Saturday, 28 December 2013

खामोश सफ़र!!!!!!: सरकारें बदलती रही हैं लेकिन रामलीला मैदान वहीं का ...

खामोश सफ़र!!!!!!: सरकारें बदलती रही हैं लेकिन रामलीला मैदान वहीं का ...: नई दिल्ली का रामलीला मैदान आज़ादी की लड़ाई, पाकिस्तान पर जीत, इमरजेंसी, राममंदिर आंदोलन और जनलोकपाल जैसे अनगिनत ऐतिहासिक हलचलों का गवाह रहा ...

सरकारें बदलती रही हैं लेकिन रामलीला मैदान वहीं का वहीं

नई दिल्ली का रामलीला मैदान आज़ादी की लड़ाई, पाकिस्तान पर जीत, इमरजेंसी, राममंदिर आंदोलन और जनलोकपाल जैसे अनगिनत ऐतिहासिक हलचलों का गवाह रहा है. लेकिन आमतौर पर आंदोलन के मूड में दिखने वाला रामलीला मैदान शनिवार को जीत की खुशी में झूम रहा था.
शनिवार को इसी रामलीला मैदान में मात्र बारह महीने पुरानी आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने और दिल्ली के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली. और वे दिल्ली के सातवें मुख्यमंत्री बन गए.
यही वजह थी कि अन्ना के जनलोकपाल आन्दोलन के विपरीत इस बार पुलिस का रुख भी दोस्ताना था और मंच से अरविंद केजरीवाल के भाषण में भी सत्ता की नरमी महसूस की जा सकती थी.
जनलोकपाल आंदोलन करीब ढाई साल के अपने सफर में आंदोलन से राजनीतिक दर और फिर दिल्ली की सत्ताधारी पार्टी बन गया.
बदलाव के एक अन्य पहलू को इस बात से समझा जा सकता है कि रामलीला मैदान में छाई रहने वाली टोपी पर लिखा स्नोगन 'मैं भी अन्ना' से बदलकर 'मैं हूं आम आदमी' हो गया.
रामलीला मैदान में बड़ी तादात में जुटे समर्थक अरविंद के भाषण में क्रांति और ऐतिहासिक बदलाव की झलक देख रहे थे.
लेकिन दिल्ली का रामलीला मैदान तो जिन्ना, जयप्रकाश से लेकर बाबा रामदेव तक, अनगिनत आन्दोलनों और क्रांतियों के ऐलान और उनकी अंतिम परिणिति का गवाह रहा है.
कहा जाता है कि इस मैदान को अंग्रेज़ों ने वर्ष1883 में ब्रिटिश सैनिकों के शिविर के लिए तैयार करवाया था.
समय के साथ-साथ पुरानी दिल्ली के कई संगठनों ने इस मैदान में रामलीलाओं का आयोजन करना शुरू कर दिया, फलस्वरूप इसकी पहचान रामलीला मैदान के रूप में हो गई.
दिल्ली के दिल में इससे बड़ी खुली जगह और कोई नहीं थी इसलिए रैली जैसे बड़े आयोजनों और आम जनता से सीधे संवाद के लिए ये मैदान राजनेताओं का पसंदीदा मैदान बन गया.
गुलाम भारत और आज़ाद भारत के इतिहास में ऐसे मौकों की कोई कमी नहीं है जब रामलीला मैदान ने अपना नाम दर्ज न कराया हो.
इंदिरा गांधी ने पाकिस्तान से युद्ध की जीत का जश्न इसी मैदान पर मनाया था
ये रामलीला मैदान देश के इतिहास के बदलने का गवाह रहा है.
आज़ादी की लड़ाई के दौरान महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरू, सरदार पटेल और दूसरे नेताओं के लिए विरोध जताने का ये सबसे पसंदीदा मैदान बन गया था.
इसी मैदान पर मोहम्मद अली जिन्ना से जवाहर लाल नेहरू तक और बाबा राम देव से लेकर अन्ना हज़ार तक सारे लोग इसी मैदान से क्रांति की शुरुआत करते रहे हैं.
कहा तो ये भी जाता है कि यही वो मैदान है जहां वर्ष 1945 में हुई एक रैली में भीड़ ने जिन्ना को मौलाना की उपाधि दे दी थी.
लेकिन मोहम्मद अली जिन्ना ने मौलाना की इस उपाधि पर भीड़ से नाराज़गी जताई और कहा कि वो राजनीतिक नेता है न कि धार्मिक मौलाना.
इस मैदान का इस्तेमाल सरकारी रैलियों और सत्ता के खिलाफ आवाज़ बुलंद करने जैसी दोनों ही परिस्थितियों में किया गया.
दिसंबर 1952 में रामलीला मैदान में जम्मू-कश्मीर के मुद्दे को लेकर श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने सत्याग्रह किया था. इससे सरकार हिल गई थी. देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने साल 1956 और 57 में मैदान में विशाल जनसभाएं की.
जयप्रकाश नारायण ने इसी मैदान से कांग्रेस सरकार के ख़िलाफ़ हुंकार भरी थी
28 जनवरी, 1961 को ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ ने रामलीला मैदान में ही एक बड़ी जनसभा को संबोधित किया था.
26 जनवरी, 1963 में प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की उपस्थिति में लता मंगेशकर ने एक कार्यक्रम पेश किया.
वर्ष 1965 में पाकिस्तान के खिलाफ लड़ाई में तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने इसी मैदान पर एक विशाल जनसभा में 'जय जवान, जय किसान' का नारा एक बार फिर दोहराया था.
साल 1972 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने बांग्ला देश के निर्माण और पाकिस्तान से युद्ध जीतने का जश्न मनाने के लिए इसी मैदान में एक बड़ी रैली की थी और जहां उन्हें जनता का भारी समर्थन मिला था.
25 जून 1975 को इसी मैदान पर लोकनायक जय प्रकाश नारायण ने विपक्षी नेताओं के साथ ये ऐलान कर दिया था कि इंदिरा गांधी की तानाशाही सरकार को उखाड़ फेंका जाए.
ओजस्वी कवि रामधारी सिंह दिनकर की प्रसिद्ध पंक्तियां, "सिंहासन खाली करो कि जनता आती है" यहाँ गूँजा और उसके बाद विराट रैली से डरी सहमी इंदिरा गांधी सरकार ने 25 -26 जून 1975 की दर्मयानी रात को आपातकाल का ऐलान कर दिया था.
फरवरी 1977 में विपक्षी पार्टियों ने एक बार फिर इसी मैदान को अपनी आवाज़ जनता तक पहुंचाने के लिए चुना.
जनता पार्टी के बैनर तले बाबू जगजीवन राम के नेतृत्व में कांग्रेस छोड़कर आए मोरारजी देसाई, चौधरी चरण सिंह और चंद्रशेखर के साथ भारतीय जनता पार्टी के तत्कालीन रूप जनसंघ के नेता अटल बिहारी वाजपेयी इसी मैदान के मंच पर एक साथ नज़र आए.
1980 और 90 के दशक के दौरान विरोध प्रदर्शनों की जगह बोट क्लब बन गई थी लेकिन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव के कार्यकाल के दौरान बोट क्लब पर प्रदर्शन पर रोक की वजह से इसी मैदान को भारतीय जनता पार्टी ने राम मंदिर आंदोलन के शंखनाद के लिए चुना.
यहां पर कांग्रेस, भाजपा सहित अन्य दलों, संगठनों व धार्मिक संगठनों के कई ऐतिहासिक कार्यक्रम होते रहे हैं.
ये वो ही रामलीला मैदान है जहां बाबा रामदेव ने काले धन और भ्रष्टाचार के खिलाफ अपना अनशन किया था लेकिन 5 जून 2011 उनके अनशन पर दिल्ली पुलिस ने लाठियां बरसा कर उन्हें वहां से हरिद्वार भेज दिया था.
भविष्य के गर्भ में क्या छिपा है, कोई नहीं जानता लेकिन हम इतना तो कह ही सकते हैं कि देश की सरकारें बदलती रही हैं लेकिन रामलीला मैदान वहीं का वहीं है.

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Thanks & best regards

 vijay kumar rai
 8802794703

Thursday, 19 December 2013

आखिर बेटियां हैं आपकी


रात 1:20 बजे, साल जाते जाते हमारे परिवार को एक और सौगात दे गया, मामा बनने के साथ ही इस साल ''मेरे घर आई दूसरी नन्हीं परी',, इसे उस मां की गोद मिली जो सबसे ज्यादा पढ़ी लिखी है, अभी कुछ दिन बाद उसे बड़की मस्टराइन कहकर चिढ़ाएंगे भी हम, अपने घर में हम ही सबसे कम पढ़े लिखे....सिर्फ स्नातक, लड़की के एक और मामा की तरफ से कुछ पंक्तियां आपके साथ साझा कर रहे हैं- छुटकी का फ़ोन आया, बहुत दिनों से बात नहीं हुई थी शायद इसीलिए, दुआ सलाम हुआ और मैंने पूछा…कैसे याद किया इस वक्त, दीवाल पर लगी घड़ी पर बात करते करते दस बजे रहे थे, छुटकी तो इस वक्त कभी फ़ोन नहीं करती आज कोई ख़ास खबर है शायद…रिजल्ट आ गया लगता है…कॉलेज में था कोई प्ले का रिहर्सल…जैसा की कॉलेज में होते रहते हैं, वो इस वक्त आ रही थी हॉस्टल वापस....उसने कहा, आधे घंटे का रास्ता है.. ट्रैफिक भी कम होता है यहां…तो आटो में बोर हो रही थी…सोचा आपसे बात कर लूं…टाइम पास हो जायेगा, यहां वहां की कुछ बातें कीं.. और बीच में गैर इरादतन बोली…भैया बहुत याद आ रही है आज आपकी…स्कूल में आप ही मुझे लेने आते थे ना, इसी मौके पर क्या कहा उसने…और क्या कह दिया छुटकी ने…उसकी आवाज की कंपकपाहट मेरी रीढ़ की हड्डी से होकर मेरे रोंगटों से बाहर निकली…और उसके बाद वो बस छुपाती रही अपना डर…अपनी खिलखिलाहट भरी शरारतों में.. मैं भी डांटता रहा उसकी शैतानियों पर.. हमेशा की तरह…उलझाये रखा उसे बातों में जब तक वो हॉस्टल ना पहुंच गई, या फिर शायद वो भी इसी कोशिश में थी, शायद क्यों…यकीनन…वार्डेन से बात कर ही ली किसी बहाने से, कोई शक कोई गुंजाइश मुझे आज सोने ना देती शायद…और मुझे नींद नहीं आई उस रात, सिर्फ एक कंपकपाती सी आवाज गूंज रही थे मेरे जेहन में …भैया बहुत याद आ रही हैं आज आपकी …स्कूल में तो आप ही मुझे लेने आते थे ना.. इसी मौके पे, छुटकी आज कितनी बड़की बात सिखा गई मुझे, मैं एक लड़का जिसके साथ कुछ होने की संभावना नगण्य पर खुदा ने मुझे किसी छुटकी से नवाजा है.. या फिर बड़की या भाभी मामी मौसी बुआ, उन चार दरिंदों के खिलाफ मैं लड़ूं या ना लड़ूं …लेकिन उस कंपकपाती हुई आवाज के लिए.. उस डर के खिलाफ जो मैंने महसूस किया…और उस नींद के लिए जो मुझे आई ही नहीं, मैं जरूर लडूंगा…क्योंकि ये मेरी लड़ाई है और आपकी भी, या फिर आप इस बात को समझने के लिए अपनी छुटकी के फ़ोन का इंतज़ार कर रहे हैं… अगर हां... तो मैं दुआ मांगूंगा खुदा से कि जो फ़ोन आपके पास आये... वो छुटकी का ही हो... किसी पुलिस स्टेशन या हॉस्पिटल का नहीं फैसला आपका…आखिर बेटियां हैं आपकी

सेक्स सर्वे 2013: मेरी देह, मेरा हक्क


नजर तेरी बुरी और परदा मैं करूं? मेरी स्कर्ट से ऊंची मेरी आवाज है। जवान लड़कियों को अकसर सलाह दी जाती है कि यौन उत्पीडऩ से बचने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि बदन दिखाऊ कपड़े न पहनें. जुलाई में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की ओर से हॉस्टल में रहने वाली लड़कियों को दिए गए एक नोटिस में कहा गया था कि ‘‘सलीकेदार कपड़े’’ पहनें जैसे, सलवार-कमीज और दुपट्टा, वरना उन्हें 500 रु. जुर्माना देना होगा.

