Wednesday, 1 January 2014

2014 को YEAR OF HAPPINESS बना सकती हैं ये 14 उम्मीदें

  हम नए साल में प्रवेश कर चुके हैं। 2014 से उम्मीदें आसमान छू रही हैं। लेकिन नए साल में उम्मीद की इमारत बीते साल के तजुर्बे की नींव पर खड़ी होगी तो ठोस होगी। इसलिए हमारे लिए यह जरूरी है कि हम बीते साल के तजुर्बों से सीख लें। 2013 की प्रमुख घटनाओं पर नजर डालें तो उनमें एक संदेश साफ तौर पर मिलता है कि लोग बदलाव चाहते हैं। कोई ढोंग या बहाना अब नहीं चलेगा। आस्था हो या राजनीति। जिसने बुरा बर्ताव किया, उसे न सिर्फ नजरों से उतारा, सलाखों के पीछे पहुंचा दिया गया। दूसरी ओर कुछ उजली कहानियां सामने आईं और अनजान चेहरे हमारे सितारे बन गए।

दिल्ली ने 15 वर्ष पुरानी कांग्रेस सरकार को हराकर आइना दिखा दिया। ऐसा सिर्फ राजनीति के क्षेत्र में ही नहीं हुआ। खेल, कॉर्पोरेट और प्रशासनिक क्षेत्र में भी लोगों की गलतियां गंभीर परिणाम और सबक लेकर आईं। देश ही नहीं दुनिया में ऐसे कई उदाहरण सामने आए। नोकिया ने खुद को नहीं बदला तो बिक गया। 

हालांकि, 2013 अब इतिहास का हिस्सा है। हमारे सामने 2014 है। हम सब उम्मीदों से भरे हुए हैं। ऐसे में जानना जरूरी है कि ऐसी कौन सी 14 बातें हैं जो 2014 में जिन्हें लेकर हम उम्मीद कर सकते हैं। ऐसी ही 14 बातों पर एक नजर:   


मोदी, राहुल गांधी या केजरीवाल बन सकते हैं पीएम

2013 के आखिरी दिन मीडिया में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के इस्तीफे की अटकलें हैं। बताया जा रहा है कि 3 जनवरी को मनमोहन सिंह यह भी ऐलान कर सकते हैं कि वे तीसरी बार प्रधानमंत्री नहीं बनना चाहते हैं। 2014 में बीजेपी के नरेंद्र मोदी, कांग्रेस के राहुल गांधी या आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल में से कोई एक देश का प्रधानमंत्री बन सकता है।  

बिना लाल बत्ती के चलेंगे पीएम!

आम आदमी पार्टी की दिल्ली विधानसभा चुनाव में कामयाबी के बाद पार्टी के कई लोकलुभावन वादों पर लोगों का ध्यान गया है। आम आदमी पार्टी के नेता और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उनकी कैबिनेट के सदस्य समेत दिल्ली के सभी नौकरशाह बिना बत्तियों के चल रहे हैं। आम आदमी पार्टी को मिल रहे समर्थन के मद्देनजर जन दबाव की वजह से 2014 में जो भी नेता देश का प्रधानमंत्री बनेगा, उसके लिए लाल बत्ती लगी गाड़ी लगाकर चलना मुश्किल होगा। अगर ऐसा होता है तो यह देश के इतिहास में पहली परिघटना होगा।  

इनकम टैक्स होगा खत्म!
वित्तीय वर्ष 2014-15 के लिए हो सकता है कि आयकर को पूरी तरह से खत्म कर दिया जाए। बीजेपी के सीनियर लीडर और पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी ने कुछ दिनों पहले कहा था कि अगर केंद्र में बीजेपी की सरकार आएगी तो वह इनकम टैक्स और सेल्स टैक्स को खत्म कर देगी। केंद्रीय वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने भी यह कहकर लोगों की उम्मीदें बढ़ा दी हैं कि संसद के वोट ऑन अकाउंट में नीतिगत निर्णय लिए जा सकते हैं। आम आदमी पार्टी तो वैसे ही बेहद लोकलुभावन फैसले ले रही है। ऐसे में तीनों संभावित राजनीतिक समीकरणों के लिहाज से 2014 में कर के मोर्चे पर राहत की उम्मीद की जा सकती ही।  


बॉलीवुड फिल्म पार करेगी 350 करोड़ का आंकड़ा!
हो सकता है कि दिसंबर, 2013 में रिलीज आमिर खान की धूम-3 पहली बार 300 करोड़ के कारोबारी आंकड़े को पार कर जाए। जनवरी, 2014 में सलमान खान की फिल्म 'जय हो' रिलीज हो रही है। कयास लगाए जा रहे हैं कि यह फिल्म कारोबार के मामले में धूम-3 को भी पीछे छोड़ते हुए 350 करोड़ से ज्यादा का कारोबार कर सकती है।   


इंग्लैंड में टेस्ट सीरीज जीत के झंडे गाड़ेंगे धोनी!
जून से लेकर सितंबर, 2014 तक भारतीय टीम इंग्लैंड के दौरे पर रहेगी। वहां भारतीय टीम 5 टेस्ट, 5 वनडे और 1 टी 20 मैच खेलेगी। महेंद्र सिंह धोनी की अगुवाई में दक्षिण अफ्रीका के हाथों 1-0 से टेस्ट सीरीज और वनडे सीरीज हारने के बाद भारतीय टीम चाहेगी कि इंग्लैंड से कुछ साल पहले 4-0 से मिली टेस्ट सीरीज की हार का बदला लिया जाए। अगर भारतीय टीम ऐसा करने में कामयाब होगी तो यह धोनी की कप्तानी में इंग्लैंड में टेस्ट सीरीज जीतने का पहला मामला होगा।  

महंगाई होगी सबसे कम! 
पिछले एक-दो सालों से महंगाई ने देश के लोगों का दम निकाल दिया है। नवंबर, 2013 में खुदरा चीजों की महंगाई दर 11.24 फीसदी थी। जबकि अक्टूबर, 2013 में यह 10.17 फीसदी थी। नए साल में नई सरकार के साथ लोगों को यह उम्मीद है कि महंगाई इतिहास के सबसे निचले स्तर को छुए।  

सरकार के पंजे से आजाद होगी सीबीआई! 
2013 में सीबीआई को सुप्रीम कोर्ट ने पिंजड़े में कैद तोता कहा था। इसके बाद सीबीआई की सरकारी नियंत्रण से आज़ादी की बहस तेज हुई। हो सकता है कि 2014 में नई सरकार लोकपाल कानून में बदलाव कर सीबीआई को स्वायत्तता दे दे। अगर ऐसा हुआ तो यह भी देश के इतिहास में पहली बार होगा। 

