Friday, 25 April 2014

नई सरकार, चुनौती अपार

भारत की अर्थव्यवस्था हिचकोले खा रही है.... रुपया डगमगा रहा है.... आधारभूत ढांचे का विकास भी ठहर गया है....सांप्रदायिक हिंसा बड़ा मुद्दा है... कुल मिला कर अगली सरकार के सामने चुनौतियों का पहाड़ है...नई सरकार बनाने वाले गठबंधन को जुलाई तक बजट पेश करना होगा..... बजट के जरिए नई सरकार को ये भी बताना होगा कि वो पिछली सरकार से कैसे अलग है।
आगामी सरकार ऐसे वक्त में सत्ता संभालेगी, जब अर्थव्यवस्था बेहद खराब स्थिति में है.... महंगाई हावी है, रुपये को बार बार डॉलर से लड़ना पड़ता है.... नई नौकरियां पैदा नहीं हो रही हैं, विदेशी निवेशक निवेश करने से घबराने लगे हैं.... कारोबार जगत में निराशा का भाव है.... युवा उद्यमियों के लिए हालात कठोर हैं....बजट पेश करने वाली अगली सरकार को बताना होगा कि वो वित्तीय घाटे को काबू में रखते हुए इन समस्याओं से कैसे निपटेगी।
सुपर पावर जैसी बातें करने वाले भारत में अब भी खेती मौसम और बारिश पर निर्भर है.... बीते कुछ सालों को देखें तो नहरें या खेती के लिए नई परियोजनाएं बहुत ही कम बनीं.... डीजल और बिजली महंगी होने से किसानों से लेकर आम लोगों तक की मुश्किलें जरूर बढ़ीं...लगातार बढ़ रही महंगाई और राजकोषीय घाटा भारत में नई सरकार के लिए बड़ी चुनौती होगी। भारत की विकास दर को लेकर...अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष यानी आईएमएफ ने ये आशंका जताई है।

आईएमएफ के भारत में वरिष्ठ प्रतिनिधि थॉमस जे रिचर्डसन ने देश की नई सरकार के सामने संभावित आर्थिक चुनौतियों के बारे में कहा कि यूं तो भारत की आर्थिक तरक्की को लेकर आईएमएफ को काफी उम्मीदें हैं, लेकिन ऊंची महंगाई दर और राजकोषीय घाटा गंभीर चुनौती बन कर खड़े हैं। उन्होंने कहा कि महंगाई की वजह से सारे समीकरण गड़बड़ा रहे हैं... यही वजह है कि राजकोषीय घाटा कम होने का नाम नहीं ले रहा है।

आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि सरकार किसी भी दल के नेतृत्व में बने... लेकिन उसके सामने आर्थिक विकास को रफ्तार देना सबसे बड़ी चुनौती होगी। ऐसे में देश में मजबूत आर्थिक सुधार के लिए कई ऐसे कदम उठाने होंगे...जो सरकार के लिए आसान नहीं होंगे।


मार्च 2014 को खत्म हुए वित्तीय वर्ष में भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास दर 4.6 फीसदी थी...कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार ने सरकारी खर्च में 13 अरब डॉलर की कटौती की और 16 अरब डॉलर की रियायत दी...लेकिन भविष्य में ऐसी कटौती को जारी रखना मुश्किल होगा... भारत में सरकारी कंपनियां तेल, गैस, खाद और अनाज बाजार दर से कम दाम में बेचती हैं.... इस नुकसान की भरपाई सरकारी खजाने से होती है...नई सरकार को इसके लिए एक ठोस नीति तैयार करनी होगी..ताकि सरकारी खजाना बचा रहे और जनता को उसकी जरूरतों से जुड़ी सभी चीजें... कम दाम में मुहैया कराई जा सकें।

दूसरी तरफ टैक्स से होने वाली आय बढ़ने की उम्मीद कम है... 2007-08 में जीडीपी का 12.5 फीसदी हिस्सा टैक्स से आया..लेकिन बीते साल ये गिर कर 10.2 फीसदी रह गया... नई सरकार के सामने चुनौती होगी कि वो इस हिस्सेदारी को बढ़ाए....नई सरकार के लिए चालू खाते में हो रहे घाटे को भी काबू में रखने की चुनौती होगी... बीते साल चालू खाते में रिकॉर्ड 4.8 फीसदी घाटा दर्ज किया गया. ..इसकी वजह से सोने के आयात पर पाबंदी लगानी पड़ी... अगर नई सरकार सोने पर लगने वाले आयात शुल्क की समीक्षा करती है....तो हो सकता है कि आम लोगों को इससे राहत मिले... लेकिन निवेशकों के लिहाज से ये चिंताजनक हो सकता है... ऐसा करने से चालू खाते का घाटा और बढ़ सकता है.


