का सफाया करना चाहते हैं जबकि मां सोनिया गांधी ऐसा करने से उन्हें रोकती हैं। सोनिया ऐसे लोगों और अपने विश्वस्तों का हटाना नहीं चाहती हैं। जिन्होंने बुरे दिनों में उनका साथ दिया। जबकि यही बात बुजुर्गों को खलती है। यही कारण है कि पुरानी पीढ़ी के लोग उनकी राजनीतिक क्षमता पर सवाल उठाते हैं। उन्हें डर है कि अगर कांग्रेस की कमान राहुल गांधी के हाथ गयी तो कांगे्रस सेे बूढ़ों का पत्ता साफ हो जाएगा। राहुल गांधी सैद्धांतिक राजनीति करते हैं। जबकि सोनिया गांधी व्यवहारिक राजनीति करती हैं। सोनिया वफादारों को खाद-पानी देना चाहती हैं। जबकि राहुल गांधी का फैसला पार्टी के हित में अधिक स्वहित के लिए कम हैं। इसीलिए राहुल गांधी कांग्रेस को नए विचारों वाला दल बनाना चाहते हैं। संगठन में पुराने लोगों का पत्ता साफ करना चाहते हैं।
पार्टी में उच्चपदों पर जो लोग लंबे समय से आसीन हैं। उन्हें डर है कि राहुल गांधी के हाथ पार्टी की सत्ता गयी तो उनका बोरिया विस्तर सड़क पर होगा। दस जनपथ उनके लिए बेगाना होगा। अंदर की बात यह है कि मां-बेटे की आड़ में कांग्रेस में नेतृत्व क्षमता को लेकर जो बहस की जा रही है। वह तथ्यहीन है। पार्टी की सेहत सुधारने के बजाए लोगों को अपनी ंिचंता अधिक है। उन्हें लगता है कि भाजपा की तरह अगर कांग्रेस में भी यह प्रयोग दुहराया गया तो यहां भी बुजुर्ग पीढ़ी के नेता इतिहास में दफन हो जाएंगे। पार्टी में उनकी अहमियत नहीं रहेगी। यही कारण है कि राहुल गांधी पार्टी के कई आतंरिक निर्णयों से नाराज होकर अज्ञातवास को चले गए थे। राहुल का अज्ञातवास कई सवाल खड़े करता है। सवाल उठता है कि राहुल गांधी देश छोड़कर कहा गए थे। उन्हें अज्ञातवास जाने की क्या जरुरत थी। वह चिंतन क्यों और किसके लिए था। राहुल गांधी खुद मां सोनिया के निर्णयों से खफा होकर वनवास का रास्ता अख्तियार किया था। या इस प्लानिंग में मां सोनिया, बहन प्रियंका और उनकी खुद सहमति थी। सोनिया गांधी क्या बेटे को विदेश भेजकर पार्टी में राहुल समर्थकों और विरोधियों का रुख भांपना चाहती थीं। सोनिया गांधी की सेहत पर कोई खास असर नहीं दिखा था। देश की मीडिया में इस विषय पर भले बड़े सवाल दागे गए थे। लेकिन मां सोनिया गांधी की तरफ से कोई बयान नहीं आया था।
भारतीय जनता पार्टी ने राहुल के गायब होने पर खूब हमला बोला। उन पर यह भी सवाल उठाए गए कि जिस समय संसद का अहम सत्र चल रहा हो उस दौरान उनका देश से बाहर जाना कई सवाल खड़े करता है। उस स्थिति में जब भूमि अधिग्रहण जैसे खास बिल पर संसद में चर्चा होनी थी और भाजपा नया संशोधित बिल ला रही थी। कांग्रेस राज में भूमि अधिग्रहण बिल लाने में राहुल गांधी की खास भूमिका थी। उन्हें किसानों के मसीहा के रुप देखा जाता है। वहीं दागियों को बचाने के लिए लाए जा रहे बिल पर भी उनकी भूमिका पर कई सवाल उठे थे। उन्हें आक्रामक राजनीति शैली का नेता बताया गया। लेकिन हमले चाहे जो किए गए। राजनीति में अपराधी करण को रोकने के लिए बिल फाड़कर उन्होंने जो कदम उठाया था। उनका वह कदम सौ फीसदी खरा था। लेकिन उनकी गैर मौजूदगी में सोनिया गांधी की नेतृत्व क्षमता कांग्रेस और देश के सामने सकारात्मक सोच लेकर आयी है।
भूमि बिल पर विपक्ष को एक एकजुट करने में उन्होंने खास भूमिका निभायी। इसके बाद कोयला घोटाले में सीबीआई की तरफ से नोटिस दिए जाने पर भी सोनिया गांधी यह जताने में कामयाब रही कि हम पूरी कांग्रेस आपके साथ खड़ी है। राहुल गांधी को अक्षम नहीं ठहराया जा सकता है। कांग्रेस की पराजय के लिए सिर्फ राहुल गांधी को ही जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है। देश भर में कांग्रेस के पास कोई कैडर नहीं रह गया है। कांग्रेस के नेताओं का संपर्क जनता से टूट गया है। कांग्रेस की छबि केवल मीडिया मैन की रह गयी है। कांग्रेस का कैडर भाजपा, और दूसरे दलों में परिवर्तित हो चला है। राज्यों में स्थानीय मुद्दों पर आम आदमी के साथ आने वाला कोई नहीं दिखता है। दिल्ली और दस जनपथ से कांग्रेस आगे नहीं निकल पा रही है। कांग्रेस सिर्फ बस सिर्फ नेतृत्व मे ंउलझी है। कांग्रेस के रणनीतिकार अपनी सारी उर्जा पार्टी को संघर्षशील बनाने के बजाय कांग्रेस का नेतृत्व किसने के हाथ में हो इस सवाल पर उलझा है। जबकि असलीयत यह है कि कांग्रेस जब तक अपना जनाधारा नहीं बढ़ाती है कुछ होने वाला नहीं है। उसकी कमान राहुल गांधी संभाले या मां सोनिया कोई फायदा होने वाला नहीं है।
निश्चित तौर पर राहुल गांधी की वापसी सुखद है। राहुल भारतीय राजनीति के भविष्य हैं। उनके अंदर युवा सोच और नीति है। पार्टी की जय-पराजय मात्र से ही किसी को अक्षम नहीं ठहराया जा सकता है। लोकतंत्र मंे जनमत और संख्या बल महत्वपूर्ण होता है। कभी-कभी संख्या बल के बूते अहम फैसले और जमीनी हकीकत भी लहरों और अफवाहों के बीच दब जाती है। वैसा ही कुछ कांग्रेस के साथ हुआ। उसके लिए सिर्फ राहुल गांधी को ही जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है। राहुल अब स्वेदश लौट आएं हैं। कांग्रेस और देश के लिए अपने नये विजन और चिंतन का इस्तेमाल वे किस रुप में करते हैं। इसकी अपेक्षा पूरे देश को हैं। अब वक्त आ गया जब कांग्रेस और उसके संगठन को राहुल गांधी को गंभीरता से लेना चाहिए।

