Saturday, 31 May 2014

अलविदा एम्बेसडर

आजाद भारत में सत्ता, अधिकार और दबंगई की प्रतीक रही एम्बेस्डर कार का निर्माण आधिकारिक रूप से बंद कर दिया गया है..और इसी के साथ..देश में एक युग का अंत हो गया। एम्बेस्डर कार बनाने वाले हिंदुस्तान मोटर्स लिमिटेड के आर्थिक तंगी से जूझ रहे उत्तरपाडा संयंत्र को अनिश्चित काल के लिए बंद कर दिया है.. पश्चिम बंगाल में हुगली जिले के उत्तरपाड़ा में....देश का पहला और एकमात्र ओटोमोबाइल प्लांट...  हिंद मोटर पिछले कई सालों से आर्थिक तंगी का सामना कर रही है। देश में साल 1942 में पहली स्वदेशी कार बनाने वाली ये कंपनी.... समय के साथ और ईंधन की बढ़ती कीमत के मुताबिक कार के माडलों को एडवांस नहीं बना पाई, जिससे इसे आर्थिक रूप से काफी नुकसान झेलना पड़ा... और आखिरकार प्लांट में काम रोकना पड़ा।
आधी सदी से अधिक समय तक भारतीय सडकों पर राज करने वाली हिन्द मोटर्स की सफेद एम्बेस्डर कार भारतीय समाज में पद और प्रतिष्ठा का हिस्सा बनी रही। भारत सरकार ने कई साल अपने बेड़े में एम्बेस्डर कार की संख्या कम करने का फैसला किया तो इसके बुरे दिन शुरू हो गए. ...नई तकनीक वाली कारों के आने से इसकी लोकप्रियता कम होने लगी और ग्राहक नई कारों की तरफ रुख करने लगे... बाजार में नई कारों के मुकाबले ये पिछड़ने लगी और ग्राहकों को नहीं लुभा पाई.... सरकारी अधिकारियों और नेताओं के सुरक्षा मानकों पर ये गाड़ी फेल होने लगी...यही वजह है कि दिन-ब दिन बाजार में एम्बेस्डर की मांग कम होने लगी..और एक वक्त ऐसी आया.. कि इसकी बिक्री ना के बराबर रह गई...

बाजार में मांग कम होने के चलते कपंनी का उत्पादन घटने लगा , फैक्ट्री का मेंटीनेंस, रखरखाव बढ़ता चला गया.... जो कंपनी के लिए महंगा साबित हुआ...एम्बेस्डर कार बनाने वाले हिंदुस्तान मोटर्स लिमिटेड आर्थिक तंगी के मकड़जाल में उलझ गई... उत्तरपाडा संयंत्र को अनिश्चित काल के लिए बंद कर दिया गया। एम्बेस्डर कार बनाने वाली कंपनी में ताला लगने के साथ ही.. ये कार हमेशा-हमेशा के लिए इतिहास के पन्नो में दर्ज हो गई... आने वाली पीढ़ियां भले ही इसे याद न करें लेकिन पुराने लोगो की जो यादें एम्बेस्डर के साथ जुड़ी हैं..उन्हें शायद ही वो कभी भुला पाएं।

जापानी कंपनी टोयटा के बाद एशिया की इस दूसरी सबसे पुरानी कार कंपनी की स्थापना..आजादी से पांच चाल पहले 1942 में हुई थी... तब से लगातार पांच दशक तक... कार बाजार में इन कारों का एकछत्र राज रहा... लेकिन 90 के दशक में मारूति के बाजार में उतरने से... एम्बेस्डर की स्थिति डांवाडोल होने लगी। 80 के दशक में देस में साला 24 हजार एम्बेसडर कारें बिकती थीं... लेकिन 90 के दशक में ये संख्या कुल 12 हजार रह गई। इसके बाद तो प्लांट को चलाना.. घाटे का सौदा हो गया था... घाटे से उबरने के लिए कंपनी ने फैक्ट्री परिसर की 314 एकड़ अतिर्क्त ज़मीन बेच दी... लेकिन हालात नहीं बदले...2012 में कंपनी को बीमार घोषित कर भारतीय औद्योगिक पुनर्गठन बोर्ड यानी बीआईएफआर के हवाले कर दिया गया...पिछले साल के आखिर तक... कंपनी का घाटा बढ़कर सौ करोड़ तक पहुंच गया था.. इस घाटे की भरपाई के लिए कंपनी ने चेन्नई स्थित प्लांट को भी बेच दिया... लोकिन घाटे पर अंकुश नहीं लगाया जा सका।
हिंदुस्तान मोटर्स के हालात बद से बदतर होते चले गए.... पिछले पांच सालों के दौरान एम्बेस्डर कारों की ज्यादातर बिक्री कोलकाता में टैक्सी को तौर पर इस्तेमाल होने लगी... लेकिन बाद में दूसरी कंपनी के इस क्षेत्र में घुसने की वजह से कंपनी को और झटका लगा। आखिरी कुछ में यहां रोजाना महज़ पांच कारें ही बन रही थीं... इसके मुकाबले दूसरे भारतीय आटोमोबाइल संयेत्रों में रोजाना औसतन 160 कारें बनती हैं। जबकि कंपनी के खर्चे जस के तस बने हुए थे।
लंबे समय से घाटे का दंश झेल रही हिस्दुसातन मोटर्स को आखिर कार एम्बेस्डर बंद करने का फैसला लेना पड़ा.. कंपनी में काम करने वाले 2400 कर्मचारियों के अलावा करोड़ों भारतीयों को उस वक्त धक्का लगा...जब हिंदुस्तान मोटर्स ने बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज को इस बात की जानकारी दी..कि उन्होंने एम्बेस्डर कार के उत्पादन को रोक दिया है। कंपनी के प्रवक्ता राजीव सक्सेना ने बताया कि... 'कम उत्पादन, घटता अनुशासन, पैसों की कमी, मांग में कमी, ये सब बहुत भारी पड़ रहे थे और इन्हीं वजहों से एम्बेस्डर का उत्पादन रोक दिया गया है।'
कपंनी ने घाटे से उबरने के हर जतन किए..लेकिन हर कोशिश नाकाम साबित हुई...इस परिस्थिति में कार का उत्पादन कम करने के अलावा.. कंपनी के पास दूसरा कोई विकल्प नहीं था। हालांकि कि ये बात और है कि भारत की सबसे पुरानी कार होने के नाते करोड़ों लोगों की भावनाएं इससे जुड़ी हैं..लेकिन सच्चाई ये भी है कि कंपनी भावनाओं से नहीं चलती।

