Monday, 8 October 2012

vijay



दिल्ली शहर की बसने और उजड़ने की स्वर्णिम-स्याह दास्तान इतिहास से भी पुरानी है. इतिहास के इसी क्रम में साल 1911 में दिल्ली में सजा एक दरबार और ब्रिटेन के किंग जॉर्ज पंचम ने अंग्रेज़ प्रशासित भारत की राजधानी को कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित कर दिया. इस घटना के शताब्दी वर्ष के मौके पर प्रस्तुत है बीबीसी की विशेष श्रृंखला 'दिल्ली कल आज और कल' . ये श्रृंखला कहानी है दिल्ली की शाहजहानाबाद से नई दिल्ली तक. इस श्रृंखला का संकलन किया है 

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दिल्ली दरबार
1911 में सजे दिल्ली दरबार का एक चित्र जिसमें दिल्ली को भारत की राजधानी बनाने की घोषणा हुई.
''हमें भारत की जनता को यह बताते हुए बेहद हर्ष होता है कि सरकार और उसके मंत्रियों की सलाह पर देश को बेहतर ढंग से प्रशासित करने के लिए ब्रितानी सरकार भारत की राजधानी को कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित करती है.''
12 दिसंबर 1911 की सुबह 80 हज़ार से भी ज़्यादा लोगों की भीड़ के सामने ब्रिटेन के किंग जॉर्ज पंचम ने जब ये घोषणा की, तब लोग एकाएक यह समझ भी नहीं पाए कि चंद लम्हों में वो भारत के इतिहास में जुड़ने वाले एक नए अध्याय का साक्ष्य बन चुके हैं.
इस घटना को आज सौ साल बीत चुके हैं और साल 2011 इतिहास की इसी करवट पर एक नज़र डालने का मौका है, जब अंग्रेज़ों ने एक ऐसे ऐतिहासिक शहर को भारत की राजधानी बनाने का फैसला किया जिसके बसने और उजड़ने की स्वर्णिम-स्याह दास्तान इतिहास से भी पुरानी है.
ये मौका है एक ऐसी राजधानी को परखने का जो आज दुनिया के नक्शे पर सबसे बड़े लोकतंत्र की ताकत के रुप में स्थापित है.
लेकिन सवाल ये है कि तीन हज़ार साल पुराना शहर 'दिल्ली' जिसे खुद अंग्रेज़ों ने भारत की प्राचीन राजधानी कहा उसे 1911 के बाद ‘असल राजधानी’ मानकर सौ साल के इस सफ़र का जश्न क्या तर्कसंगत है.
किंग जॉर्ज पंचम और क्वीन मैरी
इस सवाल के जवाब की खोज ने ही दिल्ली के इस सफ़रनामे की बुनियाद रखी और इतिहास के पन्नों पर जो कुछ हमें मिला उसने इस कहानी को साझा करने की एक ललक पैदा की.