Wednesday, 15 April 2015

जनता परिवार का कब कब हुआ विलय एक नज़र में

जनता परिवार का अतीत हमेशा से ही मतभेदों भरा रहा है. एकता और एकजुटता की बजाए कलह-कटुता और बिखराव ही जनता दल की कुंडली का लिखा अमिट लेख. आइए जरा नजर डालते हैं जनता दल की बुनियाद से जुड़े नेताओं के बिखराव भरे अतीत पर.
संघर्ष के सिपाही आज मिलने के लिए निकल पड़ें, फिर से उस उजड़े चमन को सजाने जिसकी रौनक अपने ही हाथों से अक्सर मटियामेट करते रहे हैं. इमरजेंसी के बाद देश में जनता सरकार बनीं तो उसी वक्त से जनता परिवार में झगड़े की आग ऐसी सुलगी की लोकनायक जयप्रकाश नारायण का संपूर्ण क्रांति का सपना उन्हीं की आंखों के सामने चकनाचूर हो गया. सत्ता का नशा क्रांति पर काबिज हो गया जिसकी वजह से समाजवादी कुनबा धीरे-धीरे जातीय गोलबंदी की सियासत और वंशवादी गुटों में तब्दील होता चला गया.



जनता सरकार में मोरारजी देसाई और चौधरी चरण सिंह के बीच बंटवारा हो गया. मोरारजी की सरकार से अलग होकर चौधरी चरण सिंह ने कांग्रेस के समर्थन से सरकार गठित कर ली. जनता सरकार के पतन के बाद जनता पार्टी का समाजवादी कुनबा भी बिखर गया. जिसे जहां राजनीति का रास्ता मिला वो उसी पार्टी के जरिए राजनीति करने लगा और आखिर में राजीव गांधी सरकार के वक्त बोफोर्स की तोप से निकले घोटाले के कथित जिन्न ने नए सिरे से जनता परिवार को एकजुट होने का मौका दिया. राजीव सरकार में वित्त मंत्री रहे विश्वनाथ प्रताप सिंह ने कांग्रेस से बगावत कर दी तो सारे युवा तुर्क उनकी छतरी के नीचे आकर खड़े हो गए. जनता दल की बुनियाद पड़ गई.

