Monday, 30 June 2014

PSLV C23 का सफलतापूर्वक हुआ लॉन्च

देश के महत्वाकांक्षी अंतरिक्ष कार्यक्रम में उपलब्धि की एक और इबारत लिखते हुए भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) का ध्रुवीय प्रक्षेपण यान (पीएसएलवी सी 23) पांच विदेशी उपग्रहों के साथ सोमवार को सफलतापूर्वक अंतरिक्ष के लिए रवाना हो गया। 
पीएसएलवी ने आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केन्द्र से पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार ठीक सुबह 9 बजकर 52 मिनट पर गगनभेदी गर्जना के साथ उड़ान भरी।

देश के अंतरिक्ष कार्यक्रम की इस कामयाबी को देखने के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के अलावा आंध्रप्रदेश के राज्यपाल ई एस एल नरसिम्हन और मुख्यमंत्री के. चंद्रबाबू नायडू (इसरो) के अध्यक्ष के राधाकृष्णन सहित कई वैज्ञानिक और अधिकारी भी मौजूद थे। 

अंतरिक्षयान के सफल प्रक्षेपण के साथ ही समूचा अंतरिक्ष केन्द्र तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। प्रधानमंत्री ने हाथ मिलाकर वैज्ञानिको को बधाई दी। 

अंतरिक्षयान ने निर्धारित समय में सफंलतापूर्वक अपने चार चरणों की यात्रा पूरी की और पांचो उपग्रहों को 665 किलोमीटर ऊपर पृथ्वी की कक्षा में स्थापित कर दिया।

पीएसएलवी की यह पूरी तरह से एक व्यावसायिक उड़ान थी जिसके जरिए पांच विदेशी उपग्रह अंतरिक्ष में प्रक्षेपित किये गए हैं।

इन उपग्रहों में फ्रांस का 714 किलोग्राम वजनी पृथ्वी निगरानी उपग्रह एसपीओटी-7 है, जर्मनी का 14 किलोग्राम वजनी आइसैट उपग्रह, 15-15 किलोग्राम वजनी कनाडा का एनएलएस 7.1 और एनएलएस 7.2 उपग्रह तथा सिंगापुर का सात किलोग्राम वजनी वेलाक्स उपग्रह शामिल है। 

इसरो की व्यावसायिक इकाई (एंटि्रक्स) द्वारा फ्रांस, र्जमनी, सिंगापुर और कनाडा के साथ इसके लिए करार किया गया था। 

सोमवार की पीएसएलवी की सफल उड़ान ने वैश्विक स्तर पर भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम का परचम एक बार फिंर से लहरा दिया है।

इस अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसरो के वैज्ञानिकों को बधाई देते हुए कहा कि यह देश के लिए गौरव का क्षण है। 

प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि पांच विदेशी उपग्रहों का सफल प्रक्षेपण भारत की अंतरिक्ष क्षमता की वैश्विक पुष्टि है। 

उन्होंने कहा कि तकनीक को आम लोगों तक पहुचाना होगा जिससे गरीबी और अशिक्षा जैसे समस्याओं से लड़ा जा सकता है। 

Wednesday, 25 June 2014

कल से शुरू होगी मंडी हाउस और केन्द्रीय सचिवालय की मेट्रो

दिल्ली की लाइफ लाइन कहीं जाने वाली मेट्रों ट्रेन
का केंद्रीय सचिवालय से मंडी हाउस वाला सेक्शन बनकर तैयार हो गया है जिसे गुरुवार से पब्लिक के लिए खोल दिया जाएगा. डीएमआरसी ने ऐलान किया है कि केंद्रीय शहरी विकास मंत्री एम वेंकया नायडू सुबह 9:30 बजे पहली ट्रेन को हरी झंडी दिखाकर रवाना करेंगे. मंगलवार को कमिश्नर मेट्रो रेल सेफ्टी (सीएमआरएस) से सेफ्टी क्लियरेंस मिलने के बाद यह घोषणा की गई.
मेट्रो फेज-3 के इस पहले सेक्शन के खुलने से मेट्रो की ब्लूलाइन से वॉयलेट लाइन पर आने-जाने के लिए तीन मेट्रो चेंज नहीं करनी पड़ेंगी. मंडी हाउस पर ही ट्रेन बदलकर लोग बदरपुर, नोएडा, वैशाली या द्वारका की तरफ आ-जा सकेंगे. करीब 3 किलोमीटर लंबे इस नए अंडरग्राउंड सेक्शन में जनपथ और केंद्रीय सचिवालय पर दो नए स्टेशन बनाए गए हैं. कमिश्नर मेट्रो रेल सेफ्टी (सीएमआरएस) ने इस सेक्शन को पैसेंजर सर्विस के लिए ग्रीन सिग्नल दे दिया है. फाइनल सेफ्टी क्लियरेंस मिलने के साथ ही डीएमआरसी ने यह भी घोषणा कर दी है कि गुरुवार से इस सेक्शन को आम जनता के लिए खोल दिया जाएगा. इससे बदरपुर लाइन पर आना-जाना बेहद आसान हो जाएगा. 


चार वर्षीय स्नातक पाठ्यक्रम को लेकरमानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने किया इंकार

मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने चार वर्षीय स्नातक पाठ्यक्रम को लेकर जारी तनातनी के बीच दिल्ली विश्वविद्यालय और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के बीच बने गतिरोध पर कुछ कहने से इंकार कर दिया है। इस गतिरोध के चलते लाखों छात्रों का भविष्य को लेकर अनिश्चितता बनी हुयी है। ईरानी ने आज संवाददाताओ के इस बारे में पूछे जाने पर कहा कि उन्हें इस संबंध में बोलने का कुछ अधिकार नहीं है। उल्लेखनीय है कि इस विवाद को हल करने के लिये कल उन्होंने यूजीसी के अध्यक्ष वेद प्रकाश से विचार विर्मश किया था। उन्होंने इस मामले में हस्तक्षेत्र करने से इंकार कर दिया था लेकिन कहा था कि डीयू को यूजीसी की बात माननी चाहिये। यूजीसी ने गत रविवार को डीयू को चार वर्षीय पाठ्यक्रम को तीन वर्ष का करने का निर्देश दिया था जिसे डीयू ने मानने से इंकार कर दिया। यूजीसी ने एक सार्वजनिक सूचना जारी करके कहा कि डीयू की ओर से पेश पाठ्यक्रम राष्ट्रीय शिक्षा नीति, डीयू के निर्धारित ढांचे और दिल्ली विश्वविद्यालय अधिनियम के अनुरुप नहीं है और कॉलेज केवल तीन वष्रीय पाठ्यक्रम में ही दाखिला लें। इस गतिरोध के चलते छात्रों के दाखिले को लेकर अनिश्चितता की स्थिति बनी हुयी है। डीयू ने दाखिले की प्रक्रिया स्थगित कर दी है। दाखिले के संबंध में पहली कट आफ लिस्ट आज आनी थी लेकिन अब यह तय नहीं है कि पहली लिस्ट कब आयेगी। इस बीच इस मुद्दे को लेकर छात्र संगठनों की ओर से विरोध प्रदर्शनों का सिलसिला आज भी जारी रहा।
 

बिहार के छपरा में राजधानी एक्सप्रेस दुर्घटनाग्रस्त

आज रात बिहार के छपरा के नजदीक गोल्डीनगंज में राजधानी एक्सप्रेस देर रात हादसे का शिकार हो गई। दिल्ली से चलकर डिब्रूगढ़ जाने वाली राजधानी एक्सप्रेस की 12 बोगियां पटरी से उतर गई। इस हादसे में 4 लोगों की मौत हो गई और 8 लोग घायल हैं। घायलों को निकट के अस्पताल में भर्ती कराया गया है। यह हादसा देर रात 2 बजकर 15 मिनट पर हुआ। इसमें राजधानी एक्सप्रेस के B1 से B7 तक के सभी डिब्बे पटरी से उतर गए। उस वक्त ट्रेन में सभी लोग सो रहे थे, तभी ट्रेन पटरी से उतर गई।

रेलवे बोर्ड ने अध्यक्ष अरुणेंद्र कुमार ने घटना में नक्सलियों हमले की आशंका जताई है। उन्होंने कहा कि नक्सलियों ने बंद का एलान किया था। ऐसे में इस हादसे में नक्सलियों का हाथ होने से भी इनकार नहीं किया जा सकता। इस बीच रेल मंत्री सदानंद गौड़ा ने रेल हादसे को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए साजिश की संभावना से इंकार नहीं किया है।

रेल मंत्री सदानंद गौड़ा ने मारे गए यात्रियों के परिजनों को दो दो लाख रूपये , गंभीर रूप से घायल हुए लोगों को एक एक लाख रूपये और मामूली रूप से घायल हुए यात्रियों को 20 हजार रूपये की मदद देने की घोषणा की है ।

पीड़ितों एवं दूसरे यात्रियों के परिवारों को सूचना उपलब्ध कराने के लिए छपरा, समस्तीपुर, हाजीपुर, सोनपुर, बरौनी, मुजफ्फरपुर, लखनउ, वाराणसी, बलिया, गुवाहाटी, ढिब्रूगढ़, तिनसुकिया, मरियानी, दीमापुर, लुमडिंग, न्यू कूचबिहार, न्यू जलपाईगुड़ी और कटिहार में हेल्पलाइन शुरू की गयी हैं । हादसे का शिकार हुई ट्रेन के यात्रियों को पास के स्टेशन ले जाया गया है जहां से वे अपनी आगे की यात्रा करेंगे।

रेलवे ने हादसे की जानकारी के लिए हेल्पलाइन नंबर जारी किए हैं। ये नंबर है:

हाजीपुर - 06224-272230
छपरा - 06152-243409, 06152-237807, 09771443941
छपरा कचहरी - 06152-243409
लखनऊ - 9794830976
वाराणसी - 0542-2503814, 0542-2226778, 0542-2224742
नई दिल्ली - 011-23342954
मुजफ्फरपुर जंक्शन - 0621-2213034 (रेलवे)
बरौनी - 06279-65210
समस्तीपुर - 06274-222613, 025-32131 (रेलवे)
गाजीपुर सिटी - 0548-2223435, 09794843922
बलिया - 05498-223024, 09794843923

  

Wednesday, 18 June 2014

क्या है 'मोदी मंत्र'