करप्शन के मामले में भारत की छवि सुधरेगी!  
ट्रांसपैरेंसी इंटरनेशनल समेत दुनिया के कई संगठन अपनी रिपोर्ट में भारत को दुनिया के भ्रष्ट देशों में गिनते हैं। यह किसी भी देश के लिए अच्छी बात नहीं है। दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार ने सत्ता संभालते ही भ्रष्टाचार विरोधी योजना का ऐलान करते हुए कहा कि अगर कोई घूस मांगे तो उसकी जानकारी सरकार की ओर से जारी होने वाले एक विशेष टेलीफोन नंबर पर दें। आम आदमी पार्टी के ऐलानों से आम आदमी को यह उम्मीद जग सकती है कि उसके रोजमर्रा के काम बिना घूस दिए हो सकते हैं। अगर यह योजना दिल्ली में सफल हुई तो देश के अन्य राज्यों में भी जनता ऐसे उपायों की मांग कर सकती है। अगर 2014 में इस दिशा में ठोस काम हुए तो दुनिया के 'ईमानदार' देशों में भारत की गिनती होने लगेगी और भारत के इतिहास में यह पहली बार होगा। 

हाफिज मोहम्मद सईद की गिरेबां तक पहुंचेंगे कानून के हाथ! 
मुंबई पर 26/11 जैसा हमला करने वाले आतंकवादियों का सरगना हाफिज मोहम्मद सईद अब भी भारत की पहुंच से दूर है। वह भारत की मोस्ट वॉन्टेड लिस्ट में शामिल है। भारत पाकिस्तान से सईद को सौंपने को कहता रहा है। लेकिन पड़ोसी देश इस मांग को अनसुना ही करता रहा है। 2014 में देश में बनने वाली नई सरकार आक्रामक विदेश नीति और ठोस रक्षा नीति की बुनियाद पर सईद को भारत लाकर उसके खिलाफ मुकदमा चला सकती है। अगर ऐसा हुआ तो यह भारत-पाकिस्तान के संबंधों में ऐतिहासिक मोड़ होगा।    


महिला दस्ते करेंगे महिलाओं की सुरक्षा
दिसंबर, 2012 में दामिनी के साथ दिल्ली में हुए विभत्स्य गैंगरेप और उसके बाद रेप की कई जघन्य घटनाओं ने पूरे देश को झकझोर दिया था। इस घटना से सबक लेते हुए आम आदमी पार्टी ने 2013 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में यह वादा किया था कि अगर उनकी सरकार बनी तो वे महिलाओं का एक ऐसा दस्ता तैयार करेंगे जो महिलाओं, लड़कियों की हिफाजत करेगा। यह दस्ता तकरीबन हर मोहल्ले में होगा। अगर दिल्ली में यह प्रयोग कामयाब रहा तो अन्य राज्यों पर भी इसे अपनाने का दबाव बनेगा और देश भर में महिला दस्ते आधी आबादी की सुरक्षा और सम्मान से खिलवाड़ करने वाले कहर बनकर टूटेंगे। 



ललित मोदी की होगी वापसी!
इंडियन प्रीमियर लीग को दुनिया के सबसे कामयाब टूर्नामेंट में से एक माना जाता है। इस टूर्नामेंट को दुनिया के सामने लाने में बड़ी भूमिका निभाने वाले आईपीएल के पूर्व कमिश्नर ललित मोदी 2014 के आईपीएल में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेते हुए एक बार फिर दुनिया को दिख सकते हैं। तमाम आर्थिक गड़बड़ियों के आरोपों का सामना कर रहे ललित मोदी पिछले कुछ सालों से लंदन में रह रहे हैं। लंदन में रहते हुए उन्होंने राजस्थान क्रिकेट बोर्ड का चुनाव लड़ा है। अगर ललित मोदी यहां जीतते हैं तो बीसीसीआई को उन्हें रोकना बहुत मुश्किल होगा। 


योगेंद्र यादव होंगे हरियाणा के मुख्यमंत्री! 
दिल्ली के बाद ‘आप’ अब हरियाणा फतह की कोशिश में है। पार्टी वहां से योगेंद्र यादव को कुछ महीनों बाद होने वाले विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री के तौर पर पेश कर सकती है। दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार के गठन के बाद से ही यादव हरियाणा में डटे हुए हैं। कयास है कि उन्हें गुड़गांव से चुनाव लड़ाया जाए। हरियाणा दिल्ली से सटा हुआ राज्य है और वहां आम आदमी पार्टी ने अच्छा खासा नेटवर्क तैयार कर लिया है। अगर बदलाव की हवा हरियाणा में चली तो भूपिंदर सिंह हुड्डा की सरकार जा सकती है और योगेंद्र यादव की अगुवाई में आम आदमी पार्टी वहां सरकार बना सकती है। 


मुस्लिमों के लिए पीएफ की तर्ज पर बनेगा फंड! 
केंद्र सरकार इन दिनों मुस्लिमों की शिक्षा में बढ़ावा देने के लिए मुस्लिम समाज से ही पीएफ जैसा फंड इकट्ठा करने जैसे एक प्‍लान पर विचार कर रही है। 2014 में जाते-जाते मौजूदा सरकार इस बारे में ठोस फैसला ले सकती है। सरकार की यह योजना मलेशिया सरकार की तबुंग हाजी योजना जैसी है। तबुंग हाजी योजना के तहत मलेशिया में मुस्लिम अपने पैसों की बचत करते हैं और बाद में इन्‍हीं पैसों से हज करने जाते हैं। भारत के अल्‍पसंख्‍यक मामलों के मंत्रालय के अनुसार मुस्लिमों के पैसों को मलेशिया की योजना की तरह जोड़ा जाएगा, ताकि यह उनके बच्‍चों की उच्‍च शिक्षा के काम आ सके। अल्‍पसंख्‍यक मामलों के मंत्री के. रहमान खान के मुताबिक इस योजना के लागू होने से 10 हजार से 15 हजार करोड़ रुपए इकट्ठा होने की उम्‍मीद है। सरकार ने इसके लिए इनवेस्‍टमेंट बैंक और प्रोजेक्‍टर एडवाइजर 'एसबीआई कैपिटल मार्केट' से इसके बारे में अध्‍ययन कर रिपोर्ट सौंपने को कहा है। यह रिपोर्ट जनवरी, 2014 के पहले हफ्ते में सरकार को सौंप दी जाएगी। 


अन्ना हजारे, मेजर ध्यानचंद को मिलेगा भारत रत्न!
2013 में केंद्र सरकार ने ऐलान किया था कि सचिन तेंडुलकर और वैज्ञानिक सीएनआर राव को भारत रत्न से नवाजा जाएगा। कुछ लोगों ने इस बात पर ऐतराज जताया था कि सचिन तेंडुलकर को हॉकी के जादूगर कहे जाने वाले मेजर ध्यानचंद से पहले भारत रत्न से नवाजा गया। 2014 में बनने वाली केंद्र सरकार इस साल मेजर ध्यानचंद और लोकपाल जैसे मुद्दे पर देश भर को आंदोलित कर चुके अन्ना हजारे जैसे समाज सेवी को भारत रत्न से नवाजे।
2014 में 14 चीजों पर फोकस करे देश 