11 अक्टूबर 1988 को वीपी सिंह की अगुवाई में जनता दल की बुनियाद पड़ी. जनता पार्टी, जनमोर्चा और लोकदल का जनता दल में विलय हो गया. लेकिन वीपी सिंह सरकार बनने के बाद जनता दल में पहली टूट चंद्रशेखर की अगुवाई में हुई. चंद्रशेखर ने अलग होकर जनता दल समाजवादी का गठन किया. कांग्रेस के समर्थन से वो प्रधानमंत्री बने. हालांकि चंद्रशेखर सरकार चार महीने में ही गिर गई. जनता दल समाजवादी का नाम बदलकर समाजवादी जनता पार्टी हो गया.

फिर तो विभाजन का सिलसिला ही चल पड़ा. अहम की लड़ाई में दिल टूटने के साथ ही दल भी टुकड़े टुकड़े होता चला गया. कोई नेता इधर गया तो कोई उधर. वीपी सिंह, लालू यादव, नीतीश कुमार और शरद यादव के साथ देवेगौड़ा जनता दल को बचाने में जुटे लेकिन कोई तरकीब काम नहीं आई.

जनता दल से अलग हुए चंद्रशेखर और मुलायम सिंह यादव में भी फूट पड़ गई. 1992 में मुलायम सिंह यादव ने समाजवादी जनता पार्टी से अलग होकर समाजवादी पार्टी का गठन कर लिया. 1992 में चौधरी अजीत सिंह ने भी जनता दल से अलग होकर आरएलडी नामकी नई पार्टी बना ली. ये जनता दल में दूसरी टूट थी.

1994 में जनता दल से अलग होकर जॉर्ज फर्नांडीज और नीतीश कुमार ने समता पार्टी की बुनियाद रखी. ये जनता दल की तीसरी टूट थी.

1996 में कर्नाटक के नेता रामकृष्ण हेगड़े भी जनता दल से अलग हो गए, उन्होंने लोकशक्ति नामक नई पार्टी का गठन कर लिया. ये जनता दल की चौथी टूट थी.

1997 में लालू यादव ने जनता दल से अलग होकर आरजेडी का गठन किया. ये जनता दल में पांचवी बड़ी टूट थी.

1998 में नवीन पटनायक जनता दल से अलग हो गए. ओडिशा में बीजेडी का गठन हुआ. ये जनता दल की छठी बड़ी टूट थी.

1999 में बचे-खुचे जनता दल के भी दो हिस्से बन गए. देवेगौड़ा की अगुवाई में जनता दल सेक्युलर और शरद यादव की अगुवाई में जनता दल यूनाइटेड. ये बिखराव का सातवां अध्याय था जिसमें जनता दल का अस्तित्व हमेशा के लिए खत्म हो गया.

तो ये थी जनता दल की यात्रा के आखिरी पड़ाव तक पहुंचने की छोटी सी कहानी. बंटवारे का सिलसिला आगे भी चलता रहा और जनता दल से निकलकर बनी पार्टियों में भी बिखराव एक सिरे से दूसरे सिरे तक बढ़ता ही गया. मसलन रामविलास पासवान ने जेडीयू से अलग निकलकर लोकजनशक्ति पार्टी का गठन कर लिया और जनता परिवार के नेताओं ने एक एककर सत्ता के लिए ना-ना करते हुए भी प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की अगुवाई वाली एनडीए का दामन भी थाम लिया.