शायद आप नहीं जानते होंगे कि एम्बेस्डर गाड़ी सबसे पहले 1956 में इग्लैंड में बनाई गई थी... उस वक्त इसका नाम था मॉरिस ऑक्सफोर्ड.. लेकिन जैसे ही ये गाड़ी भारत में आई... ये भारत की पहचान बन गई... भारतीयों ने तो एम्बेस्डर को खूब प्यार दिया है... विदेश से आने वाले सौलानियों ने भी इसे खूब सराहा। लेकिन बदलते वक्त के साथ एम्बेस्डर का नशा लोगों के दिलों से उतरने लगा..और ये गाड़ियां सड़कों से लुप्त होने लगीं। आखिर क्या वजह रही कि कंपनी को एम्बेस्डर कार की रफ्तार रोकनी पड़ी।
पुरानी तकनीक बड़ी वजह - COMMON HEADER
ओटोमोबाइल विशेषज्ञों की मानें तो एम्बेस्डर कार क पछड़ने की सबसे बड़ी वजह उसका पुरानी डिजाइन और क्वालिटी है... क्योंकि 50 के दशक में जब इस गाड़ी की शुरुआत हुई थी.. तब से लेकर आज तक कंपनी ने इसके डिजाइन में कोई खास परिवर्तन नहीं किए.. वहीं गाड़ी की उपरी बनावट भी जस की तस बनी रही.. हालांकि कुछ नए मॉडल्स को लेकर कंपनी ने इसमें छोटे-मोटे सुधार भी किए..लेकिन खरीदारों कसौटी पर ये गाड़ी खरी नहीं उतर पाई।
विशेषज्ञ ये भी मानते हैं कि 'अगर कंपनी ने पिछले साठ साल के दौरान इसकी क्वालिटी में निरंतर सुधार किया होता तो ये गाड़ी भारतीय रॉल्स रॉयस बन सकती थी।' सत्ता, प्रतिष्ठान, अभिनेताओं, नौकरशाहों और बड़े अधिकारियों की पहली पसंद होने के बावजूद इस गाड़ी का बाजार से यूं रुखसत होना.. बेहद दुखदायी है। एम्बेस्डर के बंद होने से कंपनी में काम करने वाले करीब ढाई हजार कर्मचारी भी बुरी तरह प्रभावित हुए हैं... जिसके घरों में रोजी-रोटी के भी लाले पड़े हैं। कंपनी में पिछले छह महीनों से उन्हें कोई वेतन नहीं मिला... और ना ही काम बंद करते वक्त उन्हें किसी तरह का मुआवजा दिया गया । मतलब साफ है कि भले ही बंगाल सरकार कंपनी को दोबोरा शुरु करने की बात कह रही हो..लेकिन पहले से ही घाटे में चल रही..और करोड़ों के देनदारी से जूझ रही...हिंदुस्तान मोटर्स दोबारा चले.. ऐसा मुमकिन नज़र नहीं आता। 

Wednesday, 14 May 2014

मोदी विरोध का विकल्प मोदी

सोलह मई को मतगणना होने वाली है । अभी से सरकार को लेकर क़यास लगा रहे होंगे । यह एक सामान्य और स्वाभाविक लोकतांत्रिक उत्सुकता है । सब अपने अपने अंदाज़ीटक्कर को लेकर भाँजेंगे । मैंने कहा था न कि तीन सौ आएगी मैंने कहा था न कि मोदी वोदी की कोई लहर नहीं है । गठबंधन की सरकार बनेगी या मोदी प्रधानमंत्री नहीं बनेंगे । 


किसी की बात सही होगी तो किसी की ग़लत । लेकिन ज़रा मुड़कर चुनाव को देखिये तो समझ आयेगा कि क्यों बीजेपी की सरकार बन रही है । मोदी का विरोध तो हुआ मगर मोदी का कोई विकल्प नहीं दिया गया । तथाकथित सेकुलर ताक़तें आपस में लड़ रही थीं न कि मिलकर बीजेपी से । खुद को एक मतदाता की जगह रखकर सोचिये । वो इस चुनाव में मोदी विरोध के नाम पर भाग लेता भी है तो वोट किसे दे । यह चुनाव बीजेपी को हराने के लिए नहीं था । यह चुनाव था हर हाल में कांग्रेस को हराने के लिए । मोदी ने शुरू से ही कांग्रेस पर इतना हमला किया कि कांग्रेसियों को यक़ीन हो गया कि जनता इस बार ख़िलाफ़ है ।  इसका मनोवैज्ञानिक असर यह हुआ कि सहयोगी कांग्रेस के साथ खुलकर आने से रह गए । आम मतदाता एक साथ दो राष्ट्रीय दलों का विरोध करते हुए अलग अलग  कई क्षेत्रिय दलों के साथ क्यों जायेगा । वोटर भी सरकार के स्थायीत्व को समझता है । उसका काम भी मोदी विरोधी दलों ने ही आसान कर दिया । कोई साफ़ विकल्प न देकर । 