दिल्ली एक देहलीज़

शुरुआत हुई दिल्ली शहर के नाम से, जिसे लेकर कई कहानियां मशहूर हैं. कुछ लोगों का मानना है दिल्ली शब्द फ़ारसी के देहलीज़ से आया क्योंकि दिल्ली गंगा के तराई इलाकों के लिए एक ‘देहलीज़’ था. कुछ लोगों का मानना है कि दिल्ली का नाम तोमर राजा ढिल्लू के नाम पर दिल्ली पड़ा. एक राय ये भी है कि एक अभिषाप को झूठा सिद्ध करने के लिए राजा ढिल्लू ने इस शहर की बुनियाद में गड़ी एक कील को खुदवाने की कोशिश की. इस घटना के बाद उनके राजपाट का तो अंत हो गया लेकिन मशहूर हुई एक कहावत, किल्ली तो ढिल्ली भई, तोमर हुए मतीहीन, जिससे दिल्ली को उसका नाम मिला.
भारत के इतिहास में शायद ही कोई दूसरा शहर इतनी बार बसा और उजड़ा, जितनी बार शहर दिल्ली.
माना जाता है कि 1450 ईसा पूर्व 'इंदरपथ' (इंद्रप्रस्थ) के रुप में पहली बार पांडवों ने दिल्ली को बसाया. इस आधार पर दिल्ली तीन से साढ़े तीन हज़ार साल पुराना शहर है. इंद्रप्रस्थ वो जगह थी जहां हम आज पुराने किले के खंडहर देखते हैं. नीली छतरी और सूर्य मंदिर के किनारे बने निगमबोध घाट के रुप में इंद्रप्रस्थ की तीन निशानियां आज भी हमारे बीच मौजूद हैं.
1000 ईसवी से अंग्रेज़ों के शासनकाल तक दिल्ली पर ग़ौरी, ग़ज़नी, तुग़लक, खिलजी और कई मुग़ल शासकों का राज रहा.
इस दौरान हर शासक ने अपनी बादशाहत साबित करने के लिए दिल्ली में अलग-अलग शहरों को बसाया.

दिल्ली के सात शहर

1947 में आज़ादी के बाद राजधानी दिल्ली में प्रधानमंत्री पद की शपथ लेते जवाहर लाल नेहरु.
समय के साथ ये इलाके दिल्ली के सात शहरों के नाम से मशहूर हुए और आठवां शहर बना नई दिल्ली. लेकिन इस क्रम में ये शहर कई बार गुलज़ार हुआ तो कई बरस गुमनामी की गर्त में भी बीत गए.
लाल कोट, महरौली, सिरी, तुग़लकाबाद, फ़िरोज़ाबाद, दीन पनाह और शाहजहानाबाद नाम के ये सात शहर आज भी खंडहर बन चुकी अपनी निशानियों की ज़बानी दिल्ली के बसने और उजड़ने की कहानियां कहते हैं.
दिल्ली भले ही हमारे दिलो-दिमाग़ पर राजधानी के रुप में छाई हो लेकिन इतिहास गवाह है कि मुग़लों के दौर में भी जो रुतबा आगरा और लाहौर का रहा वो दिल्ली को कम ही नसीब हुआ.
ये सिलसिला आखिरकार 1911 में ख़त्म हुआ जब अंग्रेज़ प्रशासित भारत की राजधानी को कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित करने की घोषणा हुई. इसी के साथ शुरु हुई ‘शाहजहानाबाद’ यानि पुरानी दिल्ली को 'नई दिल्ली' का रुप देने की क़वायद.
पुरानी दिल्ली के लिए क्या कुछ बदलने वाला था इसकी आहट दिल्ली दरबार की तैयारियों पर एक नज़र से मिलती है.