नई सरकार के सामने अर्थव्यवस्था की रफ्तार बढ़ाने में सबसे बड़ी चुनौती परियोजनाओं की मंजूरी में लगने वाले समय को कम करना होगा। साथ ही परियोजनाओं के दौरान आने वाली अड़चनों को दूर करके ही विकास की रफ्तार को बढ़ाया जा सकेगा...2014-15 के लिए पहली बार किसी अंतरराष्ट्रीय एजेंसी ने 5.5 फीसद आर्थिक विकास दर का अनुमान लगाया है। एडीबी का कहना है कि भले ही अर्थव्यवस्था में सुधार के संकेत दिख रहे हों, लेकिन इसे रफ्तार पकड़ने में अभी वक्त लगेगा। एशियाई विकास बैंक के मुताबिक जब तक अर्थव्यवस्था के रास्ते में आने वाली अड़चनों को दूर नहीं कर लिया जाता, विकास दर में तेजी लाना मुमकिन नहीं होगा। हालांकि 2015-16 में एडीबी ने छह फीसद विकास दर का अनुमान लगाया है।

रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया यानी आरबीआ का मानना है कि 2014-15 में आर्थिक विकास की दर पांच से छह फीसद के बीच रहने का अनुमान है। हालांकि साढ़े पांच फीसद के इस अनुमान में भी कमी आने की आशंका बरकरार है। मतलब साफ है कि चाहे जो भी सरकार बने...उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती विकास दर को बढ़ाने की होगी...लेकिन विकास दर को बढ़ाने के लिए जो भी रास्ता अपनाया जाए...वो आर्थिक बाधाओं और कमजोर प्लानिंग की वजह से...काफी मुश्किल भरा होगा।

चुनौती नंबर-1
जीएसटी को लागू करना
गुड्य एंड सर्विस टेक्स यानी जीएसटी को आर्थिक विकास के लिए बेहद अहम माना जा रहा है। इससे आर्थिक विकास दर यानी जीडीपी में दो फीसदी की तेजी आ सकती है। इससे राज्य और केन्द्र सरकारों के टैक्स में समानता भी आएगी।
चुनौती नंबर-2
रिजर्व बैंक नियमों में बदलाव
रिजर्व बैंक की एक समिति ने मौद्रिक नीति में खुदरा महंगाई को आधार बनाने की सलाह दी है...साथ ही मौद्रिक नीति के लिए समिति बनाने का सुझाव दिया है..जिससे गवर्नर अकेले फैसला नहीं ले सकेंगे। इसके लिए रिजर्व बैंक अधिनियम में सुधार करना होगा।
चुनौती नंबर-3
निजीकरण पर जोर
सरकार को राजस्व जुटाने और बढ़ते राजकोषीय घाटे पर काबू पाने के लिए सार्वजनिक कंपनियों में अपनी हिस्सेदारी बेचने की योजना तेज करनी होगी। घरेलू स्टॉक मार्केट में तेजी के इस दौर में ये ज्यादा फायदेमंद साबित होगा।
चुनौती नंबर-4
सब्सिडी का बोझ
देश की जीडीपी का 2.2 फीसदी के बराबर केवल सब्सिडी पर खर्च होता है.. 2013-14 में अनाज, खाद और तेल पर सब्सिडी करीब 2.5 लाख करोड़ रुपये रहने का अनुमान है। नई सरकार को इसे कम करने के उपाय करने होंगे।
चुनौती नंबर-5
श्रम सुधार
कंपनियां लचीला श्रम कानून चाहती हैं। इससे अनुबंध पर दी जाने वाली नौकरियां बढ़ेंगी लेकिन इसके लिए कर्मचारी, कंपनी और मजदूर संगठनों को तैयार करना आसान नहीं होगा।
चुनौती नंबर-6
रक्षा क्षेत्र में निवेश
भारत दुनिया का सबसे बड़ा हथियार आयात करने वाला देश है और इस क्षेत्र में विदेशी निवेश की सीमा 26 फीसदी है। आयात का बोझ घटाने, हथियारों को आधुनिक बनाने और जवानों को बेहतर प्रशिक्षण देने के लिए..इसमें विदेशी निवेश की सीमा बढ़ानी होगी।
चुनौती नंबर-7
बीमा क्षेत्र में सुधार
बीमा क्षेत्र में विदेशी निवेश 26 फीसदी से बढ़ा कर 49 फीसदी करने के प्रस्ताव को अमल में लाना आसान काम नहीं है। लेकिन 45 अरब डॉलर के बीमा क्षेत्र के लिए इसे महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इसे लेकर सरकार को विरोध का सामना करना पड़ सकता है।
चुनौती नंबर-8
मुश्किल में सरकारी बैंक
आर्थिक रफ्तार सुस्त पड़ने, उंची ब्याज दर और परियोजनाओं में देरी की वजह से सरकारी बैंकों का एनपीए बढ़ता जा रहा है...आपको बता दें कि एनपीए वसूल न हो पाने वाले कर्ज को कहा जाता है। अंतरिम बजट में सरकार ने बैंकों को 11,200 करोड़ रुपये दिए लेकिन इस मामले में और ज्यादा मदद की जरूरत है।
चुनौती नंबर-9
कोयला क्षेत्र पर ध्यान
कोयला क्षेत्र में सुधार से देश का व्यापार घाटा कम होगा और बिजली परियोजनाओं में भी तेजी आएगी। कोयला क्षेत्र में भ्रष्टाचार सबसे बड़ी समस्या है। देश में कोयले का पर्याप्त भंडार होने के बावजूद बड़ी मात्रा में कोयला आयात करना पड़ता है।
चुनौती नंबर-10
बिजली की दुर्दशा