दूसरी बात यह है कि इस चुनाव में कई क्षेत्रिय दल सोते रहे । शायद जानबूझकर ही ऐसा किया । हर मैदान को बीजेपी के लिए छोड़ दिया । जनता उनके मोदी विरोध की गंभीरता को समझ रही थी । सपा ने बनारस में अपने ही काम का प्रचार नहीं किया और नीतीश ने बिहार में । दूसरी तरफ़ मोदी ने न सिर्फ टीवी रेडियो और होर्डिंग को छाप लिया बल्कि हर बूथ पर संघ की मदद से कई स्तर पर प्रचार किया । बनारस में राजनीतिक कार्यकर्ताओं के साथ साथ गुजरात मुंबई और यूपी से व्यापारियों कारोबारियों को भी भेजा । जाति भाषा के हिसाब से मतदाताओं को टारगेट किया । इससे अगर तुलना करें तो मोदी विरोधी दल दिन में सपने देख रहे थे कि उनकी तरह मतदाता भी मोदी का विरोधी है । 

मोदी विरोधियों ने व्यापक स्तर पर सांप्रदायिकता का मुद्दा उठाने के बजाए गुजरात दंगों से जोड़े रखा । मोदी का विरोध करते तो मुलायम का भी करना पड़ जाता । किसी ने कहा कि व्यक्तिवादी राजनीति हो रही है जैसे मोदी न होते तो सामूहिक नेतृत्व वाली बीजेपी  बहुत अच्छी थी ! इनकी लड़ाई मोदी तक ही सीमित रह गई । मोदी ने अच्छी बुरी सरकार का सपना तो बेच ही दिया लेकिन उनके विरोधी क्या बेच रहे थे । कौन सा सपना बेच रहे थे । इस चुनाव में कांग्रेस को क्यों जीतना चाहिए यह बात तो कांग्रेसी भी दावे से नहीं कह पा रहे थे । तो किसके भरोसे मोदी विरोधी यह कहने का नैतिक साहस करते । सपा बसपा को क्यों जीतना चाहिए क्या ये कहने का नैतिक साहस कर सकते थे । मोदी के सामने उनके विरोधी निहत्थे और सुस्त पड़े रहे । 

राजनीतिक हमलों में भी तमाम दलों ने मोदी को वाकओवर दिया । जबकि मोदी ने एक एक बात का जवाब दिया और संदेश दिया कि वे सबको सुन रहे हैं । मोदी विरोधी हल्का विरोध कर चुप रहे । कोई लहर नहीं है टाइप । विकल्प के अभाव में मतदाता के एक बड़े वर्ग ने उनकी कमज़ोरियों और खराब बयानों, इंटरव्यू के दौरान प्रेस पर हावी होने की आदतों को नज़रअंदाज़ कर दिया । नतीजा यह हुआ कि हर चौक चौराहे और गाँव गलियों में आम मतदाता भी मोदी की तरफ़ से बहस करने लगा । तथाकथित सेकुलर दल मोदी के ख़िलाफ़ 'काउंटर नैरेटेवि' नहीं रच सके । इन बहसों में जो मतदाता मोदी का विरोध भी करना चाहता था उसके पास तर्कों की कमी थी । हर तबके का नाराज़ मतदाता बीजेपी की तरफ़ गया । हर दल से निकल कर बीजेपी की तरफ़ गया । यूपी विधानसभा की तरह नहीं हुआ कि सपा को हराने के लिए बसपा को जीताया और बसपा को हराने के लिए सपा को । इसलिए विरोधी मतों के बँटवारे के कारण भी बीजेपी के पक्ष में संख्या समीकरण ज़्यादा बना । बीजेपी ही एकजुट और भयंकर डिटेलिंग के साथ चुनाव लड़ रही थी । 

ऊपर से मीडिया ने अपना स्पेस लुटा कर मोदी के ख़िलाफ़ हर काउंटर नैरेटिव की धार को कुंद कर दिया । आम मोदी विरोधी मतदाता  निहत्था हो गया । अकेला पड़ गया । हर समय मोदी । ख़बर और विज्ञापन दोनों जगह । बहस के सवाल मोदी की तरफ़ से रखे और पूछे गए । मतदाता के मन में ऊपर से लेकर नीचे कर मोदी की परत जम गई । कई दलों ने अच्छी दलीलें दीं मगर नहीं दिखाया । मोदी के ब्लाग को ख़बर बनाया लेकिन नीतीश के फ़ेसबुक अपडेट को छोड़ दिया । कांग्रेस लचर तरीके से बहस में आई तो बीजेपी का हर बड़ा प्रवक्ता कम टीआरपी वाले चैनलों में भी तैयारी के साथ गया । कांग्रेस के बड़े नेता अंग्रेज़ी चैनलों में गए तो बीजेपी के हिन्दी चैनलों में । सपा बसपा के तो प्रवक्ता ही नहीं आए । 

इसलिए मोदी विरोध का विकल्प भी मोदी ही बन गए । अब अगर बीजेपी के ख़िलाफ़ मतदाताओं में ग़ुस्सा था और वो किसी को नहीं दिखा सिर्फ मोदी विरोधियों को दिखा तो सचमुच सोलह को ज़लज़ला आ जायेगा । बीजेपी हार जाएगी । और अगर हार गई तो अगली बार बीजेपी के उम्मीदवार को उनके ही घर वाले चंदा नहीं देंगे । प्रचार तंत्र का सारा तामझाम फ़ेल हो जाएगा और साबित हो जाएगा कि यह चुनाव मोदी नहीं बल्कि जनता लड़ रही थी । यह बताने के लिए कि वो व्यक्तिवादी राजनीति के ख़िलाफ़ है । वो राजनीति में पैसे के इस हद तक इस्तमाल के ख़िलाफ़ है । ऐसा है तो भारतीय राजनीति में नए सूर्योदय के स्वागत के लिए तैयार रहिए । जहाँ सब फ़ेल हो जायेंगे ।  अगर ऐसा नहीं है तो कभी लालू कभी मायावती कभी आप के बहाने मोदी विरोधी खुद को दिलासा न दें । खुद से यह सवाल करें कि क्या कोई मतदाता विकल्पहीन स्थिति के लिए वोट करेगा ? वो मोदी को हराने के लिए क्यों वोट देता और किसे देता । जब कोई लड़ेगा नहीं तो वो जीतेगा कैसे । जीतता वही है जो लड़ता है । 