विदेश नीति
2014 में बनने जा रही नई सरकार को विदेश नीति की समीक्षा करनी चाहिए। पाकिस्तान, चीन, नेपाल, म्यांमार, बांग्लादेश, श्रीलंका जैसे पड़ोसी देशों के साथ भारत के रिश्तों पर नए सिरे से रोशनी डालने की जरुरत महसूस की जा रही है। साथ ही मिडल ईस्ट, यूरोप, दक्षिण एशियाई देशों और अमेरिका के साथ भारत को अपने संबंधों को नए सिरे से परिभाषित करने की कोशिश करनी चाहिए। दुनिया भर में धाक जमाने के लिए भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खुलकर और धमक के साथ बोलना चाहिए। 

देश को सुरक्षित करने पर जोर
भारत को अंदर और बाहर से सुरक्षित करने की जरुरत है। कई जानकार मानते हैं कि नए साल में सरकार की यह कोशिश होनी चाहिए कि आतंकवादी घटनाओं पर लगाम लगे और बाहर से देश के खिलाफ काम कर रहे तत्वों पर लगाम लगाई जा सके। इसके लिए जानकार सुझाते हैं कि थानों के तहत आने वाली चौकी के स्तर से राष्ट्रीय स्तर तक पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल बने। इसके अलावा आतंकवाद के खिलाफ कड़े कानून और ऐसे मामलों के लिए विशेष अदालत के गठन जैसे उपाय भी अपनाए जा सकते हैं। भारत को अपनी खुफिया एजेंसियों को भी बेहतर बनाने की जरुरत है। देश के बाहर के दुश्मनों से निपटने के लिए सेना को और मजबूत करना होगा और सीमाओं पर बुनियादी ढांचे का विकास करना होगा। 

महंगाई कम करना 
कुछ हफ्तों पहले तक 80-100 रुपए किलो प्याज खा चुके भारत के लोग नए साल में जिस बात का इंतजार बेसब्री कर रहे होंगे वह है महंगाई में कमी। 2014 में वजूद में आने वाली नई सरकार की यही कोशिश होनी चाहिए कि वह महंगाई के मोर्चे पर पस्त लोगों को राहत दे। इसके लिए कड़े आर्थिक उपाय करने होंगे। जमाखोरों और काला बाजारी करने वालों से सख्ती से निपटना होगा।

नई ऊर्जा नीति की जरुरत 
भारत में करीब 80 फीसदी बिजली कोयले को जलाकर बनाई जाती है। यह किसी भी देश के लिए अच्छे संकेत नहीं हैं। भारत को अपने कोयले के भंडारों को सोच समझकर खर्च करने की जरुरत है। भारत को परमाणु संयंत्रों, पानी, हवा और सूरज की रोशनी से बिजली पैदा करने के उपायों पर और गंभीरता से अमल करने की जरुरत है। इससे न सिर्फ हमारे कोयले के भंडार सुरक्षित होंगे बल्कि हम बिजली बनाते समय पर्यावरण को कम से कम नुकसान पहुंचाएंगे। 

शिक्षा में सुधार
योजना आयोग की प्लानिंग है कि देश भर में 200 से ज्यादा विश्वविद्यालयों की स्थापना की जाए। लेकिन दुख की बात यह है कि दुनिया के बेहतरीन 200 शिक्षण संस्थानों में कभी-कभी एक या दो भारतीय संस्थानों को छोड़कर कभी कोई विश्वविद्यालय शामिल नहीं होता है। 2014 में यह उम्मीद की जानी चाहिए कि नई सरकार शिक्षा को लेकर कई बड़े बदलाव करेगी ताकि देश के युवाओं को ऐसी ट्रेनिंग दी जा सके जिससे उनका और देश का भी भविष्य संवर सके। 


कानूनों को जमीन पर उतारना
2013 में देश में कई ऐतिहासिक कानून बने। इनमें खाद्य सुरक्षा गारंटी कानून और लोकपाल शामिल हैं। लेकिन नए साल में इन कानूनों को जमीन पर असरदार तरीके से उतारने की चुनौती केंद्र की सरकार के सामने है ताकि हकदार लोगों को इन कानूनों का सही फायदा मिल सके। 

टैक्स रिफॉर्म
करों को लेकर आर्थिक सुधार करने में यूपीए सरकार अब तक नाकाम रही है। 2014 में यह उम्मीद की जानी चाहिए सरकार टैक्स के मोर्चे पर लंबे समय से धूल फांक रहे सुधार के उपायों पर अमल कर देश के लोगों को राहत देगी। 

पुलिस रिफॉर्म
लंबे समय से पुलिस के कामकाज के तरीकों में बदलाव के लिए पुलिस रिफॉर्म को लागू करने की मांग हो रही है। भ्रष्टाचार और अनाचार से त्रस्त देश चाहेगा कि 2014 में सरकार पुलिस के कामकाज करने से जुड़े कानूनों में सुधार कर उसके जनता का 'सच्चा सेवक' बनाए। 

राजनीतिक पार्टियां आरटीआई के दायरे में 
देश के राजनीतिक दल सूचना के अधिकार की सार्वजनिक तौर पर खूब तारीफ करते हैं। लेकिन जब बात इस कानून के दायरे में राजनीतिक पार्टियों के आने की होती है तो नेता चुप्पी मार जाते हैं। उनका तर्क है कि पार्टियां कोई सरकारी संस्थाएं नहीं हैं। भले ही राजनीतिक पार्टी सरकारी संस्था न हो लेकिन जो लोग सरकार बनाते हैं, वे उन्हीं पार्टियों से जुड़े होते हैं। उन पर लोगों का भरोसा होता है। राजनीतिक पार्टियों को कर दाताओं के पैसे से जमीन, बंगला मुहैया कराया जाता है। इन बातों की रोशनी में राजनीतिक पार्टियों का आरटीआई में आना जरूरी है। उम्मीद की जानी चाहिए कि 2014 में पार्टियां इस कानून के दायरे में आएंगी। 

नौकरियों के अवसर बढ़ें
भारत दुनिया के उन चुनिंदा देशों में शामिल है जहां ज्यादातर लोग युवा हैं। लेकिन देश में रोजगार के अवसर उस पैमाने पर पैदा नहीं किए जा रहे हैं, जिस पैमाने से आबादी बढ़ रही है। 2014 में उम्मीद का जानी चाहिए कि सरकार नौकरियों के अवसर बढ़ाने पर जोर देगी। 


लोन की दरें कम हों
रिजर्व बैंक ब्याज दरों को स्थिर रख कर महंगाई पर लगाम लगाने की नीति पर अमल कर रहा है। लेकिन इससे कर्ज लेने वाले लोगों की हालत खराब है। नए साल में उम्मीद की जानी चाहिए कि रिजर्व बैंक कर्ज की दरों में थोड़ी कमी करेगा ताकि लोगों को ईएमआई पर कम खर्च करना पड़े। साथ ही यह उम्मीद भी का जानी चाहिए कि महंगाई पर लगाम लगाने के लिए रिजर्व बैंक कोई और उपाय खोजने में सफल रहे। 

नई सरकार मजबूत और स्थिर हो
2014 में आम चुनाव होने वाले हैं। देश की आर्थिक स्थिति को देखते हुए लोग यह उम्मीद कर रहे हैं कि इस साल लोग निर्णायक जनमत देकर केंद्र में सरकार बनवाएंगे। केंद्र में मजबूत और स्थिर सरकार ही देश को आगे बढ़ा सकती है। अस्थिर या कमजोर सरकार मुश्किल फैसले नहीं ले पाती है जो बाद में देश के लिए नुकसानदेह साबित होते हैं। 

नई राजनीतिक संस्कृति बने
आम आदमी पार्टी की हालिया कामयाबी ने पारंपरिक ढर्रे पर राजनीति करने वालों की आंखें खोल दी हैं। नए साल में उम्मीद का जानी चाहिए कि नेता आम आदमी के दर्द को समझेंगे और उनके हित की राजनीति करेंगे। राजनीतिक फैसलों में पारदर्शिता, लोगों से सीधे जुड़े मुद्दों पर बात और साफगोई जैसे तत्व नई राजनीति की बुनियाद बन सकते हैं। दिल्ली में आम आदमी पार्टी की कामयाबी ने साबित कर दिया है कि ऐसा होना बहुत मुश्किल नहीं है। 


महिला सुरक्षा 
देश में महिलाओं, लड़कियों और बच्चियों की सुरक्षा को लेकर कई सवाल उठते रहे हैं। नए साल में उम्मीद की जानी चाहिए कि सरकार इस दिशा में कई ठोस उपाय करेगी ताकि समाज खुद को महफूज महसूस करे। 
2014 में होने वाली 14 अहम घटनाएं

अमेरिकी फौज अफगानिस्तान से लौटेगी
2001 में हुए आतंकवादी हमले के बाद अमेरिका ने आतंकवाद के खिलाफ जंग का ऐलान किया था। तब से लेकर आज तक आतंकवाद के गढ़ माने जाने अफगानिस्तान में अमेरिका के नेतृत्व में नाटो देशों की सेनाएं डटी हुई हैं। लेकिन 2014 में अमेरिकी सेनाएं अफगानिस्तान से हटना शुरू कर देंगी। ऐसा होने पर दक्षिण एशिया समेत पूरी दुनिया के सुरक्षा समीकरणों में बड़े पैमाने पर फेरबदल हो सकती है।   

आम चुनाव 
इस साल मई तक भारत में नई सरकार बननी है। उससे पहले देश में आम चुनाव होने हैं। 543 लोकसभा सीटों के लिए अप्रैल से लेकर मई तक चुनाव हो सकते हैं। इसके लिए अधिसूचना फरवरी के आखिर तक जारी हो सकती है। 

छह राज्यों में विधानसभा चुनाव
भारत में आम चुनाव के अलावा इस साल छह राज्यों में विधानसभा चुनाव भी होने हैं। इनमें आंध्र प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, हरियाणा, महाराष्ट्र, ओड़िशा और सिक्किम शामिल हैं। 

केजरीवाल दे सकते हैं मोदी को चुनौती
आम चुनाव के दौरान आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ सकते हैं। अगर ऐसा होता है देश के चुनावी इतिहास के सबसे दिलचस्प मुकाबलों में इसकी गिनती होगी। 

भारत-पाकिस्तान के सुरक्षा बलों के बीच मीटिंग
नए साल के पहले छह महीनों में भारतीय सीमा सुरक्षा बल और पाकिस्तान रेंजर्स के शीर्ष अफसरों के बीच दिसंबर, 2013 में हुई बैठक के बाद 2014 के शुरुआती छह महीनों में ही नई दिल्ली में एक बार फिर बैठक होगी। इस बैठक के दोनों देशों के रिश्तों पर दूरगामी असर की उम्मीद की जा रही है। 

बांग्लादेश में चुनाव 
भारत के पड़ोसी देश बांग्लादेश में 5 जनवरी, 2014 को वोटिंग होनी है। इस चुनाव में दुनिया की नजर इस बात पर लगी है कहीं बांग्लादेश पर चरमपंथी तत्वों की पकड़ न मजबूत हो जाए। अगर ऐसा होता है तो इसका भारत पर असर पड़ना तय है। 


भारतीय क्रिकेट टीम का न्यूजीलैंड दौरा
भारतीय टीम दक्षिण अफ्रीका के हाथों टेस्ट और वनडे सीरीज गंवाने के बाद 19 जनवरी से न्यूजीलैंड के खिलाफ नेपियर में वनडे सीरीज का पहला मैच खेलने उतरेगी। इस दौरे पर भारत टेस्ट मैच भी खेलेगा। 

टी 20 वर्ल्ड कप 
इस साल मार्च-अप्रैल में भारत के पड़ोसी देश बांग्लादेश में टी 20 वर्ल्ड कप का आयोजन होगा। एक बार टी 20 वर्ल्ड कप जीत चुकी टीम इंडिया की कोशिश होगी कि इस टूर्नामेंट में जीत दर्ज की जा सके। 


इंडियन प्रीमियर लीग
अप्रैल से लेकर मई तक खेला जाने वाला इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) इस साल देश के बाहर आयोजित किया जा सकता है। इसकी वजह अप्रैल-मई में ही देश में होने वाला आम चुनाव है। टूर्नामेंट के आयोजकों ने अब तक इस टूर्नामेंट की तारीख का ऐलान नहीं किया है। आयोजक लोकसभा चुनाव की तारीखों के ऐलान का इंतजार कर रहे हैं। इस साल आईपीएल में खेलने वाले खिलाड़ियों की नीलामी 12 फरवरी को की जाएगी। इस बार टूर्नामेंट का सातवां संस्करण होगा।  

फुटबॉल वर्ल्ड कप 
भले ही भारत फुटबॉल के खेल में दुनिया के नक्शे पर बहुत बड़ी ताकत नहीं है, लेकिन भारत के लोगों की इस खेल के वर्ल्ड कप में हमेशा दिलचस्पी रही है। यह टूर्नामेंट इस साल 12 जून से शुरू होगा और 13 जुलाई तक लैटिन अमेरिकी देश ब्राजील में खेला जाएगा। ब्राजील में इससे पहले 1950 में इस टूर्नामेंट का आयोजन हुआ था। 

भारतीय क्रिकेट टीम का इंग्लैंड दौरा
मई में इंडियन प्रीमियर लीग के खत्म होने के बाद जून के आखिर से लेकर सितंबर तक भारतीय क्रिकेट टीम इंग्लैंड में 5 टेस्ट, 5 वनडे और एक टी 20 मैच खेलने जाएगी। 

जय हो 
नए साल के पहले महीने यानी 24 जनवरी को सलमान खान    की बड़ी फिल्म 'जय हो' रिलीज होगी। इस फिल्म में सलमान खान के अलावा तब्बू मुख्य भूमिका में हैं। फिल्म के निर्देशक सलमान के भाई सोहेल खान हैं। सलमान की हाल के कुछ सालों में हिट हुई फिल्मों को देखते हुए उम्मीद की जा रही है कि यह फिल्म कारोबार के नए रिकॉर्ड बनाएगी।  