देश में अभी भी कई गांव ऐसे हैं...जिनमें अभी तक बिजली नहीं पहुंच पाई है..... वहीं ज्यादातर गांवों में 8 से 10 घंटे की पावर सप्लाई है.. जिससे खेती और घरेलू उद्योग बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं। बहुत से शहरों का भी यही हाल है....सरकार के लिए शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में पर्याप्त बिजली सप्लाई कर पाना भी किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं।


नई सरकार के लिए सत्ता का सिंघासन....कांटो भरे ताज से कम नहीं। घोषणाओं को पूरा करने से लेकर लक्ष्यों को हासिल करने तक पहाड़ जैसी चुनौतियां मुंह बाए खड़ी हैं। वादों को निभाने के लिए पैसे की व्यवस्था और देश को विकास की राह पर दौड़ाने के लिए नए रास्ते तलाशने होंगे। जो भी पार्टी सत्ता में आएगी..उसे किसानों, मजदूरों और गरीब तबके के लोगों के लिए भी गंभीर कदम उठाने होंगे... इसके अलावा नक्सलवाद और आंतकवाद को मुंह तोड़ जवाब देने के लिए... सख्त कदम उठाने होंगे...मरी हुई स्वास्थ्य सेवा में जान फूंकनी होगी और शिक्षा के क्षेत्र में भी नए आयाम कायम करने होंगे।

1991 के बाद से भारत की तमाम सरकारों ने सुधार की प्रक्रिया जारी रखी, किंतु धीमी रफ्तार से। और इस धीमी रफ्तार के बावजूद भारत विश्व की दूसरी सबसे तेजी से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था बन गया। पूरी दुनिया भारत की तरक्की से परेशान होने लगी.... क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय मंदी के दौर से भी हमारा देश काफी हद तक बच निकलने में कामयाब रहा...मंदी के उस मुश्किल दौर में भी देश की अर्थव्यवस्था नौ प्रतिशत की दर से बढ़ रही थी....जब दुनिया भर में बेरोजगारी से हाहाकार मच रहा था...तब भारत में. रोजगार के नए अवसर पैदा हो रहे थे...और लाखों लोग गरीबी के चंगुल से बाहर निकल रहे थे। लेकिन कुछ साल पहले...यूपीए सरकार की कुछ नीतियों ने अर्थव्यवस्था पर ऐसा प्रहार किया...कि विकास की रफ्तर पर ब्रेक लगता चला गया...आज देश की अर्थव्यवस्था किस दौर से गुज़र रही है शायद बताने की जरूरत नहीं।

क्यों बिगड़ी अर्थव्यवस्था ?
कैसे रुकी विकास की रफ्तार ?