Tuesday, 6 May 2014

ऐसा खाना ना बाबा न


चुभती गर्मी से राहत पाने के लिए बाहरी चीजों को तो हम सभी तवज्जो देते हैं... लेकिन खाने को भूल जाते हैं , जबकि मौसम के मुफीद खाना हमारी सेहत के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है। गर्मियों में शरीर में पित्त बढ़ जाता है , जिससे एसिड बनने लगता है। और पेट में एसीडिटी की समस्या होने लगती है। इससे निपटने के लिए ठंडी चीजें खाना ज्यादा बेहतर माना जाता है।




पानी : गर्मियों में पसीने से सबसे ज्यादा नुकसान शरीर को पानी और नमक का होता है। ऐसे में डी - हाइड्रेशन से बचने के लिए रोजाना 10-15 गिलास पानी पीना जरूरी है.. कम पानी पीने से यूटीआई यानी यूरीन ट्रैक इन्फेक्शन भी हो सकता है। गुनगुना , नॉर्मल या हल्का ठंडा पानी पीने की कोशिश करें...चिल्ड पानी पीना सेहत के लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है।

नींबू पानी : गर्मियों में जितना मुमकिन हो , नींबू पानी पीना चाहिए। नीबू पानी में थोड़ा नमक या थोड़ी चीनी मिलाना बेहतर है। इससे शरीर से निकले सॉल्ट्स की भरपाई होती है।
नारियल पा.नी : नारियल पानी को मां के दूध के बाद सबसे बेहतर और साफ पेय माना जाता है। नारियल पानी प्रोटीन और पोटैशियम का अच्छा सोर्स है। इसका कूलिंग इफेक्ट भी काफी अच्छा है , इसलिए ये एसिडिटी और अल्सर में भी कारगर है।
छाछ : छाछ में प्रोटीन खूब होते हें। ये शरीर के टिश्यूज को हुए नुकसान की भरपाई करते हैं। छाछ में मीठे के बजाए...काला नमक , काली मिर्च , भुना जीरा डालकर पीना काफी फायदेमंद माना जाता है।
वेजिटेबल जूस : जूस पीने से बेहतर है सब्जियां खाना। फिर भी जो लोग सब्जियों का जूस पीना चाहते हैं , वे घिया , खीरा , आंवला , टमाटर का जूस मिलाकर पी सकते हैं।

फ्रूट जूस : जूस में सिर्फ फ्रैकटोज होते हैं , जबकि साबुत फल में फाइबर होता है , इसलिए जूस के मुकाबले साबुत फल खाना हमेशा बेहतर है। जूस जब भी पिएं , ताजा ही पिएं। रखा हुआ जूस पीना सेहत के लिए अच्छा नहीं है। जूस को गरम करने से भी उसमें न्यूट्रिशनल वैल्यू कम होती है। गर्मियों में मौसमी या माल्टा का जूस काफी फायदेमंद है। इसी तरह , तरबूज का जूस गर्मियों का बेहतरीन पेय है लेकिन जितना मुमकिन हो , तरबूज जूस घर का ही पिएं। बाहर के जूस में इन्फेक्शन का खतरा बढ़ जाता है।
पैक्ड जूस : जब तक जरूरी न हो , पैक्ड जूस न पिएं। इनमें शुगर काफी ज्यादा होती है और प्रिजर्वेटिव भी खूब होते हैं। जो आपको फ्रेश जूस की तरह ताजगी और तंदरुस्ती दे पाने में नाकाम है।

रेडीमेड शरबत : मार्केट में बने बनाए तमाम शरबत आते हैं..जो आमतौर पर ज्यादा फायदेमंद नहीं हैं। चीनी ज्यादा होने की वजह से ये मोटापा बढ़ाते हैं। हालांकि सॉफ्ट ड्रिंक से बेहतर होते हैं , खासकर हर्बल शरबत।

मिल्क शेक : मिल्क शेक डबल टोंड दूध का बनाएं। शेक में फल और चीनी कम डालें , ताकि कैलरी कंट्रोल में रहें। शेक के साथ डाई - फ्रूट और आइसक्रीम न लें। खासकर मार्केट में जो शेक में ड्राइफ्रूट डालकर दिए जाते हैं , उनकी क्वॉलिटी अच्छी नहीं होती। शेक को बनाकर नहीं रखना चाहिए। केला और सेब का शेक बनाकर रखने से ऑक्सिडाइज्ड हो जाता है।

आम पना : आम पना गर्मियों का खास ड्रिंक है। कच्चे आम की तासीर ठंडी होती है। टेस्ट से भरपूर आम पना विटामिन - सी का अच्छा सोर्स है। ये स्किन और पाचन , दोनों के लिए अच्छा है। इसे लंबे समय तक रखा जा सकता है।