पीके
राजकुमार हिरानी के निर्देशन में बनने वाली फिल्म 'पीके' के साथआमिर खान   एक बार फिर दर्शकों को लुभाने को तैयार हैं। नए साल में रिलीज हो रही यह फिल्म कामयाबी की नई कहानी लिख सकती है। 

डेढ़ इश्किया
नसीरूद्दीन शाह, माधुरी दीक्षित और अरशद वारसी के अभिनय से सजी फिल्म डेढ़ इश्किया 10 जनवरी को रिलीज होगी। इश्किया की कामयाबी के बाद लोगों को इस फिल्म का बेसब्री से इंतजार है। 
2013 के कुछ अहम सबक: बदलाव के लिए तैयार रहिए 


लीडर वही जो नया नेतृत्व पैदा करे

इस वर्ष विभिन्न क्षेत्रों में नेतृत्व को लेकर सवाल उठे। हालांकि, इस बीच अरविंद केजरीवाल का भी उदाहरण सामने आया। अरविंद की अगुवाई में आम आदमी पार्टी के 28 नेता पहली बार विधानसभा पहुंचे और सरकार बनाई। 
1. नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाए जाने का लालकृष्ण आडवाणी ने विरोध किया। लेकिन उनकी ही आलोचना हुई। मोदी को जबरदस्त समर्थन था। आखिर आडवाणी को झुकना पड़ा।

2. इन्फोसिस से रिटायर नारायण मूर्ति फिर लौटे। बेटे को भी ले आए।

3. शिवसेना में उद्धव का नेतृत्व किसी को स्वीकार नहीं हो रहा है। राज ठाकरे की नजदीकी मोदी से है। अब जबकि लोकसभा चुनाव करीब हैं तब महाराष्ट्र का राजनीतिक ड्रामा बहुत रोचक होगा।

4. आंध्र में भी कमोबेश यही स्थिति है। कांग्रेस नेता और भूतपूर्व मुख्यमंत्री वायएसआर रेड्डी के बेटे जगनमोहन कांग्रेस के लिए नासूर बन गए हैं। कांग्रेस ने जब-जब उन्हें जेल भेजा, वे लोकप्रिय होते गए।

सीख : सच्चा लीडर अपने साथ एक पूरी टीम को तैयार करता ही है, लेकिन सबसे ज्यादा ध्यान देता है नए लीडर तैयार करने पर। हमारे स्कूल में, कॉलेज में, ऑफिस में, कॉलोनी में, क्लब में, संस्था में कहीं भी हमारा लीडर नए लोगों को लीडरशिप के लिए आगे नहीं ला रहा है तो उसे नेतृत्व मत मानिए। 

महिलाएं ठान लें तो अपमान करने वालों को सजा मिलेगी ही
1. मुंबई में फोटोजर्नलिस्ट के साथ दुष्कर्म।
2. आसाराम और उसके बेटे नारायण साईं की करतूतें। अपनी ही शिष्याओं को शर्मनाक हरकतों का शिकार बनाया।
3. तरुण तेजपाल द्वारा साथी पत्रकार का शोषण। फिर उसका ही चरित्र खराब बताने की कोशिश।
4. जस्टिस गांगुली पर भी लॉ इंटर्न ने लगाए गंभीर आरोप।
5. राजस्थान में दुष्कर्म के आरोपी मंत्री बाबूलाल नागर बर्खास्त।
इन सभी मामलों में महिलाओं ने अपने साथ हुए गलत व्यवहार पर विरोध जताया। उन्हें डराया, धमकाया गया, मामले को राजनीतिक रंग देने की कोशिश भी की गई, लेकिन वे डटी रहीं। पीछे नहीं ही हटीं। दुनिया को बताया। अपराधी चाहे कितने ही रसूख वाले हों या आस्था के सिंहासन पर बैठे हों। दुनिया के सामने उन्हें बेनकाब किया। सलाखों के पीछे पहुंचाया।

सीख : महिलाएं जागरुक हैं। अगर वे ठान लें, दबाव बनाए रखें तो कोई अपराधी बच नहीं सकता। कानून को उन पर कार्रवाई करनी ही पड़ेगी।

अंधविश्वास कभी भी सच नहीं बदल सकता

साधु शोभन सरकार को सपना आया कि उत्तर प्रदेश के डोंडियाखेड़ा में हजार टन सोना गड़ा हुआ है। लगभग 3 लाख करोड़ रुपए का। एक केंद्रीय मंत्री ने साधु के कहने पर खजाने की खुदाई का आदेश दे दिया। इसके साथ ही केंद्र और राज्य की जिम्मेदार सरकारों का अमला इस काम में एक पखवाड़े तक जुटा रहा। इसके लिए ट्रस्ट बनाने की सिफारिश भी होने लगी। देशभर का इलेक्ट्रॉनिक मीडिया जुटा रहा, लेकिन मिला कुछ नहीं। फायदा यह हुआ कि धूल खाते गजेटियर और ब्रितानी पुस्तकें चर्चा में आर्ईं। इसके साथ ही फिर वही साबित हुआ जो आध्यात्म और विज्ञान कहते हैं- सपने पर विश्वास मत करो।

सीख : अंधविश्वास से सिर्फ गलत और झूठी धारणाएं ही पनपेंगी। किसी का भला नहीं होगा। छुपे खजानों ने आज तक किसी का भला नहीं किया। ऐसे खजाने होते ही नहीं हैं। सिवाय झूठा जुनून जगाने के ये और कुछ नहीं करते, जिससे हजारों जिंदगियां तबाह हो जाती हैं।


चेतावनी छोटी भी हो तो उस पर ध्यान दें वरना अपूर्णीय नुकसान होगा

1. इस वर्ष सबसे बड़ी त्रासदी उत्तराखंड चारधाम यात्रा के दौरान हुई।
2. मध्य प्रदेश के दतिया में नवरात्रि के दौरान हादसा। 

क्या कोई मजबूरी है कि धर्मस्थल पर ऐसे हादसे हों? 
धार्मिक और आस्था वाले स्थलों पर जाने वालों की संख्या बढ़ रही है। पर्यटन भी एक कारण है। उत्तराखंड में हादसे से पहले मौसम विभाग ने सूचना दी थी कि बादल फट सकते हैं, लेकिन सभी ने इसे सूचना की तरह ही लिया, इसमें छुपी चेतावनी नहीं देखी। इसके विपरीत अक्टूबर में ओडिशा में आने वाले तूफान के बारे में भी पूर्व सूचना मिली, लेकिन यहां गंभीरता बरती गई। लोगों को हटा लिया गया। हजारों जिंदगियां बच गईं।

सीख : आपदाएं भले ही प्राकृतिक थीं, लेकिन नुकसान मनुष्य की वजह से हुआ। इन हादसों की तीव्रता को कम करना हमारे हाथ में नहीं है लेकिन हम सचेत होकर हजारों
जिंदगियां बचा सकते है।