या फिर महिलाओं को नसीहत मिलती है कि वे रात 8 बजे के बाद घर से न निकलें-यह बात शीला दीक्षित ने तब कही थी जब पिछले साल 16 दिसंबर की घटना पर दिल्ली की जनता गुस्से में थी.

जाहिर है, यौन हिंसा से बचने के लिए यह कोई हल नहीं. इंडिया टुडे ग्रुप-एमडीआरए के 2013 के सेक्स सर्वे से पता चलता है कि शहरी भारत के पुरुषों की पुरुषवादी सोच उनके डीएनए में ही है. 36 फीसदी शहरी भारतीय पुरुषों का मानना है कि बलात्कार के लिए महिलाओं के बदन दिखाऊ कपड़े जिम्मेदार हैं; 33 फीसदी इसके लिए विकृत मानसिकता को दोषी ठहराते हैं.

 इससे भी ज्यादा चौंकाने वाला तथ्य यह है कि कम कपड़ों को यौन हिंसा की वजह मानने की थ्योरी शिक्षा के स्तर के साथ बढ़ती जाती है, यानी बदन दिखाऊ कपड़ों को यौन हिंसा की वजह मानने वालों में शिक्षित लोगों की संख्या ज्यादा है. इस तरह के 35 फीसदी उत्तरदाता हाइस्कूल तक पढ़े थे जबकि पोस्ट ग्रेजुएट उत्तरदाताओं की संख्या 45 फीसदी थी.

पीड़िता को ही जिम्मेदार बताने वालों में सभी वर्ग के लोग शामिल थे-चाहे वह पांच सितारा होटल की पार्टियों में जाने वाला वर्ग हो, कॉलेज के कैंपस हों या बसों में सफर करने वाला वर्ग. इस तरह की बातें घरों के भीतर और बाहर हर जगह सुनने को मिलीं.

16 दिसंबर के आंदोलन के दौरान हाथ से लिखा एक नारा थाः हमसे मत कहो कि बलात्कार न कराएं. पुरुषों से कहो कि हमारा बलात्कार न करें.

आखिर वह क्या बात है जो पुरुषों को औरतों की थोड़ी-सी ड्रेस ऊपर सरकने या स्तन की झलक मिलते ही, उनकी सोचने-समझने की शक्ति खत्म कर देती है और उन्हें कमजोर बना डालती है? शायद इसकी वजह यही हो सकती है कि पॉपुलर कल्चर में हर चीज इस तरह से रची गई है जिससे पुरुष प्यार के नाम पर किसी भी हद से गुजरने का खुद का अधिकार समझे.

इस साल की हिट फिल्म रांझणा को ही लें, जिसमें एक लड़की को परेशान करने की बात को दीवानगी दिखाकर पेश किया गया है, भले ही लड़की को उस लड़के में कोई दिलचस्पी न हो. लड़का उसका पीछा करता है, जबरन हाथ पकड़ लेता है, लड़की के लिए अपने हाथ की कलाई काट लेता है, सिर्फ इसलिए कि उसने अपना दिल उस लड़की को दे रखा है.

(जैसा कि उसका दोस्त उससे कहता है, ‘‘तुम्हारा प्यार न हो गया, यूपीएससी का एग्जाम हो गया. दस साल से पास ही नहीं हो रहा. लगता है, जैसे दस साल से यूपीएससी की परीक्षा दिए जा रहा है.’’) या फिर राऊडी राठौर को लें, जिसमें हीरो हीरोइन को मेरा माल कहता है और इशारों में बताता है कि लड़की की स्पेशल टैलेंट तो उसकी कमर में है.

प्रेम प्रसंग के कुछ मामलों में दीवानगी हिंसा का रूप अख्तियार कर लेती है. फिल्म दबंग का मशहूर डायलॉग इसे बड़ी अच्छी तरह दिखाता हैः थप्पड़ से डर नहीं लगता साहब, प्यार से लगता है. हिंदी फिल्मों में हीरोइनों के साथ उग्रता दिखाने वाले इस तरह के हीरो अब विलेन नहीं माने जाते हैं.

बल्कि वे दबंग हीरो माने जाते हैं, जैसा फिल्म इशकजादे में उभरते ऐक्टर अर्जुन कपूर को हीरो के रूप में दिखाया गया है. वह एक मुस्लिम लड़की को धोखा देकर उससे शारीरिक संबंध बना लेता है. प्रेम अपनी सीमा लांघकर कब हिंसा का रूप ले लेता है? हनी सिंह के गानों और मर्दानगी, पर नायकों के बेलगाम संवादों (फिल्म गोलियों की रासलीला राम-लीला) ने इस सीमा को पूरी तरह से मिटा डाला है.

सच्चाई बहुत ही कड़वी है. सेक्स सर्वे से पता चलता है कि विवाह होने पर पुरुष पत्नी के साथ सेक्स को अपना अधिकार मानने लगता हैः सर्वे में शामिल 79 फीसदी पुरुषों ने माना कि सेक्स उनका वैवाहिक अधिकार है.

तहलका की घटना के बाद कुछ पुरुषवादियों की शिकायत है कि बेडरूम का अपराधीकरण हो रहा है. यह वह समय है जब उन्हें समझ आ रहा है कि बेडरूम में जो होता है, वह अब बेडरूम तक सीमित नहीं है.

Wednesday, 18 December 2013

अधर में पड़ी दिल्ली....

लोकसभा चुनावों के फाइनल से पहले सेमीफाइनल मुकाबला माने जा रहे विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पारी से हारी है। तीन राज्य में भाजपा को खुशी मिली और दिल्ली में आम आदमी पार्टी ने कमाल कर दिया। लेकिन हर जगह हार आई, तो कांग्रेस के खाते में।
दिल्ली विधानसभा की 70 सीटों में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। वहीं पहली बार राजनीति में कूदी आम आदमी पार्टी (आप) का प्रदर्शन बेहद चौंकाने वाला रहा।सबसे बड़ा उलटफेर नई दिल्ली सीट पर रहा, जहां मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को आप के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने 25 हजार से ज्यादा मतों से हरा दिया।मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को भाजपा की लगातार तीसरी बार सरकार बनाने का जनादेश सौंप दिया है। भाजपा के कई प्रमुख मंत्री चुनाव हार गए हैं, फिर भी भाजपा ने 2008 से भी ज्यादा सीटें हासिल करके कांग्रेस को करारा झटका दिया है।छत्तीसगढ़ के बारे में अक्सर कहा जाता रहा है कि वहां सत्ता की चाबी बस्तर के पास है, मगर विधानसभा के नतीजों ने इस मिथक को तोड़ दिया है। इस नक्सल प्रभावित आदिवासी क्षेत्र में सीटें गंवाने के बावजूद भाजपा छत्तीसगढ़ में डॉ. रमन सिंह की अगुवाई में लगातार तीसरी बार सरकार बनाने जा रही है।राजस्‍थान में भाजपा की चली आंधी ने उसे प्रदेश के इतिहास में सबसे अधिक सीटें जीतने वाली पार्टी बना दिया है। पार्टी की सफलता में महंगाई और भ्रष्टाचार से परेशान जनता पर मोदी फैक्टर के असर को खासा अहम माना जा रहा है।
दिल्ली विधानसभा चुनाव के नतीजों में किसी को स्पष्ट जनादेश नहीं मिला है। असल में ये नतीजे चौंकाने वाले हैं। तमाम एग्जिट पोल के दावों को झुठलाते हुए अरविंद केजरीवाल के नेतृत्‍व में आप ने 28 सीटें हासिल की हैं। भाजपा को 31 सीटें मिली हैं।
दिल्ली के दिल में राज करने वाली कांग्रेस को दिल्लीवासियों ने अपने दिलोदिमाग से बाहर निकाल फेंका। सीट जीतने के मामले में वह दहाई अंकों तक नहीं पहुंचती दिख रही। दिल्ली में कांग्रेस विरोधी माहौल कुछ ऐसा रहा कि शीला दीक्षित और उनके चार मंत्री अपनी सीट तक नहीं बचा पाए।आम आदमी पार्टी के लिए चुनावी राजनीति की इससे बेहतर शुरुआत कोई नहीं हो सकती। अरविंद केजरीवाल की झाड़ू ने शीला की कुर्सी साफ कर दी।यह साफ है कि राष्ट्रीय राजधानी की जनता ने भाजपा और आप को चुना है। और भड़ास निकाली शीला दीक्षित पर। लेकिन यह शीला से ज्यादा कांग्रेस की तरफ जनता की बेरुखी दिखाती है।ऐसा इसलिए, क्योंकि जिन मुद्दों पर जनता ने उन्हें आड़े हाथों लिया, उसके लिए काफी हद तक केंद्र की यूपीए सरकार जिम्मेदार है।
पड़ा। दिल्‍ली में शीला ने लंबी और धमाकेदार पारी खेली। और उनकी ताकत का खात्मा हुआ, तो उसका श्रेय भाजपा से कहीं ज्यादा आम आदमी पार्टी को जाता है! यह जरूर कहा जा सकता है कि बीते पांच साल में उनके रुख में कुछ तल्‍खी आई, जिसका खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ा। आम आदमी पार्टी के शानदार प्रदर्शन ने भारतीय जनता पार्टी के अरमानों पर पानी फेर दिया है। 28 सीटें हासिल करने के बाद ‘आप’ ने साफ किया है कि वह न तो किसी पार्टी का समर्थन करेगी और न ही किसी से समर्थन लेगी।
राजनीतिक उदासीनता के दौर में आम आदमी पार्टी की जीत अच्छाई की जीत है।अगर केजरीवाल की बात करें तो ना सिर्फ उनकी पार्टी चुनावी अखाड़े में पहली बार उतरी, बल्कि उन्होंने भी पहली बार चुनाव लड़ा। दिल्ली में कांग्रेस को लगातार तीन बार सत्ता दिलाने वाली पार्टी की दिग्गज नेता शीला दीक्षित के खिलाफ उन्होंने चुनाव लड़ने का ऐलान किया। अरविंद के पास एक सुरक्षित सीट से चुनाव लड़ने का विकल्प था, लेकिन वह शीला दीक्षित के राजनीतिक इतिहास से नहीं डरे। क्या होगा अगर पार्टी का नेता ही अपनी सीट हार जाए? ऐसा ‘अगर-मगर’ का सवाल केजरीवाल के जेहन में नहीं आया और जनता ने उनकी इस दिलेरी और साहस का सम्मान किया।कांग्रेस और बीजेपी सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी की बात करती हैं। लेकिन जब चुनाव आते हैं तो वो दोनों उम्मीदवारों के चयन के मामले में ईमानदारी की बजाय ‘जीतने की योग्यता’ को तवज्जो देती हैं। लेकिन केजरीवाल ने उन्हें गलत साबित कर दिया। पार्टी बनाते वक्त उन्होंने जनता से वादा किया कि वह किसी भी दागी व्यक्ति को टिकट नहीं देंगे। अन्य पार्टियों द्वारा आरोप लगाए जाने के बाद उन्होंने चुनाव से महज 4 दिन पहले पार्टी का एक उम्मीदवार हटा दिया। जाहिर है आम आदमी पार्टी को अपने उसूलों और आदर्शों की परवाह है।सब जानते थे कि केजरीवाल की पार्टी के पास एक ही चीज है- ईमानदारी। यही उसकी दौलत है और यही उसका विरोधी पार्टियों को मात देने का हथियार, इसलिए अन्य पर्टियों ने कई मर्तबा उनकी और उनकी पार्टी की छवि पर दाग लगाने की कोशिश की। कई बार खुद केजरीवाल और पार्टी के अन्य नेताओं को निशाना बनाते हुए उनके खिलाफ जांच कराई गई। यहां तक कि अन्ना हजारे ने भी पार्टी की सत्यनिष्ठा पर सवाल उठाए। लेकिन केजरीवाल डटे रहे और अपनी ईमानदारी और पारदर्शिता का सबूत देते रहे। थोड़े वोटों से हारने वाली शाजिया इल्मी पर जब एक स्टिंग ऑपरेशन के जरिए गलत ढंग से पैसे वसूलने के आरोप लगे तो उन्होंने उम्मीदवारी छोड़ने का फैसला कर लिया था। चुनावी मैदान में वह तभी वापस आईं जब ये पाया गया है कि उन्हें फंसाने के लिए स्टिंग ऑपरेशन की टेपों के साथ छेड़छाड़ की गई है। जनता ने यह सब देखा और ‘आप’ को समर्थन दिया, क्योंकि उसके लिए ईमानदारी काफी मायने रखती है।अधिकांश राजनीतिक पार्टियां युवाओं को सत्ता में भागीदारी की बात करती हैं। लेकिन सच तो यह है कि उनके ये जुमले सिर्फ होठों तक ही सीमित होते हैं। चुनावों में जब टिकट देने की बात आती है तो पार्टी आलाकमान दिग्गज और अनुभवी नेता को ही चुनता है। उनके मुताबिक राजनीति कूटनीति का खेल है, जो कि तजुर्बेकार नेता ही समझ सकते हैं। अगर वह युवा को टिकट देते भी हैं तो सत्ता और पार्टी की कमान उन्हीं उम्रदराज नेताओं के पास रहती है। लेकिन केजरीवाल इस स्थिति के उलट युवा वोटर और युवा उम्मीदवारों को तवज्जो दी। नतीजा सबके सामने है। दिल्ली विधानसभा का सबसे युवा सदस्य उन्हीं की पार्टी का है, जिसकी उम्र 25 साल है। जनता ने केजरीवाल के इस ‘युवा’ आदर्श पर मुहर लगाई।वैसे तो कांग्रेस और बीजेपी दोनों जनता से जुड़े मुद्दों की बात करते दिखते हैं। लेकिन चुनाव प्रचार के दौरान कांग्रेस ने भ्रष्टाचार के मुद्दे को दरकिनार कर दिया। बीजेपी ने इस मुद्दे को अपनी सुविधा और फायेद के मुताबिक भुनाया। इसी मुद्दे ने बीजेपी को अपना सीएम उम्मीदवार हर्षवर्धन को बनाने के लिए मजबूर कर दिया, जबकि केजरीवाल ने इस समस्या को एक बड़ा चुनावी मुद्दा बनाया। उन्होंने महंगी बिजली-पानी और आम जनता से जुड़ी समस्याओं को मुद्दा बनाया। साफ है कि ये विधानसभा चुनाव मोदी बनाम राहुल गांधी नहीं, बल्कि जनता बनाम व्यवस्था की जंग थे।
इस बार भाजपा की जीत और कांग्रेस की हार से बड़ी खबर अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली आम आदमी पार्टी का जोरदार तरीके से राजनीतिक पटल पर छा जाना है। जब आप ने राजनीतिक मैदान में कदम रखा था, तो प्रेक्षकों को यह अनुमान था कि यह पार्टी कांग्रेस और भाजपा के वोट काटेगी। किंतु ऐसी उम्मीद नहींथी कि जनता का व्यापक समर्थन उसे मिलेगा। दिल्ली में भाजपा के बाद आप का स्थान है और कांग्रेस बेहद कम सीटों के साथ तीसरे स्थान पर रही है। भाजपा को अपने पारंपरिक मत मिले, और राष्ट्रमंडल खेलों में गड़बड़ी, 16 दिसम्बर की भयावह घटना, महंगाई, बिजली दरों में बढ़ोत्तरी आदि से नाराज जनता ने कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर दिया और अपनी नाराजगी को मतों में तब्दील कर आप को आगे बढ़ाया। कांग्रेस संगठन ने भी शीला दीक्षित को एक तरह से अकेले ही मैदान में छोड़ दिया था। अगर कांग्रेस शीला दीक्षित की जगह किसी युवा चेहरे को सामने लाती, युवाओं की टीम के साथ काम करती तो मुमकिन है उसकी स्थिति थोड़ी बेहतर होती। राजस्थान और दिल्ली में एंटी इनकम्बेन्सी स्पष्ट देखने मिली है। जबकि मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में यह चुनावी कारक बेअसर दिखा।
आप को दिल्‍ली चुनाव में पहली बार में ही यह जीत यूं ही हासिल नहीं हुई है। इस चुनाव में दिल्‍ली में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी आप ने इसके लिए लोगों के बीच न केवल अपनी पहुंच बनाई, बल्कि बहुमत में आने पर स्‍वच्‍छ छवि वाली सरकार देने का भी आश्‍वासन दिया। इन सबके बीच अरविंद केजरीवाल एक हीरो बनकर उभरे। अरविंद केजरीवाल ने अपनी नौकरी छोड़ देश को भ्रष्‍टाचार मुक्‍त बनाने का संकल्‍प लिया और समाजसेवी अन्‍ना हजारे के नेतृत्‍व में यूपीए सरकार के खिलाफ आंदोलन शुरू कर दिया।
बहरहाल, चार राज्यों के विधानसभा चुनावों के परिणाम जनभावनाओं का आईना दिखला रहे हैं। भाजपा अपनी जीत से उत्साहित होकर 2014 के आम चुनावों में अपनी दावेदारी और मजबूती से करेगी और कांग्रेस हार के बाद आत्ममंथन करेगी। महंगाई नियंत्रित करने में बेबसी, भ्रष्टाचार के नित नए प्रकरण, जनता से सीधे संवाद की कमी, नेताओं का अहंकार, जनसामान्य से दूरी, सत्ता का घमंड और इलेक्ट्रानिक व नए मीडिया में भाजपा व आप के मुकाबले कमजोर उपस्थिति, ऊपरी तौर पर कांग्रेस की हार के ये कुछ कारण नजर आते हैं। यूं सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने इस जनादेश को स्वीकार करने के साथ हार के कारणों के विश्लेषण, आत्ममंथन की बात कही है, पर उनके लिए ऐसा करना तब तक आसान नहींहोगा, जब तक जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं की ईमानदार और सक्रिय फौज खड़ी नहींहोगी और दिग्गज नेताओं का उनसे प्रत्यक्ष संवाद नहींहोगा। भाजपा और कांग्रेस अब आम चुनावों की तैयारियों में जुट जाएंगे और देखने वाली बात यह होगी कि आम आदमी पार्टी क्या राष्ट्रीय स्तर पर भी इन दोनों पार्टियों को किसी तरह चुनौती देने की स्थिति में होती है? अगर ऐसा हुआ तो यह मानना होगा कि भारतीय राजनीति एक बार फिर निर्णायक करवट लेने वाली है।