बेल का शरबत : बेल का शरबत एसिडिटी और कब्ज , दोनों में असरदार है। कच्चे बेल का शरबत लूज मोशंस को रोकता है तो पके बेल का शरबत कब्ज को ठीक करता है। इसका कूलिंग इफेक्ट भी काफी अच्छा होता है। ये अल्सर को भी ठीक करता है। 
गर्मियों में जो भी खाएं...ध्यान रहे कि वो खाना हल्का हो। उसमें फैट कम हो। गर्मियों में भारी फूड आइटम आसानी से नहीं पचते। लंच और डिनर में हल्का और जल्दी पचनेवाले खाने को ही तवज्जो दें।
GFX IN
ऐसे खाने से बचें - COMMON HEADER
GFX OUT
फास्ट फूड या स्नैक्स :
स्नैक्स में भेलपुरी , ढोकला , चिवड़ा , खांडवी , ब्राउन राइस का पोहा जैसे भाप में पकी चीजें खाएं। ये लाइट भी होते हैं और टेस्टी भी।

अंडा और नॉनवेज
गर्मियों में हफ्ते में दो बार से ज्यादा नॉनवेज या अंडा न खाएं। इन्हें भी उबालकर या भाप में पकाकर खाएं। नॉनवेज में मछली या चिकन ले सकते हैं। गर्मी करे हिसाब से मटन काफी हेवी होता है। उससे बचें। नॉनवेज को देसी घी में बनाने की बजाय दही में मेरिनेट करके बनाएं।

घी और तेल
गर्मियों में घी और तेल का इस्तेमाल कम करें। देसी घी , वनस्पति घी के अलावा सरसों का तेल और ऑलिव ऑयल भी कम खाएं। ये गर्म होते हैं। राइस ब्रैन , नारियल , सोयाबिन का तेल खाना ज्यादा फायदेमंद है।

आइसक्रीम
गर्मियों की कल्पना भी आइसक्रीम के बिना अधूरी है। आइसक्रीम को पूरी तरह जंक फूड की कैटिगरी में नहीं रखा जा सकता क्योंकि इसमें दूध ड्राइफ्रूड्स भी होते हैं लेकिन हाई कैलरी , हाई शुगर और प्रिजर्वेटिव होने की वजह से ये सेहत के लिए नुकसान दायक भी साबित हो सकती है..लिहाजा हफ्ते में दो बार से ज्यादा आइसक्रीम बिल्कुल न खाएं।
फ्रूट चाट
फ्रूट चाट जितनी स्वाद के लिहाज से अच्छी है , उतनी सेहत के लिहाज से नहीं। वजह यह है कि सारे फलों का डायजेशन अलग - अलग वक्त पर होता है। इनका मिजाज भी अलग - अलग होता है। मसलन , केला अल्कलाइन है तो संतरा एसिडिक। दोनों को एक साथ खाने से डाइजेशन सही नहीं होता। अगर फ्रूट सलाद खाना ही चाहते हैं तो इसमें ऐसे फल रखें , जिनमें कार्ब और फैट ज्यादा न हों। मसलन केला , आम या चीकू कम रखें।
तला- भुना
गर्मियों में तला - भुना नहीं खाना चाहिए। तली - भुनी चीजें शरीर में आलस पैदा करती हैं। इसकी बजाय उबला , भुना या भाप में पका खाना खाएं। गर्म मसाले कम कर दें। लाल मिर्च की बजाय काली मिर्च का इस्तेमाल करें।

चाय - कॉफी
चाय - कॉफी कम पिएं। इनसे बॉडी डी - हाइड्रेटेड होती है। ग्रीन - टी पीना बेहतर है।

स्मोकिंग / अल्कोहल
 स्मोकिंग कम करें। अल्कोहल बिल्कुल न लें या फिर कम लें। लोग मानते हैं कि बियर ठंडी होती है , ऐसा सोचना गलत है। ज्यादातर बियर में ग्लिसरीन होती है , जिससे शरीर डी - हाइड्रेटेड होता है।

ड्राइफ्रूट्स
गर्मियों में 5-10 बादाम रोजाना खा सकते हैं। इन्हें रात भर भिगोकर खाना चाहिए। बाकी ड्राइ - फ्रूट्स को गर्मियों में खाने की सलाह नहीं दी जाती। क्यों की ड्राइफ्रूट्स का तासीर गर्म होता है।

शहद
शहद की तासीर भी काफी गरम है। इसे सोच समझकर कम मात्रा में लें। या ठंडी चीजों में मिलाकर शहद का सेवन करें।

फ्रोजन फूड
फ्रोजन फूड इमरजेंसी में ही खाना चाहिए। फ्रोजन फूड हाइजीन और टेंपरेचर के हिसाब से सही नहीं होता।

बासी खाना
बासी खाने से बचें। इसमें बैक्टीरिया पनपने की आशंका काफी ज्यादा होती है। एक रात से ज्यादा पुराना खाना न खाएं। गर्मियों में कोई भी खाना 7-8 घंटे तक ही ठीक रहता है।
गर्मियों में बजाए तला-भुना और ठोस खाना खाने के... कच्ची सब्जियों और फलों का सेवन फायदेमंद साबित हो सकता है। लेकिन फलों के खोने से पहले आपको कुछ बातों पर ध्यान देना बेहद जरूरी है...मसलन फलों को ज्यादा देर पहले काटकर न रखें। इससे उनका पानी उड़ जाता है और न्यूट्रिशन वैल्यू कम होती है। इसके अलावा पोटाश और दूसरी आप्रकृतिक प्रक्रियाओं से पकाए गए फल भी सेहत के लिए नुकसान दायक साबित हो सकते हैं।  इसके अलावा खरबूजे और तरबूज में सैक्रीन के इंजेक्शन लगाकर उन्हें जबरन मीठा बनाया जाता है... ध्यान रहे सैक्रीन स्लो प्वाइज़न की तरह है..जो धीरे-धीरे शरीर पर असर दिखाता है।