खबरें ये आ रही है कि शायद मोदी सरकार बहुत जल्द भूमि अधिग्रहण कानून से सामाजिक प्रभाव Assesment को बंद कर सकती है। इसके तहत अधिग्रहण के पहले ये देखा जाता है कि इससे वहां के रहने वाले लोगों, उनके पीने के पानी की व्यवस्था और पूजा स्थल पर क्या असर पड़ता है।
क्या कानूनों की जटिलता विकास की रफ्तार को धीमी कर देती है? क्या प्रक्रियाओं की उलझन में तरक्की के एजेंडे धरे के धरे रह जाते हैं? दरअसल बीते 10 सालों का राजनीतिक अतीत ये बताता है कि किस तरह देश में पिछली सरकार ने कानून तो कई लागू किए, लेकिन उनसे बजाय सहूलियत मुश्किलें और बढ़ती चली गईं। लिहाजा अब नई सरकार पिछली गलतियों से सबक लेने को तैयार है, जिसके संकेत अभी से मिलने शुरु हो गए हैं।
दरअसल किसी भी देश के समग्र विकास के लिए जरूरी है कि हर वर्ग के लिए सोची समझी रणनीति के साथ अहम बदलाव करते हुए समय के साथ फैसले किए जाएं। लेकिन ये तभी मुमकिन है जब इसके लिए ना केवल जरूरी साधन हों बल्कि प्रक्रिया भी आसान हो। बिना इसके विकास की रफ्तार कुंद पड़ जाती है। यहां प्रक्रिया का मतलब लालफीताशाही से है, और कानूनों से भी। वक्त के साथ कानून बदले जाने जरूरी है, लेकिन सियासी उतार चढ़ाव के हिसाब से बदले गए कानून किसी के हित में नहीं होते। अच्छी बात ये है कि नई सरकार ने शुरू में ही इस बात को समझ लिया है, और खालिस विकास के एजेंडे पर चलना शुरू किया है। उम्मीद की जानी चाहिए कि ये कोशिश आने वाले दिनों में देश के लिए अच्छे दिनों की बुनियाद साबित होगी।
 दरअसल नई सरकार को ये बात अच्छी तरह पता चल चुकी है कि यूपीए के कार्यकाल में जो पॉलिसी पैरालिसिस रहा है उसकी वजह कानूनों का जाल है जो पूरी प्रक्रिया को सुस्त कर देता है। लिहाजा मोदी सरकार की ओर से वो तमाम उपाय किए जा रहे हैं जिससे विकास की प्रक्रिया बाधित ना हो। इसीलिए एक ओर जहां सिंगल विंडो सिस्टम बनाए जाने की बात हो रही है तो वहीं एक्जीक्यूशन लेवल पर सरकार की भागीदारी बढ़ाने की भी बात हो रही है। इसी कोशिश में प्रोजेक्ट मॉनिटरिंग ग्रुप को ये काम दिया गया है कि, वो ना केवल योजनाओं को क्लीयरेंस दिलाए, बल्कि ये भी देखे कि निर्धारित वक्त में इंडस्ट्री ने काम शुरु किया है या नहीं।
मोदी ने विकास को लेकर जीरो टॉलरेंस के रुख की झलक सत्ता संभालने के साथ ही देनी शुरु कर दी थी। सचिव स्तर के अधिकारियों के साथ हुई मोदी की बैठक में उन्होने सचिवों से ना केवल बेफिक्र होकर काम करने की छूट दी, बल्कि महज 24 घंटे के नोटिस पर उनसे सीधे मुलाकात का रास्ता भी खोल दिया। इतना ही नहीं अधिकारी खुलकर काम कर सके इसके लिए एंटी करप्शन लॉ में भी बदलाव की तैयारी चल रही है।
अब एनडीए की सरकार को ये अहसास हो रहा है कि अगर इसी तरह कानूनों का जाल बिछा रहा तो विकास को तेज़ रफ्तार देना मुमकिन नहीं होगा। लिहाजा कोशिश की जा रही है कि कानून में ज़रूरी बदलाव किए जाएं ताकि इंडस्ट्रीज़ को भी आसानी हो और ज़मीन मालिक को भी नुकसान ना हो। हालांकि इस मामले में बीजेपी अपने पुराने रुख से पलटती नजर आ रही है। बीजेपी ने विपक्ष में रहने के दौरान नए नए कानूनों की मांग करने से कभी भी परहेज नहीं किया। भ्रष्टाचार रोकने के लिए लोकपाल की मांग होती रही जबकि पहले से ही करप्शन के खिलाफ कई कानून मौजूद हैं। लेकिन अब जबकि बीजेपी सत्ता में है शायद उसे ये अहसास होने लगा है कि विपक्ष में बैठकर सवाल उठाना और बात है जबकि सत्ता में बैठक सरकार चलाना और बात। लिहाजा बीजेपी का रूख बदला है और पीएम नरेन्द्र मोदी इस बदलाव के अगुवा बने हैं।
दरअसल भूमि अधिग्रहण को लेकर देश भर के अलग अलग हिस्सों में मचे बवाल के बाद 2013 में यूपीए की सरकार ने कानून में कई बदलाव कर दिए थे। जो नया कानून बना उसके तहत ये ज़रूरी कर दिया गया कि ज़मीन अधिग्रहण के एवज़ में प्रभावित होने वाले 80 फीसदी लोगों की मंजूरी होनी चाहिए। इस कानून के बाद ज़मीन अधिग्रहण के मामले काफी कम हो गए, क्योंकि पूरी प्रक्रिया आसान नहीं रही। लिहाज़ा विकास की रफ्तार भी धीमी पड़ गई।

गोवा क्रांति दिवस


गोवा क्रांति दिवस के मौके पर यह वीडियों सूट किया गया है इसको जरूर देखे

इराक में फंसे भारतीय


इराक में चल रही लड़ाई जैसे-जैसे घमासान होती जा रही है, भारत में चिंताए भी बड़ती जा रही है। वही अर्थव्यवस्था पर भी इस युध्द की साफ झलग दिखाई पडने लगी है। यदि हम भारतीयों की बात करें तो युध्द-क्षेत्र से भारतीयों को निकालने का जो भारत का रिकार्ड भले ही अच्चा रहा हो, मगर इराक में जो हाल है, उसमें यह कठिन चुनौतीयों का समय है इस स्थिति में भारत को बहुत ही शान्ति से काम करने की जरूरत है ताकी भारतीयों की जान भी बच जाए और उन्हें कुछ हो भी न  
इराक में फंसे भारतीयों की सुरक्षा को लेकर चिंता के बीच भारत ने खाड़ी देश के हिंसा प्रभावित इलाकों में अपने नागरिकों की सहायता के लिए इराक के अधिकारियों के साथ जमीनी सहयोग की संभावनाओं पर विचार-विमर्श किया और उनके परिजनों को सूचना मुहैया कराने के लिए यहां नियंत्रण कक्ष की स्थापना की।
इराक में मौजूद भारतीयों के बारे में जानकारी के लिए विदेश मंत्रालय ने हेल्पलाइन नंबर जारी किया है। नंबर इस प्रकार हैं- बग़दाद- +964 770 484 3247, + 964 770 444 4899 भारत - +91 11 2301 2113, 2301 7905, 2301 4104 विदेशमंत्री सुषमा स्वराज से निर्देश मिलने के बाद आयोजित ‘संकट प्रबंधन बैठक’ में उस देश में फंसे भारतीयों को मुहैया कराए जाने वाले सहयोग के सभी पहलुओं की समीक्षा की गई।

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता सैयद अकबरूद्दीन ने कहा कि सुषमा खुद ही नियमित रूप से स्थिति की ‘निगरानी एवं समीक्षा’ कर रही हैं।करीब 46 नर्स के अलावा करीब 40 भारतीय मोसुल में हैं।

आतंकवादी संगठनों ने इन दोनों शहरों पर कब्जा कर लिया है।

इससे पहले सचिव (पूर्व) अनिल वाधवा ने इराक के राजदूत अहमद तहसीन अहमद बेरवारी से मुलाकात की और दोनों ने हिंसा प्रभावित इलाकों में भारतीय नागरिकों को सहयोग मुहैया कराने के लिए जमीनी स्तर पर सहयोग की संभावनाओं पर चर्चा की।

बगदाद में भारतीय मिशन इराक की सरकार और यूएन असिस्टेंट मिशन इन इराक के संपर्क में है ताकि हिंसा प्रभावित इलाकों में फंसे सभी भारतीयों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

गौरतलब है कि इराकी सरकार के खिलाफ जंग छेड़े सुन्नी चरमपंथियों ने तिरकित पर कब्जा कर रखा है।

विजय कुमार राय

हाय ये महंगाई


तरफा बढ़ती महंगाई की मार... जिससे जनता में मच गया है हाहाकार... महंगाई के मोर्चे पर एक बार फिर निराशा हाथ लगी है। थोक महंगाई दर में बढ़ोतरी दर्ज की गई... और इसपर काबू पाने में एक बार फिर सरकार फ्लॉप साबित हुई। जी हां अच्छे दिनों का वादा करने वाली मोदी सरकार के लिए महंगाई मुसीबत बनती जा रही है...पिछली सरकार महंगाई पर काबू पाने में पूरी तरह नाकाम साबित हुई.... बीजेपी ने शुरू से ही महंगाई को अपना मुख्य एजेंडा बनाया... लेकिन इसपर काबू पाना इतना आसान नहीं...चौतरफा बढ़ती महंगाई को देखकर तो लगता है कि...ये महंगाई अब मोदी के लिए भी मुसीबत बनती जा रही है।
देश में फिर गहराया
महंगाई का संकट

मोदी सरकार के लिए
महंगाई बनी मुसीबत

जनता ने उठाया सवाल
महंगाई से कैसे निपटेगी सरकार ?

दूध महंगा, सब्जी महंगी
महंगाई की चौतरफा मार

डीजल-पैट्रोल होंगे महंगे
प्याज के दामों पर हाहाकार

सब्सिडी का अटका फंदा
रेलवे को भी बढोतरी की दरकार

महंगाई ने बिगाड़ा बजट

सबको अच्छे दिनों का इंतजार


केन्द्र में मोदी सरकार के आते ही... अच्छे दिन आए हैं या नहीं फिलहाल ये कह पाना थोड़ा मुश्किल है... लेकिन आसमान छूती महंगाई से राहत पाने की उम्मीद कर रहे लोगों के लिए बुरी खबर ये है कि पिछले पांच महीनों में महंगाई दर अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच गई है। और इसका असर भी बाजार में देखा जा सकता है.. अनाज से लेकर दालों तक.. दूध से लेकर फलों और सब्जियों तक...इंसान की मूलभूत जरूरतों से जुड़ी सभी चीजों पर महंगाई की मार पड़ रही है।
महंगाई से निजात दिलाने का वादा करनेवाली मोदी सरकार महंगाई कम करने के प्रयास में अब तक नाकाम रही है... ताजा आंकड़ों के मुताबिक मई में महंगाई थोक दर बढ़कर 6.01 फीसदी हो गयी जो दिसंबर 2013 के बाद सबसे उच्च स्तर पर है।
देश में महंगाई से हाहाकार
अच्छे दिन कब लाएगी सरकार ?
महंगाई के मुद्दे को हवा दे सत्ता में आई बीजेपी के लिए अब महंगाई ही सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरी है..। सौ दिन में महंगाई रोकने के कांग्रेस के दावों की खिल्ली उड़ाने वाले मोदी के पास भी अब महंगाई की मार से लोगों को राहत देने के लिए कोई फौरी योजना नहीं है। सोमवार को जारी ताजा आंकड़ों के अनुसार मई में थोक महंगाई दर बढ़कर 6.01 फीसदी हो गयी जो अप्रैल में थी 5.2 फीसदी  पर थी। दिसंबर 2013 के बाद  अपने उच्चतम स्तर पर है। हालांकि महंगाई के ये आंकड़े सरकार बनने से पहले के हैं। 
पांच महीनों में सबसे ज्यादा महंगाई
मई में थोक महंगाई दर बढ़कर 6.01 फीसदी
अप्रैल में थी 5.2 फीसदी  महंगाई दर
दिसंबर 2013 के बाद उच्चतम स्तर पर
महंगाई दर में ये बढ़ोतरी खाद्य और ईंधन कीमतों में हुए उछाल की वजह से हुई है। ये जानकारी सरकारी आंकड़े में सामने आई....केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के आंकड़े के मुताबिक , ईंधन और बिजली की महंगाई दर, डीजल कीमतों में 14.21 फीसदी वृद्धि की वजह से बढ़कर 10.53 फीसदी हो गई। पेट्रोल की कीमत 12.28 फीसदी बढ़ गई। खाद्य महंगाई दर बढ़कर 9.50 फीसदी हो गई। आलू की कीमत में सबसे ज्यादा 31.44 फीसदी वृद्धि दर्ज की गई। फल 19.40 फीसदी महंगे हो गए, जबकि दूध की कीमत में 9.75 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई।
कहां कितनी महंगाई बढ़ी -
डीजल                14.21 %
ईंधन और बिजली       10.53 %
पेट्रोल                 12.28 %
आलू                  31.44 %
फल                  19.40 %
दूध                   9.75 %
गौरतलब है कि मोदी सरकार ने महंगाई काबू करने को अपने एजेंडे में सबसे ऊपर रखा है, लेकिन हालात ऐसे बन रहे हैं कि सरकार के लिए बढ़ती कीमतों पर नियंत्रण मुश्किल हो सकता है। मई की महंगाई दर का आंकड़ा तो बढ़ कर आया ही है, अब आगे कीमतें और ऊपर जाने का खतरा बन गया है। महंगाई बढ़ने के साथ ही मोदी के लिए अच्‍छे दिन लाने की चुनौती भी बढ़ गई है...देश से अच्‍छे दिन लाने का वादा कर चुके पीएम नरेंद्र मोदी ने अब कहा है कि कुछ कड़े फैसलों के लिए तैयार रहना होगा, लेकिन एक तरफ बढ़ती महंगाई और दूसरी तरफ मोदी के कड़े फैसलों की चेतावनी के बाद....ये सवाल भी गहराने लगा है कि कि अच्‍छे दिन आखिर कैसे आएंगे?