सत्ता के लिए विचार को पीछे छोड़ने के इस सफर में एकजुटता की जरूरत भी वक्त वक्त पर चंद नेताओं ने महसूस की. जॉर्ज फर्नांडीज और नीतीश कुमार की अगुवाई वाले समता पार्टी का विलय शरद यादव की अगुवाई वाली जेडीयू में हो गया. यानी बिखरे जनता परिवार में मिलन की प्रक्रिया भी शुरू हुई जो अब फिर से परवान चढ़ रही है.
­­­­_________________________________________________________________________________
भारत की छह राजनीतिक पार्टियों ने मिलकर एक नया दल बनाने का फ़ैसला कर लिया है.
जनता परिवार के इस विलय का ऐलान दिल्ली में जवता दल (यूनाइटेड) के अध्यक्ष शरद यादव ने किया.
उन्होंने ये घोषणा भी की कि इस नए दल के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव होंगे.
जिन छह पार्टियों का विलय होगा वो हैं: जनता दल (यू), समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, भारतीय राष्ट्रीय लोकदल, जनता दल (सेक्यूलर), समाजवादी जनता पार्टी.
य़े सभी एक ज़माने में उस जनता दल का हिस्सा थे जो 1988 में वजूद में आया था. इसीलिए इसे जनता परिवारका विलय भी कहा जा रहा है.
1988 में जनता दल कांग्रेस के खिलाफ वजूद में आया था जिसे तब भाजपा का साथ मिला था. लेकिन आज जो गोलबंदी हो रही है वह भाजपा के खिलाफ हुई है जिसे कांग्रेस का साथ मिलता दिखाई दे रहा है. इस तरह समकालीन भारतीय राजनीति का एक चक्र भी पूरा हुआ है.
क्या है इतिहास
बोफोर्स
बोफोर्स विवाद से शुरू हुई काग्रेस में फूट और जनता दल के शुरू होने की दास्तां
1987 में राजीव गांधी सरकार में वरीय मंत्री रहे कांग्रेस के नेता विश्वनाथ प्रताप सिंह ने बोफोर्स तौप सौदे में हुए कथित भ्रष्टाचार के सवाल पर बगावत कर दी थी.
भ्रष्टाचार के खिलाफ विश्वनाथ प्रताप सिंह ने लोकमोर्चा बनाकर पूरे देश में अभियान चलाया जिसको अच्छा जनसमर्थन मिला.
बना जनता दल
शरद यादव
शरद यादव ने बनाई जनता दल युनाइटेड
बैंगलौर (अब बैंगलुरु) में पुरानी जनता पार्टी के धड़ों, लोकदल और कांग्रेस (एस) ने लोकमोर्चा के साथ मिलकर 1988 में जनता दल का गठन किया. जयप्रकाश नारायण की जयंती के दिन यह दल वजूद में आया था.
1989 के आम चुनाव में कांग्रेस के बाद जनता दल सबसे बड़ी पार्टी बनी. कांग्रेस के सरकार बनाने से इंकार करने पर भाजपा, वामपंथी और क्षेत्रीय दलों के समर्थन से 1989 के दिसंबर में विश्वनाथ प्रताप सिंह प्रधानमंत्री बने.
दो साल में ही हुई पहली टूट
जनता दल ने सत्ता के दरवाज़े पर दस्तक दी और पार्टी में खींच-तान भी शुरु हो गई .
1989 के आम चुनाव के बाद जब जनता दल का नेता चुनने की बारी आई तो पार्टी के तत्कालीन कद्दावर नेता चंद्रशेखर ने देवीलाल का नाम प्रस्तावित किया और देवीलाल ने विश्वनाथ प्रताप सिंह का.
इसके बाद विश्वनाथ प्रताप सिंह मान-मनौव्वल के बाद जनता दल के नेता और फिर भारत के प्रधानमंत्री बने.
इस खींच-तान के एक साल के अंदर ही जनता दल टूट भी गया. 1990 के अक्तूबर में विश्वनाथ प्रताप सिंह सरकार से भाजपा ने समर्थन वापस ले लिया और सरकार गिर गई.
इस बीच 1990 के नवंबर में चंद्रशेखर ने जनता दल के लगभग 60 सांसदों को साथ लेकर समाजवादी जनता पार्टी बनाई और कांग्रेस के समर्थन से प्रधानमंत्री भी बने.
बिखर गया चक्र
जनता दल का चुनाव चिह्न चक्र था. चंद्रशेखर की अगुवाई में हुई टूट से जनता दल में जो बिखराव शुरु हुआ वो लगभग अगले एक दशक के दौरान कई बार सामने आया. चक्र के सारे हिस्से धीरे-धीरे अलग होते गए.
मुलायम यादव
1992 के अक्तूबर में चंद्रशेखर के नेतृत्व वाली समाजवादी जनता पार्टी से टूट कर मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व में समाजवादी पार्टी बनी.
1994 में नीतीश कुमार और दूसरे नेताओं ने लालू प्रसाद यादव का विरोध करते हुए समता पार्टी का गठन किया.
विश्वनाथ प्रताप सिंह
1997 में लालू प्रसाद यादव तत्कालीन जनता दल के अध्यक्ष और बिहार के मुख्यमंत्री थे. तब तक वे बहुचर्चित चारा घोटाले में आरोपित हो चुके थे.
उन पर जनता दल के एक धड़े से दबाव था कि वे पार्टी के अध्यक्ष और बिहार के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दें.
इस पृष्ठभूमि में उन्होंने 5 जुलाई, 1997 को राष्ट्रीय जनता दल का गठन कर लिया.
वहीं एचडी देवगौड़ा के नेतृत्व में जनता दल (सेक्यूलर) 1999 में वजूद में आया. तब जनता दल से टूट कर यह नई पार्टी बनी थी. उस वक्त शरद यादव जनता दल के अध्यक्ष थे.
बाद में शरद यादव के नेतृत्व में ही जनता दल यूनाइटेड यानी जदयू बनी.
जदयू आज जिस स्वरुप में सामने है वह 2003 में तत्कालीन समता पार्टी और जदयू के विलय के बाद अस्तित्व में आया था.
तब समता पार्टी के अध्यक्ष ज़ॉर्ज फर्नांडीस और जनता दल यूनाइटेड के अध्यक्ष शरद यादव थे. विलय के बाद से शरद यादव जनता दल यूनाइटेड के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं