Wednesday, 19 March 2014

एक कविता वाया व्हाट्स अप

सुख का दुःख

जिन्दगी में कोई बड़ा सुख नहीं है, 
इस बात का मुझे बड़ा दु:ख नहीं है, 
क्योंकि मैं छोटा आदमी हूँ, 
बड़े सुख आ जाएं घर में 
तो कोई ऎसा कमरा नहीं है जिसमें उसे टिका दूं। 

यहां एक बात 
इससॆ भी बड़ी दर्दनाक बात यह है कि, 
बड़े सुखों को देखकर 
मेरे बच्चे सहम जाते हैं, 
मैंने बड़ी कोशिश की है उन्हें 
सिखा दूं कि सुख कोई डरने की चीज नहीं है। 

मगर नहीं 
मैंने देखा है कि जब कभी 
कोई बड़ा सुख उन्हें मिल गया है रास्ते में 
बाजार में या किसी के घर, 
तो उनकी आँखों में खुशी की झलक तो आई है, 
किंतु साथ साथ डर भी आ गया है। 

बल्कि कहना चाहिये 
खुशी झलकी है, डर छा गया है, 
उनका उठना उनका बैठना 
कुछ भी स्वाभाविक नहीं रह पाता, 
और मुझे इतना दु:ख होता है देख कर 
कि मैं उनसे कुछ कह नहीं पाता। 

मैं उनसे कहना चाहता हूँ कि बेटा यह सुख है, 
इससे डरो मत बल्कि बेफिक्री से बढ़ कर इसे छू लो। 
इस झूले के पेंग निराले हैं 
बेशक इस पर झूलो, 
मगर मेरे बच्चे आगे नहीं बढ़ते 
खड़े खड़े ताकते हैं, 
अगर कुछ सोचकर मैं उनको उसकी तरफ ढकेलता हूँ। 

तो चीख मार कर भागते हैं, 
बड़े बड़े सुखों की इच्छा 
इसीलिये मैंने जाने कब से छोड़ दी है, 
कभी एक गगरी उन्हें जमा करने के लिये लाया था 
अब मैंने उन्हें फोड़ दी है। 

मोदी मतलब बीजेपी बीजेपी मतलब मोदी

क्या सचमुच बीजेपी कम सीटें आने पर नरेंद्र मोदी को पीछे कर देगी । यह चर्चा मैं तब से सुन रहा हूँ जबसे मोदी ने अपनी दावेदारी की पेशकश की । मोदी तब से अपने भाषणों में कह रहे हैं कि मुझे प्रधानमंत्री बनाओ । कभी प्रधानमंत्री के पद को सेवक कहा तो कभी चौकीदार । ग़नीमत है अगर यही बात मनमोहन सिंह ने कहीं होती तो बीजेपी या मोदी आरोप लगा रहे होते कि प्रधानमंत्री पद की गरिमा की ये हालत कर दी है कांग्रेस में । मोदी प्रधानमंत्री पद को सीईओ कहें या सेनापति कहें या मज़बूत नेतृत्व लेकिन बीजेपी के लिए प्रधानमंत्री का मतलब सिर्फ और सिर्फ मोदी हैं । 

इस चुनाव में जो भी जनता बीजेपी को वोट देगी या दे रही है वो मोदी को दे रही है । बीजेपी भी  वोट मोदी के नाम पर माँग रही है । बीजेपी के एजेंडे का कम गुजरात के काम काज का विज्ञापन ही टीवी में आ रहा है । अलग अलग राज्यों के अख़बारों में गुजरात का ही विज्ञापन छप रहा है । मोदी के भाषणों का कई भाषाओं में अनुवाद हो रहा है और डबिंग हो रही है । राजनाथ सिंह या आडवाणी के भाषणों की नहीं हो रही है । दो साल से बीजेपी का मतलब मोदी है । यह बात आर एस एस को भी मालूम है । संघ ने जानबूझ कर अनुमति दी या सत्ता के लिए बर्दाश्त किया, इस पर अटकलें लगाई जा सकती हैं । संघ के लिए भी मोदी हैं । ( अगर कहा हो तो क्योंकि खंडन हो गया है) हमारी प्राथमिकता किसे लाना है नहीं है बल्कि इस सरकार को हटाना है । सिर्फ इतना कह देने से संघ मोदी का विरोधी हो गया अजीब है । जिसने मोदी को मनोनित किया है उसकी ये बात मोदी के लिए नहीं तो किसके लिए है ।
हर हर मोदी घर घर मोदी का नारा तो कब से चल रहा है । रैलियों में मोदी मोदी का नारा लगवाया जाता है । पूर्णिया रैली में मंच पर भीमकाय फोंट में लिखा था- हर हर मोदी । हर हर गंगे और ऊँ नमो शिवा़य पर भी अब मोदी क़ायम हो चुके हैं । दिल्ली शहर में चारों तरफ़ मोदी के नए होर्डिंग लगे हैं । बड़ी सी होर्डिंग में सिर्फ मोदी का चेहरा है । नारा लिखा है अबकी बार मोदी सरकार । बीजेपी सरकार भी नहीं । मोदी सरकार । बीजेपी का चुनाव चिन्ह होर्डिंग के एक कोने में हैं । जिसके नीचे छोटे फोंट में लिखा है भाजपा को वोट दें । 