भारतीय राजनीति में जातिवाद को बढ़ावा

भारतीय राजनीति में जातिवाद को बढ़ावा देने की शुरुआत भाजपा याने कि जनसंघ के जमाने से चली आ रही है। हिंदू और वह भी सिर्फ सवर्ण हिंदुओं की बात ही की जाती थी। हमारे गांव में एक सज्जन थे जिनके लिए कहा जाता था कि सारे संघ उनकी घर से पैदा हुए थे, मजाक तो यह भी चलती थी कि उनके घर बच्चा निक्कर पहनकर ही पैदा होता है।

जी हां, सवर्ण जाति के थे, भेदभाव उनकी रग-रग में समाया था। हमारे गांव के सबसे बड़े मंदिर के ट्रस्टी भी थे। एक बार बिजली का काम करने वाला गरीब मजूदर जो धाकड़ जाति का था, बल्ब ठीक करने के लिए उस मंदिर के गर्भ-गृह में प्रवेश कर गया। बस निक्कर में तूफान उठ खड़ा हुआ। अब धाकड़ शुद्र नहीं होते हैं, इस जाति के लोग सामान्यतया खेती करते हैं...। लेकिन सवर्ण तो सवर्ण उनके मंदिर में एक हिंदू गर्भ-गृह में चला गया? इन सज्जन ने उस गरीब का जीना मुश्किल कर दिया। उसके गरीब मां-बाप पैरों में गिर पड़े लेकिन टस से मस हो जाए तो फिर क्या कट्टरपंथी यूं ही बन जाते हैं? आप लोगों को आश्चर्य होगा कि मंदिर शुद्धि के लिए उस गरीब परिवार से ग्यारह हजार रुपये लिये गये जो कि उन्होंने अपना खेत बेचकर दिये?

हमारे गांव में भाजपा का सबसे ऊंचा झंड़ा इन्हीं सज्जन की हवेली पर लहराता है। पता नहीं कितनी बार हर छोटी-मोटी बात पर गांव को फसाद में फसा देना बड़ा आसान? किसी मुद्दे पर बाजार बंद करवाने निकले और मेरा भाई दुकान बंद कर ही रहा था, तब तक ये कट्टरपंथी आधमके और मेरे भाई के साथ छिना-झपटी कर दी, जब मेरे पिता को पता चला तो दुकान खोलकर बैठे और सभी निक्करों को ललकारा कि हिम्मत हो तो अब आओ?

हमारे यहां एक गरीब वर्ग है जो शाक-सब्जियां बेचकर रोजी-रोटी कमाते हैं। पता नहीं कितनी बार इन सब्जी बेचने वालों के खोमचे, टोकरे, झोपड़े जलाए गये होंगे। बचपन से सवर्ण जाति के इन कुछ लोगों द्वारा होता दमन देखता आया हूं, आज भी दुख होता है।

इंदिरा गांधी ने आपातकाल में शुद्रों को हिम्मत दी और उसका फर्क पड़ा। हमारे गांव के शुद्र भी बाजार में आने लगे, चाय की दुकान पर बैठकर चाय पीने लगे। कोई उन्हें कुछ कह नहीं सकता? जो कहने वाले थे वे सब तो अंदर थे और पुलिस का भय वह अलग। जब शुद्रों ने शादियों में अपने दुल्हे-दुल्हन को घोड़े पर निकालना शुरू किया तो बड़ा हंगामा हुआ, लेकिन कांग्रेस के भले नेताओं के सपोर्ट से सब कुछ ठीकठाक हो गया।

दूसरी जाति के प्रति इनकी नफरत तो जग-जाहिर है लेकिन अपने ही धर्म एक बहुत बड़े वर्ग को ये लोग आज भी अपने समान नहीं ला पाए? सदियों से शुद्रों ने जो दुख देखा है जब पढ़ने में आता है तो मन कांप उठता है...हारेमल जी आप वी.पी.सिंह और कांग्रेस को कोसते थकते नहीं, लेकिन मैंने अपनी आंखों से सवर्णों के ऐसे-ऐसे खेल देखे हैं कि भगवान का शुक्र मानता हूं कि भाजपा केंद्र में अपने दम पर कभी सरकार नहीं बना पाई और कभी बना भी नहीं पाएगी...कहते हैं उसकी लाठी में आवाज नहीं होती...।

महिलाएं पूछती हैं कहां है बदलाव

ठीक एक साल पहले 23 वर्षीय लड़की के साथ हुए क्रूर सामूहिक बलात्कार से लोगों में भड़के रोष और हजारों लोगों के सड़कों पर उतर आने के बाद संसद को नया बलात्कार-विरोधी कानून बनाने के लिए बाध्य होना पड़ा था लेकिन यदि राजधानी में महिलाओं की सुरक्षा की बात की जाए तो स्थिति में ज्यादा कुछ बदलाव नहीं आया है।

हालांकि केंद्र और राज्यों की सरकारें महिलाओं की सुरक्षा सुधारने के लिए कई कदम उठाए जाने का दावा करती हैं लेकिन विशेषज्ञ और कार्यकर्ताओं को नहीं लगता कि दिल्ली में महिलाओं को सुरक्षित महसूस करवाने में कुछ खास सफलता हासिल की गई है। दिल्ली सरकार ने महिलाओं के लिए एक हेल्पलाइन (181) जैसे कुछ उपायों की शुरुआत की थी लेकिन बसों और ऑटो में जीपीएस सिस्टम लगाने, महिलाओं के लिए विशेष गुलाबी ऑटो लाने और यातायात व्यवस्था में सुधार लाने का वादा अभी भी कागजों में ही है।

एक कामकाजी महिला भावना टुटेजा ने कहा कि मुझे अभी भी सार्वजनिक वाहनों से यात्रा करना सुरक्षित नहीं लगता। ऑटो चालक कई जगहों पर जाने से मना कर देते हैं। अभी भी मेरे इलाके में नियमित रूप से गश्त लगाती पीसीआर नहीं दिखती। दिल्ली पुलिस के आंकड़ों के अनुसार, 30 नवंबर तक राष्ट्रीय राजधानी में बलात्कार के कुल 1493 मामले दर्ज किए गए थे। यह संख्या वर्ष 2012 में दर्ज हुए बलात्कारों की संख्या से दोगुनी है। उत्पीड़न के दर्ज मामले भी पांच गुना बढ़कर 3,237 हो गए।