गहरा राज़

1911 में हुए दिल्ली दरबार का ये वो दौर था जब अंग्रेज़ों का विरोध शुरु हो चुका था और कलकत्ता इन गतिविधियों का गढ़ बन रहा था. स्वराज की सुगबुगाहट के बीच किंग जॉर्ज पंचम ने भारत की जनता से सीधा रिश्ता कायम करने की नज़र से अपने राज्याभिषेक के लिए दिल्ली दरबार सजाया. लेकिन एक तीर से दो निशाने साधते हुए इस अवसर पर दिल्ली को भारत की राजधानी घोषित करने का निर्णय अंतिम समय तक एक राज़ रखा गया.
"''अंग्रेज़ों ने जब दिल्ली के बारे में सोचा तो उन्हें लगा कि ये बेहद सुंदर शहर है और इसका इतिहास इतना पुराना है कि इसे राजधानी बनाने के ज़रिए वो भी इस इतिहास से जुड़ जाएंगे. किसी ने उन्हें यह भी याद दिलाया कि दिल्ली में जो राज करता है बहुत दिन तक उसका राज्य टिकता नहीं लेकिन अंग्रेज़ अपना मन बना चुके थे.'' "
नारायनी गुप्ता इतिहासकार
अंग्रेज़ी सरकार नहीं चाहती थी इस महत्वपूर्ण आयोजन में कोई भी चूक रंग में भंग डाले.
ये आयोजन जिस शानो-शौकत और सटीक योजनाबद्ध तरीके से किया गया उसका आज भी कोई सानी नहीं.
आयोजन इतना भव्य था कि इसके लिए शहर से दूर बुराड़ी इलाके को चुना गया और अलग-अलग राज्यों से आए राजा-रजवाड़े, उनकी रानियां, नवाब और उनके कारिंदों सहित भारतभर से 'अतिविशिष्ट' निमंत्रित थे.
लोगों के ठहरने के लिए हज़ारों की संख्या में लगाए गए अस्थाई शिविरों के अलावा दूध की डेरियों, सब्ज़ियों और गोश्त की दुकानों के रुप में चंद दिनों के लिए शहर से दूर मानो एक पूरा शहर खड़ा किया गया.
जॉर्ज पंचम और क्वीम मैरी की सवारी चांदनी चौक में आम लोगों के बीच से गुज़री ताकि जनता न सिर्फ़ अपने राजा को एक झलक देख सके बल्कि अंग्रेज़ी साम्राज्य की शानो-शौकत से भी रूबरू हो. जिस रास्ते से किंग जॉर्ज और क्वीन मैरी का काफ़िला गुज़रा वो आज भी किंग्सवे-कैंप के रुप में जाना जाता है.

लाइटों से जगमगा उठी दिल्ली

शाहजहां की बसाई पुरानी दिल्ली का एक चित्र लेकिन अंग्रेज़ों की बसाई नई दिल्ली में पुरानी दिल्ली कहीं शामिल न हो सकी.
दरबार के पहले और बाद में शरारती तत्वों को दूर रखने के लिए व्यापक स्तर पर गिरफ़्तारियां की गईं. सार्वजनिक अवकाश घोषित हुआ और हर तरफ पुलिस की नाकेबंदी ने आम लोगों को खास लोगों के स्वागत के लिए पहले ही सावधान कर दिया.
दरबार के अगले दिन राजधानी बनी दिल्ली, जश्न के रुप में लाइटों से जगमगा उठी और इस मौके पर अंग्रेज़ प्रशासन ने आम लोगों से भी अपने घरों को रौशन करने का आग्रह किया. इसके लिए शहर में अतिरिक्त बिजली का विशेष इंतज़ाम किया गया था.
1911 की उस ऐतिहासिक घोषणा के बाद अंग्रेज़ों ने नई दिल्ली को नींव रखी और इस शहर को देश की राजधानी का जामा पहनने की जो कवायद शुरु की वो आज तक जारी है.
विशालयकाय भवन, चौड़ी सड़कें, दफ्तर, क्वार्टर, विश्वविद्यालय हर तरफ़ अंग्रेज़ अपनी छाप छोड़ना चाहते थे और इसकी जीती जागती निशानियां बनीं 'वायसराय हाउस' और 'नेशनल वॉर मेमोरियल' जैसी इमारतें जिन्हें हम आज 'राष्ट्रपति भवन' और 'इंडिया गेट' के नाम से जानते हैं.
दिल्ली की इस कायापलट पर इतिहासकार नारायनी गुप्ता कहती हैं, ''अंग्रेज़ों ने जब दिल्ली के बारे में सोचा तो उन्हें लगा कि ये बेहद सुंदर शहर है और इसका इतिहास इतना पुराना है कि इसे राजधानी बनाने के ज़रिए वो भी इस इतिहास से जुड़ जाएंगे. किसी ने उन्हें यह भी याद दिलाया कि दिल्ली में जो राज करता है बहुत दिन तक उसका राज्य टिकता नहीं लेकिन अंग्रेज़ अपना मन बना चुके थे.''
किंग जॉर्ज पंचम
दिल्ली के बुराड़ी इलाके में मौजूद कॉरोनेशन पार्क में बीहड़ के बीच किंग जॉर्ज पंचम सहित कई अंग्रेज़ अधिकारियों की मूर्तियां मौजूद हैं.
लेकिन किवदंतियों और इतिहास का रिश्ता शायद पुराना है. 1931 को उसी वायसराय हाउस में ऐतिहासिक गांधी-इरविन समझौते पर हस्ताक्षर हुए और 1947 में आज़ाद हुए भारत ने पहली नज़र में दिल्ली को अपनी राजधानी बना लिया.