यूपीए सरकार के दूसरे कार्यकाल में लगातार आर्थिक मुश्किलें बढ़ती गईं....इसके पीछे ठोस कारण हैं...दरअसल  2008-09 के दौरान 15वीं लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखकर यूपीए ने सब्सिडी पर जमकर खर्च किया। मनरेगा जैसी योजनाओं पर भी खर्च में भारी बढ़ोतरी की गई। राजकोषीय और राजस्व घाटे का स्तर बढ़ा, महंगाई और प्रमुख ब्याज दरें ऊंची बनी रहीं। दूरसंचार, खनन, भूमि अधिग्रहण आदि क्षेत्रों में अनिर्णय और भ्रष्टाचार ने अर्थव्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित किया। नई बिजली उत्पादन परियोजनाओं में निवेश का मामला चिंताजनक हो गया। ईंधन कीमतें निर्धारित करने वाली नीति में कमियां नजर आईं, जिससे हजारों मेगावाट बिजली उत्पादन क्षमता ठप हो गई। 2जी आवंटन घोटाला, लौह अयस्क और कोयला खान वितरण घोटाला आगे भी अर्थव्यवस्था में तेजी लाने की राह में कई तरीकों से रोड़ों की भूमिका निभाते रहेंगे।
यूपीए-2 के दौरान विदेश व्यापार की रफ्तार थमी, चालू खाता घाटे में खतरनाक ढंग से इजाफा हुआ और मुद्रा का जबर्दस्त अवमूल्यन देखने को मिला। युवा आबादी के लिए रोजगार के अवसर कम होने लगे। बैंकिंग क्षेत्र में फंसे हुए कर्ज की मात्रा बढ़ जाने से सरकारी बैंकों की वित्तीय स्थिरता पर बुरा असर पड़ा। कृषि क्षेत्र और छोटे किसानों पर भी पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा सका। भारत में खेती पर निर्भर आबादी दुनिया में सबसे अधिक तेज गति से बढ़ी, लेकिन इस क्षेत्र में लोगों की आय बढ़ने के बजाय घट गई।

कैसे हो सुधार ?

देश में आर्थिक सुधारों से भी कहीं ज्यादा जरूरी प्रशासनिक, न्यायिक और पुलिस सुधार हैं। फौरन फैसले लेने, उन्हें पूरा करने, कानून का शासन लागू करने, भ्रष्टाचारियों को सज़ा दिलाने और सरकार को लोगों के प्रति जवाबदेह बनाने के लिए... एक मजबूत सरकार की जरूरत है। देश की उन्नति युवा शक्ति पर टिकी है, फिलहाल देश में युवाओं की संख्या कुल आबादी की एक-तिहाई है....अनुमान है कि आने वाले दशक में ये बढ़कर आधे हो जाएंगे। युवा वर्ग भी इस बात से हैरान-परेशान हैं कि जो देश उन्हें धार्मिक और राजनीतिक स्वतंत्रता देता है... आखिर वो उन्हें आर्थिक स्वतंत्रता दे पाने में नाकाम साबित क्यों हो रहा है।


Thursday, 3 April 2014

नरेन्द्र मोदी


`अच्छा क्या है और बुरा क्या है उसे मतदाता भली-भांति समझता है। जब भी स्वतंत्र रूप से निर्णय करने का अवसर आता है, वह सभी चीजों को ध्यान में रखकर निर्णय करता है।`  भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने यह वक्तव्य दिसंबर 2012 में तब दिए थे जब उन्होंने तीसरी बार गुजरात की सत्ता संभाली थी। शायद मोदी को तभी भान हो गया था कि अब उन्हें मिशन-2014 के लिए राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस जैसी पार्टी से मुकाबला करने के लिए निकलना होगा। अनुमान सही निकला और फिर भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर नरेंद्र मोदी निकल पड़े कांग्रेस मुक्त भारत के राष्ट्रीय मिशन पर।