यहां तक कि 16 दिसंबर के सामूहिक बलात्कार की पीड़िता निर्भया के पिता भी इस बात पर दुख जाहिर करते हैं कि इतने ज्यादा शोरगुल के बावजूद बदलाव नहीं आया है। उन्होंने बताया कि उस समय बहुत ज्यादा विरोध प्रदर्शन हुए थे, कानूनों में भी बदलाव किए गए थे और पुलिस भी ज्यादा सक्रिय व चौकस हुई लेकिन क्या महिलाओं के खिलाफ अपराध रुक गए हैं हर दूसरे दिन बलात्कार और यौन उत्पीड़न की घटनाओं की खबर आ रही है। बदलाव आखिर है कहां मुझे तो कोई बदलाव नहीं दिखता। क्या आपको दिखता है।

इसी तरह के विचार जाहिर करते हुए सुमन राजपूत ने कहा कि आखिर यह किस तरह की मिसाल पेश की जा रही है, कि दोषियों को सजा सुनाई तो जाएगी लेकिन उन्हें कभी फांसी नहीं दी जाएगी। और अगर उन्हें सजा दी भी जाएगी तो वह भी वर्षों बाद। ऐसा ही तो पहले भी होता आया है। फिर हम कैसे कह सकते हैं कि कुछ बदलाव आया है।

केंद्र अप्रैल में एक विधेयक लेकर आया था, जिसके अनुसार बलात्कार के दोषियों को उम्रकैद और मौत की सजा का प्रावधान था। इसके अलावा तेजाब हमले, पीछा करने और अभद्र व्यवहार जैसे अपराधों के लिए भी कठोर सजाओं का प्रावधान किया गया था। दिल्ली में सामूहिक बलात्कार की घटना से पैदा हुए देशव्यापी गुस्से की पृष्ठभूमि में आपराधिक कानून (संशोधन) विधेयक-2013 लाया गया था और इसे आपराधिक अधिनियम (संशोधन) अधिनियम 2013 का नाम दिया गया था।

19 मार्च को लोकसभा और 21 मार्च को राज्यसभा में पारित किए गए इस कानून ने 3 फरवरी को जारी किए गए अध्यादेश की जगह ले ली है। बलात्कार जैसे अपराधों के खिलाफ कड़ा भय दिखाने के लिए नया कानून कहता है कि अपराधी को न्यूनतम 20 साल की कैद की कड़ी सजा सुनाई जा सकती है और इसे उम्रकैद तक में तब्दील किया जा सकता है। यहां उम्रकैद का मतलब अपराधी की मौत तक का समय है।

इस कानून ने पहली बार पीछा करने और अभद्र व्यवहार को एक से ज्यादा बार करने पर गैर-जमानती अपराध बताया है। तेजाब हमला करने वाले को 10 साल की जेल होगी। इस मामले में लड़की के साथ किए गए पाश्विक बर्ताव और रोंगटे खड़े कर देने वाले तरीके से अंजाम दिए गए इस अपराध को अदालत ने दुर्लभ से दुर्लभतम बताते हुए सामूहिक बलात्कार के चार दोषियों को सितंबर में मौत की सजा सुनाई गई थी।

कानून की छात्रा ज्योति भारद्वाज ने कहा कि पीड़िता के इस अकेले मामले में ही इंसाफ करने में फास्ट ट्रैक अदालत को 8 महीने लग गए जबकि ऐसे असंख्य मामले हैं, जो व्यवहारिक तौर पर उपेक्षित हो जाते हैं। सेंटर फॉर सोशल रिसर्च की निदेशक डॉक्टर रंजना कुमारी का मानना है कि पिछले कुछ सालों में हुई इन दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं का खामियाजा कांग्रेस सरकार को हाल के विधानसभा चुनावों में भुगतना पड़ा है।

एक अन्य महिला कार्यकर्ता कवित कष्णन ने कहा, मौत की सजा देने से वे लाखों महिलाएं संतुष्ट नहीं होंगी, जिन्हें रोजाना अपनी सुरक्षा और हिंसा से जुड़े मसलों से दो-चार होना पड़ता है और उन्हें इस बारे में कोई जवाब नहीं मिलता कि आखिर सरकार उनके लिए कर क्या रही है। हालांकि महिला कार्यकर्ताओं के एक वर्ग का मानना है कि कुछ शुरुआत तो हुई है और आने वाले सालों में स्थिति में सुधार की काफी उम्मीद है।

दिल्ली विधानसभा चुनाव में सियासती बिसात पर आकड़ों की कहानी

दिल्ली विधानसभा चुनाव में सियासती बिसात पर आकड़ों की कहानी
खास रिपोर्ट: विजय कुमार राय नई दिल्ली।। दिल्ली विधानसभा चुनाव की सियासी बिसात पर पास होने को हर कोई जोर आजमाईश कर रहा है। जनता की कसौटी पर खरा उतरने के लिए हर उम्मीदवार दिन-रात एक कर प्रचार में जुटे हैं। इस बीच दिल्ली चुनाव में कई ऐसे दिलचस्प पहलू भी सामने आए हैं जो देश की राजनीति का नया चेहरा दिखा रहें हैं। दिल्ली चुनाव में कुल 796 उम्मीदवार खड़े हैं। जिनमें से 117 उम्मीदवार करोड़पति हैं। लेकिन उनके पास पैन नंबर नहीं है।
एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफार्म की तरफ से जारी आंकड़ों के मुताबिक राजौरी गार्डन से कांग्रेस की उम्मीदवार धनवंती चंदीला की संपत्ति 55 करोड़ की है। लेकिन ये इनकम टैक्स नहीं भरती हैं।
ओखला से कांग्रेस के ही उम्मीदवार आसिफ मोहम्मद खान की आयकर रिर्टन भरने में दिलचस्पी नहीं दिखाते। इनकी संपत्ति 13 करोड़ की है।
इसके अलावा घोंडा सीट से आप उम्मीदवार दाताराम की संपत्ति 4 करोड़ की है ये भी इनकम टैक्स भरने से कतराते हैं।
2013 के विधानसभा चुनावों में सबसे अमीर उम्मीदवार शिरोमणी अकाली दल के मनजिंदर सिंह सिरसा हैं। सिरसा के पास करीब 235 करोड़ की संपत्ति है और ये राजौरी गार्डन विधानसभा सीट से चुनाव लड़ रहे हैं।
अमीरों की लिस्ट में दूसरे नंबर पर मोती नगर विधानसभा सीट से कांग्रेस उम्मीदवार सुनील गुप्ता हैं। इनके पास 164 करोड़ रुपये की संपत्ति है।
143 करोड़ की संपत्ति के साथ दिल्ली कैंट से कांग्रेस उम्मीदवार अशोक कुमार जैन अमीरी के मामले में तीसरे पायदान पर हैं।
वही अमीरों के अलावा सबसें गरीबों की लिस्ट भी है जिसमें राष्ट्रीय उलेमा काउंसिल के आलम खान ने अपनी संपत्ति शून्य बताई है। आलम खान मुंडका सीट से चुनाव लड़ रहें हैं।
कोंडली विधानसभा सीट से सीपीआई–एमएल के कोंडली सीट से उम्मीदवार रामरूप 2000 रुपये की संपत्ति के साथ गरीबी की लिस्ट में दूसरे नम्बर पर हैं।
जबकि वजीरपुर से सीपीआई–एमएल के ही उम्मीदवार मन्नू कुमार की संपत्ति 3 हजार रूपये है और वो गरीब उम्मीदवारों की लिस्ट में तीसरे नम्बर पर है।
गरीबी अपनी जगह पर कायम हैं और पिछले 5 साल में कई नेताओं ने अपनी इनकम हजारों फीसदी बढ़ाई है। इनमें सबसे पहला नाम बिजवासन विधानसभा सीट से बीजेपी विधायक सत प्रकाश का है। सत प्रकाश ने पिछले पांच सालों में 1652 फीसदी संपत्ति का इजाफा किया है।
वहीं इस बार दिल्ली में हर राजनीतिक पार्टी आंकड़ों के हिसाब से ना महिलाओं को ज्यादा मौका मिला है और ना ही पढ़े लिखे उम्मीदवारों पर दिलचस्पी दिखाई गई है।
एसोसिएशन आफ डेमोक्रेटिक रिफार्म की तरफ से जारी आंकड़ों के मुताबिक इस बार विधानसभा चुनाव में 60 फीसदी ऐसे उम्मीदवार हैं जो ग्रैजुएट भी हैं। 796 में से 185 उम्मीदवार 10 वीं या उससे कम पढ़े लिखे हैं। 22 उम्मीदवार तो ऐसे भी है जो पूरी तरह से अनपढ़ हैं जिनमें से दो बीजेपी के प्रत्याशी हैं। चुनावी मैदान में 10 पीएचडी होल्डर भी है जिनमें से 4 बीजेपी 4 कांग्रेस और 2 आप के उम्मीदवार हैं।
दिल्ली चुनाव में 332 उम्मीदवार 40 साल से कम उम्रम के है। हालांकि सबसे ज्यादा उम्मीदवारों की औसत उम्र 40 से 50 के बीच है। 70 से 80 साल तक की उम्र वाले करीब 20 उम्मीदवार भी चुनावी मैदान में हैं।
वही महिलाओं को राजनीति में आगे बढ़ाने की बातें हर राजनीतिक दल की तरफ से खूब होती हैं। लेकिन दिल्ली विधानसभा चुनाव में कुल 796 उम्मीदवारों में से महिला उम्मीदवार 69 हैं। कांग्रेस और आप ने 6-6 जबकि बीजेपी ने सिर्फ 5 महिला उम्मीदवारों को ही मौका दिया है।
दिल्ली चुनाव में बहुबली उम्मीदवारों को पूरा बोलबाला है। 796 मे से 129 यानि करीब 16 फीसदी उम्मीदवार ऐसे हैं। जिन्होंने अपने उपर आपराधिक मामलों का ब्यौरा दिया है। दागी उम्मीदवारों में सबसे ज्यादा 31 उम्मीदवार बीजेपी के है। कांग्रेस के 15, बीएसपी के 14, और आम आदमी पार्टी के भी 5 उम्मीदवार दागी हैं। ये आंकड़े बताते है कि सत्ता पाने के लिए सियासी दलों ने क्या-क्या किया है। इससे साफ है कि राजनीतिक दलों ने भी सिर्फ उन उम्मीदवारों को तरजीह दी है जिनके पास दौलत ज्यादा है। ऐसे में लोकतंत्र के क्या मायने निकाले जाएं इसका फैसला आप खुद कर लीजिए? 

भारतीय मीडिया की दुर्गति की कहानी शुरू !

भारतीय मीडिया की दुर्गति की कहानी शुरू !
दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत में पिछले कुछ सालों में प्रेस की आजादी का गला या तो सरकार ने घोंटने की कोशिश की है या फिर बड़े पत्रकार और मीडिया हाउस 'न्‍यूज डीलर' की भूमिका अख्तियार कर मीडिया के सामाजिक सरोकार का 'पिंड दान' कर चुके हैं।

अंतरराष्‍ट्रीय संस्‍था 'रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स' ने दुनिया भर की मीडिया की निष्‍पक्षता पर एक रिपोर्ट जारी की, जिसमें अंतरराष्ट्रीय मीडिया रैंकिंग में भारत को 140 वां स्‍थान हासिल हुआ है। रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स का मानना है कि भारत में मीडिया की आजादी सिर्फ कहने भर के लिए है। सच्‍चाई तो यह है कि भारत की मीडिया स्‍वतंत्रता और निष्‍पक्षता के मामले में अफ्रीकी और अरब के देशों से भी नीचे है। यहां तक कि लगातार आतंकवाद और युद्ध की विभीषिका झेलने वाले अफगानिस्तान में भी मीडिया भारत से अधिक सशक्‍त है। तो क्‍या भारतीय मीडिया के दुर्गति की कहानी शुरु हो चुकी है।

मुद्दों से भटकने में इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया को महारत हासिल
महंगाई और भ्रष्‍टाचार से कराहती जनता के लिए आज मुख्‍य धारा की इलेक्‍ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया में शायद ही कहीं कोई जगह बची है। जितने भी घोटाले सामने आए हैं वो मुख्‍य नियंत्रक महालेखा परीक्षक (सीएजी) जैसी संवैधानिक संस्‍था की वजह से आए हैं। हमारी मुख्‍यधारा की मीडिया या तो उन घोटालों में शामिल रही है या फिर मुद्दों को भटकाने में 'कलम' 'गन माइक' और 'चैट शो' के जरिए जुटी हुई दिखी है।

पत्रकारों पर है विश्‍वास का संकट
खुद को मूर्धन्‍य और वरिष्‍ठ मानने वाले पत्रकारों के समक्ष आज विश्‍वास का संकट पैदा हो चुका है। लोग पहले जब किसी पत्रकार से मिलते थे तो आदर के साथ मिलते थे, लेकिन आज तो‍ मिलते ही पत्रकारों व मीडिया संस्‍थानों पर सवालों की बौछार कर उन्‍हें कटघरे में खड़ा करने लगे हैं।