क्या आपको लगता है कि मोदी के नाम पर बीजेपी चुनाव लड़े और मोदी को ही प्रधानमंत्री न बनाए । ऐसे ख़्वाब देखने वाले नेताओं को आम आदमी पार्टी में चले जाना चाहिए या फिर ऐसी ख़बरों में यक़ीन करने वाले रिपोर्टरों को उन नेताओं के जनसंपर्क का काम संभाल लेना चाहिए जिनसे ऐसी ख़बरों की लीड मिलती हैं । आज टाइम्स आफ़ इंडिया में ख़बर छपी है कि मधु किश्वर ने ट्वीट किया है कि बीजेपी के नेता पार्टी को हरवा रहे हैं । उनका प्रयास है कि बीजेपी 160 सीटों तक सिमट जायें और मोदी की जगह राजनाथ या आडवाणी प्रधानमंत्री बन जायें । मधु ने इसे 160 क्लब का नाम दिया है । 


जिस मोदी का चयन आर एस एस ने किया है क्या उसके पास ऐसा करने का विकल्प होगा । तब क्या बीजेपी के सत्ता संघर्ष में आर एस एस एक बाॅस की जगह पार्टी नहीं बन जाएगा । बीजेपी के जो कार्यकर्ता संघ में निष्ठा रखते हैं क्या वे संघ को साज़िशकर्ता के रूप में नहीं देखेंगे । कार्यकर्ताओं को ही जो सदमा लगेगा उसकी कल्पना कोई नहीं कर सकता । फिर क्या ये बीजेपी को वोट देने वालों से छल नहीं होगा । किस मुँह से बीजेपी आगे के चुनावों में अपना प्रधानमंत्री का दावेदार लेकर जाएगी । पब्लिक और विरोधी सब कहेंगे कि असली वाला बताओ । हालाँकि ऐसा होगा नहीं पर एक पल के लिए मान लीजिये कि बीजेपी को एक सौ साठ सीटें नहीं आईं । तब क्या ये बीजेपी की जीत होगी ? क्या ये मोदी और बीजेपी की हार नहीं होगी । 2009 में बीजेपी को 112 सीटें मिली थीं । क्या 48 सीटें ज़्यादा जीतकर बीजेपी विजयी होने का दावा कर सकती है । फिर मोदी लहर का क्या होगा और अगर बीजेपी को एक सौ साठ सीटें आईं तो इसका मतलब है कि क्षेत्रीय दलों की संख्या ज़्यादा होगी । कांग्रेस भी उतनी कमज़ोर नहीं होगी । क्या ये दल सिर्फ मोदी को माइनस कर बीजेपी के किसी भी नेता के साथ आ जायेंगे । इतना आसान होता तो हर बार गठबंधन की सरकार बीजेपी की ही बनती ।