क्या ये वही दिल्ली है?

तब से आजतक ये शहर अपने शासकों की महत्वाकांक्षा और उनकी राजनीतिक मंशाओं पर ख़रा उतरने की होड़ में आगे बढ़ता रहा है. भले ही इस क्रम में अकसर यहां रहने वालों की ज़रूरतें पिछड़ गईं.
लेकिन सवाल ये है कि ये दिल्ली क्या वही दिल्ली है जिसका सपना कभी शाहजहां ने देखा था, वो दिल्ली जिसे अंग्रेज़ों ने बड़ी हसरत से अपने रंग में रंगा, वो दिल्ली जो आज़ाद भारत के लिए जिजीविषा और राष्ट्रीयता का प्रतीक बन गई है.
सवाल ये भी है कि राजधानी होने के नाते दिल्ली पर ‘राष्ट्रीयता’ का भार कहीं इतना तो नहीं कि उसकी अपनी पहचान, उसकी संस्कृति इसके बोझ तले कहीं दब कर रह गई है. सवाल ये भी कि राजीव चौक, लाजपत नगर और विवेकानंद मार्गों के बीच दिल्ली में ‘अमीर-ख़ुसरो रोड’ या ‘ग़ालिब-गली’ के लिए कोई जगह क्यूं नहीं है.
बीबीसी की विशेष श्रंखला 'दिल्ली: कल आज और कल' इन्हीं सवालों के जवाब की एक कड़ी है.
ये कहानी है एक ऐसी राजधानी की जो अपने गदले-मैले कपड़ों को मखमल के शॉल में छिपाए हर मंच पर भारत का प्रतिनिधित्व कर रही है.

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मेरी अमिताभ बच्चन से पहली मुलाकात उस वक्त हुई थी जब वो फिल्मों में नहीं आए थे.
दिल्ली में एक समारोह के दौरान मैं उनकी मां तेजी बच्चन से मिला. उन दिनों में मैं मनोज कुमार का असिस्टेंट हुआ करता था. मुझे याद है कि मेरे साथ गायक महेंद्र कपूर भी थे.
तब तेजी जी ने एक लंबे, दुबले पतले शख्स की तरफ इशारा करते हुए कहा, "ये मुन्ना है. अब ये भी आपकी बिरादरी में आ रहा है. थोड़ा ध्यान रखिएगा इसका.' वो अमिताभ को मुन्ना कहती थीं.
ये मेरी अमित यानि अमिताभ बच्चन से पहली मुलाकात थी. फिर मुंबई में हम सब मनोज कुमार की फिल्म 'यादगार' की शूटिंग में व्यस्त हो गए.
अमिताभ बच्चन रोजाना फिल्मिस्तान स्टूडियो आते. दिन भर चुपचाप बैठकर शूटिंग देखते और वापस चले जाते.
तब मैंने मनोज कुमार से कहा,"इसकी मां से हमने कहा है कि फिल्म देंगे. अगर आपको इन्हें फिल्म ऑफर करनी है तो कर दीजिए वर्ना अच्छा नहीं लगता बेचारा रोज आता है, और शाम को वापस चला जाता है."