कुछ समय पूर्व वरिष्‍ठ पत्रकार पुण्‍य प्रसून वाजपेयी ने एक साक्षात्‍कार में स्‍पष्‍ट शब्‍दों में और बड़ी ही साफगोई से यह कहा था कि यूपीए सरकार के मंत्रियों का समूह संपादकों की बैठक लेता है और उन्‍हें बताता है कि कौन-सी खबर को कितनी तवज्‍जो देनी है। पुण्‍य आज के समय अपनी जन सरोकार आधारित पत्रकारिता के लिए हिंदी समाचार चैनलों में शायद एक मात्र विश्‍वसनीय नाम रह गए हैं। इस दौर में जब बड़े-बड़े पत्रकारों व मीडिया हाउसों का नाम प्रत्‍यक्ष-अप्रत्‍यक्ष रूप से राष्‍ट्रमंडल खेल घोटाला, 2जी स्‍पेक्‍ट्रम घोटाला, कोल-गेट घोटाले में आ चुका है तो ऐसे में हिंदी की टीवी पत्रकारिता में पुण्‍य प्रसून, अंग्रेजी के टीवी जर्नलिज्‍म में टाइम्‍स नाउ के अर्णव गोस्‍वामी और प्रिंट मीडिया में दैनिक जागरण के अंशुमन तिवारी जैसे कुछ पत्रकार ही बचे हैं जो आज भी बस केवल पत्रकारिता ही कर रहे हैं।

यूपीए2 की रणनीति: मीडिया मैनेज करो या उसे दबाओ
वास्‍तव में 'मीडिया को मैनेज करो या फिर उसे दबाओ' की रणनीति पर चल रही वर्तमान यूपीए सरकार अघोषित अपातकाल की ओर बढ़ रही है। हाल के वर्षों में अभिव्यक्ति के सबसे सशक्त माध्यम के रूप में उभरे सोशल साइटों पर प्रतिबंध लगाकर सरकार ने यह दर्शा दिया है कि उसके लिए लोकतंत्र का मतलब जनता से सिर्फ वोट हासिल करना है, न कि जनता को अपनी बात कहने का मौका देना।

रोष को व्‍यक्‍त करने का माध्‍यम बना सोशल मीडिया
सरकार की असंवेदनशीलता और मुख्‍यधारा की मीडिया की 'सरकारी रिपोर्ट' से उपजे आक्रोश के लिए सोशल मीडिया एक नया प्‍लेटफॉर्म बनकर उभरा है।

दिल्‍ली गैंग रेप की शिकार 'दामिनी' के लिए सड़कों पर उतरने की घटना हो, हैदराबाद के विधायक ओवैसी की संप्रदायिक भाषण के खिलाफ हल्‍ला बोलना हो या उससे पहले अन्‍ना हजारे का आंदोलन, सोशल मीडिया ने आम जनता को ऐसी ताकत दी कि वो अपनी बात खुलकर कहने और लोगों को जोड़कर सड़क पर उतरने लगे। सरकार को इसकी उम्‍मीद ही नहीं थी। वो तो माने बैठी थी कि 'मैनेज्‍ड मीडिया' जो दिखाएगा, जनता उसे ही सच मानेगी। लेकिन सोशल मीडिया ने पूरा परिदृश्‍य ही बदल दिया। सोशल मीडिया पर कांग्रेस पार्टी, कांग्रेस अध्‍यक्षा सोनिया गांधी, युवराज राहुल गांधी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के प्रति बढते आक्रोश का ही नतीजा था कि हाल ही में जयपुर में संपन्‍न हुए कांग्रेस चिंतन शिविर में सोशल मीडिया भी एक मुददा बना। सोनिया गांधी ने साफ शब्‍दों में कहा कि सोशल मीडिया को समझने में हमसे देर हो गई।

सोशल मीडिया को बैन करने में सरकार को दिखा रास्‍ता
सभी ने देखा कि करीब छह लाख करोड़ के घोटाले को अंजाम देने का आरोप झेल रही यूपीए2 सरकार ने अपनी अलोचना से चिढ़ कर पिछले साल सोशल मीडिया पर और वेबसाइटों पर पाबंदी लगाने की कोशिश की थी। यही नहीं, गूगल सहित फेसबुक, ट्वीटर सभी से धमकी भरे अंदाज में सरकार के मंत्री बात कर रहे थे। गूगल ने तो कहा भी कि दुनिया भर में सबसे अधिक शब्‍दों को बैन करने की अर्जी भारत सरकार की ओर से प्राप्‍त हुई है।

भारत में पिछले साल सोशल मीडिया पर नकेल कसने की यूपीए सरकार की कोशिशों का भारी विरोध हुआ था। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत की सरकार पर गंभीर सवाल उठाए गए थे। मुंबई की उस घटना पर भारत की काफी फजीहत हुई थी, जिसमें बाल ठाकरे की मौत के एक बाद एक लड़की द्वारा फेसबुक पर किए गए कमेंट के कारण उसे गिरफ्तार कर लिया गया था। पिछले ही साल कार्टुनिस्‍ट असीम त्रिवेदी के एक कार्टून की वजह से उन पर राष्ट्रदोह का मुकदमा दर्ज किया गया था, जिसे काफी हंगामे के बाद हटाया गया। ये घटनाएं दर्शाती हैं कि कांग्रेस संचालित यूपीए सरकार की पूरी मंशा सोशल मीडिया को कुचलने की है।

सोशल मीडिया का आभासी चरित्र आंदोलन में हो रहा है तब्‍दील
मिश्र की क्रांति को लोगों ने फेसबुक क्रांति कहा था, लेकिन देख़ते ही देख़ते पूरी दुनिया इस सोशल नेटवर्क से उत्पन्न हुई क्रांति की चपेट में आ गई। रूस में पुतिन के खिलाफ तो एक ब्‍लॉगर ने ही आंदोलन की शुरुआत की थी। भारत में अण्णा हज़ारे के आंदोलन को facebook, twitter और SMS के जरिए जिस तरह से युवाओं का समर्थन मिला, उससे कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार पूरी तरह से बौखला गई।

निवर्तमान केंद्रीय सूचना एवं प्रद्यौगिकी मंत्री कपिल सिब्बल को इस सभी पर प्रतिबंध लगाने की जिम्मेदारी सौंपी गई। माननीय मंत्री ने पहले बल्क एसएमएस पर रोक लगाकर इसकी शुरुआत की और बाद में फेसबुक, गूगल, यू टयूब जैसे साइटों के प्रबंधकों को बुलाकर इस पर सेंसरशिप लागू करने का दबाव डाला। आम जनता को उसी वक्त पता चल गया कि यूपीए सरकार की मंशा आखिर क्या है? वह लोकतंत्र का दंभ तो भरती है, लेकिन लोकतंत्र में विरोध को दबाने की मंशा भी रख़ती है।

सोशल मीडिया को दबाने के लिए मुकदमों की बारिश
सोशल साइट संचालकों द्वारा सेंसरशिप से हाथ खडे करने के तुरंत बाद इन नेटवर्किंग साइटों के खिलाफ दिल्ली की अदालतों में मुकदमों की बारिश हो गई। शायद ही किसी को इसमें शक हो कि अदालत में मुकदमा दर्ज कराने वाले लोगों को सरकारी तंत्र से बढ़ावा दिया गया था। जल्दबाजी में हो रहे अदालती निर्णय से भी लोगों का यह शक पुख्ता हुआ कि सरकार और अदालत मिलकर सेंसरशिप की ओर बढ रहे हैं।

13 जनवरी 2011 को फेसबुक, गूगल सहित 21 वेबसाइटों के खिलाफ जिस तरह से केंद्र सरकार ने मुकदमा दर्ज़ करने की अनुमति दी, उससे साबित हो गया कि केंद्र सरकार की मंशा देश में अघोषित रूप से अपातकाल लगाने की है। मुख्‍यधारा की मीडिया तो बहुत हद तक सरकारी प्रवक्‍ता की तरह व्‍यवहार कर रही है, जिससे लोगों की उम्‍मीद पूरी तरह से टूट चुकी है। देश की आम जनता, खासकर युवा पीढी ने मुख्‍यधारा की मीडिया की विश्‍वसनीयता समाप्‍त होने के बाद ही सोशल साइटों की ओर रुख किया है, जिसे सरकार नहीं पचा पा रही है।

सोशल साइट के निशाने पर कांग्रेस व गांधी परिवार
सरकार की पहली प्राथमिकता उन लोगों के आईडी को ब्लॉक करने की थी, जो यूपीए सरकार, कांग्रेस और सोनिया-राहुल गांधी को लेकर मुख्‍यधारा की मीडिया द्वारा छुपाई गई जानकारी को शेयर कर रहे थे। सरकार ऐसे जुट गई जैसे सोनिया-राहुल को गोद में छुपाना चाहती हो।

उदाहरण के लिए रामेश्वर आर्या न केवल खुद फेसबुक पर मौजूद हैं, बल्कि फेसबुक पर वह 18 पेजों को संचालित कर रहे हैं। उनका हमला, कांग्रेस व यूपीए सरकार पर तो है ही, उन्होंने बकायदा एक पेज बना रखा था, जिसका नाम ` रियलिटी ऑफ कांग्रेस, गांधी-नेहरू परिवार' है। इस पेज के साथ उनके सभी 18 पेज बंद कर दिए गए। रामेश्वर आर्य बताते हैं कि उनके friend लिस्ट में 5000 व्यक्ति हैं। 3000 लोगों ने उन्हें सब्सक्राइव कर रखा है। इसके अलावा उनके 18 पेजों पर 10 हज़ार से अधिक समर्थक हैं। मेरे आईडी को ब्लॉक कर दिया गया है। बिना आईडी के इन पेजों का संचालन भी नहीं किया जा सकता है।

ऐसे ही एक व्यक्ति हैं भगत सिंह क्रांति सेना के तजिंदर पाल सिंह बग्गा। तजिंदर पाल सिंह बग्गा वही हैं, जिन्होंने टीम अण्णा के सदस्य प्रशांत भूषण को कश्‍मीर पर देश विरोधी बयान के मद्देनजर चेंबर में घुसकर मारा था और उसके बाद वह तीन दिन जेल में रहकर भी आए हैं। तेजेंद्र का आईडी भी ब्लॉक कर दिया गया है। तेजेंद्र का कहना है कि सरकार लोगों के समर्थकों की कडि़यों को तोडने की मंशा से काम कर रही है। मेरे पांच हज़ार समर्थक थे, लेकिन अब कोई और आइडी से फेसबुक एकाउंट खोलूंगा तो फिर से फ्रेंड बनाने में बहुत समय लगेगा। इस देश में या तो आपातकाल लगाने की तैयारी है या फिर इस देश में विद्रोह की आग भड़केगी। सरकार यह सब कांग्रेस और गांधी परिवार की सच्‍चाई को छुपाने की नीयत से कर रही है।

अभी भी मुगालते में है सरकार
इस सबके बावजूद इसी सरकार में कपिल सिब्‍बल जैसे मंत्रियों को अभी भी यह लग रहा है कि सोशल मीडिया को कुचल दो और मुख्‍यधारा की मीडिया को साध लो तो काम बन जाएगा। यूपीए सरकार के ऐसे मंत्रियों की कुबुद्धि का ही परिणाम है कि सरकार व मीडिया दोनों की साख पर सोशल मीडिया के जरिए देश की जनता ने धावा बोल दिया है।