चौतरफा महंगाई की मार से ना सिर्फ आम आदमी परेशान है.. बल्कि सरकार के लिए भी ये महंगाई मुसीबत बनी हुई है... खाने-पीने की चीजों पर सबसे ज्यादा महंगाई का असर पड़ा है...लेकिन सवाल ये खड़ा होता है कि आखिर महंगाई क्यों बढ़ रही है..आखिर क्या वजह है कि आपकी सारी कमाई...महंगाई नाम की ये डायन खाए जा रही है।
महंगाई का जिम्मेदार कौन ?
देश में नई सरकार बनी...नई योजनाओं का आगाज़ हुआ... पिछली सरकार की सबसे बड़ी खामियों में से एक महंगाई को दूर करने के लिए नीतियां निर्धारित की गईं... लेकिन महंगाई की मुसीबत ने जनता का पीछा नहीं छोड़ा... महंगाई पर काबू पाने में पिछली सरकार पूरी तरह नाकाम नज़र आई...और नई सरकार भी.. इस मुसीबत में घिरती नज़र आई। फल, सब्जियां, दूध, अनाज, दालें और ईंधर सब कुछ महंगा हो गया। इस महंगाई ने ना सिर्फ जनता को करारा झटका दिया..बल्कि सरकार को गंभीरती से सोचने पर मजबूर कर दिया। बड़े-बड़े अर्थशास्त्री महंगाई के कारणों को लेकर अलग-अलग तर्क दे रहे हैं।
कम मानसून का खतरा
पैदावार में कमी का डर
जमाखोरों ने भरा खजाना
महंगाई का ग्राफ पहुंचा ऊपर
इस बार शुरू से ही मानसून के कमजोर रहने की आशंका जताई जा रही है... मौसम विभाग के अलावा प्रोइवेट वेदर टेलिकास्ट कंपनी स्काई मेट भी अपनी रिपोर्ट में कम मानसून की चेतावनी दे चुकी है... जाहिर है कम बारिश का असर कई फसलों पर पड़ सकता है...लिहाजा कम पैदावार की आहट ने जमाखोरों और बिचौलियों को पहले ही सतर्क कर दिया है... और उन्होंने खाद्य सामग्रियों की जमाखोरी शुरू कर दी है..जिसके चलते बाजार में आपूर्ति प्रभावित हुई और कमोडिटीज़ के दाम बढ़ गए। केन्द्रीय वित्त मंत्री अरूण जेटली ने भी बढ़ती महंगाई का ठीकरा कमजोर मॉनसून की आशंका और खाद्य जमाखोरी पर फोड़ा है। अरुण जेटली ने मंहगाई बढ़ने के बारे में जो कहा वो भी गौर करने लायक है। फेसबुक पेज पर उन्होंने लिखा.... खाने की चीजों की कीमतों में बढ़ोतरी को जमाखोरी और कमजोर मॉनसून की आशंका से जोड़ा जा सकता है राज्य सरकारों को जमाखोरी रोकने के लिए कड़े कदम उठाने चाहिए,  सरकार ऐसे कदम उठाने के लिए प्रतिबद्ध है जो जीडीपी और विकास दर को बढ़ाए उम्मीद है महंगाई दर पर कुछ दिनों में काबू पा लिया जाएगा
चुनाव से चरमराई अर्थव्यवस्था
महंगाई ने तोड़ी जनता की कमर
चुनावों के बाद अक्सर महंगाई बढ़ती है....कुछ लोग इस महंगाई के पीछे भी चुनाव में हुए अनाब-शनाब खर्चे को ही जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। लेकिन जिस तरह कुछ खास चीजों के दामों में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है...उसे देखकर नहीं लगता कि महंगाई की इस मार के पीछे...चुनाव का कोई लेना-देना है।
अब वजह चाहे जो भी हो...लेकिन ये तो साफ है कि महंगाई ने जनता की मुसीबत को बढ़ा दिया है... और इसमें कोई दोराय नहीं कि अगर जनता की मुसीबत बढ़ी तो सरकार की मुश्किलें भी बढ़ सकती हैं।
 पिछले पांच महीनों में महंगाई दर अपने उच्चतर स्तर पर पहुंच गई है... और आने वाले दिनों में ये महंगाई आपको और ज्यादा परेशान करने वाली है...जी हां खान-पान और रसोई के अलावा भी आपको महंगाई के दर्द से दो-चार होना पड़ेगा। इतना ही नहीं कई जीचों पर सरकार सब्सिडी हटाने पर भी कर रही है विचार...जिससे महंगाई की मार दोगुनी रफ्तार के साथ करेगी.. आपकी जेबों पर प्रहार... तो आप भी हो जाइए तैयार... महंगाई पर जल्द मचने वाला है हाहाकार।
प्याज पर जब-जब महंगाई बढ़ी है..तब-तब हाहाकार मचा है..और सरकार की फजीहत हुई है... इस स्थिति से निपटने के लिए केन्द्र सरकार ने प्याज का Maximum export price यानी MEP निर्धारित किया है..ताकि देश में प्याज की कमीं न हो...लेकिन सरकार का ये कदम कितना कारगर साबित होगा...फिलहाल कहना मुश्किल है। काबिल-ए-गौर है कि अगर पैट्रोल-डीज़ल के दाम बढ़े तो रेल और बस के किराए में भी बढ़ोतरी हो जाएगी... ऐसे में जब सबकुछ महंगा होगा...तो देश में अच्छे दिनों का सपना देखना कितना सही है।
और बढ़ सकती है महंगाई
पैट्रोल-डीजल होंगे महंगे !
प्याज के बढ सकते हैं दाम
रेल के किराए में बढ़ोतरी तय
फल-सब्जी अनाज और दालें....महंगाई का सबसे ज्यादा असर आम आदमी की रसोई पर पड़ा है... महंगाई ने लोगों का स्वाद बिगाड़ दिया है...ऐसे में प्याज के दामों में भारी बढ़ोतरी की अनुमान लगाया जा रहा है...यानी एक बार फिर ये प्याज आम आदमी के आंसू निकालने वाला है... जब-जब प्याज पर महंगाई की मार पड़ी है.. तब-तब इसकी कीमतों ने आसमान छुआ है। और एक बार फिर यही प्याज आम आदमी की पहुंच से दूर होने वाली है। जी हां देश की सबसे बड़ी प्याज मंडी नासिक में..मजदूरों की हड़ताल को लेकर...प्याज की खरीद-फरोख्त रुक गई है... आपको बता दें कि इस प्याज मंडी से देश के बड़े हिस्से में प्याज की सप्लाई होती है...लेकिन हड़ताल ने इस सप्लाई को पूरी तरह ठप्प कर दिया है...जिससे आने वाले दिनों में प्याज की किल्लत होगी..और इसके दाम और भी बढ़ सकते हैं।
इतना ही नही संकेत ये भी मिल रहे हैं कि रेल बजट में इस बार 10 फीसदी तक की बढ़ोत्तरी की जा सकती है। रेल मंत्री सदानंद गौड़ा का कहना है कि रेलवे की मौजूदा हालत के मुताबिक किराए में बढ़ोत्तरी समय की मांग है। गौरतलब कि नई सरकार बहुत जल्द बजट पेश करने वाली है..ऐसे में कभी भी रेलवे के किराए में बढ़ोतरी हो सकती है। लिहाजा यहां भी जनता को महंगाई की एक और मार झेलने के लिए..तैयार रहना होगा। आपको बता दें कि पिछले बजट में भी तत्कालीन सरकार ने ईंधन में महंगाई और रेलवे के घाटे का रोना-रोकर... किराए में बढ़ोतरी की थी... ऐसे में अगर मौजूदा सरकार दोबारा दाम बढ़ाती है..तो रेलवे से सस्ते सफर की उम्मीद नहीं की जा सकती।
इसके अलावा आशंका ये भी है कि जल्द ही डीजल और पेट्रोल की कीमते भी बढ़ सकती हैं। जी हां इराक संकट के चलते अंतरराष्‍ट्रीय बाजार में कच्‍चे तेल की कीमत 106 से 113 डॉलर प्रति बैरल हो गई है। इराक के बुरे हालात के चलते अगर आपूर्ति प्रभावित हुई तो यहां पेट्रोल-डीजल सामान्‍य से ज्‍यादा महंगा हो सकता है। बहुत मुमकिन है कि डीज़ल-पैट्रोल के महंगा होने से...ना सिर्फ मिडिल और हाई क्लास पर इसका असर पड़ेगा। बल्कि पब्लिक ट्रांसप्रोट में सफर करने वाला गरीब तबका भी इससे बुरी तरफ प्रभावित होगा। जाहिर है कि अगर पेट्रोल-डीजल महंगे हुए तो बसों, ट्रकों और टैक्सियों के किराए में भी बढ़ोतरी होगी...साथ ही जनता पर महंगाई की चौतरफा मार भी पड़ेगी।
मोदी पहले ही ये कह चुके हैं कि देश को कुछ कड़े फैसलों के लिए तैयार रहना होगा, लेकिन रेल किराया बढ़ाने और सब्सिडी खत्म करने जैसे फैसले लिए गए तो महंगाई और बढ़ जाएगी। ऐसे में मोदी का अर्थशास्त्र जनता के कितना समझ आएगा फिलहाल कहना मुश्किल है। 
महंगाई एक ऐसा मुद्दा है..जिससे देश के हर खास-ओ-आम पर असर पड़ेगा..फिर चाहे वो गरीब हो या अमीर.. लिहाजा सरकार को इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।

विजय कुमार राय

आज सौ साल बाद....

विनाश के सौ साल बाद
जिंदा हुईं तबाही की तस्वीरें

कहीं गोलियों की बौछार थी
कहीं सैनिकों की दहाड़ थी

कहीं दर्द बेहिसाब था
कहीं आंसुओं का सैलाब था

कहीं शहीदों की लाशें थीं
कहीं बिलखती विधवाएं थीं

कहीं जख्म बने नासूर थे
कहीं अनाथ होते मासूम थे

कहीं बारूद का बवंडर था
कहीं खौफ का मंजर था

आज सौ साल बाद....

कहीं युद्ध की कड़वी यादें हैं
कहीं मौतों के आंकड़े हैं

कहीं नुकसान की कहानी है
कहीं बोझिल आंखों में पानी है



कहीं शहादत पर फख्र है
कहीं इतिहास पर अफसोस है।

 प्रथम विश्व युद्ध को.. एक सदी पूरी हो चुकी है..इसकी शुरूआत 28 जून 1914 को यूरोप से हुई थी.... लेकिन विनाश के इस विश्वयुद्ध के ज़ख्म अभी तक जिंदा हैं... ये युद्ध किसी को हार तो किसी को जीत देकर गया...और साथ ही लाखों लोगों की यादें.. शहीदों की चिताएं... विकलांग, घायल, अनाथ बच्चे और बिलखती विधवाएं भी छोड़ गया। 1914 से लेकर 1918 तक.. चार साल तक चले इस युद्ध ने.. तबाही की ऐसी तस्वीर पेश की... जिसके आंकड़े देख कर किसी का भी दिल दहल उठे। इस युद्ध में इंसान की जान की तो जैसे कोई कीमत ही नहीं थी.. बस कीमत थी तो झूठे वर्चस्व की.....मौत बांटती सियासत की...और घिनौनी नीतियों की। आंकड़ों पर नज़र डालें को पता लगता है कि पहला विश्वयुद्ध विनाश का एक ऐसा संग्राम था... जो पानी की तरह दौलत को पीता रहा...और इंसानी जिंदगियों को निगल कर अपनी प्यास बुझाता रहा।

प्रथम विश्वयुद्ध के आंकड़े -
प्रथम विश्वयुद्ध में पहली बार 70 से ज्यादा देशों ने हिस्सा लिया।
इसमें लैटिन अमेरिका और उत्तरी यूरोप के 20 देशों ने हिस्सा नहीं लिया।
इस युद्ध में 13 लाख तोप के गोले दागे गए।
सैनिकों और अपनों की सलामती जानने के लिए 1000 करोड़ पत्र भेजे गए।
एक करोड़ लोगों के आशियाने उजाड़ दिए गए और वो शरणार्थी बन गए।
60 लाख सैनिक इस युद्ध में बंदी बनाए गए।