गरिमामयी व्यक्तित्व

सोचिए, संघर्ष के दिनों में भी अमित का व्यक्तित्व बड़ा गरिमामयी था और वो किसी से काम मांगते नहीं थे.
तब मनोज कुमार ने उन्हें 'रोटी, कपड़ा और मकान' फिल्म ऑफर की और मेरी और अमित की दोस्ती वहीं से शुरू हो गई. मैं उसे टाइगर बुलाता हूं.
मुझे याद है ज़ंजीर का प्रीमियर कोलकाता में होना था. उस वक्त कोलकाता में किसी फिल्म के प्रीमियर पर लाठीचार्ज हो जाए तो उसे हिट समझा जाता था.
तब अमित ने फैसला किया कि अगर फिल्म हिट हो गई तो वो जया के साथ लंदन घूमने जाएगा. प्रीमियर के दौरान लोगों की सचमुच भयानक भीड़ हो गई और पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा.
"टाइगर रिश्तों को निभाना बखूबी जानता है. 40 सालों से उसका मेक-अप मैन वही है. अपने निजी ड्राइवर की मौत के बाद उसके बेटे को ड्राइवर रखा. उसके घर में जो फंक्शन होता है उसमें मुझे 40 सालों से कम से कम 10-12 चेहरे नियमित तौर पर नजर आते ही हैं."
तब मैंने टाइगर से कहा कि प्यारे, तेरी लंदन ट्रिप तो पक्की हो गई. फिल्म सुपरहिट हो गई.
अमित ने अपने पिताजी से कहा कि मैं, चंद्रा बारोट और जया लंदन जा रहे हैं. तब उनके पिता ने कहा जया से शादी किए बगैर मैं तुम दोनों को लंदन जाने की इजाज़त नहीं दे सकता.
तब एक दिन अमित ने मेरे घर का दरवाजा खटखटाया और कहा, "चंद्रा, मैं शादी कर रहा हूं."
'डॉन' बनने की कहानी बड़ी दिलचस्प है. फिल्म के निर्माता नरीमन ईरानी उन दिनों बड़े आर्थिक संकट से जूझ रहे थे.
उन पर 12 लाख रुपए का कर्ज था जो उन दिनों बड़ी रकम हुआ करती थी. तब मैंने, अमित ने और सलीम-जावेद ने मिलकर तय किया कि इन्हें इस संकट से उबारना चाहिए.
'डॉन' बनने में तीन साल लगे. फिल्म जबरदस्त हिट साबित हुई. लेकिन, हम में से किसी को उस वक्त नहीं लगा था कि ये फिल्म इतनी चलेगी.
फिल्म का सुपरहिट गाना 'खई के पान बनारस वाला' पहले इसका हिस्सा नहीं था. लेकिन बाद में हमने मनोज कुमार की सलाह पर ये गाना फिल्म में डाला.

रिश्तों की अहमियत

टाइगर (अमिताभ बच्चन) रिश्तों को निभाना बखूबी जानता है. 40 सालों से उसका मेक-अप मैन वही है. अपने निजी ड्राइवर की मौत के बाद उसके बेटे को ड्राइवर रखा. उसके घर में जो फंक्शन होता है उसमें मुझे 40 सालों से कम से कम 10-12 चेहरे नियमित तौर पर नजर आते ही हैं.
वो बहुत बड़ा हनुमान भक्त भी है.
जब अमित की बेटी श्वेता का जन्म हुआ था, तो मैंने उसकी तस्वीर ली. फिर जब श्वेता की बच्ची हुई तो उसने मुझे फोन करके कहा, चंद्रा अंकल. आपने मेरी तस्वीर ली थी. अब मेरी बेटी की तस्वीर नहीं लोगे ! मैं भागता हुआ अस्पताल गया और उसकी बेटी की तस्वीर खींची.
न्यूयॉर्क में एक बार बड़ा दिलचस्प वाकया हुआ. अमित का एक कॉन्सर्ट था. तब वहां की सुरक्षा में तैनात एक अमरीकी पुलिस वाले ने मुझसे पूछा कि ये शख्स है कौन. तो मैंने पूछा, क्यों, क्या हुआ. तब उस पुलिस वाले ने जवाब दिया कि मुझे इस कॉन्सर्ट से पहले पता ही नहीं था कि अमरीका में इतने भारतीय और एशियाई लोग रहते हैं.
मैं प्रार्थना करता हूं, कि मेरा टाइगर इसी तरह से प्रगति के पथ पर बढ़ता चला जाए. और जैसा कि मैं हमेशा कहता हूं, फिर कहूंगा, "अभी उसका सर्वश्रेष्ठ आना बाकी है."