ये अन्ना का सफर है ऐसे खत्म नहीं होगा

मुंबई के आजाद मैदान से चला अन्ना का ये आंदोलन आज एक राष्ट्रीय आंदोलन बन गया है और अब एक बार फिर जनलोकपाल लाने के अभियान को अन्ना ने रालेगण सिद्धी गांव से शुरू किया है। जिस अन्ना की बदौलत अरविंद केजरीवाल की पार्टी का गठन हुआ, आज उन्हीं को किसी का साथ नहीं मिल रहा। अन्ना ने जनलोकपाल को लाने के लिए फिर से अनशन करने की ठानी है लेकिन बेहद अफसोस की बात है की अनशन के तीन दिन केजरीवाल और उनके साथियों को इस बात की याद आई है जो कभी हर कदम पर अन्ना के साथ नज़र आते थे। अनशन के पहले दिन की शुरूआत अन्ना ने अकेले ही की। शायद ‘आप’ के सदस्य इस नई राजनीति में बहुत व्यस्त है लेकिन आज जनता जिस पर भरोसा कर रही और चाह रही है कि आम आदमी पार्टी की ही सरकार बने उसे किसने बनाया? अरविंद केजरीवाल ने या ‘अन्ना हजारें’ ने? लोकपाल बिल लाने के लिए जन-आंदोलन करने वाले अन्ना हजारे की वजह से अरविंद केजरीवाल की पार्टी का जन्म हुआ है।
कौन है अन्ना हज़ारे
किसन बापट बाबूराव हज़ारे जिन्हें लोग ‘अन्ना हज़ारे’ के नाम से जानते है उनका जन्म 15 जून 1937 में हुआ। अन्ना हज़ारे एक भारतीय समाजसेवी है और समाज की भलाई के लिए उन्होंने हमेशा काम किया है। भारत सरकार ने 1992 में  उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया था। सूचना के अधिकार के लिए काम करने वालों में अन्ना प्रमुख थे।
सबसे पहले अन्ना ने सूचना का अधिकार अधिनियम के समर्थन में मुंबई के आजाद मैदान से अपना अभियान शूरू किया। अन्ना 8 अगस्त 2003 को आजाद मैदान पर सूचना का अधिकार को लागू करने के लिए आमरण अनशन पर बैठ गए थे। ये अनशन 12 दिन तक चला और इस दौरान अन्ना और सूचना का अधिकार आंदोलन को पूरे देश का समर्थन मिला और फिर महाराष्ट्र सरकार को इस अधिनियम को पारित करना ही पड़ा। बस तब से अन्ना की आंधी चल पड़ी और एक मैदान से चला आंदोलन पूरे देश का राष्ट्रीय आंदोलन बन गया। जिसके परिणामस्वरूप 12 अक्टूबर 2005 को भारतीय संसद ने भी सूचना का अधिकार के अधिनियम को पारित किया। अगस्त 2006 में अन्ना ने सूचना का अधिकार अधिनियम में संशोधन प्रस्ताव के खिलाफ अन्ना ने 11 दिन तक आमरण अनशन किया जिसे देशभर का समर्थन मिला, जिसके चलते सरकार ने संशोधन का इरादा बदल लिया। अन्ना हज़ारे ने कहा था की 2जी आवंटन घोटाला और सुरेश कलमाड़ी का राष्ट्रमंडल घोटाला सूचना के अधिकार कानून की वजह से ही सामने आ पाया, लेकिन इस कानून के पास दोषियों को जेल भेजने का अधिकार नहीं है। ये अधिकार और शक्ति जनलोकपाल विधेयक में है।
जन लोकपाल बिल
जिस जन लोकपाल विधेयक को लाने के लिए अरविंद केजरीवाल ने 29 दिसम्बर की तारिख तय कर रखी है, उसको पारित करने के लिए अन्ना हज़ारे  5 अप्रैल 2011 को समाजसेवी अन्ना हज़ारे एवं उनके साथियों के जंतर-मंतर पर शुरू किए गए अनशन के साथ आरंभ हुआ। भारत की पहली महिला प्रशासनिक अधिकारी किरण बेदी, प्रसिद्ध वकील प्रशांत भूषण, कुमार विश्वास, मनीष सिसोदिया और इस समय सबसे ज्यादा चर्चा में बने हुए अरविंद केजरीवाल इस अभियान में अन्ना के साथ थे। इस आंदोलन में पूरा देश अन्ना के साथ उमड़ पड़ा था लेकिन मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली तत्कालीन सरकार ने इसके प्रति नकारात्मक रवैया दिखाया और इसकी उपेक्षा की और अनशन के प्रति भी उनका रवैया उपेक्षा पूर्ण ही रहा। लेकिन ये आंदोलन इस तरह का नहीं था कि सरकार की इस उपेक्षा से खत्म हो जाता इसलिए भारत सरकार ने आनन-फानन में एक समिति बनाकर संभावित खतरे को टाला और 16 अगस्त तक संसद में लोकपाल विधेयक पारित कराने की बात स्वीकार कर ली। अगस्त से शुरु हुए मानसून सत्र में सरकार ने विधेयक लेकर आई वह कमजोर और जन लोकपाल के विपरीत था।
अन्ना हज़ारे ने इसके खिलाफ अपने पहले से तय तारीख को दोबारा 16 अगस्त को अनशन पर जाने की बात दोहराई। 16 अगस्त को सुबह साढ़े सात बजे जब वे अनशन पर जाने के लिए तैयारी कर रहे थे तब उन्हें दिल्ली पुलिस ने उनके ही घर से गिरफ्तार कर लिया। उनके टीम के अन्य लोग भी गिरफ्तार कर गए लिए। इस खबर ने आम जनता के दिल में हलचल मचा दी और वह सड़कों पर उतरकर सरकार के इस कदम का विरोध करने लगी। दिल्ली पुलिस ने अन्ना को मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया। अन्ना ने रिहा किए जाने पर दिल्ली से बाहर रालेगण सिद्धी गाँव चले जाने या 3 दिन तक अनशन करने की बात अस्वीकार कर दी। उन्हें 7 दिनों के न्यायिक हिरासत में तिहाड़ जेल भेज दिया गया। शाम तक देशव्यापी प्रदर्शनों की खबर ने सरकार को अपना कदम वापस खीचने पर मजबूर कर दिया।


दिल्ली पुलिस ने अन्ना को सशर्त रिहा करने का आदेश जारी किया। मगर अन्ना अनशन जारी रखने पर दृढ़ थे। बिना किसी शर्त के अनशन करने की अनुमति तक उन्होंने रिहा होने से इनकार कर दिया। 17 अगस्त तक देश में अन्ना के समर्थन में प्रदर्शन होता रहा। दिल्ली में तिहाड़ जेल के बाहर हजारों लोग डेरा डाले रहे। 17 अगस्त की शाम तक दिल्ली पुलिस रामलीला मैदान में और 7 दिनों तक अनशन करने की इजाजत देने को तैयार हुई। मगर अन्ना ने 30 दिनों से कम अनशन करने की अनुमति लेने से मना कर दिया। उन्होंने जेल में ही अपना अनशन जारी रखा। अन्ना को रामलीला मैदान में 15 दिन कि अनुमति मिली। अपने अनशन को समाप्त करने के लिए अन्ना ने सार्वजनिक तौर पर तीन शर्तों का ऐलान किया। उनका कहना था कि तमाम सरकारी कर्मचारियों को लोकपाल के दायरे में लाया जाए, सरकारी कार्यालयों में एक नागरिक चार्टर लगाया जाए और सभी राज्यों में लोकायुक्त हो।
74 वर्षीय हजारे ने कहा कि अगर जन लोकपाल विधेयक पर संसद चर्चा करती है और इन तीन शर्तों पर सदन के भीतर सहमति बन जाती है तो वह अपना अनशन समाप्त कर देंगे।
आम आदमी पार्टी का गठन 
जनलोकपाल बिल के लिए शुरू हुआ अनशन इन शर्तों के साथ उस समय तो खत्म हो गया लेकिन फिर आई ‘आप’ पार्टी। ये पार्टी आम आदमी के लिए बनी और उसके मुखिया बने अरविंद केजरीवाल। अन्ना का हर कदम पर साथ देने वाले केजरीवाल ने 2012 में आम आदमी पार्टी की स्थापना की। पार्टी ने औपचारिक रूप से 26 नवंबर 2012 को नई दिल्ली में शुरूआत की। उसके बाद तो ‘आप’ ने हर तरफ अपनी पहचान बनाई और लोगों के दिलों पर और खासकर युवाओं के दिलों पर पूरी तरह से छा गई। केजरीवाल ने अपना चुनाव चिन्ह ‘झाड़ू’ इस इरादे के साथ रखा की भष्ट्राचार और महंगाई की सफाई कर देंगे।
2013 के विधानसभा चुनावों में ‘आप’ ने पहली बार चुनाव लड़ा। इस दौरान फेसबुक और ट्विटर जैसी सोशल नेटवर्किंग साइट पर ‘आप’ ने ही अपना कब्ज़ा कर रखा था और विधानसभा के चुनावों के बाद तो जैसे आम आदमी पार्टी ने दिल्ली पर ही कब्ज़ा कर लिया है, केजरीवाल ने दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को नई दिल्ली विधानसभा से बहुत करारी हार दी। विधानसभा की 70 सीटों में से 28 सीटों पर आप ने जीत हासिल की जो एक नई पार्टी के लिए बहुत बड़ी बात है। हालांकि ये अभी भी तय नहीं है की दिल्ली में सरकार किसकी बनेगी पर बीजेपी और कांग्रेस की राह में अब सबसे बड़ा रोड़ा बनकर उभरी है आम आदमी पार्टी।
अन्ना ने की थी शूरूआत
आज अरविंद केजरीवाल या पूरी आम आदमी पार्टी ने मिल कर पूरी दिल्ली में अपना परचम लहरा दिया हो लेकिन इसको बनाने की प्रेरणा देने वाले तो किसन बापट बाबूराव हज़ारे ही है।

Saturday, 7 December 2013

निराशा से निकलने और खुद को प्रेरित करने के 16 तरीके


हममें से सबसे अधिक motivated लोग भी- आप,मैं,– कभी -कभार demotivated feel कर सकते हैं. यहाँ तक की , कभी-कभी हम इतना low feel कर सकते हैं कि positive बदलाव के बारे में सोचना भी बहुत कठिन लगने लगता है.

पर ये निराशाजनक नहीं है: छोटे छोटे steps लेकर आप सकारात्मक बदलाव के रास्ते पर वापस आ सकते हैं.

हाँ , मैं जानता हूँ, कभी कभी ये असंभव लगता है. आपको कुछ करने का मन नहीं करता. मेरे साथ भी ये हुआ है,दरअसल अभी भी समय समय पर मैं ऐसा feel करता हूँ. आप अकेले नहीं हैं . लेकिन मैंने इस निराशा से बाहर निकलने के कुछ तरीके सीख लिए हैं, और हम आज उन्ही पर नज़र डालेंगे.

जब बीमारी , चोट या life में चल रही किसी और समस्या के कारण में व्यायाम नहीं कर पाता तो उसे वापस से शुरू करना कठिन होता है. कई बार, मैं उसके बारे में सोचना भी नहीं चाहता . लेकिन मैं हमेशा उस feeling से उबरने का कोई ना कोई रास्ता निकाल लेता हूँ, और यहाँ ऐसी ही कुछ बाते हैं जो मेरे लिए मददगार साबित होती हैं.

1. One Goal एक लक्ष्य

जब भी मैं थोडा down हुआ हूँ , मैंने पाया है कि अक्सर ऐसा इसलिए होता है क्योंकि मेरी life में एक साथ बहुत कुछ चल रहा होता है. मैं बहुत कुछ करने की कोशिश कर रहा होता हूँ. और ये मेरी energy और motivation को ख़तम कर देता है. शायद ये सबसे common mistake है जो लोग करते हैं: वो एक साथ बहुत कुछ करने की कोशिश करते हैं. यदि एक समय में दो या उससे अधिक लक्ष्य achieve करने का प्रयास करते हैं तो आप अपनी ( लक्ष्य पाने के लिए दो सबसे महत्त्वपूर्ण चीजें ) energy और focus बनाये नहीं रख पाते. ये संभव नहीं है – मैंने कई बार कोशिश की है. आपको अभी के लिए कोई एक लक्ष्य चुनना होगा, और पूरी तरह से उसपर focus करना होगा. मुझे पाता है ये कठिन है, पर मैं अपने experience से बता रहा हूँ. एक बार आप अपना अभी का निर्धारित लक्ष्य प्राप्त कर लें फिर उसके बाद आप अपने बाकी लक्ष्य प्राप्त कर सकते हैं.

2. Find Inspiration प्रेरणा खोजिये

मुझे उन लोगों से प्रेरणा मिलती है जिन लोगों already वो achieve कर लिया है जो मैं करना चाहता हूँ, या वो लोग जो वही कर रहे हैं जो मैं करना चाहता हूँ. मैं औरों के blogs, books,magazines पढता हूँ. मैं अपने goals को Google करता हूँ , और success stories पढता हूँ. Zen Habits ऐसी ही जगहों में से एक है, सिर्फ मुझसे ही नहीं बल्कि अन्य कई readers से जिन्होंने अद्भुत चीजें प्राप्त की हैं.