किसी जमाने में अपने बड़े भाई के साथ चाय की दुकान चलाने वाले नरेन्द्र भाई मोदी का जन्म दामोदरदास मूलचन्द मोदी व उनकी पत्नी हीराबेन मोदी के बेहद साधारण परिवार में उत्तरी गुजरात के मेहसाणा जिले के गांव वड़नगर में 17 सितंबर, 1950 को हुआ था। अपने माता-पिता की कुल छह सन्तानों में तीसरे नरेंद्र दामोदर दास मोदी खानपान से विशुद्ध शाकाहारी हैं। 



कहते हैं कि 1965 के भारत-पाक युद्ध के दौरान नरेंद्र मोदी ने एक किशोर स्वयंसेवक के रूप में रेलवे स्टेशनों पर सैनिकों की खूब आवभगत की। युवावस्था में ही वे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की भ्रष्टाचार विरोधी अभियान में सक्रिय भूमिका निभाई और तत्पश्चात वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्णकालिक प्रचारक बन गए। बाद में उन्हें संगठन की दृष्टि से भारतीय जनता पार्टी में संघ के प्रतिनिधि के रूप में भेजा गया। वड़नगर से स्कूली शिक्षा लेने के बाद गुजरात विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर की उपाधि हासिल की। नरेन्द्र जब विश्वविद्यालय के छात्र थे तभी से वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा में नियमित रूप से जाने लगे थे। इस प्रकार उनका जीवन संघ के एक निष्ठावान प्रचारक के रूप में शुरू हुआ। गुजरात में शंकर सिंह वघेला का जनाधार मजबूत बनाने में नरेन्द्र मोदी की रणनीति को आज भी सराहा जाता है।

अप्रैल 1990 में जब केन्द्र में मिली जुली सरकारों का दौर शुरू हुआ, मोदी की मेहनत रंग लाई और गुजरात में 1995 के विधान सभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी ने अपने बलबूते दो तिहाई बहुमत प्राप्त कर सरकार बना ली। इसी दौरान दो राष्ट्रीय घटनाएं इस देश में घटीं। पहली घटना थी सोमनाथ से लेकर अयोध्या तक की रथ यात्रा जिसमें लाल कृष्ण आडवाणी के प्रमुख सारथी की भूमिका में नरेन्द्र मोदी का मुख्य सहयोग रहा। इसी प्रकार की दूसरी रथ यात्रा कन्याकुमारी से लेकर सुदूर उत्तर में स्थित कश्मीर तक की नरेन्द्र मोदी की ही देखरेख में आयोजित हुई। इन दोनों यात्राओं ने मोदी का राजनीतिक कद काफी ऊंचा कर दिया जिससे चिढ़कर शंकर सिंह वघेला ने पार्टी से त्यागपत्र दे दिया। तब केशुभाई पटेल को गुजरात का मुख्यमन्त्री बनाया गया और नरेन्द्र मोदी को दिल्ली बुलाकर भाजपा संगठन केन्द्रीय मन्त्री का दायित्व सौंपा गया।




1995 में राष्ट्रीय मन्त्री के नाते उन्हें पांच प्रमुख राज्यों में पार्टी संगठन का काम दिया गया जिसे उन्होंने बखूबी निभाया। 1998 में उन्हें पदोन्नत कर राष्ट्रीय महामन्त्री (संगठन) का उत्तरदायित्व सौंपा गया। इस पद पर वे अक्तूबर 2001 तक काम करते रहे। भाजपा ने अक्तूबर 2001 में केशुभाई पटेल को हटाकर गुजरात के मुख्यमन्त्री पद की कमान नरेन्द्र मोदी को सौंप दी। नरेन्द्र मोदी अपनी विशिष्ट जीवन शैली के लिए राजनीतिक हलकों में जाने जाते हैं। उनके व्यक्तिगत स्टाफ में केवल तीन ही लोग रहते हैं। कोई भारी भरकम अमला नहीं होता। नरेंद्र मोदी एक लोकप्रिय वक्ता हैं जिन्हें सुनने के लिए बहुत भारी संख्या में श्रोता आज पहुंच रहे हैं। 

गुजरात के मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए नरेंद्र मोदी ने पार्टी और अपने राज्य में बहुत लोकप्रियता हासिल कर ली। उन्हें एक प्रगतिशील नेता के रूप में पहचान भी मिली। जिस समय नरेंद्र मोदी को गुजरात का प्रभार सौंपा गया था, उस समय गुजरात आर्थिक और सामाजिक दोनों ही क्षेत्र में बहुत पिछड़ा हुआ था। नरेंद्र मोदी के प्रयासों से गुजरात ने उनके पहले कार्यकाल के दौरान ही सकल घरेलू उत्पाद में 10 प्रतिशत तक की बढ़ोत्तरी दर्ज की जो अपने आप में एक रिकॉर्ड है। गुजरात के एकीकृत विकास के लिए नरेंद्र मोदी ने कई योजनाएं लागू की जिसमें पंचामृत योजना सबसे प्रमुख है।