राजनीति को एक तरफ़ से नहीं देखना चाहिए । मोदी की सरकार नहीं बनेगी तो पूरी संभावना है कि बीजेपी की सरकार नहीं बनेगी । सब कुछ कुंडली देखकर तय नहीं होता । ग़ाज़ियाबाद में एक पत्रकार मित्र से पूछा कि राजनाथ की क्या स्थिति है तो उन्होंने कहा कि इस बार नब्बे हज़ार से भी ज़्यादा वोटों से जीतेंगे । ग़ाज़ियाबाद ठाकुर बहुल क्षेत्र हैं । यहाँ ठाकुरों के गाँवों की एक पूरी पट्टी है जिसे साठा चौरासी कहते हैं । जहाँ तोमर और सिसोदिया राजपूतों का वर्चस्व है । इन गाँवों में लोग मानते हैं कि इस बार मोदी की वजह से बीजेपी बड़े दल के रूप में उभरेगी और राजनाथ प्रधानमंत्री होंगे । यही राजनीति है । जिस धारणा का मज़ाक़ उड़ाने के लिए मैं यह लेख लिख रहा था और यक़ीन मानिये आख़िरी दो पैरा लिखने से पहले उस पत्रकार को फ़ोन किया तो उसकी बातों से वही आवाज़ सुनाई दी । राजनाथ इस बार ज़्यादा मतों से जीतेंगे । कमाल है । 

फिर भी मैं मानता हूँ कि अगर ऐसा हुआ तो बीजेपी टूट जाएगी । पूरे साल अकेले घूम घूम कर इतनी मेहनत करने वाले मोदी को धकियाना अब मुमकिन नहीं है । मधु किश्वर मोदी के प्रति अपनी निष्ठा के प्रदर्शन में भले ही बचकानी असुरक्षा ज़ाहिर कर रही हों मगर दम नहीं है । उन्हें मोदी सरकार में ही जगह की तैयारी शुरू कर देनी चाहिए और ख़ुश रहना चाहिए कि उनके मोदी जी के साथ ऐसा कुछ नहीं होने जा रहा है । टू लेट । या तो बीजेपी जीतेगी या हार जाएगी । बीजेपी के भीतर मोदी नहीं हारने वाले । पिछले एक साल में आम आदमी पार्टी के समर्थकों के अलावा मुझे एक भी ऐसा आदमी या औरत या युवा नहीं मिला है जिसने कहा हो कि वो मोदी को वोट नहीं करेगा । इन्हीं में से एक ने भी ये नहीं कहा कि वे मोदी को नहीं बीजेपी को वोट दे रहे हैं । अत: राजनीति और जीवन में सब कुछ तात्कालिक होते हुए भी औकात बोध का ध्यान रखना चाहिए । जोशी जी और टंडन जी की नाराज़गी में इतना ही दम है तो ये दोनों अपनी बगल की सीट पर बीजेपी को जीता दें । प्लीज़ अब ये वाली बकवास बंद कर दीजिये ।

सेकुलर भगदड़

नरेंद्र मोदी के पक्ष में लहर है या नहीं इस पर अनेक मत हो सकते हैं मगर इस पर कोई दो मत नहीं हो सकता कि इस चुनाव में सेकुलर भगदड़ है । सेकुलर विचारधारा के नाम पर बीजेपी का विरोध करने वाली पार्टियों की प्राथमिकता नरेंद्र मोदी को हराना नहीं है । ये सभी दल इस चुनाव में एक दूसरे को हराने में लगी हुई हैं । गणित का कोई मास्टर इस बात को एक लाइन में कह देगा । समाजवादी सेकुलर भगदड़ बराबर मोदी लहर ।


मोदी लहर है या नहीं मगर मोदी का लक्ष्य साफ़ है । कांग्रेस के साथ समाजवादी सेकुलर दलों को साफ़ कर देना । समाजवादी सेकुलर दलों का लक्ष्य भी एकदम साफ़ है । कांग्रेस को साफ़ करते हुए एक दूसरे को साफ़ कर देना । एक तरह से समाजवादी सेकुलर दल नरेंद्र मोदी की मदद करने में लगे हैं । नरेंद्र मोदी की नैतिक और रणनीतिक विजय यही है कि उन्होंने साल भर पहले से कांग्रेस पर धुआँधार हमले शुरू कर दिये थे । ये हालत कर दी कि आर जो डी को छोड़ कोई समाजवादी सेकुलर दल कांग्रेस के क़रीब जाने का साहस नहीं कर पाया । इनमें से कौन कितना सेकुलर है इस पर भी बहस है ।