तबाही और विनाश के इस महायुद्ध में 10.75 लाख करोड़ रुपये का आर्थिक नुकसान हुआ...ये हिसाब सिर्फ आस्ट्रिया-हंगरी, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली, रूस और अमेरिका का है। सैनिकों की मौतों को लेकर भी ये महायुद्ध... बेहद विनाशकारी रहा। इस युद्ध में दुनिया भर से 7 करोड़ सैनिकों ने हिस्सा लिया।  और लगभग एक करोड़ सैनिकों की मौत हुईइस महायुद्ध में फ्रांस के 80 लाख सैनिकों ने हिस्सा लिया..जिनमें 14 लाख की मौत हो गई.. जबकि 42 लाख जवान घायल हो गए। जर्मनी में 1 करोड़ 30 लाख सैनिक युद्ध के मैदान में उतरे जिनमें 18 लाख की मौत हो गई...वहीं 42 लाख ज़ख्मी हो गए। ऑस्ट्रिया और हंगरी से 90 लाख सैनिकों ने युद्ध में हिस्सा लिया लेकिन 14 साल की मौत हो गई और 36 लाख घायल हो गए। ब्रिटेन और भारत ने भी 90 लाख सैनिकों को लड़ाई में शामिल किया...पर 9 लाख की मौत हुई और 20 लाख बुरी तरह ज़ख्मी हो गए। पहले विश्वयुद्ध में सबसे ज्यादा सेना रूस की तरफ से शामिल हुई... रूस के 1 करोड़ 80 लाख सैनिकों में से 18 लाख की मौत हो गई...वहीं घायलों की संख्या 50 लाख तक पहुंच गई। इटली से 60 लाख सैनिक युद्ध में उतरे...लेकिन 6 लाख को मौत नसीब हुई...जबकि 10 लाख घायल हो गए। और आखिरकार बात करें अमेरिका की...तो 40 लाख जवानों में से अमेरिका ने अपने आठ लाख जवानों को खो दिया..और 14 लाख घायल हो गए।

कहां कितनी मौतें
देश               कुल सैनिक        मौतें            घायल
फ्रांस              80 लाख           14 लाख        42 लाख 
जर्मनी            1.30 करोड़          18 लाख        42 लाख
ऑस्ट्रिया-हंगरी      90 लाख            14 लाख        36 लाख
ब्रिटेन -भारत       90 लाख            9 लाख         20 लाख
रूस               1.80 करोड़         18 लाख         50 लाख
इटली             60 लाख            6 लाख          10 लाख
अमेरिका           40 लाख            8 लाख         15 लाख

कुल मिला कर ये युद्ध 1 करोड़ जवानों की जान लील गया... जबकि 2 करोड से ज्यादा जवान घायल हुए। इस युद्ध में 30 लाख महिलाओं की मांग उजड़ी...तो 60 लाख बच्चे अनाथ हो गए। ये आंकड़े..100 साल पुरानी विनाश की उस कहानी को बयां करने के लिए काफी है...जिसे पहले विश्वयुद्ध का नाम दिया गया।

22 अगस्त 1914
विश्वयुद्ध का सबसे मनहूस दिन
यूं तो प्रथम विश्वयुद्ध चार साल तक चला...इन चार सालों में हर रोज़ हजारों लोग मौत का निवाला बने... लेकिन 22 अगस्त 1914 ...इस विश्वयुद्ध का सबसे काला दिन रहा... इस दिन सबसे ज्यादा विनाश हुआ... सबसे ज्यादा लोगों की जानें गईं... जी हां इस एक दिन में फ्रांस के 27 हजार सैनिकों की मौत हुई। विश्व युद्ध के दौरान कभी इतनी भारी संख्या में लोगों की मौत नहीं हुई।


विनाश का विश्वयुद्ध
किसने किया आगाज़ ?
भले ही पहले विश्व युद्ध को 100 साल पूरे हो चुके हैं.... लेकिन बुनियादी सवाल अभी भी उलझा हुआ है...और वो ये है कि आखिर प्रथम विश्व युद्ध किसने शुरू किया....दरअसल युद्ध खत्म होने के बाद 1919 में वरसाई की संधि में जर्मनी को युद्ध का असली जिम्मेदार ठहराया गया और इसके लिए बर्लिन पर बंदिशें लगाई गईं...लेकिन 1920 से ही माना जाने लगा कि इस युद्ध के लिए या तो सभी जिम्मेदार थे, या फिर कोई नहीं...क्योंकि जर्मनी के अलावा भी... 70 से ज्यादा देशों ने इस महायुद्ध में हिस्सा लिया। 
इतिहासकारों का मानना है कि जर्मनी के साथ-साथ ऑस्ट्रिया-हंगरी, रूस, सर्बिया, फ्रांस और ब्रिटेन भी इस युद्द के लिए काफी हद तक जिम्मेदार हैं। 2012 में आई एक किताब ने इस मुद्दे को फिर सुलगा दिया...कि पहले विश्व युद्ध में जर्मनी का कितना हाथ है.... ऑस्ट्रिलेयाई इतिहासकार क्रिस्टोफर क्लार्क की किताब द स्लीपवॉकर्स में दावा किया गया है कि जून 1914 में ऑस्ट्रियाई-हंगेरियाई राजकुमार की सारायेवो में हत्या किया जाना ही युद्ध की शुरुआत की इकलौती वजह नहीं थी... उनका कहना है कि ये बाल्कन युद्ध का नतीजा था, जो 1912 और 1913 में हुआ था... हालांकि उस युद्ध में ऑस्ट्रिया-हंगरी ने हिस्सा नहीं लिया था...
महायुद्ध में बिगड़े रिश्ते
आपसी संबंधों में पड़ी दरार
कहीं दोस्ती पर मर-मिटे लोग
कहीं दुश्मनी बनी मिसाल


1914 से 1918 के बीच यूरोप में हुआ प्रथम विश्व युद्ध... दो विरोधी सैन्य गठबंधनों के बीच लड़ा गया। एक तरफ अमेरिका, रूस और फ्रांस थे, तो दूसरी ओर जर्मनी, ऑस्ट्रिया, हंगरी और इटली थे। हालांकि, युद्ध के दौरान एक-एक कर ओटोमन एम्पायर से लेकर बुल्गारिया और जापान तक तमाम देश इसमें शामिल हो गए।

इतिहास के इस बड़े युद्ध में 6 करोड़ यूरोपियन समेत 7 करोड़ सैन्यकर्मियों ने हिस्सा लिया था। इस युद्ध में 90 लाख लोगों ने अपनी जान गंवाई... बताया जाता है कि 28 जून 1914 को ऑस्ट्रिया के सिंहासन के उत्तराधिकारी आर्कड्यूक फ्रांज फर्डिनेंड और उनकी पत्नी की हत्या इस युद्ध की वजह बनी। इसके ठीक एक महीने बाद ऑस्ट्रिया ने सर्बिया के खिलाफ युद्ध का ऐलान कर दिया। इस महायुद्ध में रूस, फ्रांस और ब्रिटेन ने सर्बिया की मदद की। वहीं, जर्मनी ने ऑस्ट्रिया का साथ दिया। इसके बाद अन्य देश एक-एक कर जापान... ब्रिटेन की तरफ से...या तुर्की व जर्मनी की तरफ इस युद्ध का हिस्सा बन गए। शुरुआत में जीत जर्मनी की हुई, लेकिन 1917 में ही जर्मनी ने ब्रिटेन के  व्यापारी जहाजों को डुबो दिया। इससे खफा अमेरिका ब्रिटेन की तरफ से युद्ध के मैदान में उतर गया।

हालांकि, बोल्शेविक क्रांति की वजह से रूस को युद्ध से अलग होना पड़ा, लेकिन अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस ने जर्मनी और उसे सहयोगी राष्ट्रों को हरा दिया। आखिरकार, कुछ संधियों के बाद युद्ध की समाप्ति की घोषणा की गई। लेकिन चार साल तक चले इस युद्ध में.. भारी संख्या में जान और माल का नुकसान हुआ।

प्रथम विश्व युद्ध में
भारत की भूमिका

प्रथम विश्व युद्ध के दौरान भारतीय सेना ने यूरोपीय, भूमध्यसागर के और मध्य पूर्व के युद्ध क्षेत्रों में अपने अनेक डिवीजनों और स्वतंत्र ब्रिगेडों का योगदान दिया था...उस वक्त भारतीय सेना को ब्रिटिश भारतीय सेना कहा जाता था। इस युद्ध में दस लाख भारतीय सैनिकों ने विदेशों में अपनी सेवाएं दीं...जिनमें से 62,000 सैनिक मारे गए और 67,000 घायल हो गए....युद्ध के दौरान कुल मिला कर 74,187 भारतीय सैनिकों की मौत हुई थी.

प्रथम विश्व युद्ध में भारतीय सेना ने जर्मनी पूर्वी अफ्रीका और पश्चिमी मोर्चे पर जर्मन साम्राज्य के खिलाफ युद्ध किया.
... इस युद्ध में खुदादाद खान विक्टोरिया क्रॉस से सम्मानित होने वाले पहले भारतीय बने....इस महायुद्द में जहां लाखों सैनिक विदेशों में लड़ाई लड़ रहे थे वहीं...देश की आंतरिक सुरक्षा और प्रशिक्षण कार्यों के लिए लाखों सैनिकों को भारत में ही रहना पड़ा था।
1919 में जब विश्व युद्ध खत्म हुआ तो भारतीय सेना अपने कुल 491,000 जवानों को ही वापिस बुला सकी...इनमें भी अनुभवी अधिकारियों की कमी थी, ज्यादातर अधिकारी युद्ध में मारे गए थे या बुरी तरह ज़ख्मी हो चुके थे। पहले विश्व युद्ध के खत्म होने के बावजूद भी भारतीय सेना के लिए संघर्ष  खत्म नहीं हुआ..1919 में भारतीय सेनाओं ने तीसरे अफगान युद्ध में हिस्सा लिया... इसके साथ ही 1920 से लेकर 1924 तक चले वजीरिस्तान अभियान में शामिल हुई... 1930 और 1931 के बीच अफरीदियों के खिलाफ भारतीय सैनिकों ने जंग छेड़ी तो 1933 में मोहमंदों के खिलाफ और फिर 1935 में दूसरे विश्व युद्ध से पहले एक बार फिर वजीरिस्तान में हुए युद्ध का हिस्सा बनी। प्रथम विश्व युद्ध के बाद भारतीय सैनिकों के शहीद होने का ऐसा दौर छिड़ा...कि वो दूसरे विश्व युद्ध के खत्मे के बाद जाकर थमा। पहले विश्व युद्ध में भारत ने जहां बड़े-बड़े सूरमाओं को खोया..वहीं हथियारों और गोला बारूद में भारी आर्थिक नुकसान भी झेलना पड़ा।
अपने घर-परिवार को छोड़ कर...जिन सैनिकों ने इस विश्व युद्ध में हंसते-हंसते मौत को गले लगा लिया... उनकी याद में 1931 में दिल्ली में इंडिया गेट का निर्माण किया गया। इंडिया गेट देश की धरोहर होने के साथ-साथ प्रथम विश्व युद्ध में मारे गए भारतीय सैनिकों के प्रति श्रद्धांजलि का प्रतीक भी है। 

विजय कुमार राय 
  

Tuesday, 10 June 2014

अच्छे दिन... बिजली बिन, ऐसा हा मोदी सरकार

दिल्ली शहर में भीषण गर्मी और बिजली की लंबी कटौती के बीच केंद्रीय बिजली मंत्री पीयूष गोयल ने बिजली संकट पर चर्चा के लिए आज दिल्ली के उपराज्यपाल नजीब जंग और अन्य शीर्ष अधिकारियों के साथ एक आपात बैठक की। बिजली मंत्रालय में जंग के साथ बैठक से पहले गोयल ने संवाददाताओं को बताया, हम पिछली सरकार की निष्क्रियता के वजह से परेशानी उठा रहे हैं। 


उन्होंने मौजूदा संकट 10 दिन में हल करने का दावा किया। साथ ही उन्होंने कहा, अधिकारियों को जरूरी कदम उठाने के निर्देश दे दिए गए हैं। प्रतिदिन पॉवर बुलेटिन जारी किया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि पिछले सालों में ऊर्जा से जुड़ी हर तरह की व्यवस्था बेहद खराब रही। उन्होंने बताया कि पिछले 12 साल से बिजली को लेकर कोई फैसले नहीं लिए गए, और क्षेत्र में निवेश नहीं होने से भी बिजली समस्या बढ़ी। अब बिजली उत्पादन बढ़ाया जाएगा, जिसके लिए बवाना प्‍लांट को गैस दी जाएगी, जो मंगलवार रात तक मिल जाएगी। उन्होंने बताया कि एनटीपीसी भी दिल्ली को अतिरिक्त बिजली देने के लिए तैयार है, और दिल्‍ली को 400 मेगावाट अतिरिक्‍त बिजली उपलब्ध कराई जाएगी। दिल्ली में बिजली की किल्लत से उबरने के लिए सरकार डाभोल (महाराष्ट्र) बिजली घर से रोजाना 9 लाख घनमीटर गैस राजधानी को देगी।