3. Get Excited उत्साहित होइए

ये सुनने में बहुत obvious सी बात लगती है, पर ज्यादातर लोग इस बारे में अधिक नहीं सोचते हैं: अगर आप निराशा से निकलना चाहते हैं, तो किसी लक्ष्य के लिए उत्साहित हो जाइये. पर अगर आप motivated नहीं feel करते हैं तो आप excited कैसे feel करेंगे? Well, इसकी शुरुआत दूसरों से प्रेरणा लेकर होती है, लेकिन आपको दूसरों से उत्साह लेकर उसे अपनी उर्जा में बदलना होगा.मैंने पाया है कि मैं अपनी wife और अन्य लोगों से बात करके, इस बारे में ज्यादा से ज्यादा पढ़कर, और इसे visualize (दिमाग में goal achieve करने से होने वाले फायदे को देखना ) करके कि successful होना कैसा लगेगा, excited feel करने लगता हूँ. एक बार ये कर लिया तो बस इसी energy को आगे carry करने और आगे बढ़ने की ज़रुरत रहती है.

4.Build Anticipation अपेक्षा करें

ये सुनने में कुछ कठिन लग सकता है, और अकी लोग इस tip को skip कर देंगे. लेकिन ये सचमुच काम करती है. कई बार असफल प्रयासों के बाद इसी टिप की वजह से मैं cigarette पीना छोड़ पाया.अगर आपको अपना goal achieve करने की प्रेरणा मिल जाती है तो तुरंत उसे प्राप्त करने का प्रयास ना करें. हममें से कई लोग excited होके आज ही अपना काम शुरू करना चाहेंगे. ये एक गलती है. Future की कोई date set कीजिये – एक या दो हफ्ते बाद , या एक महीना भी – और उसे अपनी Start Date बनाइये. उसे कैलेण्डर पर mark कर लीजिये. उस date को लेकर उत्साहित होइए. उसे अपने जीवन की सबसे important date बना लीजिये. इस बीच अपना प्लान बनाइये. और नीचे दिए गए कुछ steps follow कीजिये. क्योंकि अपनी start delay करके आप anticipation build करते हैं और अपने लक्ष्य के प्रति अपनी उर्जा और ध्यान बढाते हैं.

5. Post your goal अपना लक्ष्य प्रकाशित करें

अपने goal का एक बड़ा सा print निकाल लें. अपना लक्ष्य कुछ ही शब्दों में लिखें , जैसे कोई मन्त्र (“Exercise 15 mins. Daily”), और उसे अपने दीवार या फ्रिज पर चिपका दें. इसे अपने घर में अपने office में लगा लें उसे अपने computer के desktop पर लगा लें. आप अपने goals के लिए बड़े reminders लगाना चाहते हैं , ताकि आप अपने goal पर focus कर पाएं और उसे लेकर excited रह पाएं. अपने goal से सम्बंधित कोई picture लगाना भी helpful हो सकता है (like a model with sexy abs, for example).

6.Commit Publicly सार्वजनिक रूप से प्रतिज्ञा लीजिये 

कोई भी दूसरों के सामने बुरा नहीं दिखना चाहता है . जो बात हमने publicly कही है उसे करने के लिए हम extra effort करते हैं. For example, जब मैं अपनी पहली मैराथन दौड़ दौड़ना चाहता था , तब मैंने अपने local newspaper में इस बारे में एक column लिखना शुरू कर दिया. Guam की पूरी आबादी मेरे इस goal के बारे में जान गयी. अब मैं पीछे नहीं हट सकता था , हालांकि मेरी motivation कम -ज्यादा होती रही पर मैं इस goal को पकडे रहा और दौड़ complete की.आपको किसी newspaper में अपना goal commit करने की ज़रुरत नहीं है , पर आप इसे अपने family,friends, और co-workers से बता सकते हैं, और यदि आपका कोई blog है तो उसपर भी इस बारे में लिख सकते हैं.और खुद को जिम्मेदार ठेराइये – केवल एक बार commit मत करिए , बल्कि अपने progress के बारे में सभी को हर हफ्ते या महीने update करने के लिए भी commit करिए.

7. Think about it daily इस बारे में रोज़ सोचिये

यदि आप रोज़ अपने लक्ष्य के बारे में सोचते हैं तो उसके पूर्ण होने की संभावना कहीं अधिक है. इसीलिए अपने लक्ष्य को दीवार पर या desktop पर लगाना मददगार होता है . हर रोज़ खुद को reminder भेजना भी helpful होता है. और अगर आप रोज बस पांच मिनट भी ये छोटा सा काम करेंगे तो ये लगभग तय है की आपका लक्ष्य पूर्ण होगा.

8. Get Support. मदद लीजिये

अकेले कुछ हांसिल करना कठिन होता है. जब मैंने मैराथन में दौड़ने का निश्चय किया था , तो मेरे साथ दोस्तों और परिवार का support था, और साथ ही Guam में दौड़ने वालों की एक अच्छी community भी थी जो मेरे साथ दौड़ते थे और मुझे encourage करते थे. जब मैंने smoking quit करनी चाही तो मैंने एक online forum join कर लिया , जो मेरे लिए बहुत helpful रहा. और इस काम में मेरी wife Eva ने हर कदम पर मेरा साथ दिया. मैं उसकी और अन्य लोगों की मदद के बिना ऐसा नहीं कर पाता. अपना support network खोजिये , अपने आस-पास या online या दोनों जगह.

9. Realize that there’s an ebb and flow इस बात को समझिये की उतार-चढ़ाव आते रहते हैं

Motivation कोई ऐसी चीज नहीं है जो हमेशा आपके साथ रहे. ये आती है , जाती है और फिर आती है, ज्वार की तरह . इस बात को समझिये की भले ही ये चली जाए , पर वो हमेशा के लिए नहीं चली जाती . Motivation वापस आती है. बस अपने लक्ष्य से जुड़े रहिये और motivation के वापस आने का इंतज़ार कीजिय. इस दौरान अपने लक्ष्य के बारे में पढ़िए , दूसरों से मदद मांगिये , और यहाँ बताई अन्य कुछ चीजें कीजिये जब तक की आप का motivation वापस ना आ जाये.

10. Stick with it. लगे रहिये

आप चाहे जो कुछ भी करिए , पर हार नहीं मानिए. भले आप आज या इस हफ्ते बिलकुल ही motivated ना feel कर रहे हों , पर अपना लक्ष्य छोड़िये नहीं. आपकी motivation फिर वापस आएगी . अपने लक्ष्य को एक लम्बी यात्रा की तरह देखिये , और बीच में जो demotivation आता है वो महज़ एक speed-breaker है. छोटी मोती बाधाएं आने पर आप यात्रा नहीं छोड़ते. लम्बे समय तक अपने लक्ष्य के साथ जुड़े रहिये , उतार-चढ़ाव पार कीजिये और आप वहां पहुँच जायेंगे.

11.Start small. Really small छोटे, बहुत छोटे से शुरुआत कीजिये

अगर आपको शुरुआत करने में दिक्कत हो रही है तो शायद इसकी वजह ये है की आप बहुत बड़ा सोच रहे हैं. यदि आप व्यायाम करना चाहता हैं, तो शायद आप सोच रहे हों की हफ्ते में पांच दिन intensely workout करना है. नहीं – इसकी जगह छोटे-छोटे baby steps लीजिये. सिर्फ दो मिनट व्यायाम कीजिये. मुझे पता है ये आपको अटपटा लग रहा होगा. ये इतना आसान है, आप fail नहीं हो सकते. पर आप इसे करिए . बस कुछ crunches, 2 pushups, और वहीँ थोड़ी सी jogging. जब आपने एक हफ्ते तक ये २ मिनट तक कर लेंगे , तो इसे बढाकर पांच मिनट कर दीजिये , और एक हफ्ते तक इसे कीजिये. एक महीने में आप 15-20 मिनट करने लगेंगे. सुबह जल्दी उठाना चाहते हैं ? सुबह पांच बजे उठने का मत सोचिये, इसकी जगह आप एक हफ्ते तक बस 10 मिनट पहले उठिए . एक बार आपने ये कर लिया , तो 10 मिनट और जल्दी उठिए. Baby Steps.

12.Build on small successes छोटी छोटी उपलब्धियों के साथ आगे बढिए

एक बार फिर , अगर आप एक हफ्ते तक छोटे लक्ष्य के साथ शुरू करेंगे तो आप सफल होंगे. अगर किसी बेहद आसान चीज से शुरुआत करेंगे तो आप fail नहीं हो सकते. भला कौन दो मिनट तक exercise नहीं कर सकता? ( यदि आप वो हैं, तो मैं माफ़ी मांगता हूँ) और आप successful feel करेंगे , आपको अन्दर से अच्छा लगेगा. इसी feeling के साथ और छोटे-छोटे steps लेते जाइये . For example : अपनी exercise routine में दो-तीन मिनट add करिए. हर एक step के साथ (और हर स्टेप कम से कम एक हफ्ते चलना चाहिए), और आप और भी successful feel करेंगे. हर एक स्टेप बहुत बहुत छोटा रखिये और आप fail नहीं होंगे. दो महीने बाद , आपके छोटे छोटे कदम आपको बहुत सारी progress और success दिलाएंगे

13.Read about it daily. रोज़ इसके बारे में पढ़ें

जब मैं अपना motivation lose करता हूँ , मैं अपने लक्ष्य से सम्बंधित कोई किताब या ब्लॉग पढता हूँ. ये मुझे प्रेरित करता है और मुझे दृढ बनता है. किसी वजह से आप जो कुछ भी पढ़ते हैं वो आपको उस विषय में प्रेरित करता है और आपका ध्यान केन्द्रित करने में मदद करता है. इसलिए अगर आप पढ़ सकते हैं तो रोज़ अपने लक्ष्य के बारे में पढ़िए , खासतौर से तब जब आप motivated ना feel कर रहे हों.

14.Call for help when your motivation ebbs जब प्रेरणा कम हो तब मदद मांगिये

समस्या है? मदद मांगिये. मुझे email करिए. कोई online forum join करिए. अपने लिए कोई partner खोजिये. अपनी माँ को call कीजिये. इससे मतलब नहीं है की सामने वाला कौन है , बस अपनी समस्या बताइए , इस बारे में बात करना आपके लिए helpful होगा. उनकी advice मांगिये . उनसे आपको demotivated state से निकालने के लिए मदद करने के लिए कहिये. ये काम करता है.

15.Think about the benefits, not the difficulties. फायदों के बारे में सोचिये परेशानियों के बारे में नहीं

एक common problem है कि हम ये सोचते हैं कि कोई चीज कितनी कठिन है . Exercise करना बहुत कठिन लगता है ! इसके बारे में सोचना ही आपको थका देता है.पर ये सोचना कि बजाये की कोई चीज कितनी कठिन है , ये सोचिये की उसके कितने फायदे हैं. For Example, ये सोचने की जगह कि व्यायाम करना कितना कठिन है;आप ये सोचिये की ये करने के बाद आप कितना अच्छा feel करेंगे, और long run में आप कितने healthier और slimmer होंगे. किसी चीज के फायदे आपको energize कर देंगे.

16.Squash negative thoughts; replace them with positive ones. नकारात्मक विचारों को त्यागिये और उन्हें सकारात्मक विचारों से बदल दीजिये

अपने विचारों को monitor करना ज़रूरी है. आप जो negative self-talk करते हैं, जो दरअसल आपको demotivate कर रहा है उसे पहचानिए. कुछ दिन बस ये जानने में बिताइए कि आपके अन्दर कौन कौन से नकारात्मक विचार हैं, और फिर कुछ दिनों बाद उन्हें एक bug की तरह अपने अन्दर से निकालिए , और फिर उन्हें corresponding positive thought से replace कर दीजिये . अगर आप सोचते हैं कि ,” ये बहुत कठिन है” तो उसे ” मैं ये कर सकता हूँ” से बदल दीजिये . अगर वो Leo इसे कर सकता है , तो मैं भी! ये कुछ अटपटा सुने देता है , पर ये काम करता है. सचमुच.

Thursday, 14 November 2013

कैसे पाएं Negative Thoughts से छुटकारा ?