बीजेपी या मोदी विरोधी मोर्चा इतना बिखर गया कि वो तब भी नहीं खड़ा हो सका जब मोदी ने आरोपी, परिवारवादी और जातिवादी नेताओं दलों को मिलाना शुरू कर दिया ।  यहाँ तक राज ठाकरे से रणनीतिक समझौता करने से शिवसेना ही ज़्यादा बौखलाई हुई है । सपा,बसपा, लोजपा, राजद, जदयू चुप हैं । लेफ़्ट की भूमिका भी साफ़ नहीं है बल्कि बेहद लचर है । कांग्रेस हटाओ और बीजेपी हराओ का नारा भ्रामक है । एक साथ दो राष्ट्रीय दलों को आप इस तरह के नारे से हरा नहीं सकते । ऐसे भ्रामक स्लोगन से आप बाज़ार में गंजी नहीं बेच सकते । कांग्रेस को हटा और बीजेपी को हराकर किसे लाओ ये कोई भी जानना चाहेगा ।

इसका नतीजा यह हुआ कि राष्ट्रीय चुनाव में ये दल बिना लक्ष्य के नज़र आने लगे । नीतीश लालू को भी हराने में लगे हैं और लालू नीतीश को भी । पासवान ये खेल छोड़ अपनी गोटी मोदी से सेट कर चुके हैं । यूपी में सपा बसपा और कांग्रेस के अलग लड़ने और कांग्रेस विरोधी लहर के कारण बीजेपी की बढ़त बताई जाने लगी है । सेकुलर भगदड़ या बिखराव बीजेपी की जीत के लिए लाल क़ालीन बिछा रहा है । जनता के सामने साफ़ नहीं है कि ये दल किस मक़सद से लड़ रहे हैं । ममता, मुलायम और मायावती तीनों पर बीजेपी को बाहर से समर्थन देने का शक किया जाता है ।

नरेंद्र मोदी जीतने के लिए लड़ रहे हैं । एक साल से घूम घूम कर रैलियाँ कर रहे हैं । इसके पीछे संसाधन, प्रचार और प्रोपेगैंडा को लेकर बहस हो रही है मगर इसमें क्या शक कि वे लगातार काम कर रहे हैं । उन जगहों पर रैलियाँ कर रहे हैं जहाँ उन्हें कोई नहीं जानता । बीजेपी के सभी मुख्यमंत्री लड़ रहे हैं । आर एस एस भी कांग्रेस के हटाने का लक्ष्य लेकर मोदी की खुल कर मदद कर रहा है । नीतीश को छोड़ विरोधी किसी ने मोदी के भाषणों को सुनकर जवाब नहीं दिया है । इलाहाबाद की रैली में मुलायम ज़रूर तैयारी करके आए थे। लालू और मायावती अभी भी पुरानी बातें कर रहे हैं । कांग्रेस के जवाब से नहीं लगता कि उनका कोई नेता मोदी के भाषण को सुनता भी है ।

इस चुनाव में जीत के बाद मेरी मोदी से एक ही अपील है कि वे इन तमाम समाजवादी सेकुलर दलों को शुक्रिया ज़रूर कहें और ज़्यादा नहीं तो एक गुलाब का फूल भिजवा दें । जिनकी वजह से जीतेंगे उनके लिए इतना तो बनता है ।

मेरी बात

हर वक्त कई चीज़ें करने का मन करता है। शौक-ए-दीदार अगर है तो नज़र पैदा कर। स्कूल की मिट चुकी तमाम स्मृतियों में से एक यही लाइन बची रह गई। बाकी आज तक नहीं समझ पाया कि दस बारह सालों तक स्कूल क्यों गया? इस सवाल का जवाब अभी तक नहीं मिला। ज़ाहिर है जब मैं लिखूंगा तो वो मेरे ही व्यक्तिगत विचार कहलायेंगे किसी संस्थान के नहीं। विचारों की मॉनिटरिंग करने वाले संस्थानों से मुझे कोई सहानुभूति भी नहीं। मेरी कोई भी रचना कालजयी नहीं मानी जाए। न ही पत्रकारिता या साहित्य में योगदान के रूप में देखी जाए। मैं हिन्दी पट्टी में इन दोनों भूमिकाओं के निभाने के दायित्व से खुद को मुक्त कर चुका हूं। भारत के संविधान के तहत। कस्बा ने कई रिश्तेदारियां दी हैं। कमेंटबाज़ मेरे घर के सदस्य लगते हैं। ब्लॉग हम सब का एक मेंटल ब्लॉक है जिसके प्रखंड विकास पदाधिकारी भी हमी हैं। आमीन।

Friday, 7 March 2014

इससे खूबसूरत पश्चाताप और कोई नहीं …

शब्दों की यात्रा में, शब्दों के अनगिनत यात्री मिलते हैं, शब्दों के आदान प्रदान से भावनाओं का अनजाना रिश्ता बनता है - गर शब्दों के असली मोती भावनाओं की आँच से तपे हैं तो यकीनन गुलमर्ग यहीं है...सिहरते मन को शब्दों से तुम सजाओ, हम भी सजाएँ, यात्रा को सार्थक करें....