कल दिल्ली का तापमान 45.5 डिग्री सेल्सियस रहा, जो कि सामान्य से छह अंक उपर था। पिछले दस साल में शहर में जून का यह सबसे अधिक तापमान है। बिजली कटौती के कारण विभिन्न राजनैतिक दलों ने विरोध प्रदर्शन किए।

आप के 20 से ज्यादा विधायकों ने केंद्रीय मंत्री हर्ष वर्धन के पूर्वी दिल्ली स्थित आवास के बाहर विरोध प्रदर्शन किया और शहर में बिजली आपूर्ति सुधार के लिए केंद्र सरकार की ओर से तत्काल कदम उठाए जाने की मांग की।

कल कांग्रेस के विधायकों और नेताओं ने राष्ट्रीय राजधानी में बिजली और पानी की आपूर्ति में तत्काल सुधार की मांग करते हुए दिल्ली के प्रमुख सचिव एस के श्रीवास्तव को डेढ़ घंटे के लिए उनके कमरे में बंद कर दिया था। बिजली की मौजूदा समस्या को नियंत्रित करने के लिए उपराज्यपाल ने रविवार को कुछ निर्देश जारी किए थे, जिनमें रात दस बजे के बाद मॉल की बिजली आपूर्ति रोकना शामिल था।

जंग ने ये आदेश भी दिए थे कि ज्यादा बिजली की खपत करने वाली सड़कों पर काफी उंचे खंभों पर लगे हैलोजन लैंपों को रात में अधिकतम बिजली उपभोग के समय बंद कर दिया जाना चाहिए ताकि बिजली बचाई जा सके। दिल्ली सचिवालय और अन्य सरकारी कार्यालयों समेत सरकारी प्रतिष्ठानों, विश्वविद्यालयों और कॉलेजों को सलाह दी गई है कि वे दिन में अधिकतम बिजली उपभोग के समय यानी दोपहर साढ़े तीन से साढ़े चार बजे के बीच वातानुकूलन को बंद कर दें।

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मोदी का हिन्दी प्रेम

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हिंदी की पहचान भारतीयों की वजह से ही हो सकती है और ऐसे में देश के प्रधानमंत्री का हिंदी में बात करने का फैसला भले ही दुभाषिए की मौजूदगी को आवश्यक बना देता हो लेकिन भारत की अलग पहचान को भी कायम रखता है। इससे राष्ट्रवाद की भावना और गहरी हो जाती है। मोदी का ये फैसला भी राष्ट्रवाद से जुड़ा नज़र आता है। मोदी की ट्रेनिंग आरएसएस में हुई है। आरएसएस की प्रार्थना है। नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे, इनके लिए मातृभूमि पूजनीय होती है, राष्ट्रवाद सबसे ऊपर होता है। 

मोदी के इस फैसले ने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की याद दिला दी है। वाजपेयी ने युनाइटेड नेशंस की बैठक में हिंदी में भाषण देकर इतिहास बना दिया था। अटल बिहारी वाजपेयी भारत के ऐसे एकमात्र नेता हैं जिन्होंने संयुक्त राष्ट्र संघ में जब कभी भी अपना भाषण दिया तो हमेशा हिंदी का ही प्रयोग किया। अपने एक इस फैसले से मोदी ने ना सिर्फ अटल की याद दिला दी है बल्कि खुद को भारत का पुतिन भी साबित कर दिया है...। 

मोदी भी एक राष्ट्रवादी नेता की तरह भारत को एक महान राष्ट्र बनाना चाहते हैं, इसके लिए चाहे आलोचना ही क्यों ना झेलनी पड़े। शायद इसीलिए राजनैतिक विश्लेषक मोदी को भारत का पुतिन कहते हैं। पुतिन की छवि एक कट्टर राष्ट्रवादी छवि वाले नेता की है। पुतिन ने हमेशा राष्ट्रवाद को सबसे ऊपर रखा है। पुतिन ने 2013 में रूसी संसद को संबोधित करते हुए कहा था। 

रूस में रूसी रहते हैं, कोई भी अल्पसंख्यक समुदाय चाहे वो कहीं का भी हो, अगर उन्हें रूस में रहना है, काम करना है, अपना पेट भरना है तो उसे रूसी भाषा बोलनी होगी एवं रूस के कानूनों का पूरी तरह पालन करना होगा। अगर उन्हें शरिया कानून चाहिए तो मेरी उन्हें सलाह है की वो किसी ऐसे देश में चले जाएँ जहाँ उनके इस कानून को मान्यता मिली हो 

राष्ट्र के नाम पर कुछ ऐसी ही दृढ़ता भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी में भी दिखाई देती है, जहां देश में कोई अल्पसंख्यक या बहुसंख्यक नहीं है। जहां देश एक है तो कानून भी एक, जहां देश की राष्ट्रभाषा सर्वोपरि है, जहां राष्ट्रवाद ही धर्म है, पुतिन के लिए राष्ट्रवाद सबसे बड़ा धर्म है। दरअसल हिंदी में बोलना महज भाषाई ज्ञान की चर्चा परिचर्चा नहीं है। राष्ट्रभाषा होने की वजह से हिंदी भारत की पहचान है और ये पहचान महज इसीलिए धूमिल हो जाती है क्योंकि ये मल्टीनेशनल कंपनियों की भाषा नहीं है। 
यदि मोदी का बात करें तो  देश का वह दूसरें प्रधानमंत्री है जो हिन्दी को प्राथमिकता दे रहें उससे पहले कोई नेता था तो वह थे भारत के और देश के बीच एक नया समझौता कराने का अधिकार सिर्फ अटल बिारी वाजपेयाी जी को जाता है। यदि हम मोदी की बात करें को वह भी अटल जी के कदमों पर चल पड़े है, देखना यह होगा की कितना कारगर होगा मोदी का हिन्दी प्रेम


इस बात को ज्‍यादा दिन नहीं बीते हैं जब रशियन संसद ड्युमा में दिए पुतिन के भाषण ने खलबली मचाई थी। अब एक बार फिर वही चर्चा नरेंद्र मोदी के हिंदी में बातचीत के फैसले के बाद हो रही है। नरेंद्र मोदी इसी साल सितंबर में अमेरिका की यात्रा पर होंगे जहां वो युनाइटेड नेशंस की बैठक में हिस्सा लेंगे। मोदी ने तय किया है कि इस दौरान वो बाकी नेताओं से हिंदी में ही बात करेंगे। मोदी का ये हिंदी प्रेम ना सिर्फ उनके राष्ट्रवादी छवि को और पुख्ता करता है बल्कि इस बात को भी बल देता है कि वो भारतीय पुतिन हैं। 


गुलाम नबी आजाद का अनुभव

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद के संसदीय अनुभवों को देखते हुए कांग्रेस पार्टी की ओर से उन्हें राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष बनाया गया है। गुलाम नबी आजाद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के एक तेज-तर्रार नेता हैं। वह एक कुशल राजनेता हैं। कांग्रेस को उनके अनुभवों से लाभ मिलेगा।
गुलाम नबी आजाद का जन्म 7 मार्च, 1949 को जम्मू-कश्मीर के डोडा जिले में हुआ था। इनके पिता का नाम रहमतुल्लाह था। गुलाब नबी आजाद ने जम्मू-कश्मीर विश्वविद्यालय से प्राणि विज्ञान में स्नातकोत्तर की पढाई संपन्न की। गुलाम नबी आजाद ने वर्ष 1980 में कश्मीर की एक लोकप्रिय और प्रतिष्ठित गायिका शमीन देव आजाद के साथ विवाह संपन्न किया। इनके परिवार में पत्नी और दो बच्चे हैं। वर्ष 1973 में कांग्रेस के सदस्य के तौर गुलाम नबी आजाद ने सक्रिय राजनीति में कदम रखा। वर्ष 1973-1975 के बीच वह ब्लेस्सा  कांग्रेस समिति के ब्लॉक सचिव रहे।
 यहीं से उनके राजनैतिक जीवन को सही दिशा मिलनी प्रारंभ हो गई। वर्ष 1975 में गुलाम नबी आजाद जम्मू-कश्मीर युवा कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष और फिर 1977 में डोडा जिले के कांग्रेस अध्यक्ष बने। इसके बाद जल्द ही वह अखिल भारतीय युवा कांग्रेस के महासचिव बनाए गए। वर्ष 1982 में गुलाम नबी आजाद ने पहले केन्द्रीय उपमंत्री के तौर पर कानून, न्याय और कंपनी मामलों का मंत्रालय संभाला फिर कुछ ही समय बाद राज्य मंत्री बने। वर्ष 1985 में गुलाम नबी आजाद वशिम निर्वाचन क्षेत्र से दोबारा लोकसभा चुनाव जीतने के बाद गृह राज्य मंत्री बनाए गए। लेकिन उन्हें जल्द ही खाद्य और नागरिक आपूर्ति मंत्रालय सौंप दिया गया। इन सब के अलावा वर्ष 1978 से 1981 तक गुलाम नबी आजाद अखिल भारतीय मुस्लिम युवा कांग्रेस के भी अध्यक्ष रहे। 1986 में कांग्रेस कार्य समिति के भी सदस्य बनाए गए। इसके बाद वर्ष 1987 में वह अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के महासचिव बने। गुलाम नबी आजाद नौ बार इस पद पर काबिज रहे। वर्ष 1990 में राज्यसभा में चयनित होने के बाद वह पी.वी. नरसिंह राव सरकार में संसदीय मामलों के केन्द्रीय मंत्री और बाद में पर्यटन और नागरिक उड्डयन मंत्री बनाए गए। गुलाम नबी आजाद के जम्मू-कश्मीर प्रदेश कांग्रेस समिति के अध्यक्ष पद पर रहते हुए कांग्रेस को विधानसभा चुनावों में 21 सीटों पर जीत हासिल हुई जिसके बाद वह प्रदेश की दूसरी सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बनकर उभरी। मनमोहन सरकार में गुलाम नबी आजाद संसदीय मामलों के मंत्री रहे, लेकिन 2007 में जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री पद के कारण उन्होंने इस पद से इस्तीफा दे दिया। प्रधानमंत्री डाॅ. मनमोहन सिंह के दूसरे कार्यकाल में उन्हें स्वास्थ्य मंत्री का पद प्रदान किया गया था। स्वास्थ्य मंत्री बनने के बाद जनसंख्या नियंत्रण करने के लिए उन्होंने कई प्रकार के सुझाव दिए। जैसे लड़कियों का विवाह अगर 25-30 वर्ष के बीच किया जाए तो इससे जनसंख्या वृद्धि को रोका जा सकता है आदि बहुत प्रशंसनीय रहे।
उल्लेखनीय है कि इसके साथ ही यूपीए-2 में एक अन्य मंत्री रहे आनंद शर्मा को पार्टी ने उपनेता बनाया है। कांग्रेस के पास राज्य सभा (उच्च सदन) में विपक्ष के नेता का दावा करने के लिए अपेक्षित संख्या बल है। उच्च सदन में 245 सदस्य हैं और कांग्रेस की सदस्य संख्या 67 है। इस प्रकार सदन की कुल संख्या का 10 फीसदी अपेक्षित आंकड़ा कांग्रेस के पास है जो विपक्ष का नेता पद पाने के लिए जरूरी है। लोकसभा में कांग्रेस ने मल्लिकार्जुन खड़गे को पार्टी का नेता बनाया है। पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह को निचले सदन में कांग्रेस का उपनेता बनाया गया है। कांग्रेस की ओर से लोकसभा के लिए चीफ व्हिप और व्हिप के पदों का ऐलान कर दिया है। ज्योतिरादित्य सिंधिया को लोकसभा में कांग्रेस का चीफ व्हिप बनाया गया है। हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपिन्दर सिंह हुड्डा के सांसद बेटे दीपेंदर सिंह हुड्डा और केरल से सांसद केसी वेणुगोपाल को व्हिप नियुक्त किया गया है।

Friday, 6 June 2014

नई लोकसभा, नए रिकॉर्ड

 16वीं लोकसभा की तस्वीर...नई लोकसभा में कैसे हैं आपको 543 सांसद... किसमें क्या कुछ खास..और किसकी छवि पर लगे हैं कितने दाग
देश की नई लोकसभा तैयार हो गई है... 543 सांसद जनता पर अपना जलवा दिखाकर...ससंद तक पहुंचने में कामयाब रहे...ये सभी सांसद अपनी-अपनी खूबियों और खामियों के साथ लोकसभा तक पहुंच गए। हर बार की तरह इस बार भी लोकसभा में कई पुराने रिकॉर्ड टूटे..और कई नए रिकॉर्ड बने...अगर बात की जाए दागियों की...तो इस बार संसद में हर तीसरा चेहरा..दागदार छवि वाला होगा। जी हां आप भी देखिए...आपकी सरकार में कितने दागी।