इरादे मजबूत हों तो उम्र कभी बाधक नहीं बनत

मैराथन धावक फौजासिंह 101 की उम्र में रिटायर, 80 की उम्र में दौड़ना शुरू किया। अंतरराष्ट्रीय स्तर की मैराथन में भी दौड़े और खिताब जीते। लता ताई के पति को इलाज की जरूरत थी। 65 साल की लता ने 3 किमी की रेस दौड़ी। बतौर ईनाम पांच हजार रु. जीते। लोगों ने मदद की। उनके अकाउंट में जमा हुए डेढ़ लाख रु.से भी ज्यादा।

सीख : चुनौती मिले तो स्वीकार कीजिए। आपको लक्ष्य की स्पष्टता है और आप अपना पूरा जुनून इसे पाने में लगा देते है तो जीत तय है। फिर उम्र मायने नहीं रखती।

इमोशनल कहानी से कुछ नहीं होगा, ग्राउंड वर्क बताना होगा

हाल ही में चार राज्यों में विधानसभा चुनाव हुए। कांग्रेस के लिए राहुल गांधी ने सभाएं कीं। जहां उन्होंने लोगों को भावुकता भरी कहानी सुनाई कि मां नहीं चाहतीं थीं फिर भी दिल पर पत्थर रखकर उन्होंने मुझे जिम्मेदारी लेने के लिए कहा। मेरे पापा को मारा, दादी की हत्या कर दी गई। मुझे जान का भी खतरा है, लेकिन इन कहानियों का कोई फायदा नहीं मिला। स्थानीय नेतृत्व के प्रति लोगों में गुस्सा था। कांग्रेस को शिकस्त मिली। वहीं मोदी ने अपने भाषणों में युवाओं को जोडऩे और विकास कार्यों की बात की। उन्हें फायदा मिला।

सीख : आपने जो काम किया है या जो करने वाले हैं सिर्फ उसी के बारे में बताइए। भावुकता भरी कहानी सांत्वना तो दिला सकती है समर्थन नहीं। इस तरह सिर्फ
आप उपहास का पात्र बन सकते हैं। यह तब और भी महत्वपूर्ण हो जाता है जब आपके पास बड़ी जिम्मेदारी वाला पद हो।


जहां जरूरी हो वहां आक्रमण करें, नहीं तो सिर कटते ही रहेंग

हमारी सरहद की सुरक्षा पूरे वर्ष सवालों के घेरे में रही। जनवरी में पाकिस्तान के आतंकी 'सैनिकों' ने घुसपैठ कर दो सैनिकों की हत्या की। एक सैनिक का सिर भी काट ले गए। हम बयानों में उलझे रहे। अगस्त में पुंछ में फिर पांच सैनिकों की हत्या की। 100 से ज्यादा बार युद्धविराम तोड़ा। रही सही कसर चीन ने पूरी कर दी। 50 से ज्यादा बार उसने हमारी सीमा लांघी। अप्रैल में तो उसके सैनिक लद्दाख में 19 किमी तक घुस आए। तीन सप्ताह तक आराम से टेंट बांधकर बैठे रहे। ठीक उसी तरह जैसी हमारी सरकार दिल्ली में हाथ पर हाथ धरे बैठी थी।

सीख : हम पाकिस्तान से 3328 किमी और चीन से 3500 किमी की सीमा बांटते हैं। इसकी सुरक्षा, आत्मसम्मान अगर कायम रखना है तो हमें अपनी सरहद मजबूत करनी होगी। बयान हमें सिर्फ तसल्ली दिला सकते हैं। कटे हुए सिर नहीं। हमारा मस्तक हमेशा ऊंचा रहे इसके लिए हमें अपने इरादे न सिर्फ जताने होंगे, बल्कि कर दिखाने भी होंगे।


सरकार वोटबैंक देखेगी तो व्यवस्था बने रहना मुश्किल

अगस्त में मुजफ्फरनगर में छेड़छाड़ की स्तरहीन घटना। क्या पुलिस, क्या अफसरान और क्या प्रदेश सरकार। सबको सब पता था। किसी ने भी रोकने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए। सामान्य घटना को जाति और धर्म का रंग देकर नफरत की आग में जलने के लिए छोड़ दिया गया पूरे इलाके को। चप्पे-चप्पे पर पुलिस तैनात थी किन्तु गिरफ्तार एक को भी नहीं किया। दोनों समुदायों की पंचायतों पर पंचायत होती रहीं। भड़काऊ भाषण दिए गए। फिर वही खून-खराबा। कार्रवाई के नाम पर
कलेक्टर और एसएसपी को हटा दिया। कुछ नहीं हुआ। सांप्रदायिक तनाव बढ़ता ही गया। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कुछ किया ही नहीं, स्टिंग ऑपरेशन से
यह स्पष्ट हो गया। आज सरकार मजे में हैं। जान गंवाई 40 से ज्यादा निर्दोषों ने।

सीख : हम जिनके हाथों में अपने राज्य की बागडोर सौंप रहे हैं। चाहे वे किसी भी पार्टी से हों। उनको एक बार अवश्य जांच लें। ऐसा न हो कि वह अपने फायदे के लिए कानून-व्यवस्था को ताक पर रख दें। उन्हें पहचानें। चुनाव में हराएं। ताकि नरसंहार की ऐसी घटना फिर न हो।

खेल हो या कोई भी प्रोफेशन, सफलता का शॉर्टकट नहीं होता

आईपीएल टी-ट्वेंटी। 21वीं सदी का रोमांचक और फटाफट क्रिकेट। खुशी, हताशा, गुस्सा, आश्चर्य लेकिन सब छलावा।
मनोरंजन, शोर-शराबा, ग्लैमर। पानी की तरह बहा पैसा। सीजन 6 में भी। किन्तु क्रिकेट की गरिमा धूल में मिल गई, जब स्पॉट फिक्सिंग की बात सामने आई। यानी जो भी मैदान पर हो रहा था। वह सबकुछ पहले से तय था। पहले श्रीसंत, चंडीला और अंकित चव्हाण के नाम सामने आए। फिर बीसीसीआई अध्यक्ष श्रीनिवासन, उनके दामाद गुरु मयप्पन, राजस्थान रॉयल्स के राज कुंद्रा भी इस घिनौने खेल में शामिल बताए गए। बोर्ड सचिव और कोषाध्यक्ष ने इस्तीफा दे दिया। आहत हुए क्रिकेटप्रेमी।

सीख : अति महत्वाकांक्षा हमेशा गलत काम के लिए बाध्य करती है। दौलत और शोहरत के लिए मैदान में पसीना बहाना पड़ता है। शॉर्टकट से सफलता की चाह ऐसे दाग दे जाती है जो जिंदगी भर नहीं मिट सकते। किसी कीमत पर नहीं।