मेरे एहसास इस मंदिर मे अंकित हैं...जीवन के हर सत्य को मैंने इसमे स्थापित करने की कोशिश की है। जब भी आपके एहसास दम तोड़ने लगे तो मेरे इस मंदिर मे आपके एहसासों को जीवन मिले, यही मेरा अथक प्रयास है...मेरी कामयाबी आपकी आलोचना समालोचना मे ही निहित है...आपके हर सुझाव, मेरा मार्ग दर्शन करेंगे...इसलिए इस मंदिर मे आकर जो भी कहना आप उचित समझें, कहें...ताकि मेरे शब्दों को नए आयाम, नए अर्थ मिल सकें ...

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कहीं कुछ मेरे स्वभाव के विपरीत हुआ
मैंने ओढ़ ली चुप्पी की चादर
जबकि मुझे बोलना था
… मेरा मन बोल भी रहा था
बोलता ही है- समय-असमय
मैं सुनती रहती हूँ !!!
किसी स्पष्टीकरण की ज़रूरत भी नहीं
क्योंकि अपने सच के एक एक धागे को
मैं बखूबी पहचानती हूँ
कोई और समझेगा क्या ?
इतनी खुली समझ होती
तो दोराहे,तिराहे,चौराहे
आपस में उलझते नहीं !
जब दिशा ज्ञान ही भ्रमित हो उठा
तो शिकायत कैसी ?
किससे ?
कुछ नया तो हुआ नहीं है
जो शोर किया जाए !
ऊँगली उठाने का कोई अर्थ नहीं
अपने मन के धरातल को बखूबी देखना ज़रूरी है
कहाँ थी समतल भावनाएँ
कहाँ छोड़ दी गई काई
कहाँ रखे थे बातों के कंकड़
खुद का मुआयना कर लें
कुछ परिवर्तन ले आएँ
इससे खूबसूरत पश्चाताप और कोई नहीं  …
परिवर्तन का सूत्र उठाए
खड़ी हूँ रेगिस्तान में
धूल का बवंडर उठता है
तो रास्ते दुविधा में डाल देते हैं
कहाँ से चले थे
कहाँ जाना है - सब गडमड हो जाता है
पर मुझे पहुँचना तो है न तुम तक
 बाधाएँ कितनी भी हों
…… मुझे पहुँचना है उस मोड़ पर
जहाँ से अपने से एहसास की खुशबू आती है
....
मुझे खुद पर यकीन है
यकीन है कि मैं पछतावे की अग्नि शांत कर लूँगी
तुम्हारे चेहरे पर एक गाढ़ी मुस्कान दे जाऊँगी
तुम्हें भी यकीन है न ?-

मेरी भावनायें...

शब्दों की यात्रा में, शब्दों के अनगिनत यात्री मिलते हैं, शब्दों के आदान प्रदान से भावनाओं का अनजाना रिश्ता बनता है - गर शब्दों के असली मोती भावनाओं की आँच से तपे हैं तो यकीनन गुलमर्ग यहीं है...सिहरते मन को शब्दों से तुम सजाओ, हम भी सजाएँ, यात्रा को सार्थक करें....

मेरे एहसास इस मंदिर मे अंकित हैं...जीवन के हर सत्य को मैंने इसमे स्थापित करने की कोशिश की है। जब भी आपके एहसास दम तोड़ने लगे तो मेरे इस मंदिर मे आपके एहसासों को जीवन मिले, यही मेरा अथक प्रयास है...मेरी कामयाबी आपकी आलोचना समालोचना मे ही निहित है...आपके हर सुझाव, मेरा मार्ग दर्शन करेंगे...इसलिए इस मंदिर मे आकर जो भी कहना आप उचित समझें, कहें...ताकि मेरे शब्दों को नए आयाम, नए अर्थ मिल सकें ...