फल खाएं पर ज़हर नहीं 

मौसमी 
मौसमी खाना सेहत के लिहाज से हमेशा बढ़िया होता है। जिन फलों के छिलके खा सकते हैं , उन्हें छिलके समेत ही खाएं। फलों को ब्रेकफास्ट से पहले , शाम में 4 बजे के आसपास खाना अच्छा है। फल खाने का तरीका यही है कि इन्हें खाना पचने के बाद खाएं। खाने और फलों के बीच 2-3 घंटे का गैप रखें। खाने से एक घंटा पहले भी खा सकते हैं लेकिन भरे पेट न खाएं और न ही खाने के साथ खाएं।
तरबूज
गर्मियों के लिए तरबूज बहुत अच्छा है , लेकिन तरबूज के साथ पानी न पिएं। दोपहर के वक्त तरबूज खाना और भी अच्छा है क्योंकि उस वक्त तक शरीर में पानी की जरूरत बढ़ जाती है। ऐसे में तरबूज बॉडी के डी - हाइड्रेशन को कम करता है। तरबूज को कभी भी खाने के ऑप्शन के तौर पर न लें क्योंकि इससे पूरे पोषक तत्व नहीं मिलते। तरबूज को दूसरे फलों के साथ नहीं खाना चाहिए क्योंकि इसमें काफी पोटैशियम , प्रोटीन , पानी और फाइबर होता है।

आम 
गर्मियों के दिनों में आम फलों का राजा होता है...लेकिन इसे ज्यादा नहीं खाना चाहिए। बाजार के आमों के मुकाबले...घर में पकाकर आम खाना बेहतर है। घर पर पकाने के लिए आम को अखबार में लपेटकर तीन - चार दिन के लिए छोड़ दें। बाजार से आम खरीदते हैं तो ज्यादा मुमकिन है कि वो हाइड्रोजन सल्फाइड से पकाया गया हो। ऐसे आम की तासीर काफी गरम हो जाती है। आम में विटामिन और मिनरल्स के अलावा कैलरी और शुगर काफी होती हैं। जिन्हें वजन या शुगर की प्रॉब्लम है , उन्हें आम बहुत कम खाना चाहिए। आम खाने के बाद ठंडा दूध या छाछ पीना अच्छा है। इससे आम शरीर में जाकर गर्मी नहीं करता।

बेर और चेरी
गर्मियों में बेर और चेरी भी खूब आते हैं। हर फल में अलग - अलग विटामिन होते हैं , इसलिए थोड़ी - थोड़ी मात्रा में सभी को खाना अच्छा है। जैसे कि बेर में बॉरोन और सल्फर जैसे माइक्रो न्यूट्रिएंट काफी होते हैं। लेकिन जो लोग एसिडिक हैं , उन्हें इन्हें कम ही खाना चाहिए। लीची में शुगर आम से भी ज्यादा होती है। बड़ों की बजाय ये बच्चों के लिए अच्छी है।

अंगूर
डी- हाइड्रेशन होने पर अंगूर से काफी मदद मिलती है। अंगूर फेफड़ों के लिए बहुत अच्छे होते हैं। लो बीपी या लो शुगर वालों को इन्हें खाना चाहिए। खाने और अंगूर खाने के बीच कुछ फासला रखें। इसमें भी शुगर काफी होती है , लिहाजा इन्हें लिमिट में खाएं।

सेब
सेब वैसे तो साल भर आता है और इसे कभी भी खा सकते हैं लेकिन गर्मियों के मुकाबले इसे सर्दियों में खाना बेहतर है। एसिडिटी के शिकार लोगों को सेब कम खाना चाहिए। जो खाना चाहते हैं , वे छिलके समेत नमक के साथ खाएं।

केला

केला की तासीर ठंडी है। इसमें इलेक्ट्रोलाइट्स होते हैं , जो शरीर के सॉल्ट्स को बैलेंस करते हैं। मोटे लोगों और शुगर के मरीजों को केला नहीं खाना चाहिए। 

उफ! ये गर्मी...