तो देखा आपने कितने दागी... परचम लहराने में कामयाब रहे..खैर बढ़ते हैं आगे और बात करते हैं करोड़पति सांसदों की... शायद आप ये जानकर हैरान रह जाएंगे कि नई लोकसभा के सभी सांसदों के पास... कुल 6,500 करोड़ रुपये की संपत्ति है...जो पिछली बार के मुकाबले काफी ज्यादा है। अगर यकीन नहीं होता
इस बार की लोकसभ में बीजेपी ने कई रिकॉर्ड अपने नाम किए...नई लोकसभा में सबसे ज्यादा सांसद बीजेपी के हैं...इसके अलावा सबसे ज्यादा दागी, सबसे अमीर और सबसे गरीब सांसद का रिकॉर्ड भी बीजेपी के ही नाम रहा...चलिए आपको दिखाते हैं सबसे उम्रदराज़...और रिटायर्ड सेना प्रमुख को जीत दिलाकर... कैसे बीजेपी ने कुछ और नए रिकॉर्ड अपने नाम किए।
जी हां संसद में महिलाओं की 11 फीसदी भागीदारी और 70 पर्सेंट एजूकेटेड सांसदों के साथ...नई लोकसभा में और भी कई रिकॉर्ड कायम हुए... फिलहाल यहां लेंगे एक छोटा सा ब्रेक.. ब्रेक के बाद जल्द हाजिर होंगे...और आपको दिखाएंगे... कैसे बना लोकसभा में सबसे कम मुस्लिम सांसदों का नया रिकॉर्ड.
16वीं लोकसभा की... उन सांसदों की जो इस बार लोकसभा तक पहुंचने में कामयाब रहे... मोदी लहर में देश का राजनीतिक नक्शा सा बदला कि उत्तर प्रदेश समेत 27 राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों में से... एक भी मुस्लिम उम्मीदवार लोकसभा नहीं पहुंच सका...जी हां आजादी के बाद ये पहला आम चुनाव है, जब लोकसभा में सबसे ज्यादा 80 सांसद भेजने वाले उत्तर प्रदेश से एक भी मुस्लिम संसद नही पहुंचा... जबकि इस राज्य की कुल आबादी में मुस्लिम समुदाय का हिस्सा 18 फीसदी है।
नई सरकार ने संसद में तो कई रिकॉर्ड दर्ज कर लिए... उम्मीद करते हैं कि जनता की कसौटी पर भी नई सरकार खरी उतरने में कामयाब रहे...

16वीं लोकसभा के सांसद
34 फीसदी सांसद दागी
186 सांसदों पर क्रिमिनल केस
हर तीसरे MP की दागदार छवि
चुनाव से पहले भले ही क्रिमिनल बैकग्राउंड के लोगों को संसद से दूर रखने की बात जोर-शोर से उठी थी, लेकिन इसका कोई असर देखने को नहीं मिला। नई लोकसभा में हर तीसरा सांसद आपराधिक मामलों में आरोपी होगा। जी हां चुनाव जीत कर आए 541 सांसदों में से 186 के खिलाफ कोई न कोई आपराधिक केस दर्ज है। आपको बता दें कि पिछली लोकसभा में ऐसे सांसदों की संख्या 158 थी। जबकि नई लोकसभा में आपराधिक पृष्ठभूमि वाले सांसदों की संख्या बढ़ गई है।


इस बात का खुलासा सांसदों ने जो शपथ पत्र भरे हैं.. उनके आधार पर हुआ है... नेशनल इलेक्शन वाच यानी एनईडब्ल्यू और एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफार्म्स यानी एडीआर ने 543 में 541 सदस्यों के शपथ पत्र के विश्लेषण के आधार पर कहा...कि 34 फीसदी चुने गए सांसदों ने अपने शपथ पत्र में खुलासा किया है कि उनके खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं...संसद में इन सांसदों की कुल संख्या 186 है। चौंकिए नहीं...ये हकीकत है कि नई लोकसभा में हर तीसरा नवनिर्वाचित सांसद आपराधिक पृष्ठभूमि वाला है।


2009 में 30 फीसदी लोकसभा सदस्यों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज थे... इस बार इनमें चार फीसदी की बढ़ोतरी हुई है...2014 के चुनाव में आपराधिक पृष्ठभूमि वाले एक प्रत्याशी के जीतने की संभावना 13 फीसदी रही, जबकि साफ छवि के प्रत्याशियों के जीतने की संभावना सिर्फ पांच फीसदी थी।
इस बार चुने गए क्रिमिनल बैकग्राउंड वाले 186 सांसदों में से 112 ने अपने खिलाफ हत्या, हत्या का प्रयास, सांप्रदायिक सौहार्द  बिगाड़ने, अपहरण, महिलाओं के खिलाफ अपराध जैसे गंभीर  मामले होने की घोषणा की है...चुनाव सुधार की दिशा में काम करने वाली संस्था एसोसिएशन ऑफ डेमॉक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) की रिपोर्ट के मुताबिक...सबसे ज्यादा दागी सांसद बीजेपी के हैं। बीजेपी के कुल 281 सदस्यों में से 98 ने अपने शपथ पत्र में आपराधिक मामले दर्ज होने की घोषणा की है...कांग्रेस के 44 में से 8, एआईएडीएमके के 37 में से 6, शिवसेना के 18 में से 15 और तृणमूल के 34 विजेताओं में से 7 ने आपराधिक मामले दर्ज होने का खुलासा किया है.... 



किस पार्टी से कितने दागी
पार्टी            कुल सांसद        दागी सांसद
बीजेपी            281                            98
कांग्रेस             44                             08
एआईएडीएमके       37                            06
शिवसेना            18                            15
तृणमूल कांग्रेस       34                           07

हैरत की बात तो ये है कि इस बार दागी नेताओं को लेकर सुप्रीम कोर्ट भी भूमिका काफी सख्त रही... इसके अलावा पार्टियां भी दागियों को चुनावी मैदान से दूर रखने के दावे कर रही थीं... लेकिन राजनीतिक दलों को इस बात का बखूबी एहसास था कि बिना दागियों के उनकी नैया भंवर से पार लगने वाली नहीं..यही वजह है कि चुनाव नज़दीक आते-आते पार्टियां अपने इरादों से पलटती दिखाई दीं..और सभी दलों से दागियों को खूब टिकट बांटे... नतीजा आप के सामने है... नई संसद में हर तीसरा चेहरा दागदार छवि वाला होगा।
नए सांसदों का रिपोर्ट-कार्ड
करोड़पतियों की बढ़ी संख्या
543 में से 442 करोड़पति
300 करोड़पति थे पिछली बार
लोकसभा में करोड़पति सांसदों की संख्या भी बढ़ी है। नई लोकसभा में कुल 442 करोड़पति हैं और इसमें भी भारतीय जनता पार्टी ने बाजी मार ली है... बीजेपी के 237 सदस्य करोड़पति हैं जबकि तेलुगु देशम पार्टी दूसरे नंबर पर है...कांग्रेस के 35 सदस्य करोड़पति हैं जबकि अन्नाद्रमुक के 29 और तृणमूल कांग्रेस के 21 सदस्य करोड़पति हैं. ये आंकड़े भी एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स ने जारी किए हैं।

किस पार्टी में कितने करोड़पति 
पार्टी                करोड़पति
बीजेपी                237
कांग्रेस                 35
अन्नाद्रमुक             29
तृणमूल कांग्रेस          21
GFX OUT
अमीर सांसदों में बीजेपी के 237 और कांग्रेस के 35 सांसद करोड़पति हैं. अमीर सांसदों में नंबर 1 पर जयदेव गल्ला हैं, जिनकी घोषित संपत्ति 683 करोड़ रुपये है। गल्ला आंध्र प्रदेश के गुंटूर से टीडीपी के एमपी हैं। दूसरे नंबर पर 528 करोड़ की दौलत के साथ के. विशेश्वर रेड्डी हैं। रेड्डी टीआरएस के सांसद हैं। तीसरा नंबर आंध्रप्रदेश के नारसापुरम से बीजेपी सांसद गंगे राजू का है। गंगे राजू की कुल संपत्ति 288 करोड़ रुपये हैं...यानी इस बार संसद में करोड़पति सांसदों की भी भारी भरकम संख्या देखने को मिल रही है। 
सबसे अमीर सांसद कौन 
जयदेव गल्ला
पार्टी - टीडीपी
गुंटूर से सांसद
कुल संपत्ति - 683 करोड़
-----------------
के. विशेश्वर रेड्डी
पार्टी - टीआरएस
चेवेला से सांसद
कुल संपत्ति - 528 करोड़
---------------
गंगे राजू
पार्टी - बीजेपी
नरसापुरम से सांसद
कुल संपत्ति - 288 करोड़

नई लोकसभा के सभी सांसदों के पास कुल 6,500 करोड़ रुपये की संपत्ति है... करोड़पति सांसदों को लेकर तो बीजेपी अव्वल नबंर पर है ही.. गरीब सांसदों के मामले में भी बीजेपी ही सबसे ऊपर है। इस बार लोकसभा में आए सबसे गरीब सांसदों में सीकर से बीजेपी के लिए चुने गए सुमेधानंद सरस्वती हैं.. इनके पास महज़ 34,311 रुपये की संपत्ति है..इसके अलावा बीजेपी के ही अल्वर से चुने गए... महंत चंद नाथ योगी भी सबसे गरीब सांसदों में से एक हैं... योगी के पास कुल 1,99 लाख रुपये की संपत्ति है
सबसे गरीब सांसद कौन
सुमेधानंद सरस्वती
पार्टी - बीजेपी
सीकर से सांसद
कुल संपत्ति - 34,311 रुपये
-----------------
महंत चंद नाथ योगी
पार्टी - बीजेपी
अलवर से सांसद
कुल संपत्ति - 1.99 लाख रुपये

भले ही राजनीति में दौलतमंदों का सिक्का चलता हो..लेकिन आज भी ऐसे नेता हैं..जो महज़ कुछ हजार रुपये की संपत्ति के मालिक हैं...बावजूद इसके उन्होंने चुनाव में शानदार जीत हासिल की..और एक मिसाल बन कर लोकसभा पहुंचे। 

16वीं लोकसभा के माननीय
महिलाओं की बढ़ी भागीदारी
11 फीसदी महिला सांसद
उम्रदराजों ने भी मारी बाजी
16वीं लोकसभा के लिए चुने गए सांसदों की प्रोफाइल पर अगर गौर किया जाए..तो एक और दिलचस्प बात सामने आती है.. वो ये है कि इस बार की लोकसभा...अब तक की सबसे उम्रदराज़ लोकसभा होगी...इस बार चुने गए कुल सांसदों में... 47 फीसदी सांसद 55 साल से ज्यादा उम्र के हैं। जबकि पिछली लोकसभा में इस उम्र के सांसदों की संख्या कुल 43 फीसदी ही थी...इस बार लोकसभा में कुल 13 फीसदी यानी 71 सांसद ही 40 साल से कम उम्र के है... वहीं 24 से 40 साल के बीच के 13 फीसदी सांसद चुने गए हैं... इसके अलावा 71 साल से 100 साल के आयुवर्ग वाले 7 फीसदी सांसद लोकसभा तक पहुंचे...इनमें सबसे उम्रदराज बीजेपी के लालकृष्ण आडवाणी हैं..89 साल के आडवाणी गांधीनगर सीट से सांसद चुने गए हैं।
कौन कितना उम्रदराज़
आयुवर्ग            सांसदों की संख्या
55-70 साल            47 फीसदी
24-40 साल            13 फीसदी
71-100 साल           07 फीसदी
चौंकाने वाली बात तो ये है कि...चुनाव से पहले सभी पार्टियों ने यूथ फेक्टर पर जम कर फोकस किया था.. और युवाओं को बढ़-चढ़कर मौका दिया... इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि इस बार..देश की सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरी बीजेपी में चुनाव से ठीक पहले बुजुर्ग नेताओं ने खूब बगावत की..और पार्टी ने भी इनकी तरफ कोई ध्यान नहीं दिया। इस बार की लोकसभा में...पहली बार संसद में कोई पूर्व सेना प्रमुख जीत कर पहुंचे हैं.. जी हां बिना किसी राजनैतिक बैकग्राउंड के... पहली ही बार में इतनी शानदार जीत हासिल करने वाले जनरल वी.के.सिंह इतिहास रचने में कामयाब हुए।
16वीं लोकसभा के ब्लूप्रिंट पर अगर नज़र डाली जाए...तो पता लगता है कि राजनीति और सामाजिक सेवा में पूरी तरह एक्टिव कुल 24 फीसदी नेता ही संसद तक पहुंचे...जबकि 20 फीसदी बिजनेस मैन्स ने बाजी मारी...कृषि जगत से जुड़े 27 फीसदी लोग संसद पहुंचे... इसके अलावा 7 फीसदी वकील...4 फीसदी शिक्षक....3 फीसदी कलाकार...4 फीसदी डॉक्टर...1 फीसदी पत्रकार..और 2 फीसदी सिविल,पुलिस और सेना से रिटायर्ड लोग संसद तक पहुंचने में कामयाब रहे। इन सबके अलावा अन्य क्षेत्रों से 6 फीसदी नेता संसद तक पहुंचे। 