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क्या वेश्यावृति भी किसी औरत को आज़ादी का एहसास दिला सकती है. और क्या इससे महिला सशक्तिकरण की भावना पैदा हो सकती है. आपकी राय चाहे जो भी हो लेकिन कभी
यूँ तो रॉबर्ट वाड्रा उस समय से ही चर्चा में आ गए थे जब उन्होंने भारत के भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी और सबसे प्रभावशाली महिला सोनिया गाँधी की बेटी प्रियंका गाँधी से शादी की थी.
उस वक्त भारत का ये नवविवाहित जोड़ा न सिर्फ चर्चा में रहा बल्कि लोग जानना चाहते थे कि ये रॉबर्ट वाड्रा हैं कौन?
रॉबर्ट वाड्रा का दरअसल हैंडीक्राफ्ट आइटम्स और कस्टम आभूषणों का कारोबार है और उनकी कंपनी का नाम है आर्टेक्स एक्सपोर्ट्स.
इसके अलावा भी रॉबर्ट वाड्रा की कई कंपनियों में भागीदारी है.

परिवार

रॉबर्ट वाड्रा 18 अप्रैल 1969 में उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद शहर में पैदा हुए. मुरादाबाद भारत में पीतल के काम के लिए प्रसिद्ध है. उनके पिता राजेंद्र वाड्रा पीतल व्यवसायी थे और माँ मूलत: स्कॉटलैंड की रहने वाली है.
मूल रुप से वाड्रा परिवार पाकिस्तान के सियालकोट से है, भारत विभाजन के समय राजेंद्र वाड्रा के पिता यानि रॉबर्ट वाड्रा के दादा भारत आकर बस गए.
रॉबर्ट वाड्रा के एक भाई और एक बहन थीं.
2001 में उनकी बहन की कार दुर्घटना में मौत हो चुकी है और 2003 में उनके भाई ने आत्महत्या की थी. 2009 में उनके पिता की हृदयगति रुक जाने से मृत्यु हो गई. अब वाड्रा परिवार में उनकी माँ ही उनके साथ है.
कहा जाता है कि रॉबर्ट अपनी मां के बेहद करीब हैं और उनकी माँ का कहना है कि रॉबर्ट और प्रियंका गलत वजहों से सुर्खियों में आते हैं.
रॉबर्ट वाड्रा के एक बेटा और एक बेटी है.
रॉबर्ट वाड्रा और प्रियंका गांधी की मुलाकात 1991 में दिल्ली में एक कॉमन फ्रेंड के घर पर हुई थी. बाद में दोनों की नज़दीकियां बढ़ीं और दोनों ने 18 फरवरी, 1997 को शादी कर ली. प्रियंका से विवाह करने के बाद रॉबर्ट वाड्रा का जीवन ही बदल गया.

विवादों से पाला

रॉबर्ट ने हाल ही में उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनावों में पत्नी प्रियंका के साथ अमेठी और रायबरेली में चुनाव प्रचार में भी हिस्सा लिया
कहा जाता है कि रॉबर्ट के प्रियंका से शादी से फैसले को उनके परिवार ने पसंद नहीं किया और इसके चलते पिता-पुत्र के रिश्तों में दरार भी आ गई.
अपने पिता के साथ संबंध बिगड़ने पर रॉबर्ट वाड्रा सुर्खियों में आ गए. एक दौर ऐसा भी आया जब 2001 में उन्होंने एक सार्वजनिक बयान देकर खुद को अपने पिता से अलग कर लिया.
रॉबर्ट के पिता राजेंद्र वाड्रा पर आरोप था कि उन्होंने उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी में नौकरी लगवाने के नाम पर लोगों को धोखा दिया.
2001 में ही उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव के दौरान रॉबर्ट की बाइक रैली को एक आईएएस अधिकारी ने रोक दिया था. बाद में उस आईएएस अधिकारी का तबादला एक बार फिर उन्हें विवादों में ले आया
रॉबर्ट ने हाल ही में संपन्न हुए उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनावों में अपनी पत्नी प्रियंका के साथ अमेठी और रायबरेली में चुनाव प्रचार में भी हिस्सा लिया.