ऊंचे 'कद' वाले ऐसा करेंगे तो इतिहास से भी मिट जाएंग

थोड़े दिन पहले साइकिलिंग की दुनिया में लांस आर्मस्ट्रांग का दर्जा भगवान के जैसा था। हो भी क्यों न। सात बार टूर डि फ्रांस का खिताब अपने नाम किया। कैंसर जैसी बीमारी को हराकर फिर से विश्व चैंपियन बने। जीवटता की ऐसी मिसाल से हर कोई प्रभावित। क्रिकेटर युवराज सिंह जब कैंसर से लड़ रहे थे तो उन्हें भी आर्मस्ट्रांग की जीवनी ने बड़ा हौसला दिया, लेकिन जैसे ही आर्मस्ट्रांग ने डोपिंग की बात स्वीकारी लोगों का भरोसा टूट गया। भरोसा सिर्फ आर्मस्ट्रांग ने नहीं तोड़ा। दक्षिण अफ्रीका के हीरो रहे स्प्रिंट रनर ऑस्कर पिस्टोरियस भी इसी श्रेणी में खड़े हो गए हैं। 2004 में जब उन्होंने एथेंस पैराओलिंपिक में गोल्ड मेडल जीता था, तो पूरे दक्षिण अफ्रीका के लिए वह हीरो बन गए थे। बिना पैरों हवा से बातें करने वाला यह शख्स कितना खतरनाक है, इस बात का पता चला इस वर्ष वैलेंटाइन डे के दिन। पूरी दुनिया जब इस दिन को प्रेम दिवस के रूप में मना रही थी, ठीक उसी दिन पिस्टोरियस ने बड़ी बेरहमी से अपनी ही प्रेमिका की हत्या कर दी। देश के चहेते खिलाड़ियों में से एक पिस्टोरियस एक झटके में सबसे बुरा चेहरा बन गए।

सीख : समाज में एक मुकाम हासिल करने के बाद अगर आप चाहते हैं कि इतिहास आपको हीरो के रूप में याद रखे तो आपको प्रतिमान भी ऊंचे स्थापित करने
होंगे। लांस आर्मस्ट्रांग अगर डोपिंग की बजाए साहस के सहारे अपनी प्रतियोगिताएं जीतते तो आज उनकी इतिहास की किताब से जीत के पन्ने फटे हुए नहीं
होते। ऑस्कर पिस्टोरियस अगर अपने ऊपर उस हैवान को हावी नहीं होने देते, तो आज वह साहस और जीवटता की मिसाल होते।


कानून की नजर में सब समान

बीता वर्ष इसलिए भी खास है क्योंकि विभिन्न क्षेत्रों की आला हस्तियों को सलाखों की पीछे जाना पड़ा। लालू प्रसाद यादव को चारा घोटाले में, संजय दत्त को हथियार रखने के मामले में, तलवार दंपती को बेटी की हत्या करने के जुर्म में जेल हुई। आसाराम हो या तेजपाल, कोई भी नहीं बच पाया। इन्हें बचाने के लिए तर्क दिए गए कि समाज में इनका रसूख है। ये लोग कहीं भाग नहीं जाएंगे। समाज को इनसे खतरा नहीं है, लेकिन कोई दलील नहीं चली।

सीख : यदि अपराध किया है तो उसकी सजा भुगतनी ही होगी। कानून की नजर में सब समान हैं। गलती की है तो स्वीकार करें क्योंकि रसूख और प्रभाव से कानून को गुमराह नहीं किया जा सकता।

2013 के कुछ अहम अदालती फैसले

गे सेक्स फिर अपराध 

सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिकता को एक बार फिर अपराध की श्रेणी में ला दिया है। दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए शीर्ष अदालत ने कहा कि भारत दंड संहिता की धारा-377 कहीं से असंवैधानिक नहीं है। अगर सरकार को लगता है कानून में बदलाव करने की जरूरत है तो वह ऐसा करने के लिए स्वतंत्र है। महज इस आधार पर कि समाज बदल गया है, ऐसे में समलैंगिकता को कानूनी वैधता देना सही नहीं है। 


दोषी करार देने पर सांसद व विधायक की सदस्यता रद्द 

सुप्रीम कोर्ट ने बीते साल ऐतिसाहिक फैसला सुनाया। दोषी ठहराए गए सांसद या विधायकों की तत्काल सदस्यता रद्द करने का फैसला। इस फैसले से राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव और कांग्रेस सांसद रशीद मसूद की सदस्यता गई। 

जेल में रहते चुनाव लड़ने पर पाबंदी 

शीर्ष अदालत ने 2013 में जन प्रतिनिधि कानून की बारीकियों को स्पष्ट करते हुए जेल में रहकर चुनाव लडऩे पर पाबंदी लगा दी। हालांकि बाद में संसद ने कानून में बदलाव कर लिया। 

लाल बत्ती के बेजा इस्तेमाल पर चला ‘डंडा’

पिछले साल 10 दिसंबर को देश भर में लाल बत्ती के बेजा इस्तेमाल पर नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा कि इसका इस्तेमाल केवल संवैधानिक पदों पर आसीन लोग ही कर सकेंगे। सांसद और विधायकों को अपने वाहनों में लाल बत्ती लगाने का अधिकार नहीं। उल्लंघन करने वालों पर भारी जुर्माना करने का निर्देश।

देश की राजनीति ने इस साल एक ऐतिहासिक बदलाव देखा

देश की राजनीति ने इस साल एक ऐतिहासिक बदलाव देखा है। परंपरागत राजनीति से परे उसूलों के सहारे परिवर्तन की राजनीति ने राजधानी दिल्ली की सत्ता पर पिछले 15 साल से काबिज 128 साल पुरानी पार्टी को बाहर का रास्ता दिखा दिया। हो सकता है कि ऐसा बदलाव लेकर आने वाली आम आदमी पार्टी के पास सिद्धांत ना दिखें लेकिन क्या ऐसा पहली बार हो रहा है कि राजनीति में बिना सिद्धांतों के सहारे आने वाली पार्टी सत्ता में आई हो। 

कांग्रेस के महासचिव जनार्दन द्विवेदी कहते हैं कि बिना विचारधारा के कोई पार्टी आगे नहीं बढ़ सकती और अगर कोई पार्टी नारों के सहारे सत्ता पर काबिज होती है अराजकता, अव्यवस्था फैलेगी। अब सवाल ये उठते हैं कि जनार्दन द्विवेदी जी सियासत के किन सिद्धांतों की बात कर रहे हैं, वो सिद्धांत जिनके सहारे कांग्रेस और बीजेपी आज तक सियासत करती आई है? सियासत में अक्सर दिलचस्प वाकये नज़र आते हैं। शख्स पार्टी बदलता है तो उसकी शख्सियत बदल जाया करती है। इत्तेहादे मिल्लत काउंसिल के तौकीर रज़ा जब मुलायम सिंह यादव के साथ होते हैं तो उन्हें दंगाई समझा जाता है लेकिन जब वो किसी और पार्टी का झंडा बुलंद करने लगते हैं तो वो ईमानदारी, विकास और बदलाव की राजनीति करने लग जाते हैं। जनार्दन द्विवेदी वैसे लोगों के लिए क्या कहेंगे जो बाबरी विध्वंस के दौरान बीजेपी और संघ की कटु आलोचना कर रहे थे लेकिन बाद में बीजेपी के टिकट पर ही चुनाव लड़ते नज़र आए और वो कौन सी विचारधारा की राजनीति थी कि बाबरी विध्वंस के आरोपी गैर बीजेपी दलों से जा मिले। तब किस विचारधारा की राजनीति हो रही होती है जब भ्रष्टाचार के आरोपी जब तक साथ रहते हैं तो ठीक रहते हैं और जब साथ छोड़ देते हैं तो भ्रष्ट नज़र आने लगते हैं। 