किस प्रोफेशन से कितने सांसद
राजनीति/ सामाजिक सेवा        24 फीसदी
बिजनेस                      20 फीसदी
कृषि                         27 फीसदी
वकील                        07 फीसदी
शिक्षक                       04 फीसदी
कलाकार                      03 फीसदी
डॉक्टर                       04 फीसदी
पत्रकार                       01 फीसदी
सिविल/ पुलिस/ सेना             02 फीसदी
अन्य                         06 फीसदी
इस बार की नई लोकसभा ने कई रिकॉर्ड बनाए... जिनमें एक ये भी है कि इस बार संसद में महिलाओं की भागीदारी 11 फीसदी हो गई हैइस बार लोकसभा में पुरुष महिला अनुपात... 89:11 है। यानी हर 100 में से 89 पुरुष सांसद हैं तो 11 महिला सांसद हैं।


इस बार लोकसभा पहुंचे सांसदों की शैक्षणिक पृष्ठभूमि पर गौर किया जाए तो 70 फीसदी ग्रेजुएट या उससे ज्यादा बढ़े-लिखे नेताओं ने सरकार बनाने में भागीदागी निभाई... इस बार संसद में 41 फीसदी सांसद ग्रेजुएट हैं...जबकि 28 फीसदी पोस्ट ग्रेजुएट हैं... महज़ 10 फीसदी सांसद हाई स्कूल पास है...और 13 फीसदी हाई स्कूल से भी कम पढ़े हुए हैं... इन आंकड़ों में 2 फीसदी सांसदों की शिक्षा के बारे में जानकारी नहीं मिल पाई है।

सांसदों की शैक्षणिक पृष्ठभूमि
ग्रेजुएट                41 फीसदी
पोस्ट ग्रेजुएट           28 फीसदी
हाई स्कूल             10 फीसदी
हाई स्कूल से कम       13 फीसदी
जानकारी नहीं          02 फीसदी


हालांकि सांसद बनने के लिए शिक्षा का कोई स्तर निर्धारित नहीं किया गया है... बावजूद इसके संसद में 70 फीसदी सांसदों का ग्रेजुएट या पोस्ट ग्रेजुएट होना...देश में बढ़ते शिक्षा के स्तर की बानगी बयां करने के लिए काफी है।

आजादी के बाद पहली बार
मुस्लिम सांसदों को लेकर
बदली लोकसभा की तस्वीर
देश की सबसे बड़ी दूसरी आबादी मुस्लिम है... 2011 के आंकड़ों के मुताबिक मुस्लिमों की संख्या.. देश की कुल आबादी का 15 फीसदी है... लेकिन देश की सबसे बड़ी पंचायत में इस आबादी का प्रतिनिधित्व इस बार... महज़ 3.5 फीसदी ही रह गया है। संसद में मुस्लिम सांसदों की संख्या हर बार घट रह रही है। जहां 2004 के लोकसभा चुनाव में 34 मुस्लिम प्रत्याशी जीत हासिल कर संसद पहुंचे थे, वहीं 2009 में ये आकंड़ा घट कर मात्र 28 रह गया। लेकिन इस बार संसद में मुस्लिम सांसदों की भागीदारी... बेहद कम हो गई है...जी हां इस बार लोकसभा में सिर्फ 22 मुस्लिम सांसद...चुने गए हैं। 


आजादी के बाद इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है, कि 80 लोकसभा सीटों वाले उत्तर प्रदेश में कोई भी मुस्लिम प्रत्याशी जीत हासिल नहीं कर पाया। जबकि इस राज्य से लोकसभा में मुस्लिम सांसदों की अच्छी खासी भागीदारी हुआ करती थी...इससे भी ज्यादा चौंकाने वाली बात ये है कि....देश भर में 282 सीटें जीतने वाली भारतीय जनता पार्टी में...एक भी प्रतिनिधि मुस्लिम कम्यूनिटी से नहीं है। जिन चुनिंदा मुस्लिम प्रत्याशियों को बीजेपी ने टिकट दिए थे... उन्हें जनता ने नकार दिया।
आपको बता दें कि देश के लोकसभा चुनाव में 21 राज्यों और छह केंद्र शासित प्रदेशों से एक भी मुस्लिम प्रत्याशी ने जीत हासिल नहीं की। पश्चिम बंगाल में सबसे ज्यादा सात मुस्लिम प्रत्याशियों ने जीत दर्ज की, वहीं दूसरे नंबर पर बिहार है, जहां से चार मुस्लिम प्रत्याशियों ने चुनाव जीता, जम्मू-कश्मीर और केरल से तीन-तीन मुस्लिम प्रत्याशी लोकसभा तक पहुंचने में कामयाब रहे..तो असम से दो मुस्लिम उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की...वहीं आंध्रप्रदेश, लक्षद्वीप और तमिलनाडु से भी एक-एक मुस्लिम कैंडीडेट मोर्चा मारने में कामयाब रहे। 

लोकसभा में किसने मुस्लिम सांसद 
पश्चिम बंगाल            07
बिहार                   04
जम्मू-कश्मीर             03
केरल                   03
असम                   02
आंध्रप्रदेश                01
लक्षद्वीप                01
तमिलनाडु               01


देश में मुस्लिमों की भारी भरकम आबादी के बावजूद कई राज्यों से एक भी मुस्लिम प्रत्याशी संसद तक पहुंचने में कामयाब नहीं हुआ। राजस्थान, गुजरात, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, हिमाचल प्रदेश, पंजाब और हरियाणा जैसे मुस्लिमों की अच्छी खासी आबादी वाले राज्यों में भी मुस्लिम उम्मीदवाद वोटरों पर जादू दिखाने में नाकाम साबित हुए। 

सड़क हादसों का सच

मुंडे सड़क हादसे का शिकार होने वाले पहले राजनेता नहीं हैं। इससे पहले पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह, पूर्व केंद्रीय मंत्री राजेश पायलट, पंजाब के पूर्व वित्त मंत्री कंवलजीत सिंह, दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री साहिब सिंह वर्मा और तेलुगू देशम पार्टी के नेता येरन नायडू भी सड़क हादसे के शिकार हो चुके हैं।
सड़क हादसों में मरते नेता
शोभा नेगी रेड्डी
तारीख - 24 अप्रैल 2014

आंध्र प्रदेश के कुरनूल जिले से लगभग 112 किमी दूर अलागडा से पूर्व विधायक शोभा नेगी रेड्डी की मौत भी सड़क दुर्घटना में हुई। 23 अप्रैल 2014 को देर रात उनकी एसयूवी पलट गई। वह 2014 के विधानसभा चुनाव का प्रचार करके लौट रही थीं। इस हादसे में वह गंभीर रूप से घायल हुई और कुछ घंटों बाद उन्होंने हैदराबाद के एक अस्पताल में दम तोड़ दिया।
येरन नायडू
2 नवंबर, 2012
पूर्व केंद्रीय मंत्री और तेलुगू देशम पार्टी के अध्यक्ष के येर नायडू की आंध्र प्रदेश के श्रीकाकुलम में सड़क दुर्घटना में मौत हो गई थी। उनकी कार को एक ऑयल टैंकर ने पीछे से टक्कर मार दी थी। वह विशाखापट्टनम में किसी विवाह समारोह से लौट रहे थे। गंभीर रूप से घायल नायडू को कृष्णा इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज में भर्ती कराया गया जहां दिल का दौरा पड़ने से उनकी मृत्यु हो गई।वी राधाकृष्णन
वी. राधाकृष्णनन
26 अप्रैल 2010
राजनीतिज्ञ और 14वीं लोकसभा सदस्य वी. राधाकृष्णनन की मॉर्निंग वॉक के दौरान पीछे से आ रहे ट्रक की टक्कर से मौत हो गई थी। यह घटना 22 अप्रैल 2010 को हुई और 26 अप्रैल को अस्पताल में उन्होंने दम तोड़ दिया।
वाईएसआर रेड्डी
2 सितंबर 2009
आंध्र प्रदेश में कांग्रेस के कद्दावर नेता और राज्य के मुख्यमंत्री वाईएस राजशेखर रेड्डी का हेलिकॉप्टर हादसे में निधन हो
गया था।
साहिब सिंह वर्मा
30 जून 2007
भारतीय जनता पार्टी के पूर्व वरिष्ठ उपाध्यक्ष और दिल्ली के सीएम रहे साहिब सिंह वर्मा की जयपुर-दिल्ली हाइवे पर शाहजहांपुर में ट्रक से टकराने पर मौत हो गई थी।
गंति मोहन चंद्र बालयोगी
3 मार्च 2002
पेशे से वकील और राजनीतिज्ञ गंति मोहन चंद्र बालयोगी आंध्र प्रदेश के कृष्णा जिले में हेलिकॉप्टर हादसे में मारे गए थे। 12वीं लोकसभा स्पीकर गंति मोहन उस वक्त 50 वर्ष के थे।
माधव राव सिंधिया
30 सितंबर 2001
उत्तर प्रदेश के मैनपुरी के पास विमान दुर्घटना में कांग्रेस मंत्री माधव राव सिंधिया की मौत हो गई थी। विमान में सवार आठों लोग इस हादसे में मारे गए थे। वे शाही परिवार से ताल्लुक रखते थे। उनके पिता ग्वालियर के अंतिम महाराज जिवाजी राव सिंधिया थे।
राजेश पायलट
11 जून 2000
भारत सरकार में मंत्री रह चुके राजेश पायलट की मौत भी जयपुर के निकट एक सड़क दुर्घटना में हुई। राजेश पायलट इंडियन एयर फोर्स में पायलट भी रह चुके थे। पूर्व प्रधानमेत्री राजीव गांधी से उनकी खासी निकटता थी।
ज्ञानी जैल सिंह
25 दिसंबर 1994
भारत के सातवें राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह 29 नवंबर 1994 को सड़क दुर्घटना का शिकार हुए। यह दुर्घटना आनंदपुर साहिब जाते वक्त हुई। उसी वर्ष 25 दिसंबर को हॉस्पिटल में उनका निधन हो गया।
संजय गांधी
23 जून 1980

पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के भाई संजय गांधी की हवाई दुर्घटना में मौत हो गई थी। उनका हवाई जहाज सफदरजंग एयरपोर्ट के पास क्रैश हो गया था। पायलट के तौर पर प्रशिक्षित संजय गांधी उस वक्त खुद जहाज उड़ा रहे थे।
बेलगाम होता ट्रैफिक
बढ़ते सड़क हादसे
बेमौत मरती जनता
ग्रामीण विकास मंत्री गोपीनाथ मुंडे की सड़क हादसे में हुई मौत ने... एक बार फिर दिल्ली की सड़कों पर बेलगाम ट्रैफिक की कलई खोलकर रख दी। इस घटना ने साबित कर दिया कि दिल्ली में लोग कितनी लापरवाही के साथ गाड़ियां चलाते हैं। यही वजह है कि सड़क हादसों में हर साल कितने बेकसूर जान गंवा देते हैं। आंकड़ों पर गौर करें तो एक ऐसी सच्चाई सामने आती है...जो आपको हैरान-परेशान कर सकती है।
बदइंतजामी बयां करते आंकड़े
खूनी सड़कें, खौफनाक हादसे
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो यानी एनसीआरबी के आकड़ों के मुताबिक 2012 के बाद से देश में हर रोज सड़क हादसों में औसतन 461 लोगों की मौत हो जाती है...और करीब 1,301 लोग घायल हो जाते हैं...रिपोर्ट बताती है देश में हर तीन मिनट में एक मौत सड़क हादसे की वजह से हो जाती है...यहां की खूनी सड़कों पर महज़ एक घंटे के अंदर...करीब 19 लोग मारे जाते हैं।
एक रिसर्च में ये बात भी सामने आई कि सड़क हादसों की वजह से.... पिछले 10 सालों में देश में 12 लाख मासूमों को जान गंवानी पड़ी। विडंबना देखिए कि पिछले 10 साल में इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। आपको ये जानकर भी हैरानी होगी कि विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी डब्ल्यूएचओ ने भारत को दुनिया में सबसे ज्यादा सड़क हादसों वाला देश माना है।
आंकड़े बाताते हैं कि चीन में हर साल 97,551 मौतें सड़क हादसों में होती हैं, वहीं अमेरिका में 41,292 और रूस में 37,349 मौतें सड़क हादसों में होती हैं...लेकिन भारत ने इन सभी देशों को पीछे छोड़ दिया है..2012 में भारत में 1,68,301 लोगों ने सड़क हादसों में जानें गंवाईं। जबकि दूसरे  देशों में भारत के मुकाबले कहीं ज्यादा ट्रैफिक है। लेकिन मजबूत ट्रैफिक व्यवस्था और लोगों की समझदारी के चलते वहां सड़का हादसों का ग्राफ काफी नीचे है।
जिंदगी पर भारी सड़क हादसे
देश            मौतें (हर साल)
चीन            97,551
अमेरिका        41,292
रूस            37,349
भारत          1,68,301
नसीआरबी की रिपोर्ट बताती है कि पूरी दुनिया में हर साल 14 लाख लोग सड़क दुर्घटनाओं में मारे जाते हैंअगर बात की जाए सिर्फ भारत की तो... हमारे देश में 2003 से 2012 के दौरान जनसंख्या वृद्धि दर 13.6 फीसदी रही, जबकि इसी दौरान सड़क हादसों में मरने वालों की संख्या में 34.2 फीसदी वृद्धि दर्ज की गई। 
2003 - 2012 के आंकड़े
जनसंख्या वृद्धि दर - 13.6 फीसदी
सड़क हादसों में मौतों की दर - 34.2 फीसदी बढ़ी
2012 में दुर्घटनाओं में होने वाली कुल मृत्यु का 35.2 फीसदी सिर्फ सड़क दुर्घटनाओं का नतीजा है। रिपोर्ट के मुताबिक 2012 में यातायात दुर्घटनाओं के कुल 4,73,416 मामले दर्ज किए गए, जिसमें 4,40,042 मामले सड़क दुर्घटना के और 1,762 मामले रेलमार्ग दुर्घटना के तथा 31,612 मामले रेल से जुड़ी अन्य दुर्घटनाओं के थे। 
2012 के आंकड़े
यातायात संबंधी दुर्घटनाएं    -    4,73,416
सड़क दुर्घटनाएं            -    4,40,042
रेलमार्ग दुर्घटनाएं           -    33,374

आपको ये जानकर हैरानी होगी कि हमारे देश में हर साल आइसलैंड या मालदीव जैसे छोटे देशों की कुल आबादी की आधी के बराबर जनसंख्या सड़क हादसों की बलि चढ़ जाती है।


सड़क हादसों का सच
दिल्ली में हर पांच लोग सड़क हादसों में जान गंवा रहे हैं... ये खुलासा हुआ है इंटरनेशनल रोड फेडरेशन की एक रिपोर्ट में.. दिल्ली ट्रैफिक पुलिस भी इस बात को मानती है कि राजधानी में ज्यादातर सड़क हादसे लापरवाही की वजह से होते हैं। इसके अलावा और भी कई ऐसी वजह हैं.. जो लोगों का शानदार सफर... आखिरी सफर में तब्दील हो जाता है।
सड़का हादसों की वजह
लापरवाही 60 फीसदी सड़क हादसों की वजह
स्पीड ब्रेकर के ना होने से ओवर स्पीड का खतरा
खतरनाक ड्राइविंग और स्टंट भी जानलेवा
कई बार नशा और नींद भी बन जाती है मौत की वजह
फुटपाथों पर कब्जे होने से संकीर्ण होते सड़क मार्ग
पैदाल यात्री बढ़ा देते हैं अव्यवस्था
दिल्ली में फुट ओवर ब्रिज और सब-वे की भारी किल्लत
दिल्ली में जाम से निजात दिलाने... यात्रियों को सुविधा देने और ट्रैफिक की रफ्तार को चालू रखने के लिए...  हर चौक-चौराहों पर रेड लाइट सिग्नल लगाए गए हैं। लेकिन बड़ी बात ये है कि लोग इन ट्रैफिक सिग्नल्स को फोलो नहीं करते। ये जानते हुए भी कि कई बार रेड लाइट तोड़ना जान पर भारी बन जाता है..बावजूद इसके कुछ लोग नियमों की खुलेआम धज्जियां उड़ाते हैं। आंकड़ों पर अगर गौर किया जाए..तो दिल्ली में सबसे ज्यादा चालान सिग्नल तोड़ने वालों के होते हैं। 2013 में सिग्नल तोड़ने वालों के 3,40,000 चालान काटे गए... जबकि 2014 में 15 मई तक ये संख्या 3,29,000 हो गई।
लालबत्ती का उल्लंधन
2013                                3,40,000
2014 (15मई तक)           3,29,000
दिल्ली में जिन जगहों पर सबसे ज्यादा सड़क हादसे होते हैं.. उन टॉप 10 डेंजर रोड्स में अरविंदो रोड भी एक है..जी हां ये वही जगह है..जहां गोपीनाथ मुंडे का एक्सीडेंट हुआ। आंकड़े बताते हैं कि 2009 में..सड़क हादसों की वजह से.. अरबिंदो मार्ग पर 08 लोगों ने जान गंवाईं..जबकि 22 लोग घायल हो गए। 2010 में ये संख्या और बढ़ गई.,. मरने वालों की संख्या 13 और घायलों की 27 हो गई ..2011 में भी कमोबेश ऐसे ही हालात रहे...इस साल यहां 12 लोगों की मौत हुई और 28 लोग घायल हुए...2012 में अरबिंदो मार्ग पर कुल 2 लोगों की मौत हुई लेकिन घायलों का आंकड़ा 18 पहुंच गया। 
अरबिंदो मार्ग पर बढ़ते हादसे
साल        घायल            मौत
2009                22                              08
2010                27                              13
2011                28                              12
2012                18                              02

दिल्ली के खूनी सड़कें
मुकुंदपुर चौक, ब्रिटेनिया चौक, शास्त्री पार्क चौराहा, सीलमपुर टी-प्वाइंट, निगम बोध घाट, पंजाबी बाग चौक, शकरपुर चुंगी, महिपालपुर फ्लाइओवर और आश्रम चौक

ये वो तमाम जगहें हैं.. जहां भीड़ ज्यादा होने के साथ-साथ लापरवाही का भी बुरा हाल है... यही वजह है कि इन सड़कों पर सबसे ज्यादा मौतें होती हैं...जाहिर है इन बढ़ते सड़क हादसों के बाद.. ट्रैफिक पुलिस की भूमिका सवालों में आ जाती है.. ..आप भी देखिए पिछले कुछ सालों में ट्रैफिक पुलिस ने इन सड़क हादसों पर लगाम कसने के लिए....क्या कुछ ठोस कदम उठाए।

ट्रैफिक पुलिस की कार्रवाई
शराब पीकर गाड़ी चलाने वालों पर बरती सख्ती
रात में कमर्शियल वाहनों पर खास निगरानी
ओवरस्पीड और खतरनाक ड्राइविंग पर नियंत्रण
रफ्तार रोकने के लिए खास जगहों पर स्पीड ब्रेकर
कम भीड़ वाली जगहों पर भी ट्रैफिक सिग्नल


दिल्ली की ट्रैफिक पुलिस सड़क हादसों पर काबू करने के लिए...जो दावे कर रही है...उनमें कितनी सच्चाई है.. इसका अंदाजा आप शहर में हर रोज़ होते सड़क हादसों से लगा सकते हैं... अगर वाकई पुलिस ने सख्ती बरती होती..तो देश की राजधानी दिल्ली.. आज खतरे और हादसे की राजधानी ना बनी होती।

दिल्ली को नहीं ट्रैफिक सेंस
गलतियों में सबसे आगे
दिल्ली में हर रोज़ सड़क हादसे होते हैं..इनमें कितने ही बेगुनाह जान गंवाते हैं... लेकिन इन हादसों के बाद सबसे बड़ा सवाल ये खड़ा होता है कि पिछली गलतियों से हमने क्या सबक लिया? रोड ट्रांसपोर्ट मिनिस्ट्री और नैशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि पहले के मुकाबले लोग ट्रैफिक सेंस को लेकर ज्यादा लापरवाह हो रहे हैं। इतना ही नहीं रिपोर्ट ये भी बताती है कि हम दुनिया के उन चुनिंदा मुल्कों में से हैं.. जो सड़क पर सबसे ज्यादा गलतियां करते हैं। यही वजह है कि सबसे ज्यादा हादसे भी इसी देश में होते हैं।
बात की जाए राजधानी दिल्ली की..तो भारतीय शहरों में मुंबई के बाद सबसे ज्यादा रोड एक्सिडेंट दिल्ली में होते हैं2011 में राजधानी में कुल 7281 सड़क हादसे हुए, जबकि मुंबई में यह आंकड़ा 25 हजार 471 था। ब्रिटिश कैपिटल लंदन के मुकाबले राजधानी दिल्ली में एक्सिडेंट 40 गुना ज्यादा हैं
सड़क हादसों में मुंबई अव्वल
2011 का रिकॉर्ड 
दिल्ली            7281 हादसे
मुंबई             25,471 हादसे
रोड ट्रांसपोर्ट मिनिस्ट्री की रिपोर्ट के मुताबिक 77.5 फीसदी सड़क हादसों के लिए ड्राइवर जवाबदेह होते हैं, जबकि फुटपाथ पर चलने वालों और साइकिल वाले 3.7 फीदसी हादसों के लिए जिम्मेदार होते हैं। रिपोर्ट कहती है कि हादसों के लिए सड़क को सिर्फ 1.5 फीसदी मामलों में जिम्मेदार करार दिया जा सकता है। ट्रैफिक विशेषज्ञ भी इस बात को मानते हैं कि अराजक तरीके से ड्राइविंग सड़क हादसों की सबसे बड़ी वजह है।
देश में बढ़ते सड़क हादसों पर गौर किया जाए तो एक ऐसी तस्वीर सामने आती है..जिसकी कल्पना भी हम और आप नहीं कर सकते।
सड़क हादसों की हकीकत 
सबसे ज्यादा 23.2 फीसदी हादसे दुपहिया वाहनों से होते हैं।
दूसरे नंबर पर सबसे ज्यादा 19.2 फीसदी हादसे ट्रकों से होते हैं।
2011 के मुकाबले 2012 में मरने वालों की संख्या 1.6 फीसदी बढ़ी।
भारत में 2012  में 4,40,042 सड़क हादसों में 1,39,097 मौतें।
77.5 फीसदी हादसों में ड्राईवर की गलती।
देश में हर मिनट में एक सड़क हादसा
हर तीन मिनट में सड़क हादसे में एक मौत

लापरवाही से मौत
धारा 304 (A) के तहत कार्रवाई
सड़क हादसे में मौत के मामले में लापरवाही से मौत का केस दर्ज किया जाता है..पुलिस ये देखती है कि हादसे में किसकी लापरवाही है..जिसकी लापरवाही सामने आती है उसी पर मुकदमा दर्ज किया जाता है.. इन मामलों में आईपीसी की धारा 304 (A)  के तहत मामला दर्ज किया जाता है.. ऐसे में दोषी पाए जाने पर 6 महीने कैद हो सकती है। आपको बता दें कि इस तरह के अपराध में जमानत भी आसानी से मिल जाती है। लेकिन ये हल्का कानून भी इस तरह के सड़क हादसों की पीछे काफी हद तक जिम्मेदार है। लोग जानते हैं कि अगर उनकी लापरवाही से किसी की जान चली भी गई तो उन्हें आसानी से बेल मिल जाएगी.. कई बार इस कानून में संशोधन की बात भी उठाई गई..लेकिन ये मामला हमेशा ही ठंडा पड़ जाता है... यही वजह है कि सड़क हादसों में मौतों का ग्राफ और ज्यादा बढ़ता जा रहा है।