रिपोर्ट- विजय कुमार राय
पारा बढ़ रहा है... और इसी के साथ गरमी अपना सितम दिखाने लगी है.. लोग हलकान हैं... ये मंजर गरमियों की शुरूआत का है..जबकि तपती गर्मी का मौसम आना अभी बाकी है। सूरज की किरणें आंगारों की तरह.. लोगों को झुलसा रही हैं... आलम ये है कि सुबह की धूप भी सहन नहीं होती... जबकि दोपहर के वक्त सड़कों पर निकलना... धधकती भट्टी में उतरने जैसा है। मौसम की तल्खी के बीच काम करने की मजबूरी में लोग ना चाहते हुए भी... घरों से निकलने को मजबूर हैं।
कई जगहों पर तो गर्मी ने पुराने रिकॉर्ड भी तोड़ दिए हैं। जबकि आने वाले दिनों में गर्मी और बढ़ने के आसार हैं। मौसम विभाग की मानें तो अभी दिन ब दिन पारा और चढ़ेगा...अभी गर्मी से राहत मिलने की कोई उम्मीद नहीं....आने वाले महीनों में गर्मी और सताएगी।
दिल्ली में गर्मी का प्रकोप बढ़ने लगा है.... दोपहर के वक्त स्कूल से लौटते बच्चे.. तेज धूप औऱ गर्म हवाओं के थपेड़े सहने को मजबूर हैं। दुपहिया वाहनों पर सफर करने वाले लोग मुंह पर कपड़ा बांध कर... चल रह हैं.. वहीं पैदल यात्री छाते का सहारा लेकर... सड़कों पर निकलने की हिम्मत जुटाते हैं... सड़कें आग उगलने लगी हैं... और ट्रैफिक घुटन पैदा कर रहा है। मैदानी इलाकों में लोग गर्मी से बेहाल हैं... जबकि पहाड़ी इलाकों में भी गर्मी का बुरा हाल है। गर्मी के इस मौसम में बिमारियां और संक्रमण का खतरा भी बढ़ने लगा है...
हफ्ते दस दिन के अंतराल पर होने वाली बारिश... मौसम के मिजाज को और ज्यादा बिगाड़ रही है। बारिश की ठंडक और सूरज की गर्मी की कॉकटेल मिल कर... लोगों को बीमार कर रही हैं। साइनस, स्वाइन फ्लू, मलेरिया और वायरल जैसी बीमांरियां जनता को चपेट में ले रही हैं। अस्पतालों में मरीजों की तादाद बढ़ने लगी है। बुखार और नज़ले के मरीजों की संख्या भी बढ़ रही है।
रेलवे स्टेशनों और बस अड्डों पर यात्री गर्मी से परेशान हैं। ठंडे इलाकों से दिल्ली पहुंचे लोग.... गर्मी में बिलख रहे हैं... इंसान ही नहीं जानवरों पर भी गर्मी का असर साफ देखा जा सकता है। ऐसे में पानी और बर्फ और कोल्ड ड्रिंक्स की बिक्री काफी बढ़ गई है।
 देश भर में गर्मी का बुरा हाल है.... चारों तरफ हाहाकार मचा है... चाहे मैदानी इलाकों की बात हो या फिर पहाड़ों की.,... हर तरफ गर्मी अपना असर दिखा रही है। चलिए आपको भी दिखाते देश भर में तपती गर्मी की अलग-अलग तस्वीरें। उत्तराखंड में गर्मी से बुरा हाल है... जो लोग गर्मी से निजात पाने के लिए... मैदानी इलाकों से पहाड़ों की तरफ दौड़ते हैं... वो इन तस्वीरों को जरूर देख लें... क्योंकि इस बार पहाड़ों पर भी गर्मी से राहत मिलने वाली नहीं है। पहाड़ों पर गर्मियों का इतना बुरा हाल है कि...यहां यहां सड़कें तप रही हैं..जो पर्यटक दूर से यहां ठंडक का मज़ा लेने आए थे...उन्हें निराशा झेलनी पड़ रही है... कई नदियां और नहरें सूख चुकी हैं।पहाड़ों की ऊंची चोटियों पर थोड़ी राहत जरूर है... मगर थोड़ा नीचे गर्मी से बचने के लिए... लोग नदियों में नहा रहे हैं... उधर तपती धूम के चलतेग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। जिससे कई नदियों का जलस्तर काफी बढ़ गया है। पंजाब की सर्दी जितना लोगों को ठिठुराती है...उससे कहीं ज्यादा यहां की गर्मी जनता को जला रही है... जी हां पंजाब में गर्मी से इतना बुरा हाल है कि लोग सिर्फ ठंडी चीज़ों को तवज्जो दे रहे हैं... लस्सी और जूस की ब्रिकी बढ़ गई हैं...वहीं सड़कें आग उगल रही हैं... आलम ये है कि पेड़ों के नीचे भी लोगों को राहत नहीं मिल रही...। सूरज की जलाने वाली किरणें मुसाफिरों पर मुसीबत बन कर गिर रही हैं।
ये तस्वीरें हैं हरियाणा के भिवानी की... जहां इन दिनों लू अपना प्रकोप दिखा रही है... गर्मी से तो बचना मुमकिन है..लेकिन लू के थपेड़ों ने लोगों को और बेहाल कर दिया है। स्कूली बच्चों को देख कर तो लगता है कि जैसे... बेचारों को पढ़ाई की सज़ा मिल रही है.. दोपहर के वक्त चिलचिलाती धूप में...स्कूल से निकले बच्चों को घर तक पहुंचना मुश्किल हो जाता है। ये बेचारे रास्ते में रुकते-रुकातेआईस क्रीम,जूस और लस्सी पीते हुए घर पहुंचते हैं। चूंकि तरबूज में पानी की भरपूर मात्रा है..और इसकी गिनती ठंडे फलों में होती है...लिहाजा तरबूज़ की डिमांड भी काफी बढ़ गई है।