ताजा विवाद

अब भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन चला रहे अरविंद केजरीवाल, प्रशांत भूषण और उनके पिता शांति भूषण ने रॉबर्ट वाड्रा पर आरोप लगाया है कि एक बड़े रियल एस्टेट डेवलपर डीएलएफ़ समूह ने गलत तरीकों से रॉबर्ट वाड्रा को 300 करोड़ रुपयों की संपत्तियाँ कौड़ियों के दामों में दे दीं.
रॉबर्ट वाड्रा मोटर साइकिलों और कारों के भी शौकीन हैं. कहा जाता है कि वाड्रा के पास कई शानदार विदेशी कारों के अलावा मोटर साइकिलें भी हैं.
व्यापार के साथ साथ रॉबर्ट वाड्रा फिटनेस और फैशन में भी काफी दिलचस्पी रखते हैं.
दिसंबर 2011 में रॉबर्ट वाड्रा को एक अंग्रेजी अखबार ने बेस्ट ड्रेस्ड मैन का खिताब दिया था. ख़ुद एक वेश्या रह चुकीं डॉक्टर ब्रुक मैगनानटी ऐसा ही मानती हैं

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Dan at WordPress.com News - 3 days ago
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Sunday, 7 October 2012

wiki


blog (a portmanteau of the term web log)[1] is a discussion or informational site published on the World Wide Web and consisting of discrete entries ("posts") typically displayed in reverse chronological order (the most recent post appears first). Until 2009 blogs were usually the work of a single individual, occasionally of a small group, and often were themed on a single subject. More recently "multi-author blogs" (MABs) have developed, with posts written by large numbers of authors and professionally edited. MABs from newspapers, other media outlets, universities, think tanks, interest groups and similar institutions account for an increasing quantity of blog traffic. The rise of Twitter and other "microblogging" systems helps integrate MABs and single-author blogs into societal newstreams. Blog can also be used as a verb, meaning to maintain or add content to a blog.
The emergence and growth of blogs in the late 1990s coincided with the advent of web publishing tools that facilitated the posting of content by non-technical users. (Previously, a knowledge of such technologies as HTML and FTP had been required to publish content on the Web.)
Although not a requirement, most good quality blogs are interactive, allowing visitors to leave comments and even message each other via GUI widgets on the blogs, and it is this interactivity that distinguishes them from other static websites.[2] In that sense, blogging can be seen as a form of social networking. Indeed, bloggers do not only produce content to post on their blogs, but also build social relations with their readers and other bloggers.[3]
Many blogs provide commentary on a particular subject; others function as more personal online diaries; others function more as online brand advertising of a particular individual or company. A typical blog combines text, images, and links to other blogs, Web pages, and other media related to its topic. The ability of readers to leave comments in an interactive format is an important contribution to the popularity of many blogs. Most blogs are primarily textual, although some focus on art (art blogs), photographs (photoblogs), videos (video blogs or "vlogs"), music (MP3 blogs), and audio (podcasts). Microblogging is another type of blogging, featuring very short posts. In education, blogs can be used as instructional resources. These blogs are referred to as edublogs.
As of 16 February 2011, there were over 156 million public blogs in existence.[4] As per the latest survey report till July 2012; there are around 70 million WordPress and 39 million timber active bogs present in the worldwide.[5]