जन्म के बाद मृत्यु
तो निःसंदेह मृत्यु के बाद जन्म
कब कहाँ जन्म
और कहाँ मृत्यु
सबकुछ अनिश्चित   … !
कल्पना का अनंत छोर
जीने का प्रबल संबल देता है
साथ ही
मृत्यु की भी चाह देता है
चाह निश्चित हो सकती है
हो भी जाती है
पर परिणाम सर्वथा अनिश्चित
!!!
प्रयास के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं !!!
……………………
चलो एक प्रयास हम कल्पना से परे करें
मृत्यु के बाद का सत्य जानें
यज्ञ करें
विज्ञान की ऊँगली थाम आविष्कार करें
मृत शरीर की गई साँसों की दिशा लक्ष्य करें
सूक्ष्म ध्वनिभेद पर केन्द्रित कर सर्वांग को
…आत्मा में ध्यान की अग्नि जला
असत्य की आहुति दे
उस सूक्ष्मता को उजागर करें
…।
पाप-पुण्य की रेखा से परे
ईश्वरीय रहस्य को जाग्रत करना होगा
एक युग
एक महाकाव्य
एक महाग्रंथ का निर्माण करना होगा
जन्म-मृत्यु
इन दोनों किनारों को आमने-सामने करना होगा
संगम में मुक्ति है
तो उसी संगम में ढूंढना होगा
प्रेम का तर्पण
त्याग का तर्पण
मोह का तर्पण
प्रतिस्पर्धा का तर्पण
कुछ यूँ करना होगा
मृत्यु के पार सशरीर जाकर
आत्मा से रूबरू होना होगा

अपनी दृष्टि घुमाओ - अपनी स्वर्णिम गाथा लिखो

आज महिला दिवस है,
दिवस की सार्थकता के लिए
सुनो ऐ लड़की
तुम्हें जीना होगा
और जीने के लिए
नहीं करना कभी हादसों का जिक्र
क्योंकि उसके बाद जो हादसे होते हैं
पारिवारिक,सामाजिक और राष्ट्रीय
उसमें तुम्हारे हादसे
सिर्फ तुम्हें प्रश्नों के कटघरे  डालते हैं !

तुम आज भी
जाने कैसे सोचती हो
कि तुम्हारी चीखों से भीड़ स्तब्ध हो जाएगी
निकल आएगा कोई भाई उस भीड़ से
और तुम्हारी नक्कारा इज्जत के लिए
लड़ जाएगा आततायिओं से
याद रखो,
सच्चाई फिल्मों सी नहीं होती
और अगर कभी हुई
तो उसके परिवार के लोग तुम्हें कोसेंगे
फिर दूर दूर तक कोई गवाह नहीं होगा
और नहीं होगी कोई राहत की नींद तुम्हारी आँखों में  …

इन लड़ाइयों से बाहर निकलो
और जानो 
इज्जत इतनी छोटी चीज नहीं
कि किसी हादसे से चली जाए !
इज्जत तो उनकी नहीं है
जो तुम्हें भूखे भेड़िये की तरह खा जाने को आतुर होते हैं
खा जाते हैं
उस हादसे के बाद
वे सिर्फ एक निकृष्ट,
हिंसक
 हैवान रह जाते हैं !

इस सत्य को जानो
अपने संस्कारों की अहमियत समझो
भीख मत माँगो न्याय की
अपना न्याय स्वयं करो
- अपने रास्तों को पुख्ता करो
अगली चाल में दृढ़ता लाओ
मन में संतुलन बनाओ
फिर देखो किसी की ऊँगली नहीं उठेगी
नहीं खुलेगी जुबान !

तुम अपनी दृष्टि घुमाओ
यह जो दिवस तुम्हें मिला है
उसे वार्षिक बनाओ
एक युग बनाओ  ....

यूँ सच भी यही है कि नारी एक युग है
जिसने घर की बुनियाद रखी
आँगन बनाया
बच्चों की पहली पाठशाला बनी
पुरुष की सफलता का सोपान बनी

दुहराने मत दो यह कथन
कि - अबला जीवन हाय  ....
आँसू उनकी आँखों में लाओ
जो तुम्हारी हँसी छीनने को बढ़ते हैं
स्वत्व तुम्हारा,अस्तित्व तुम्हारा
कोई कीड़ा तुम्हारी पहचान मिटा दे
यह संभव नहीं
उठो,
मुस्कुराओ
मंज़िल तुम्हें बुलाती है
निर्भीक बढ़ो
इतिहास के पन्नों पर
अपनी स्वर्णिम गाथा लिखो