दोस्तों कई बार ऐसा होता है कि हम खुद ही अपनी happiness या success के मार्ग में रोड़ा बन जाते हैं. और कई मामलों  में  तो हमें इस बात का पता भी नहीं होता. बार-बार मन में एक ही या कई नकारात्मक विचारों का आना एक ऐसा ही रोड़ा है.
For Example: यदि आपके मन में विचार आता है कि ,” मैं भद्दा दीखता हूँ”, या ,”मेरा पति मुझसे प्यार नहीं करता.”, या “मुझे अंग्रेजी नहीं आती.”, या ,” मेरा IQ कम है” इत्यादि , तो कहीं ना कहीं ये आपके personal development में hurdle बन रहे हैं.
आज AchhiKhabar.Com पर हम ऐसे ही विचारों से निजात पाने  के  एक बहुत ही effective process के बारे में जानेंगे. इसके बारे में मैंने Steve Pavlina के  article How to Squash Negative Thought Patterns में  पढ़ा था,और यहाँ पर मैं आपके साथ उसी का Hindi translation share कर रहा हूँ.
How to get rid of negative thought patterns in Hindi
Redirect Negativity into Positivity
  Negative Thoughts से कैसे छुटकारा पाएं ?
Suppose करिए कि आपकी बार-बार एक ही negative thought को सोचने की बुरी आदत है. और suppose करिए कि असल दुनिया में उस सोच की कोई अभिव्यक्ति नहीं है. वो बस एक नकारात्मक सोच है , जैसे ” मैं बहुत depressed हूँ” या ” मुझे अपनी नौकरी से नफरत है” या ” मैं ये नहीं कर सकता” या “मुझे अपने मोटापे से नफरत है.” आप किसी  बुरी आदत से कैसे छुटकारा पायेंगे जब वो पूरी तरह से आपके दिमाग में हो ?
असल में negative thought pattern को बदलने के बहुत सारे तरीके हैं. Basic idea ये है कि पुराने thought pattern को नए से replace कर दिया जाए. मानसिक रूप से नकारात्मक सोच का विरोध करना उल्टा पड़ सकता है- आप इसे और मजबूत करते जायेंगे और स्थिति बदतर हो जाएगी. आप जितना अपने neurons को उसी दिशा में fire करेंगे, आपकी नकारात्मक सोच उतनी ही शशक्त होती जायेगी.
यहाँ एक तरीका है जो मैं अपने negative thought patterns को break करने के लिए use करता हूँ.  ये basically एक memory technique जिसे ‘chaining’ कहते हैं से मिला जुला कर बना है. ये तरीका मेरे लिए बहुत सही काम करता है.
Negative Thought pattern का विरोध करने का प्रयास करने की बजाये आप इसकी दिशा बदल दीजिये. इसे आप एक mental kung fu की तरह से समझिये. नकारात्मक सोच की उर्जा को लीजिये और उसे सकारात्मक सोच की तरफ मोड़ दीजिये. थोड़ी सी mental conditioning के साथ जब भी आपके दिमाग में negative thought आएगी , आपका दिमाग खुद बखुद positive thought की तरफ divert हो जाएगा. ये Pavlov’s dogs की तरह है जो घंटी बजने पर लार टपकाना सीख जाते हैं.
ये ऐसे काम करता है:
मान लीजये आपकी negative thought एक subvocalization है, मतलब आपको अन्दर से एक आवाज़ सुनाई देती है जिसे आप बदलना चाहते हैं , जैसे कि, ” मैं idiot हूँ”. अगर आपकी negative thought एक आवाज़ होने की बजाये एक mental image (कोई चित्र जो दिमाग में आता हो) या  kinesthetic ( कोई अन्दर होने वाला एहसास
) हो तो भी आप इस process को use कर सकते हैं. कई मामलों में आपका विचार इन तीनों का combination भी हो सकता है.

Step 1: अपनी negative thought को एक mental image में बदल लें.

उस आवाज को सुनिए और दिमाग में उसकी एक तस्वीर बना लीजिये.For Example, यदि आपकी सोच है कि ,“मैं idiot हूँ”, तो कल्पना कीजिये कि आप मूर्खतापूर्ण कपडे पहने और जोकरों वाली टोपी लगाकर इधर उधर कूद रहे हैं. आपके चारो तरफ लोग खड़े हैं जो आपकी तरफ ऊँगली दिखा रहे हैं और आप चिल्ला रहे हैं, “मैं idiot हूँ” आप इस scene को जितना बढ़ा चढ़ा कर देखेंगे उतना बेहतर है . चटक रंगों, खूब सारे animation,यहाँ तक कि आप कुछ sex से भी सम्बंधित सोच सकते हैं यदि ये आपको याद रखने में मदद करे. इस scene को बार-बार तब तक practice करते रहिये जब तक महज वो negative line सोचने भर से आपके दिमाग में आपकी कल्पना की हुई negative mental image ना आने लगे.
यदि आपको उस विचार का चित्रण करने में दिक्कत हो तो आप उसे एक आवाज़ का भी रूप दे सकते हैं. अपनी negative thought को एक आवाज़ में बदल लें , जैसे कि कोई धुन जिसे आप गुनगुनाते हों. इस प्रोसेस follow करने में को चाहे एक  sound की कल्पना करें या किसी चित्र की , दोनों ही तरह से ये काम करेगा. वैसे मैं किसी चित्र के बारे में कल्पना करना prefer करता हूँ.
 Step 2: उस negative thought को replace करने के लिए कोई powerful positive thought चुनें.
अब decide करिए की negative thought को replace करने के लिए आप कौन सी positive thought चुनेंगे. जैसे कि यदि आप ये सोचते रहते हैं कि, ” मैं idiot हूँ,” तो शायद आप उसे , “मैं brilliant हूँ.” से replace करना चाहेंगे. कोई ऐसी सोच चुनिए जो आपको कुछ इस तरह से शशक्त बनाए कि आप उस negative thought के असर को कमजोर बना पाए.

Step 3: अब अपनी positive thought को एक mental image में बदल लें

एक बार फिर से Step 1 की तरह ही अपनी positive thought के लिए एक mental image बना लें. जैसे कि उदाहरण में ली गयी सोच  “में brilliant हूँ” के लिए आप खुद को Superman की तरह दोनों हाथ कमर पर रख कर खड़ा हुआ होने की कल्पना कर सकते हैं.और आप सोच सकते हैं कि ठीक आपके सर के ऊपर एक bulb जल रहा है. Bulb बहुत तेज रौशनी के साथ जगमगा रहा है, और आप जोर से चीख रहे हैं, ” मैं bbbbrrrrrillllliannnnttt हूँ !”. इसकी practice तब तक करते रहिये जब तक महज वो positive line सोचने भर से आपके दिमाग में आपकी कल्पना की हुई positive mental image ना आने लगे.

Step 4: अब दोनों mental images को एक साथ जोड़ दीजिये.

आपने Step 1 और Step 3 में जो mental image सोची है , दोनों को अपने दिमाग में चिपका दीजिये. ये trick chaining नामक memory technique में प्रयोग होती है. इसमें आप पहले चित्र को दुसरे में परिवर्तित कर देते हैं. मेरा सुझाव है कि आप इस एक animated movie की तरह करिए. इसमें आपको पहला (negative picture) और आखिरी (positive picture) scene का अंदाजा है, बस आपको बीच में एक छोटा सा एनीमेशन भरना है.
For example, पहले scene में  आपके idiot version पर कोई एक light bulb फेंकता है.और आप उस बल्ब को कैच कर लेते हैं और  आपके पकड़ते ही वो बल्ब बड़ा होने लगता है और उससे इतनी तेज रौशनी निकलती है कि आपको घेरे हुए लोग चौंधिया जाते हैं. तब आप अपने मूर्खतापूर्ण कपड़ों को फाड़ कर फेंक देते हैं और चमचमाते सफ़ेद लिबास में प्रकट होते हैं. आप Superman की तरह पूरे आत्मविश्वास के साथ खड़े होकर जोर से चिल्लाते हैं, ” ” मैं bbbbrrrrrillllliannnnttt हूँ !”और फिर वो लोग अपने घुटनों के बल बैठ जाते हैं और आपकी पूजा करने लगते हैं. एक बार फिर , आप इसे जितना बढ़ा-चढ़ा कर सोचेंगे उतना अच्छा होगा. बढ़ा-चढ़ा कर सोचना आपको scene को याद रखें में मदद करेगा क्योंकि हमारा दिमाग unusual चीजों को याद रखने के लिए designed होता है.
एक बार जब आप पूरा scene complete कर  लें तो फिर बाद-बाद इसे अपने दिमाग में दोहरायें ताकि speed आ जाये. इस  scene को शुरू से अंत तक तब तक imagine करते रहिये जब तक कि आप पूरा का पूरा scene 2 मिनट में complete नहीं कर लेते, ideally 1 मिनट में. ये बिजली की तेजी से होना चाहिए, वास्तविक दुनिया से कहीं तेज.

 Step 5: Test.

अब आपको अपने mental redirect को टेस्ट करना है कि ये काम कर रहा है कि नहीं. ये बहुत हद्द तक HTML redirect की तरह है – जब आप पुराना negative URL input करते हैं, तब आपका दिमाग उसे automatically positive की तरफ  redirect कर देता है.Negative thought के  दिमाग में आते ही तुरन्त positive thought आपके दिमाग में आ जानी चाहिए. अगर आपने ये सही से practice किया है तो ये automatically होने लगेगा. Negative thought दिमाग में आते ही पूरा का पूरा scene आपके दिमाग में घूम जायेगा. इसलिए आप जब भी ये सोचेंगे कि , ” मैं idiot हूँ “, भले आप पूरी तरह से aware ना हो कि आप ऐसा सोच रहे हैं, आप अंत में खुद को ये सोचता हुआ पायेंगे कि, “मैं brilliant हूँ”
अगर आपने पहले ऐसा visualization नहीं किया है तो आपको ये सब करने में कुछ समय लगेगा. Speed practice के साथ आएगी. एक बार अभ्यास हो जाने के बाद सारी चीजें सेकेंडों में हो जाएँगी. पहली बार करने में चीजें धीमी गति से होंगी,इससे discourage मत  होइए . किसी भी और skill की तरह इसे भी learn किया जा सकता है,और शायद पहली बार सीखने में ये आपको ये कुछ अटपटा लगे.
मेरा सुझाव है कि आप अलग-अलग तरह की कल्पना के साथ experiment करिए. आपको कुछ कल्पनाएँ बाकियों से सही लगेंगी. Association Vs. Dissociation पर ख़ास ध्यान दीजिये. जब आप किसी scene से associated होंगे तो आप उसे अपनी आँखों से घटता हुआ देखेंगे( i.e. first person perspective). जब आप dissociated होंगे तो आप उस scene में खुद को देखने की कल्पना करेंगे ( i.e. third person perspective). आम  तौर  पर मुझे best results खुद को dissociate करने पर मिलते हैं. आपके results अलग हो सकते हैं.
मैंने 1990s की शुरआत में इस तरह की काफी mental conditioning की है. जब भी मुझे इस तरह की कोई नकारात्मक सोच परेशान करती थी तो मैं उसे चुनता था और उसकी दिशा बदल देता था.कुछ ही दिनों में मैंने दर्जनों negative thought patterns को reprogram कर दिया था, और कुछ ही दिनों में मेरे दिमाग के लिए negative thought या emotion produce करना भी कठिन हो गया. ऐसी कोई भी सोच positive सोच की तरफ redirect हो जातीं.शायद कुछ हद तक इसीलिए मैं college से निकलने के तुरंत बाद अपन business start करने में पूरा confident था.मैं mental conditioning के माध्यम से अपनी self-doubt सम्बंधित thoughts को can-do mindset में बदल देता था. कालेज के दिनों में मैंने इसका खूब प्रयोग किया और शायद इसी वजह से मैंने औरों से जल्दी graduate हो पाया.इसके बावजूद मुझे कई real-world challenges को face करना पड़ा, पर कम से कम मैं उस समय खुद के self-doubt से नहीं लड़ रहा था.
इस तरह की mental conditioning ने मुझे अपने अंदरुनी मामलों को control करने में काफी सहायता की.आज मैं ये इतना भली-भांति कर लेता हूँ कि बिना इसके बारे में सोचे ही ये automatically होता रहता है. किसी point पर मेरे subconscious ने इसका कंट्रोल ले लिया; इसलिए जब कभी मेरे मन कोई ऐसा विचार आता है कि , “I can’t” तो वो स्वतः ही ,”How can I?” में परिवर्तित हो जाता है. दरअसल जब आप mental conditioning को बहुत ज्यादा practice कर लेते हैं तो यही होता है- आपका subconscious कंट्रोल ले लेता है;ठेक विअसे ही जैसे कि साइकिल चलाने की practice के बाद हो जाता है.
अब जब कभी आपको लगे कि कोई negative thought आपके दिमाग में घर कर रही हो तो इसे try कीजिये. मेरे विचार है कि आप इसे काफी सशक्त बनाने वाला पाएंगे. और जिन्हें इससे फायदा पहुँच सकता है उनके साथ जरूर share करिए.