सच तो ये है कि देश के दोनों बड़े राष्ट्रीय दल विचारधारा और सिद्धांत की बात सिर्फ जनता को गुमराह करने के लिए करते हैं, इनकी विचारधारा की राजनीति दिखावे की राजनीति है। इनका सिर्फ एक मकसद है, वो है सत्ता हासिल करना, इसके लिए विचारधारा से समझौता करना तो बहुत छोटी बात है, वो इसके लिए कुछ भी करने और किसी भी हद तक जाने को तैयार नज़र आते हैं। सच तो ये है कि महात्मा गांधी, दीनदयाल उपाध्याय, श्यामा प्रसाद मुखर्जी और डा. केशव बलिराम हेडगेवार के आदर्शों की बात करने वाले, उनके सिद्धातों की सियासत करने वाले दोनों राष्ट्रीय दल इन महापुरुषों के आदर्शों की तिलांजलि दे चुके हैं। 

देश के दोनों राष्ट्रीय दलों के राजनैतिक इतिहास पर नज़र डालें तो इनके द्वारा सैकड़ों बार मूल्यों, सिद्धांतों की बलि दी जाती रही है। इन्होंने सत्ता हासिल करने के लिए, सत्ता में बने रहने के लिए हर समझौते किए हैं। शिबू सोरेन, सुखराम, तसलीमुद्दीन सरीखे नेता, अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में बनी एनडीए की सरकार, मनमोहन सिंह और एचडी देवेगौड़ा के नेतृत्व नें चली कांग्रेस की सरकार में सम्मानित पदों पर रहे हैं। देश की दो बड़ी पार्टियों के सिद्धांत और सियासी समझौते की कई बानगी देश के इतिहास में मौजूद हैं। जरूरत पड़ने पर भिंडरावाले को मान्यता देने और नक्सली आंदोलन चलाने वालों से सांठगांठ करके सत्ता हथियाने के आरोप भी कांग्रेस पर लगते रहे हैं। कांग्रेस की ही सरकार थी जब झारखंड मुक्ति मोर्चा घूस कांड सामने आया। वहीं, पहली बार टेलीकॉम घोटाला सामने आने पर नरसिम्हा राव के कार्यकाल में जिस बीजेपी ने कई दिनों तक संसद नहीं चलने दी बाद में उसी पार्टी को इस घोटाले के जनक सुखराम की पार्टी हिमाचल विकास कांग्रेस के साथ हिमाचल में सरकार बनाने में बीजेपी को कोई गुरेज नहीं रहा। 

देश के इतिहास में पहली बार डेढ़ दर्जन अपराधियों और दागियों को कल्याण सिंह के मुख्यमंत्री रहते उस वक्त बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष रहे राजनाथ सिंह की पहल पर उत्तर प्रदेश के मंत्रिमंडल में जगह दी गई। जो मुलायम सिंह यादव खुद को सांप्रदायिक ताकतों के खिलाफ बताते आए हैं, जिन्होंने सेकुलरिज्म का नारा बुलंद किया हुआ है उन्होंने भी कभी परोक्ष को कभी सीधे-सीधे बाबरी विध्वंस के नायक कल्याण सिंह से गठबंधन किया है। क्षेत्रीय दलों की स्थिति तो पहले से बेहद विवादास्पद रही है। डीएमके, एडीएमके, आईएनएलडी, अकाली दल और वाईएसआर कांग्रेस के तमाम नेताओं के विरुद्ध पहले से ही आर्थिक और प्रशासनिक भ्रष्टाचार के मामले देश की अलग-अलग अदालतों में लंबित हैं। ऐसी स्थिति में भ्रष्टाचार, कुशासन का विरोध करके महज एक साल पहले पैदा हुई `आप` के हाथों दिल्ली चुनाव में शर्मनाक हार का सामना कर चुकी कांग्रेस और बीजेपी किस मुंह से आम आदमी पार्टी से सिद्धांत और मूल्यों की राजनीति की अपेक्षा कर रही है।सिद्धांत, सियासत और सत्ता

राजनीति में जिस तरह से आइडियोलॉजी की बात जनार्दन द्विवेदी कर रहे हैं उससे ऐसा लगता है कि वो दिल्ली युनिवर्सिटी के क्लासरूम में हैं, क्योकि इस तरह की बातें क्लासरूम में ही अच्छी लगती हैं। एक वक्ता के रूप में तो सियासत में विचारधारा को लेकर उनके ये विचार अच्छे लग सकते हैं लेकिन एक राजनीतिक पार्टी के महासचिव के रूप में नहीं। विचारधाराओं को ताक पर रखने वाले सैकड़ों सियासी तालमेल के गवाह बन चुके जनार्दन द्विवेदी ये बयान देकर राजनीति के मंझे हुए लोगों के बीच हंसी के पात्र बनकर रह गए हैं। ये सच है कि जो आम आदमी पार्टी बनी है उसके पास सांप्रदायिकता, आर्थिक नीति, विदेश नीति को लेकर कोई स्पष्ट राय नहीं है, लेकिन करीब साल भर पुरानी पार्टी से इतनी अपेक्षा क्यों? 128 पुरानी कांग्रेस पार्टी, विचारधारा के मसले पर कांग्रेस से अलग होकर भारतीय जनसंघ, फिर बीजेपी बनने वाली पार्टी और क्षेत्रीय दलों के पास भी देश से जुड़े कई अहम मुद्दों पर कोई स्पष्ट राय नहीं है तो आम आदमी पार्टी से इतनी अपेक्षा क्यों? 

जो लोग खुद को भारतीय राजनीति के पुरोधा, दर्शनशास्त्री समझते हैं उनको एक बार बीएसपी के इतिहास पर भी नज़र डाल लेनी चाहिए। जब कांशीराम ने वामसेफ, डीएस4 (दलित शोषित समाज संघर्ष समिति) और फिर बहुजन समाज पार्टी का गठन किया था तब उस पार्टी के पास भी विचारधारा नहीं थी, उन्होंने भी मुद्दों से राजनीति की शुरुआत की, और बीएसपी भी ऐसी इकलौती पार्टी नहीं है। ऐसे में जनार्दन द्विवेदी जी को अपने देश के राजनैतिक इतिहास में झांकना चाहिए। क्या जनता द्वारा चुनी गई आम आदमी पार्टी को अराजक कहना संविधान का अपमान नहीं है? क्या ये जनादेश का अपमान नहीं है? क्या ये दिल्ली की डेढ़ करोड़ जनता का अपमान नहीं है? जिस कांग्रेस पार्टी ने सरकार बनाने में आम आदमी पार्टी को जनादेश की दुहाई देकर समर्थन दिया है उस पार्टी के महासचिव जनार्दन द्विवेदी आखिर इस तरह के बयान देकर कहना क्या चाहते हैं?