जल संसाधनों का एक ग्रिड बनाने के लिए नरेंद्र मोदी ने `सुजलाम सुफलाम` नामक योजना का भी संचालन किया जो जल संरक्षण के क्षेत्र में बहुत प्रभावी सिद्ध हुई है। कृषि महोत्सव, बेटी बचाओ योजना, ज्योतिग्राम योजना, कर्मयोगी अभियान, चिरंजीवी योजना जैसी विभिन्न योजनाओं को भी नरेंद्र मोदी ने लागू किया। 

2009 में एफडीआई पत्रिका ने सभी एशियाई देशों में से नरेंद्र मोदी को एफडीआई पर्सनैलिटी का खिताब प्रदान किया। वाइब्रेंट गुजरात ग्लोबल समिट के दौरान अनिल अंबानी ने नरेंद्र मोदी को भारत के अगले नेता के रूप में संबोधित किया। गुजरात में आए भूकंप में राहत कार्य और आपदा प्रबंधन के सफल प्रयासों के लिए संयुक्त राष्ट्र द्वारा नरेंद्र मोदी को योग्यता पत्र प्रदान किया गया।

नरेंद्र मोदी पर गुजरात दंगों में शामिल होने का आरोप है। जब तब उन्हें हिंदू-मुस्लिमों की आपसी भावनाओं को भड़काने और दंगों में प्रभावी कदम ना उठाने जैसे कई आरोपों का सामना करना पड़ता है। 27 फरवरी 2002 को अयोध्या से गुजरात वापस लौट कर आ रहे हिन्दू तीर्थयात्रियों को गोधरा स्टेशन पर खड़ी ट्रेन में मुस्लिमों द्वारा आग लगाकर जिन्दा जला दिया गया। इस हादसे में 59 स्वयंसेवक भी मारे गये। रोंगटे खड़े कर देने वाली इस घटना की प्रतिक्रिया स्वरूप समूचे गुजरात में हिन्दू मुस्लिम दंगे भड़क उठे। मरने वाले लोगों में अधिकांश संख्या मुस्लिमों की थी। इसके लिए न्यूयॉर्क टाइम्स ने मोदी प्रशासन को जिम्मेवार ठहराया था। कांग्रेस सहित अनेक विपक्षी दलों ने नरेन्द्र मोदी के इस्तीफे की मांग की। 

मोदी ने गुजरात की 10वीं विधान सभा भंग करने की संस्तुति करते हुए राज्यपाल को अपना त्यागपत्र सौंप दिया। राज्य में दोबारा चुनाव हुए जिसमें भाजपा ने मोदी के नेतृत्व में विधान सभा की कुल 182 सीटों में से 127 सीटों पर जीत हासिल की। 


2007 में सोनिया के मौत के सौदागर वाले बयान को गुजरात की अस्मिता का सवाल बनाकर नरेंद्र मोदी ने वोटों की अच्छी फसल काटी और 49 प्रतिशत वोटों के साथ 117 सीटों पर जीत दर्ज कर एक बार फिर गुजरात में भाजपा की पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई। अप्रैल 2009 में सुप्रीम कोर्ट ने विशेष जांच दल भेजकर यह जानना चाहा कि कहीं गुजरात के दंगों में नरेन्द्र मोदी की साजिश तो नहीं। यह विशेष जांच दल दंगे में मारे गए कांग्रेसी सांसद ऐहसान ज़ाफ़री की विधवा जकिया जाफरी की शिकायत पर भेजा गया था। 

दिसम्बर 2010 में सुप्रीम कोर्ट ने एसआईटी की रिपोर्ट पर यह फैसला सुनाया कि इन दंगों में नरेन्द्र मोदी के खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं मिला है। आज नरेंद्र मोदी गुजरात में सत्ता का हैट्रिक बनाने के बाद देश के भावी प्रधानमंत्री की तरफ अपना कदम बढ़ा चुके हैं।