गर्मी में झुलसा ओडिशा

गर्मी में बारिश पड़ जाए.. तो मानो लोगों को नई जिंदगी मिल जाती है... लेकिन इस गर्म मौसम में अगर कहीं आग लग जाए...तो जान बचाना भी मुश्किल हो जाए.. लेकिन ओडिशा में गर्मी का क्या हाल है...इसका सबूत है जंगल में लगी ये आग... भीषण गर्मी के चलतेयहां बालीगुड़ाफूलबानी और कंधमाल के जंगलों में आग लग गई...जिससे कितने ही जंगली जीवों के आशियाने और जिंदगियां उजड़ गईं। इंसान तो इंसान जानवर भी इस गर्मी से हार रहे हैं। किसानों की हालत खराब है... फसलें सूख रही हैं,... प्यासी धरती में दरारें पड़ने लगीं हैं... वहीं शहरी आबादी पानी के लिए तरस रही है...लोग पानी की किल्लत से इस कदर जूझ रहे हैं.. कि उन्हें कासों दूर से पानी ढोना पड़ रहा है। कुछ लोग तो नाली का गंदा पानी पीने को मजबूर हैं.... ये तस्वीरें आपको विचलित कर सकती हैं..लेकिन हकीकत यही है..कि मरता क्या नहीं करता... जब प्यास के मारे गला सूखने लगा..तो गंदे पानी को ही अमृत समझ कर पी लिया। सूखे नलों और तालाबों के इर्द-गिर्द सन्नाटा पसरा हुआ है। गर्मी और लू से तड़पते मुसाफिर बीच रास्ते में जूसगन्ने का रस और नारियल पानी का सहारा ले रहे हैं।
आम तौर पर नॉर्थ ईस्ट का तापमान ठंडा रहता है...लेकिन इस बार गर्मियों की मार के आगे...यहां भी लोगों के पसीने छूट रहे हैं... सड़कों पर दोपहर के वक्त सन्नाटा पसरने लगता है.... जिसे देखो वहीं छांव की तरफ दौड़ता नज़र आता है... लोग इस भीषण गर्मी में घरों से निकलने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे। गर्मी की वजह से बाजारों की रौनक फीकी पड़ चुकी है। हर किसी को बारिश की आस है... कि कब मानसून आए...और उन्हें इस जलाती गर्मी से निजात दिलाए। यहां भी लोग चटपटेमसालेदार और तैलीय भोजन को छोड़कर ठंडे खाद्य प्रदार्थों की तरफ ज्यादा भाग रहे हैं। जूसलस्सी और नारियल पानी की यहां भी धड़ल्ले से ब्रिकी हो रही है।
मध्यप्रदेश की गर्मी तो पहले से ही मशहूर है... ठंड के महीनों में भी यहां गर्मी अपना असर दिखाती रहती है...अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं कि इन दिनों में यहां क्या हालत होगी। मध्यप्रदेश और विदर्भ में गर्मी का इतना बुरा हाल है कि लोग... घरों से बाहर निकलने में भी कतरा रहे हैं.. वहीं जो लोग सड़कों पर निकलने की हिम्म्त जुटाते हैं...वो भी पूरे इंतजाम के साथ निकलते हैं। जहां भी नज़र जाती है...वहीं मुंह पर तौलिया.. सिर पर गमछा..और आँखों पर काला चश्मा लगाए लोग दिखाई देते हैं। गर्मी का यहां क्या आलम है...इसका अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते है कि यहां सुबह 10 से 11 बजे के आसपास... तापमान 41 तक पहुंच जाता है।
बिना बारिश मानसून
सूखे की बढ़ी आशंका
इस बार मानसून तो आएगा..लेकिन बारिश नहीं लाएगा... हरियाली की जगह सूखा लाएगा.... रिमझिम फुहारों के बदले...मिलेंगे लू के थपेड़े... जी हां ये बात हम नहीं कह रहे..बल्कि इस बात का खुलासा हुआ है.. मौसम विभाग की एक रिपोर्ट में...रिपोर्ट के मुताबित इस साल मानसून सीज़न में औसत से कम बारिश का अनुमान है। खास तौर पर उत्तर-पश्चिमी और पश्चिमी मध्य इलाकों में...इसका सबसे ज्यादा असर पड़ेगा। प्राइवेट फोरकास्टर स्काइमेट ने जून से लेकर सितंबर तक...सामान्य से कम बारिश होने की 40 फीसदी आशंका जताईहै। वहीं सूखे के आसार 25 फीसदी हैं।
प्रशांत महासागर की सतह पर असामान्य तरीके से उठती गर्म हवाओं यानी अल-नीनो के प्रभाव के चलते इस साल मानसून के दौरान भारत में सामान्य से कम बारिश होगी। जून से सितंबर के बीच कुल 896 मिलीमीटर बारिश होने के आसार हैं। अगस्त को छोड़ पूरे मानसून के दौरान इस बार सामान्य की सिर्फ 34 फीसदी बारिश होने की संभावना है। यह भविष्यवाणी मौसम संबंधी सूचना जारी करने वाली देश की पहली निजी कंपनी स्काईमेट ने की है। स्काइमेट का फोरकास्ट उन इंटरनेशनल एजेंसियों की भविष्यवाणियों से मेल खाता है,जिन्होंने इस बार गर्मी में अल नीनो के चलते बारिश पर असर पड़ने की बात कही है। स्काइमेट ने कहा कि भारत में मानसून लॉन्ग-टर्म एवरेज यानी एलपीए का 94 फीसदी रह सकता हैजिसका मतलब है कि देश में महीनों के दौरान 896 एमएम बारिश होगी। ..इससे कुछ उम्मीद बंधती है।
क्या है 'अल-नीनो' ?
अल-नीनो एक गर्म जलधारा है जो प्रशांत महासागर में पेरू तट के सहारे हर से साल बाद बहना शुरू होती है। ये समुद्र में गर्मी पैदा करती हैजिससे पेरुवियन सागर का तापमान 3.5 डिग्री सेंटीग्रेड तक बढ़ जाता है। ये दुनिया में भीषण तबाही की वजह भी बन सकती है... पिछले दिसंबर में क्रिसमस के करीब इसका पता लगने पर पेरू के मछुआरों ने इसका नामकरण अल-नीनो किया। इस जलधारा के खत्म होने के बाद.... प्रशांत महासागर में उसी जगह ठंडे पानी की धारा प्रवाहित होने लगती हैजिसे ला-नीना कहा जाता है। ला-नीना भी प्रकृति औरं मौसम में बदलाव लाती है।
 
वैज्ञानिक मानते हैं कि अल नीनो समुद्र से जुड़ी एक घटना है जो बारिश के पैटर्न को बिगाड़ देती है। ये प्रशांत महासागर से उभरती है। स्काइमेट के मुताबिक मौसम की मौजूदा स्थितियां 2012 और 1968 जैसी हैंजो अल नीनो के साल थेलेकिन तब भारत में सूखा नहीं पड़ा था। पिछले दशक में 2002, 2004 और 2009 भारत में अल नीनो की वजह से सूखे वाले साल रहे। स्काइमेट का मानना है कि अगस्त में मानसून अच्छा रह सकता है और तब सामान्य से ज्यादा बारिश होने के 70 फीसदी आसार रहेंगे।